11 अगस्त 2019

राघवयादवीयम् (श्लोक २१ - २५)

श्लोक २१

अनुलोम (रामकथा)

ताटकेयलवादत् एनोहारी हारिगिर आस सः।
हा असहायजना सीता अनाप्तेना अदमनाः भुवि ॥ २१॥

अर्थात: ताड़कापुत्र मारीच के वध से प्रसिद्द, अपनी वाणी से पाप का नाश करने वाले तथा जो अत्यंत मनभावन है, उनकी हाय सुनकर (मृगरूपी मारीच द्वारा श्रीराम के स्वर में सीता को पुकारने पर) असहाय सीता अपने उस स्वामी श्रीराम के बिना व्याकुल हो गईं।

विलोम (कृष्णकथा)

विभुना मदनाप्तेन आत आसीनाजयहासहा।
सः सराः गिरिहारी ह नो देवालयके अटता ॥ २१॥

अर्थात: प्रद्युम्न संग देवलोक में विचरण कर रहे कृष्ण को रोकने में जयंत के पिता, अथाह संपत्ति के स्वामी एवं पर्वतों को अपनी शक्ति से झुका देने वाले इंद्र असमर्थ हो गए।

श्लोक २२

अनुलोम (रामकथा)

भारमा कुदशाकेन आशराधीकुहकेन हा।
चारुधीवनपालोक्या वैदेही महिता हृता ॥ २२ ॥

अर्थात: लक्ष्मी जैसी तेजस्विता उस सर्वपूजिता सीता का अंत समय आसन्न होने के कारण नीच दुष्ट छली नीच राक्षस (रावण) द्वारा उच्च विचारों वाले वनदेवताओं के सामने ही अपहरण कर लिया गया।

विलोम (कृष्णकथा)

ताः हृताः हि महीदेव ऐक्य अलोपन धीरुचा।
हानकेह कुधीराशा नाकेशा अदकुमारभाः ॥ २२॥

अर्थात: तब एक ब्राह्मण की मैत्री से उस लुप्त अविनाशी, चिरस्थायी ज्ञान व तेज को पुनर्प्राप्त कर नाकेश (इंद्र), जिनकी इच्छा पलायन करने वाले देवताओं की रक्षा करने की थी, उन्होंने आकुल कुमार प्रद्युम्न का प्रताप हर लिया।

श्लोक २३

अनुलोम (रामकथा)

हारितोयदभः रामावियोगे अनघवायुजः।
तं रुमामहितः अपेतामोदाः असारज्ञः आम यः ॥ २३॥

अर्थात: मनोहारी एवं मेघवर्णीय श्रीराम को सीता से वियोग के पश्चात निर्विकार हनुमान और सुग्रीव का सहयोग मिला जो अपनी पत्नी रुमा के श्रद्धेय थे और अपने भाई बाली द्वारा सताए जाने के कारण अपना सुख गवां कर, विचारहीन एवं शक्तिहीन हो श्रीराम के शरणागत हो गए।

विलोम (कृष्णकथा)

यः अमराज्ञः असादोमः अतापेतः हिममारुतम्।
जः युवा घनगेयः विम् आर आभोदयतः अरिहा ॥ २३॥

अर्थात: तब देवताओं से युद्ध का परित्याग कर चुके अतुल्य साहसी प्रद्युम्न, आकाश में संचारित शीतल पवन से पुनर्जीवित हो अपने गुरुजनों का गुणगान किया और तब उनके द्वारा शत्रुओं को पराजित कर उनपर विजय प्राप्त किया गया।

श्लोक २४

अनुलोम  (रामकथा)

भानुभानुतभाः वामा सदामोदपरः हतं।
तं ह तामरसाभक्क्षः अतिराता अकृत वासविम् ॥ २४॥

अर्थात: सूर्य से भी अधिक तेजस्वी, रमणीक पत्नी (सीता) को निरंतर अतुल आनंद प्रदान करने वाले तथा  नयन कमल की भांति उज्जवल हैं, उन श्रीराम ने इंद्र के पुत्र बाली का संहार किया।

विलोम (कृष्णकथा)

विं सः वातकृतारातिक्षोभासारमताहतं।
तं हरोपदमः दासम् आव आभातनुभानुभाः ॥ २४॥

अर्थात: उस कृष्ण ने, जिनके तेज के समक्ष सूर्य भी गौण है, जिसने अपने उत्तेजित सेवक उस गरुड़ की रक्षा की जिसने अपने पंखों की फड़फड़ाहट मात्र से शत्रुओं की शक्ति और गर्व को क्षीण किया था और उन्होंने कभी भगवान शंकर से भी युद्ध किया था। 

श्लोक २५

अनुलोम (रामकथा)

हंसजारुद्धबलजा परोदारसुभा अजनि।
राजि रावण रक्षोरविघाताय रमा आर यम् ॥ २५॥

अर्थात: हंसज (सूर्यपुत्र सुग्रीव) के अपराजेय सैन्यबल की महती भूमिका ने श्रीराम के गौरव में वृद्धि कर उनके द्वारा रावण वध करवा कर उन्हें विजयश्री दिलाई।

विलोम (कृष्णकथा)

यं रमा आर यताघ विरक्षोरणवराजिर।
निजभा सुरद रोपजालबद्ध रुजासहम् ॥ २५॥

अर्थात: उस श्रीकृष्ण के हिस्से में निर्मल विजयश्री की ख्याति आई जो बाणों की वर्षा सहने में समर्थ हैं, जिनका तेज युद्धभूमि को असुर-विहीन करने से चमकता है एवं जिनका स्वाभाविक तेज देवताओं पर विजय से दमक उठा।

...शेष

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