29 अगस्त 2019

तिरुपति बालाजी - ४

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार भगवान विष्णु ने पृथ्वी पर श्रीनिवास एवं माता लक्ष्मी ने पद्मावती के रूप में जन्म लिया। पद्मावती से विवाह करने के लिए श्रीनिवास ने देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर से धन उधार लिया और कलियुग के अंत तक उनके धन को लौटने का वचन दिया। अब आइये हम तिरुपति बालाजी मंदिर के विषय में और कुछ रोचक तथ्य जानते हैं।
  • जहाँ ये मंदिर बना है उस नगर का नाम भी तिरुपति ही है। जिस पहाड़ी पर ये मंदिर बना है उसे तिरुमला के नाम से जाना जाता है।
  • भगवान वेंकटेश्वर के नाम से तिरुमला को वेंकटपर्वत भी कहा जाता है। ये पहाड़ी सर्पाकार है और उसकी सात चोटियां है। ये आकृति शेषनाग से बहुत मिलती है इसी कारण इसे शेषांचलम के नाम से भी जाना जाता है। इस पहाड़ी की सात चोटियों के नाम हैं - शेषाद्रि, नीलाद्रि, गरुडाद्रि, अंजनाद्रि, ऋषभाद्रि, नारायणाद्रि एवं वेंकटाद्रि हैं। 
  • मंदिर के मुख्यद्वार के दाई तरफ और बालाजी के सर पर अनंताळवारजी के प्रहार के चिह्न हैं। बालरूप में बालाजी की ठोड़ी से रक्त बह निकला था और तभी से उनकी ठोड़ी पर चन्दन लगाने की प्रथा आरम्भ हुई।
  • बालाजी की प्रतिमा मंदिर के गर्भगृह के मध्य भाग में स्थित है किन्तु अगर आप मंदिर के बाहर से देखें तो आपको बालाजी दाईं कोने में खड़ी दिखती है।
  • गर्भगृह में चढ़ाई गयी किसी भी वास्तु को बाहर नहीं लाया जाता है। उसे बालाजी के पीछे स्थित एक जलकुंड में विसर्जित कर दिया जाता है। जो कुछ भी हम बालाजी के जलकुंड में विसर्जित करते हैं वो वहाँ से २० कोलीमीटर दूर वेरपेडु नामक स्थान पर बाहर निकलती है।
  • बालाजी की मूर्ति को प्रतिदिन ऊपर साड़ी और नीचे धोती से सजाया जाता है।
  • बालाजी के सर पर आज भी रेशमी बाल है और वो हमेशा ताजा रहते है और उसमे कभी भी उलझन नहीं आती।
  • मंदिर से करीब २३ किलोमीटर दूर एक गांव है जहाँ बहरी व्यक्ति का प्रवेश निषेध है। वही से लाये गए फूल और अन्य वस्तुओं को बालाजी पर चढ़ाया जाता है। इस गांव में महिलाएं साड़ी के नीचे कोई अंगवस्त्र नहीं पहनती हैं।
  • बालाजी के पृष्ठभाग को जितनी बार भी साफ़ करो, वहाँ गीलापन रहता ही है। अगर आप वहाँ कान लगाएंगे तो आपको समुद्र का घोष सुनाई देगा।
  • जैसा कि आपको पता है कि बालाजी के वक्ष में देवी लक्ष्मी का निवास है। प्रत्येक गुरुवार को बालाजी के वक्ष पर चन्दन की सजावट की जाती है। जब उसे निकाला जाता है तो आश्चर्यजनक रूप से उसपर देवी लक्ष्मी की आकृति उभर जाती है। बाद में उसे ऊँची कीमत पर बेचा जाता है।
  • गर्भगृह में जलने वाले दीपक कभी बुझते नहीं है। किसी को ये ज्ञात नहीं कि वो कितने सहत्र वर्षों से अनवरत जल रहे है। 
  • किवदंती है कि १८०० ईस्वी में एक राजा ने १२ लोगों को मार कर इस मंदिर से लटका दिया था। उस समय श्रीवेंकटेश्वर वहाँ प्रकट हुए थे और उसके बाद मंदिर को १२ वर्षों के लिए बंद कर दिया गया था।
  • इस मंदिर में प्रसाद के रूप में मिलने वाले लड्डू विश्व भर में प्रसिद्ध है। ऐसा स्वाद आपको विश्व में कही और नहीं मिल सकता। इस लड्डू का वितरण यहाँ ३०० वर्षों से भी अधिक समय से किया जा रहा है। पहली बार २ अगस्त १७१५ में इसे प्रसाद के रूप में बाँटना आरम्भ किया गया। इसे बनाने में आंटा, चीनी, घी, इलाइची और मेवे का इस्तेमाल किया जाता है। इस विशेष प्रसाद को बनाने के लिए भी एक विशेष स्थान नियत है जहाँ हर कोई नहीं जा सकता है। इसे केवल खास रसोइये ही बनाते हैं। भगवान बालाजी को प्रतिदिन ताजे लड्डू का ही भोग लगता है और यहाँ प्रतिदिन ३००००० से अधिक लड्डू तैयार किये जाते हैं।

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