24 सितंबर 2019

दस दिशाएं - १

पिछले लेख में आपने १० दिशों के दिक्पालों के बारे में विस्तार से पढ़ा। आज हम उन १० दिशाओं के महत्त्व के बारे में जानेंगे। 
  1. उर्ध्व: इस दिशा के देवता स्वयं परमपिता ब्रह्मा हैं। उर्ध्व का अर्थ आकाश है और जो कोई भी उर्ध्व की ओर मुख कर सच्चे मन से ईश्वर की प्रार्थना करता है, उसे उसका फल अवश्य प्राप्त होता है। वेदों में ऐसा लिखा है कि अगर कभी भी कुछ मांगना हो तो ब्रह्म और ब्रह्माण्ड से ही मांगना चाहिए। उनसे की हुई हर प्रार्थना स्वीकार होती है। हमारे घर की छत, छज्जे, रोशनदान एवं खिड़कियां इस दिशा का प्रतिनिधित्व करते हैं। कहा जाता है कि कभी भी आकाश की ओर देख कर अपशब्द नहीं बोलना चाहिए, आकाश की ओर कुछ फेंकना, थूकना, चिल्लाना इत्यादि वर्जित है। जिस प्रकार आकाश की ओर फेंकी हुई कोई भी चीज वापस आपके पास ही आती है उसी प्रकार आकाश की ओर देखकर की गयी प्रार्थना आप पर सकारात्मक प्रभाव डालती है और आपका जीवन खुशहाल हो जाता है। दूसरी ओर अगर आप आकाश की ओर देख कर अपशब्द कहते हैं अथवा बद्दुआ देते हैं तो वो वापस आपके ही जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डालती है और उसे दुखों से भर देती है।
  2. दक्षिण: इस दिशा के दिक्पाल सूर्यपुत्र यम हैं और इसके स्वामी मंगल ग्रह है। ये दिशा बहुत पवित्र मानी जाती है और अगर वास्तु के अनुसार इस दिशा का निर्माण किया जाये तो परिवार में सुख और सम्पन्नता बढ़ती है और मनुष्य प्रसिद्धि और समृद्धि प्राप्त करता है। इस दिशा में घर का मुख्य द्वार नहीं होना चाहिए और कोई भी भारी सामान इसी दिशा में रखना चाहिए। ये स्थान कभी खाली भी नहीं छोड़ना चाहिए। वास्तु अनुसार इस दिशा को सुसज्जित रखने से यम और मंगल दोनों प्रसन्न होते हैं और मनुष्य की कभी अकालमृत्यु नहीं होती। 
  3. पूर्व: जो हमें जीवन देते हैं वो भगवान सूर्यनारायण पूर्व दिशा से ही निकलते हैं। इसी कारण इसका महत्त्व बहुत अधिक है। पूर्व और ईशान दिशा का भी सम्बन्ध होता है। जब सूर्य उत्तरायण में होता है तो वो पूर्व नहीं बल्कि ईशान दिशा से ही निकलता है। ये समय अत्यंत ही शुभ माना जाता है। यही कारण है कि शरशैया पर होने के बाद भी पितामह भीष्म अपने शरीर को त्यागने के लिए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा करते रहे। इस दिशा के दिक्पाल इंद्र और स्वामी सूर्य हैं। ये दिशा पितृस्थान भी माना जाता है। वास्तु के अनुसार पूर्व दिशा खुला-खुला होना चाहिए। अगर उस स्थान पर खिड़की हो जिससे सूर्योदय को देखा जा सके तो उससे अच्छा कुछ नहीं। पूर्व की ओर मुख्यद्वार होना भी बहुत शुभ माना जाता है। इस दिशा में बुजुर्गों का कमरा नहीं होना चाहिए और ना ही यहाँ सीढियाँ नहीं बनानी चाहिए। 
  4. ईशान: वैसे तो ईशान दिशा के दिक्पाल सोम (चन्द्रमा) हैं किन्तु इस दिशा का स्वामी स्वयं महाकाल भगवान शिव को माना जाता है। यही कारण है कि भगवान शंकर का एक नाम ईशान भी है। पूर्व और उत्तर की दिशाएं जहाँ मिलती हैं वो दिशा ईशान कहलाती है। हमारे घर में इस दिशा को ईशान कोण कहा जाता है और ये स्थान सबसे पवित्र माना जाता है। इसीलिए इस स्थान को सदैव स्वच्छ रखना चाहिए। यदि ये स्थान खाली रहे तो और भी अच्छा है। अगर कुछ रखना ही हो तो इस दिशा में जल की स्थापना रखनी चाहिए। यहाँ पर जल से भरा मटका, पीने का पानी रख सकते हैं और अगर चाहें तो कुँए या बोरिंग भी इस दिशा में खुदवा सकते हैं। इस दिशा में कभी भी कचरा नहीं रखना चाहिए और साथ ही स्टोर, शौच स्थान या रसोईघर नहीं बनाना चाहिए। ऐसा करने से दुर्भाग्य आपके यहाँ घर कर लेता है।
  5. आग्नेय: दक्षिण और पूर्व दिशा जहाँ मिलती हैं उसे आग्नेय कोण कहते हैं। देव अग्नि इस दिशा के दिक्पाल हैं और शुक्र ग्रह इसके स्वामी हैं। वास्तु के अनुसार अगर आपके घर में रसोई आग्नेय कोण में हो तो वो सर्वोत्तम है। इससे घर में कभी धन-धान्य की कमी नहीं होती है। अपने घर के इलेक्ट्रॉनिक उपकरण भी आप इस कोण में रख सकते हैं। इस दिशा में आपके सोने का कमरा या बच्चों की पढाई का स्थान नहीं होना चाहिए। घर का मुख्यद्वार भी कभी इस दिशा में ना बनायें। ऐसा करने से घर में कलह बढ़ता है सदस्यों को स्वस्थ सम्बन्धी समस्याएं भी होती हैं। 

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