25 अगस्त 2019

तिरुपति बालाजी - ३

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि भगवान विष्णु को त्यागने के बाद माता लक्ष्मी ने पद्मावती के नाम से पृथ्वी पर जन्म लिया। उन्हें खोजते-खोजते श्रीहरि ने भी श्रीनिवास के नाम से पृथ्वी पर जन्म लिया। युवा होने पर एक बार श्रीनिवास एक वन में पहुँचे जहाँ उन्होंने प्रथम बार पद्मावती को देखा। वापस आकर उन्होंने बकुलामाई, जिन्हे वो अपनी माता मानते थे, उन्हें अपने प्रेम के विषय में बताया। तब उनकी व्याकुलता देख कर बकुलामाई ने उनकी सहायता का वचन दिया। अब आगे...

श्रीनिवास एक स्त्री का वेश बना कर पद्मावती के पिता राजा आकाश की राजधानी नारायणपुर पहुँचे। उन्होंने उन्हें बताया कि वो एक पहुँची हुई ज्योतिषी है। उन्होंने राजा के विषय में कुछ ऐसी बातें बताई जिससे वे बड़े आश्चर्यचकित हो गए। तब उन्होंने अपनी पुत्री पद्मावती को बुलाया और स्त्री वेश में श्रीनिवास को उसका भविष्य बताने की प्रार्थना की। श्रीनिवास वही चाहते थे। उन्होंने पद्मावती का हाथ देख कर कहा कि कुछ दिनों पहले जिस युवक तो तुमने जंगल में देखा था, उसी से तुम्हारा विवाह होगा। कुछ दिनों के बाद उस युवक की माता विवाह का प्रस्ताव लेकर आपके पास आएगी। ये कहकर श्रीनिवास वहाँ से चले गए।

कुछ दिनों के बाद बकुलामाई नारायणपुर पहुँची और अपने पुत्र के विवाह का प्रस्ताव महाराज आकाश के सामने रखा। तब पद्मावती की माता धारणा देवी ने पूछा कि आपका पुत्र कौन है। तब बकुलामाई ने कहा - "हे महारानी! मेरे पुत्र का नाम श्रीनिवास है। वो चंद्रवंशी है और मुझे माता के सामान ही मानता है।" इसके बाद बकुलामाई ने श्रीनिवास की कुण्डली राजा को दी। तब महाराज आकाश ने उनसे कुछ दिन का समय माँगा। ये सुनकर बकुलामाई बाद में आने को कहकर वहाँ से चली गयी।

उनके जाने के बाद महाराज ने अपने राजपुरोहित को बुलाकर उन्हें श्रीनिवास की कुंडली दिखाई। उसे देखकर राजपुरोहित ने कहा कि - "हे महाराज! इस युवक के गुण तो स्वयं श्रीहरि विष्णु से मिलते हैं। लक्ष्मी के सामान आपकी पुत्री पद्मावती के लिए ये निश्चय ही सुयोग्य वर है।" ये सुनकर महाराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने बकुलामाई को अपनी सहमति भेज दी।

जब बकुलामाई ने ये सुना तो वो और श्रीनिवास बड़े प्रसन्न हुए। लेकिन वे तो बड़े निर्धन थे, अब राजा की बेटी से विवाह तो धूम-धाम से ही करना पड़ेगा। किन्तु उसके लिए धन कहाँ से आएगा। ये सोच कर बकुलामाई श्रीनिवास को लेकर वराहस्वामी के पास पहुँची और उनसे अपनी समस्या बताई। तब वराहस्वामी ने आठों दिक्पालों का आह्वान किया और श्रीनिवास से कहा कि उन्हें अपनी समस्या बताओ। तब श्रीनिवास ने कहा कि वो पद्मावती से विवाह करना चाहते हैं किन्तु उनके पास धन नहीं है।

तब देवराज इंद्र ने कुबेर से कहा कि वो श्रीनिवास को कुछ धन दे दें। तब कुबेर ने कहा कि "मैं धन दे तो दूँगा किन्तु श्रीनिवास उसे कब तक वापस कर पाएंगे?" इसपर श्रीनिवास ने कहा कि वे कलियुग के अंत तक उनका धन लौटा देंगे। तब कुबेर ने उन्हें बहुत धन दे दिया और सभी दिग्पालों के समक्ष उन्होंने श्रीनिवास से ऋण-पत्र लिखवा लिया। बाद में उस धन से श्रीनिवास ने धूम-धाम से पद्मावती से विवाह किया और दोनों सुख पूर्वक वेंकटाचलम् पर सुखपूर्वक रहने लगे।

उधर देवर्षि नारद ने देवी लक्ष्मी को इसकी सूचना दे दी कि श्रीनिवास रुपी भगवान विष्णु ने पद्मावती से विवाह कर लिया है। इससे रुष्ट होकर देवी लक्ष्मी वेंकटाचलम् पर्वत पहुँची और पद्मावती को बुरा-भला कहने लगी। अब दोनों में वाद-विवाद होना आरम्भ हो गया। इससे रुष्ट होकर श्रीनिवास ने स्वयं को पत्थर की मूर्ति के रूप में बदल लिया। अब दोनों देवियाँ बड़ा पछताई और अपने पति को पाषाण बना देख कर विलाप करने लगी।

तब उस शिला विग्रह से आवाज आई - "देवियों! आपलोग विलाप ना करें। मुझे तो इस पृथ्वी पर तब तक रहना है जबतक मैं कुबेर का ऋण ना चुका दूँ। इसीलिए कलियुग के अंत तक मैं अपने भक्तों के चढ़ाये गए चढ़ावे से उस कर्ज का ब्याज चुकता रहूँगा।" ये सुनकर दोनों वहाँ से चली गयी। देवी लक्ष्मी तो महाराष्ट्र के कोल्हापुर में महालक्ष्मी के रूप में प्रतिष्ठित हो गयी और पद्मावती तिरुनाचुर में शिला विग्रह के रूप में स्थित हो गयी।

यही कारण है कि आज तक भक्त तिरुपति में जाकर धन का दान करते हैं ताकि श्री वेंकटेश्वर बालाजी कुबेर के धन का ब्याज चुका सकें। आज ये मंदिर विश्व का सबसे अमीर मंदिर है जहाँ की संपत्ति ५००००००००००० (५० हजार करोड़) से भी अधिक है। इस श्रृंखला के अंतिम लेख में हम तिरुपति बालाजी मंदिर के बारे में कुछ आश्चर्यजनक तथ्य जानेंगे।

...शेष

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