21 अगस्त 2019

तिरुपति बालाजी - २

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार महर्षि भृगु ने त्रिदेवों की परीक्षा ली। उसी परीक्षा में उन्होंने श्रीहरि विष्णु के वक्षस्थल पर अपने पैरों से प्रहार कर दिया। इस पर भी भगवान विष्णु ने उनके चरण पकड़ लिए। तब भृगु ऋषि ने भगवान विष्णु को त्रिदेवों में श्रेष्ठ बताया। किन्तु उनके इस व्यवहार से देवी लक्ष्मी को बड़ा कष्ट हुआ कि क्यों भगवान विष्णु ने भृगु को उसके अपराध का दंड नहीं दिया। तब वे रुष्ट होकर श्रीहरि को छोड़ कर चली गयी। अब आगे...

जब देवी लक्ष्मी श्रीहरि को छोड़ कर चली गयी तो भगवान विष्णु व्याकुल होकर उन्हें त्रिलोक में ढूंढने लगे। उधर देवी लक्ष्मी ने पद्मावती के नाम से पृथ्वीलोक में जन्म लिया। जब श्रीहरि को इस बात का पता चला तो उन्होंने भी पृथ्वी पर श्रीनिवास के नाम से जन्म लिया। युवा होने पर एक बार श्रीनिवास घूमते हुए वेंकटचल पर्वत क्षेत्र में बकुलामाई के आश्रम में पहुचे। बकुलामाई ने उनकी बड़ी आवाभगत की और उन्हें आश्रम में ही रहने को कहा।

एक दिन जंगल में एक मदमस्त हाथी आ गया जिससे डर कर आश्रमवासी इधर-उधर भागने लगे। जब श्रीनिवास ने यह देखा तो उसने धनुष-बाण लेकर उसका पीछा किया। अपने शौर्य से उन्होंने हाथी को परास्त कर दिया और वह हाथी भागकर घने जंगल में अदृश्य हो गया। श्रीनिवास भी उसके पीछे जंगल में चले गए। बहुत देर तक उस हाथी को खोजने के बाद श्रीनिवास थक गए और एक सरोवर के किनारे लेट गए। थकावट के कारण उन्हें नींद आ गयी।

अचानक कुछ शोर से उनकी नींद खुली। उन्होंने देखा कि कई सुन्दर स्त्रियाँ उन्हें घेर कर खड़ी थी। श्रीनिवास ने उनसे पूछा कि ये कौन सा स्थान है? तब उन्होंने बताया कि ये उपवन उनकी राजकुमारी पद्मावती का है और यहाँ पुरुषों का आना वर्जित है। आप किस प्रकार यहाँ आ गए? तब श्रीनिवास ने उन्हें सारी घटनाएं बताई और कहा कि वे उनकी राजकुमारी से क्षमा प्रार्थना करना चाहते हैं। तब उन स्त्रियों ने अपनी राजकुमारी पद्मावती को इसकी सूचना दी और वे वहाँ आयी।

जब श्रीनिवास ने पद्मावती को देखा तो देखते ही रह गए। किन्तु उन्होंने अपने आप को संयत किया और राजकुमारी पद्मावती से क्षमा-याचना कर वापस आश्रम लौट आये। किन्तु वहाँ आने के बाद भी वे पद्मावती को भूल नहीं पाए और उनके विरह में उदास रहने लगे। जब बकुलामाई ने उनकी ये दशा देखी तो बड़े प्यार से उनकी उदासी के बारे में पूछा तब उन्होंने पद्मावती के बारे में सारी बात बताई। उन्होंने कहा कि लगता है कि उन्हें पद्मावती से प्रेम हो गया है और वे उसके बिना जीवित नहीं रह सकते।

तब बकुलामाई ने कहा कि उसे ऐसा दुस्साहस नहीं करना चाहिए। वो पद्मावती प्रतापी चोल नरेश आकाशराज की कन्या है और तुम आश्रम में पलने वाले एक कुल गोत्रहीन युवक। तुम दोनों के बीच पृथ्वी और आकाश का अंतर है। तब श्रीनिवास ने कहा - "माँ! अगर तुम मेरी सहायता करो तो हम दोनों का मिलन अवश्य हो सकता है। बकुलामाई, जो श्रीनिवास को अपना पुत्र मानती थी, वो उसका दुःख देख ना सकी और उन्होंने श्रीनिवास को उसकी सहायता का वचन दिया।

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