26 सितंबर 2019

दस दिशाएं - २

पिछले लेख में आपने उर्ध्व, दक्षिण, पूर्व, ईशान एवं आग्नेय दिशाओं के बारे में पढ़ा। इस लेख में हम अन्य ५ दिशाओं के बारे में जानेंगे।

६. नैऋत्य: दक्षिण और पश्चिम दिशा के मध्य के स्थान को नैऋत्य कहा गया है। यह दिशा सूर्यदेव के आधिपत्य में है और इस दिशा के स्वामी राहु हैं। शिवानी देवी इस दिशा की अधिष्ठात्री हैं। इस दिशा में पृथ्वी तत्व प्रमुख रूप से विद्यमान रहता है इसी कारण घर की भारी वस्तुएं इस दिशा में रखनी जाहिए। इस दिशा में जल तत्व को रखने की मनाही है। अर्थात इस दिशा में कुआँ, बोरिंग, गड्ढे इत्यादि नहीं होना चाहिए। सूर्यदेव के संरक्षण में होने के कारण इस दिशा को वास्तु के अनुसार सही रखने पर जीवन में सफलता प्राप्त होती है।

७. पश्चिम: ये दिशा पूर्व दिशा की विरोधाभासी दिशा है। जहाँ भगवान सूर्यनारायण पूर्व से प्रकट होते हैं, वही पश्चिम में अस्त होते हैं। ये दिशा वरुणदेव के संरक्षण में है और शनिदेव इस दिशा के स्वामी है। ये दिशा प्रसिद्धि, भाग्य और ख्याति की प्रतीक है। इस दिशा को वास्तु के अनुसार अनुकूल रखने पर मनुष्य पर शनि की कुदृष्टि नहीं पड़ती है। वास्तु के अनुसार इस दिशा में घर का मुख्‍य द्वार होना चाहिए। साथ ही वो द्वार सदैव स्वच्छ रखना चाहिए। अगर द्वार में किसी प्रकार की दरार हो तो उसे तुरंत बदल दें। मुख्य द्वार पर किसी भी प्रकार के रंग का उपयोग किया जा सकता है किन्तु गहरा रंग विशेष फल देता है। इस दिशा में मुख्य शयनकक्ष, शौच इत्यादि नहीं होना चाहिए। ये स्थान ना ज्यादा खुला हो और ना ही पूरी तरह बंद। 

८. वायव्य: वायुदेव के अधिकार वाली ये दिशा आपके पारिवारिक और मित्रता संबंधों पर विशेष प्रभाव डालती है। जिस स्थान पर उत्तर और पश्चिम दिशा मिलती है उसे ही वायव्य कहा जाता है। इस दिशा में वायु तत्व की प्रधानता रहती है इसी कारण ये स्थान सदैव खुला होना चाहिए ताकि वायु का आवागमन उचित रूप से होता रहे। अच्छा हो अगर आप इसे घर का सबसे हल्का हिस्सा बना कर रखें। इस दिशा में छोटी घंटियाँ लगाने से विशेष फल प्राप्त होता है। वायु के संपर्क में आने से जब घंटियाँ बजती है तो वो पूरे घर में सकारात्मकता का प्रवाह करती है। इस अतिरिक्त इस दिशा में पेड़-पौधे भी लगाना चाहिए ताकि वहाँ की वायु सदैव शुद्ध एवं स्वच्छ बनी रहे। ऐसा करने पर मनुष्य को उसकी इच्छित वस्तु प्राप्त होती है।

९. उत्तर: उत्तर दिशा के अधिपति रावण के बड़े भाई कुबेर हैं। कुबेर देवताओं के कोषाध्यक्ष भी हैं और इसी कारण इस दिशा का आपकी आर्थिक हालत पर बड़ा प्रभाव होता है। इस दिशा के स्वामी ग्रह बुध हैं और उनकी पत्नी इला इस दिशा की अधिष्ठात्री देवी हैं। इस दिशा का महत्त्व बहुत अधिक है और इसी कारण इसे "मातृ स्थान" भी कहा जाता है। ईशान दिशा के अतिरिक्त अगर घर का मुख्य द्वार उत्तर दिशा में हो तो वो बड़ा शुभ होता है। इस स्थान को कभी भर कर नहीं रखना चाहिए। अगर संभव हो तो इस दिशा की ओर कच्ची भूमि छोड़ देना चाहिए। ऐसा करना बहुत ही समृद्धिदायक होता है। अगर इस दिशा को गन्दा रखा गया तो ये मनुष्य की धन संपत्ति का नाश कर उनके दुर्भाग्य का कारण बनता है। अतः इस दिशा को सदैव साफ सुथरा रखना चाहिए और किसी प्रकार की अपवित्र वस्तु यहाँ नहीं रखनी चाहिए।

१०. अधो: जो इस पुरे ब्रह्माण्ड को आधार प्रदान करते हैं वो शेषनाग इस दिशा के अधिपति हैं। पुराणों में शेषनाग के स्वामी भगवान विष्णु को इस दिशा का दिक्पाल कहा गया है। जब भी कोई नया घर बनता है तो सर्वप्रथम धरती की वास्तु शांति की जाती है। कहा जाता है कि घर बनाने के लिए सदैव सकारात्मक ऊर्जा वाली भमि का चयन करना चाहिए। सुनसान अथवा कब्रिस्तान के पास की भूमि तो कदापि घर बनाने के लिए शुभ नहीं होती है। इस दिशा को अनुकूलित बनाने के बाद जीवन का आधार पुष्ट होता है उसमें स्थिरता आती है। इस दिशा को सदैव साफ़ सुथरा रखना चाहिए। जो भूमि पूर्व दिशा और आग्नेय कोण में ऊंची तथा पश्चिम तथा वायव्य कोण में धंसी हुई हो, ऐसी भूमि पर निवास करने वालों के सभी कष्ट दूर होते रहते हैं। अतः जब भी घर का निर्माण करना हो तो भूमि का चयन बहुत सोच समझ कर करना चाहिए।

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