17 अगस्त 2019

राघवयादवीयम् (श्लोक २६ - ३०)

श्लोक २६

अनुलोम (रामकथा)

सागरातिगम् आभातिनाकेशः असुरमासहः।
तं सः मारुतजं गोप्ता अभात् आसाद्य गतः अगजम् ॥ २६॥

अर्थात: समुद्र लांघ कर सहयाद्री पर्वत तक जा समुद्र तट तक पहुंचने वाले हनुमान जैसे दूत होने के कारण इंद्र से भी अधिक प्रतापी, असुरों की समृद्धि के लिए असहनशील उन रक्षक श्रीराम की कीर्ति में वृद्धि हो गई।

विलोम (कृष्णकथा)

जं गतः गदी असादाभाप्ता गोजं तरुम् आस तं।
हः समारसुशोकेन अतिभामागतिः आगस ॥ २६॥

अर्थात: जो गदाधारी हैं एवं अपरिमित तेज के स्वामी हैं वो श्रीकृष्ण अपने पुत्र प्रद्युम्न को दिए कष्ट से अत्यधिक कुपित हो स्वर्ग में उत्पन्न उस वृक्ष (पारिजात) को अधिकार में ले कर विजयी हुए।

श्लोक २७

अनुलोम (रामकथा)

वीरवानरसेनस्य त्रात अभात् अवता हि सः।
तोयधो अरिगोयादसि अयतः नवसेतुना ॥ २७॥

अर्थात: वीर वानर सेना के त्राता के रूप में विख्यात श्रीराम उस महान सेतुसमुन्द्र पर चलने लगे जो अथाह विस्तृत सागर के जीव-जंतुओं से भी उनकी रक्षा कर रहा था।

विलोम (कृष्णकथा)

ना तु सेवनतः यस्य दयागः अरिवधायतः।
स हि तावत् अभत त्रासी अनसेः अनवारवी ॥ २७॥

अर्थात: जो व्यक्ति प्रभु हरि की सेवा में रत रहते हुए उनका यशगान करता है वह प्रभु की दया प्राप्त कर शत्रुओं पर विजय पाता है। जो ऐसा नहीं करता है वह निहत्थे शत्रु से भी भयभीत होकर कान्तिविहीन हो जाता है।

श्लोक २८

अनुलोम (रामकथा)

हारिसाहसलंकेनासुभेदी महितः हि सः।
चारुभूतनुजः रामः अरम् आराधयदार्तिहा ॥ २८॥

अर्थात: चमत्कारिक रूप से साहसी उन श्रीराम द्वारा रावण के प्राण हरने पर देवताओं ने उनकी स्तुति की। वे रूपवती भूमिजा सीता के संगी हैं तथा शरणागतों का कष्ट निवारण करते हैं।

विलोम (कृष्णकथा)

हा आर्तिदाय धराम् आर मोराः जः नुतभूः रुचा।
सः हितः हि मदीभे सुनाके अलं सहसा अरिहा ॥ २८॥

अर्थात: वे (श्रीकृष्ण) जो लक्ष्मी को निज वक्षस्थली में रखते हैं, जो कीर्तियों के शरणस्थल हैं और जो प्रद्युम्न के हितैषी हैं अपने पुत्र (प्रद्युम्न) को युद्ध के कष्टों से उबारने के पश्चात ऐरावत वाले स्वर्गलोक को जीत कर पृथ्वी को वापस लौट आए।

श्लोक २९

अनुलोम (रामकथा)

नालिकेर सुभाकारागारा असौ सुरसापिका।
रावणारिक्षमेरा पूः आभेजे हि न न अमुना ॥ २९॥

अर्थात: नारियल के वृक्षों से आच्छादित एवं रंग-बिरंगे भवनों से निर्मित अयोध्या नगर अब रावण को पराजित करने वाले श्रीराम का समुचित निवास स्थल बन गया।

विलोम (कृष्णकथा)

ना अमुना नहि जेभेर पूः आमे अक्षरिणा वरा।
का अपि सारसुसौरागा राकाभासुरकेलिना ॥ २९॥

अर्थात: अनेकों विजयी गजराजों वाली भूमि द्वारका नगर में धर्म के वाहक सताप्रिय कृष्ण का प्रवेश क्रीडारत गोपियों के संग दिव्य वृक्ष पारिजात के साथ हुआ।

श्लोक ३०

अनुलोम (रामकथा)

सा अग्र्यतामरसागाराम् अक्षामा घनभा आर गौः।
निजदे अपरजिति आस श्रीः रामे सुगराजभा ॥ ३०॥

अर्थात: अयोध्या का समृद्ध स्थल तामरस (कमल) पर विराजमान राज्यलक्ष्मी का सर्वोत्तम निवास बना। सर्वस्व न्योछावर करानेवाले अजेय श्रीराम के प्रतापी शासन का उदय हुआ।

विलोम (कृष्णकथा)

भा अजराग सुमेरा श्रीसत्याजिरपदे अजनि।
गौरभा अनघमा क्षामरागा स अरमत अग्र्यसा ॥ ३०॥

अर्थात: सत्यभामा के आँगन में अवस्थित पारिजात में पुष्प प्रस्फुटित हुए। सत्यभामा इस निर्मल संपत्ति को पाकर श्रीकृष्ण की प्रथम भार्या रुक्मिणी के प्रति इर्ष्याभाव का त्याग श्रीकृष्ण संग सुखपूर्वक रहने लगी।

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