7 अगस्त 2019

राघवयादवीयम् (श्लोक १६ - २०)

श्लोक १६

अनुलोम (रामकथा)

सः अरम् आरत् अनज्ञाननः वेदेराकण्ठकुंभजम्।
तं द्रुसारपटः अनागाः नानादोषविराधहा ॥ १६॥

अर्थात: श्रीराम जो महाज्ञानी हैं, जिनकी वाणी वेद है, जिन्हें वेद कंठस्थ है, वो कुम्भज (महर्षि अगस्त्य, जिन्हे ये नाम मटके में जन्म लेने के कारण मिला) के निकट जा पंहुचे। वे निर्मल वृक्ष वल्कल (छाल) परिधानधारी हैं जो अनेक पाप करने वाले विराध के संहारक हैं।

विलोम (कृष्णकथा)

हा धराविषदह नानागानाटोपरसात् द्रुतम्।
जम्भकुण्ठकराः देवेनः अज्ञानदरम् आर सः ॥ १६॥

अर्थात: हाय! उस इंद्र ने जो पृथ्वी को जलप्रदान करने वाले, किन्नरों-गन्धर्वों के सुरीले संगीत रस का आनंद लेने वाले और देवाधिपति हैं, उन्होंने जैसे ही जम्बासुर संहारक श्रीकृष्ण का आगमन सुना, वे अनजाने भय से ग्रसित हो गए।

श्लोक १७

अनुलोम (रामकथा)

सागमाकरपाता हाकंकेनावनतः हि सः।
न समानर्द मा अरामा लंकाराजस्वसा रतम् ॥ १७॥

अर्थात: वेदों में निपुण एवं सन्तों के रक्षक श्रीराम को गरुड़ (जटायु) ने झुक कर नमन किया। वो श्रीराम जिनके प्रति स्वयं लंकेश की बहन (शूर्पणखा) ने भी काम याचना की थी।

विलोम (कृष्णकथा)

तं रसासु अजराकालं म आरामार्दनम् आस न।
स हितः अनवनाकेकं हाता अपारकम् आगसा ॥ १७॥

अर्थात: वे (श्रीकृष्ण), जो वृद्धावस्था व मृत्यु से परे थे, पारिजात वृक्ष की प्राप्ति की इच्छा से स्वर्ग गए। तब इंद्र जो कृष्ण के हितैषी थे, उन्हें स्वर्ग में रहते हुए भी अपार दुःख प्राप्त हुआ।

श्लोक १८

अनुलोम (रामकथा)

तां सः गोरमदोश्रीदः विग्राम् असदरः अतत।
वैरम् आस पलाहारा विनासा रविवंशके ॥ १८॥

अर्थात: पृथ्वी को प्रिय श्रीराम की दाहिनी भुजा एवं उन्हें गौरव प्रदान करने वाले उनके भाई निडर लक्ष्मण द्वारा नाक काटे जाने पर उस मांसभक्षी (शूर्पणखा) ने सूर्यवंशी (श्रीराम) के प्रति बैर पाल लिया।

विलोम (कृष्णकथा)

केशवं विरसानाविः आह आलापसमारवैः।
ततरोदसम् अग्राविदः अश्रीदः अमरगः असताम् ॥ १८॥

अर्थात: उल्लास, जीवनीशक्ति और तेज के ह्रास का भान होने पर केशव (श्रीकृष्ण) से मित्रवत वाणी में इंद्र, जिसने उन्नत पर्वतों को (अपने वज्र से) परास्त कर महत्वहीन किया था, तथा जिसने अमर देवों के नायक के रूप में दुष्ट असुरों को श्रीविहीन किया, उन्होंने धरा व नभ के रचयिता (कृष्ण) से कहा।

श्लोक १९

अनुलोम (रामकथा)

गोद्युगोमः स्वमायः अभूत् अश्रीगखरसेनया।
सह साहवधारः अविकलः अराजत् अरातिहा ॥ १९॥

अर्थात: पृथ्वी व स्वर्ग के सुदूर कोने तक व्याप्त कीर्ति के स्वामी श्रीराम द्वारा खर की सेना को परास्त करने से उनकी छवि एक गौरवशाली, निडर, शत्रु संहारक एवं शालीन योद्धा के रूप में चमक उठी।

विलोम (कृष्णकथा)

हा अतिरादजरालोक विरोधावहसाहस।
यानसेरखग श्रीद भूयः म स्वम् अगः द्युगः ॥ १९॥

अर्थात: हे कृष्ण! सर्वकामनापूर्ति करने वाले देवों के गर्व का शमन करने वाले, जिनका वाहन वेदात्मा गरुड़ है, जो वैभव प्रदाता श्रीपति हैं तथा जिन्हें स्वयं कुछ ना चाहिए, आप इस दिव्य वृक्ष को धरती पर ना ले जाएँ।

श्लोक २०

अनुलोम (रामकथा)

हतपापचये हेयः लंकेशः अयम् असारधीः।
रजिराविरतेरापः हा हा अहम् ग्रहम् आर घः ॥ २०॥

अर्थात: पापी राक्षसों का संहार करनेवाले श्रीराम पर निम्न विचार नीच एवं विकृत लंकेश (रावण) जिनके साथ सदैव मदिरापान करनेवाले क्रूर राक्षसगण विद्यमान रहते थे हैं, उसने आक्रमण करने का विचार किया।

विलोम (कृष्णकथा)

घोरम् आह ग्रहं हाहापः अरातेः रविराजिराः।
धीरसामयशोके अलं यः हेये च पपात हः ॥ २०॥

अर्थात: व्यथाग्रसित हो एवं शत्रु के शक्ति को भूल कर सूर्य की तरह शुभ्र स्वर्णाभूषण द्वारा अलंकृत किन्तु कुत्सित बुद्धि वाले देवराज इंद्र ने उन्हें (श्रीकृष्ण को) बंदी बनाने का आदेश दे दिया।

...शेष

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