9 अगस्त 2019

तिरुपति बालाजी - १

शायद ही कोई ऐसा हो जिसने तिरुपति बालाजी का नाम ना सुना हो। इसे दक्षिण भारत के सब बड़े और प्रसिद्ध मंदिर के रूप में मान्यता प्राप्त है। दक्षिण भारत के अतिरिक्त अन्य राज्यों में भी इस मंदिर की बहुत मान्यता है। यह एक ऐसा मंदिर है जहाँ भगवान विष्णु मनुष्य रूप में  विद्यमान हैं जिन्हे "वेंकटेश" कहा जाता है। इसी कारण इसे "वेंकटेश्वर बालाजी" भी कहते हैं। ये मंदिर विश्व का सबसे अमीर मंदिर है जहाँ की अनुमानित धनराशि ५०००० करोड़ से भी अधिक है। इसके पीछे का कारण बड़ा विचित्र है।

बात तब की है जब देवों और दैत्यों ने मिलकर समुद्र मंथन किया। उस मंथन से अनेक रत्न प्राप्त हुए और उनमे से सबसे दुर्लभ देवी लक्ष्मी की उत्पत्ति हुई। उनका सौंदर्य ऐसा था कि देव और दैत्य दोनों उन्हें प्राप्त करना चाहते थे। किन्तु माता लक्ष्मी ने स्वयं श्रीहरि विष्णु को अपना वर चुन लिया। स्वयं ब्रह्मदेव ने दोनों का विवाह करवाया। विवाह के पश्चात देवी लक्ष्मी ने पूछा कि उनका स्थान कहाँ होगा? तब नारायण ने कहा कि उनका स्थान उनके वक्षस्थल में होगा।

ये सुनकर देवी लक्ष्मी थोड़ा रुष्ट होते हुए बोली - "प्रभु! सभी पुरुष अपनी पत्नियों को अपने ह्रदय में स्थान देते हैं फिर क्या कारण है कि आपने मुझे अपने हृदय के स्थान पर अपने वक्षस्थल में स्थान दिया?" तब श्रीहरि हँसते हुए बोले - "देवी! जिस प्रकार भगवान शिव के ह्रदय में सदैव मेरा ही ध्यान रहता है, उसी प्रकार मेरे ह्रदय में भी महादेव का स्थाई निवास है। यही कारण है कि मैंने आपको अपने वक्षस्थल में स्थान दिया है।"

कुछ काल के बाद सप्तर्षियों द्वारा एक महान यज्ञ किया गया और उसका पुण्यफल सबसे पहले किसे दिया जाये इस विषय में शंका उत्पन्न हो गयी। तब सप्तर्षियों ने निर्णय लिया कि त्रिदेवों में जो त्रिगुणातीत, अर्थात सत, तम एवं राज गुण से परे हो, उन्हें ही सबसे पहले यज्ञ का भाव प्रदान किया जाये। लेकिन त्रिदेवों की परीक्षा कौन ले? तब महर्षि अंगिरा ने ब्रह्माजी के पुत्र महर्षि भृगु को मनाया। तब महर्षि भृगु ने ब्रह्मा, विष्णु एवं महादेव की परीक्षा ली। इसके बारे में आप तीन भागों में यहाँ पढ़ सकते हैं।

सप्तर्षियों के अनुरोध पर महर्षि भृगु ने पहले ब्रह्मदेव और फिर महादेव की परीक्षा ली। उसके बाद अंत में वे भगवान विष्णु की परीक्षा लेने पहुँचे। क्रोध में आकर महर्षि भृगु ने भगवान विष्णु के वक्षस्थल पर अपने पैर से प्रहार किया। इसपर भगवान विष्णु ने उनके चरण पकड़ लिए और पूछा - "हे महर्षि! वज्र के सामान कठोर मेरे वक्ष पर प्रहार करने के कारण आपको चोट तो नहीं आयी?" तब उनकी इस विनम्रता से प्रसन्न होकर महर्षि भृगु ने उन्हें त्रिगुणातीत माना और उन्हें ही यज्ञ के पुण्य का प्रथम अधिकारी माना।

परीक्षा के बाद महर्षि भृगु तो चले गए किन्तु इससे देवी लक्ष्मी बड़ी रुष्ट हुई। प्रभु का वक्षस्थल तो माता लक्ष्मी का निवास स्थान था फिर भृगु ऋषि ने उसपर पाद प्रहार करने का कैसे साहस किया? किन्तु उससे भी अधिक उन्हें भगवान विष्णु पर क्रोध आया कि उन्होंने महर्षि भृगु को दंड देने के स्थान पर उनके चरण पकड़ लिए। उन्हें लगा कि भगवान विष्णु को उनसे प्रेम नहीं है और उसी क्रोध में वे उन्हें त्याग कर चली गयी।

...शेष

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