8 सितंबर 2019

सोलह सिद्धियाँ - १

आप सब ने महावीर हनुमान की अष्ट सिद्धियों के बारे में पढ़ा। इसके अतिरिक्त हमारे पुराणों में १६ मुख्य सिद्धियों का वर्णन किया गया है। किसी एक व्यक्ति में सभी १६ सिद्धियों का होना दुर्लभ है। केवल अवतारी पुरुष, जैसे श्रीराम, श्रीकृष्ण इत्यादि में ही ये सारी सिद्धियाँ हो सकती है। साथ ही बहुत सिद्ध ऋषियों जैसे सप्तर्षियों में ये साडी सिद्धियाँ हो सकती है। आइये इन सिद्धियों के विषय में कुछ जानते हैं:
  1. वाक् सिद्धि: ऐसी सिद्धि जिससे वो व्यक्ति जो कुछ भी कहे वो घटित हो जाये। पुराने काल में सिद्ध ऋषि-मुनियों में ये सिद्धि होती थी और इसी कारण वे श्राप या वरदान देने में सक्षम थे। सिर्फ सिद्ध ऋषि ही नहीं, कुछ असाधारण व्यक्तियों में भी ऐसी शक्तियां होती थी। जैसे शांतनु ने अपने पुत्र भीष्म को इच्छा मृत्यु और और द्रोण ने अपने पुत्र अश्वत्थामा को चिरंजीवी होने का वरदान दिया। कई बार जब व्यक्ति अपने चरम आवेग में होता है तब भी उसके मुख से निकली हुई बात सच हो जाती है।
  2. दिव्य दृष्टि: दिव्य दृष्टि उस शक्ति को कहते हैं जिससे आप किसी भी व्यक्ति के भूत, वर्तमान एवं भविष्य का ज्ञान हो जाये। दिव्य दृष्टि और त्रिकालदर्शी होने में अंतर है। दिव्य दृष्टि में सभी कुछ आँखों के सामने होता दीखता है चाहे वो कही भी घटित हो रहा हो। पुराने ज़माने में सिद्ध ऋषियों के पास ये सिद्धि होती थी। श्रीकृष्ण ने गीताज्ञान के लिए अर्जुन को और महर्षि व्यास ने संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की थी। सभी प्रमुख देवताओं और सप्तर्षियों में ये सिद्धि स्वाभाविक रूप से होती है।
  3. प्रज्ञा सिद्धि: इस सिद्धि के साधक के पास संसार का सारा ज्ञान होता है। वो ज्ञान, प्रज्ञा, स्मरणशक्ति, बुद्धि इत्यादि को अपनी बुद्धि में समेत लेता है। इसका एक उदाहरण महर्षि व्यास हैं जिन्होंने महाभारत जैसे महान ग्रन्थ की रचना की जिसके बारे में ये कहा गया है कि जो कुछ भी यहाँ है वो संसार में है और जो यहाँ नहीं वो संसार में कही नहीं है। इसके अतिरिक्त श्रीराम और श्रीकृष्ण को भी इस संसार के सभी चीजों का ज्ञान था। उनके अतिरिक्त पितामह भीष्म का ज्ञान भी अथाह था।
  4. दूरश्रवण: इस सिद्धि को प्राप्त करने के बाद साधक कही भी हो रहे किसी भी वार्तालाप को सुन सकता है। इसके अतिरिक्त तो वार्तालाप भूतकाल में हो चुका हो उसे भी अगर पुनः सुनना चाहे तो वो सुन सकता है। सिद्ध ऋषियों में ये सिद्धि हुआ करती थी। महावीर हनुमान के पास भी ये सिद्धि थी। कुछ मायावी राक्षसों के पास भी ऐसी सिद्धियाँ होती थी।
  5. जलगमन: इस सिद्धि को प्राप्त साधक जल पर ऐसे ही विचरण कर सकता है जैसे वो भूमि पर विचरण करता है। सिद्ध ऋषियों के पास ये सिद्धि होती थी। महर्षि अगस्त्य ने तो समुद्र पर खड़े होकर उसका पान कर लिया था। अधिक दूर क्यों जाएँ, आज से १०० वर्ष पहले भी ऐसे कई सिद्ध पुरुष थे जिनके पास ये सिद्धियाँ हुआ करती थी और वे जल में स्वच्छद विचरण कर सकते थे।
  6. वायुगमन: इस सिद्धि को प्राप्त करने के बाद साधक वायुमार्ग से कही भी जा सकता है। वे अपने रूप को सूक्ष्म बना कर एक लोक से दूसरे लोक में भी गमन कर सकता है। उनकी गति इतनी तीव्र होती है कि वे तत्काल ही एक स्थान से दूसरे स्थान तक जा सकते हैं। बजरंगबली इस सिद्धि के एक जीवंत उदाहरण हैं। उनके अतिरिक्त मायावी राक्षसों में भी ये सिद्धि हुआ करती थी। मेघनाद ने इस सिद्धि के बल पर आकाश में रह कर लक्ष्मण से युद्ध किया था।
  7. अदृश्यकरण: जैसा कि इसके नाम से पता चलता है, इस सिद्धि को प्राप्त साधक अपने आप को अदृश्य कर सकता है और उसी रूप में किसी भी स्थान पर जा सकता था। मायावी राक्षसों के पास ये सिद्धि हुआ करती थी। इसी सिद्धि के बल पर रावण के पुत्र मेघनाद ने अदृश्य होकर लक्ष्मण से युद्ध किया था और श्रीराम और लक्ष्मण को नागपाश से बांध दिया था। इसके अतिरिक्त कई सिद्ध ऋषि अदृश्य होकर विभिन्न स्थानों पर विचरण कर सकते थे।
  8. विषोका: इस सिद्धि को प्राप्त साधक अपने आप को अनेक रूप में परिवर्तित कर सकता है। ऐसा व्यक्ति एक स्थान पर किसी एक रूप में और दूसरे स्थान पर किसी अन्य रूप में उपस्थित रह सकते हैं। आधुनिक काल में ऐसे व्यक्तियों को ऐय्यार कहा जाता है। राक्षसों में ये सिद्धि हुआ करती थी। श्रीकृष्ण ने अपनी माया से ऐसा कई बार किया था जब वे एक ही समय पर कई स्थानों पर उपस्थित रहते थे। इस सिद्धि के बल पर श्रीकृष्ण एक साथ अपनी १६१०८ रानियों के साथ उपस्थित रहते थे।
...शेष

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