1 अगस्त 2019

राघवयादवीयम् (श्लोक ११ - १५)

श्लोक ११

अनुलोम (रामकथा)

वरमानदसत्यासह्रीतपित्रादरात् अहो।
भास्वरः स्थिरधीरः अपहारोराः वनगामी असौ ॥ ११॥

अर्थात: विनम्र, आदरणीय, सत्य के त्याग से और वचन पालन ना करने से लज्जित होने वाले, अद्भुत, तेजोमय, मुक्ताहारधारी, वीर एवं साहसी श्रीराम वन को प्रस्थान किए।

विलोम (कृष्णकथा)

सौम्यगानवरारोहापरः धीरः स्स्थिरस्वभाः।
हो दरात् अत्र आपितह्री सत्यासदनम् आर वा ॥ ११॥

अर्थात: संगीत की धनी सत्यभामा के प्रति समर्पित वीर, दृढ़चित्त श्रीकृष्ण कदाचित भय व लज्जा से आक्रांत हो सत्यभामा के निवास पंहुचे।

श्लोक १२

अनुलोम (रामकथा)

या नयानघधीतादा रसायाः तनया दवे।
सा गता हि वियाता ह्रीसतापा न किल ऊनाभा ॥ १२॥

अर्थात: अपने शरणागतों को शास्त्रोचित सद्बुद्धि देने वाली, धरती की पुत्री सीता, इस लज्जाजनक कार्य से आहत हो किन्तु अपनी कान्ति को बिना गँवाए वन गमन करने का साहस कर गईं।

विलोम (कृष्णकथा)

भान् अलोकि न पाता सः ह्रीता या विहितागसा।
वेदयानः तया सारदात धीघनया अनया ॥ १२॥

अर्थात: गूढ़ ज्ञान से परिपूर्ण सत्यभामा ने स्वयं को नीचा दिखाने से अपमानित होकर (देवी रुक्मिणी को पुष्प देने के कारण) तेजस्वी रक्षक कृष्ण, जो वैभवदाता हैं और जिनका वाहन गरुड़ है, उनकी ओर देखा ही नहीं।

श्लोक १३

अनुलोम (रामकथा)

रागिराधुतिगर्वादारदाहः महसा हह।
यान् अगात भरद्वाजम् आयासी दमगाहिनः ॥ १३॥

अर्थात: तामसी, उपद्रवी, दम्भी एवं अनियंत्रित शत्रुदल को अपने तेज से दहन करने वाले शूरवीर राम के निकट भारद्वाज आदि संयमी ऋषिगण थकान एवं क्लांत रूप में पँहुच कर याचना की।

विलोम (कृष्णकथा)

नो हि गाम् अदसीयामाजत् व आरभत गा; न या।
हह सा आह महोदारदार्वागतिधुरा गिरा ॥ १३॥

अर्थात: सत्यभामा ने पुष्पधारी श्रीकृष्ण के शब्दों पर ना तो ध्यान दिया और ना ही कुछ बोली जब तक कि श्रीकृष्ण ने पारिजात वृक्ष को लाने का संकल्प नहीं कर लिया।

श्लोक १४

अनुलोम (रामकथा)

यातुराजिदभाभारं द्यां व मारुतगन्धगम्।
सः अगम् आर पदं यक्षतुंगाभः अनघयात्रया ॥ १४॥

अर्थात: अपने तेज एवं प्रताप से असंख्य राक्षसों का नाश करने वाले श्रीराम स्वर्गतुल्य सुगन्धित पवन संचारित स्थल (चित्रकूट) पर यक्षराज कुबेर तुल्य वैभव व आभा संग लिए पंहुचे।

विलोम (कृष्णकथा)

यात्रया घनभः गातुं क्षयदं परमागसः।
गन्धगं तरुम् आव द्यां रंभाभादजिरा तु या ॥ १४॥

अर्थात: मेघवर्ण के श्रीकृष्ण सत्यभामा को उनके द्वारा किये गए अन्याय द्वारा जन्में घोर उपेक्षा को शांत करने हेतु अप्सराओं द्वारा शोभायमान एवं रम्भा जैसी सुंदरियों से जगमगाते स्वर्ग को गए ताकि वे सुगन्धित पारिजात वृक्ष तक पहुँच सकें।

श्लोक १५

अनुलोम रामकथा)

दण्डकां प्रदमो राजाल्या हतामयकारिहा।
सः समानवतानेनोभोग्याभः न तदा आस न ॥ १५॥

अर्थात: दंडकवन में संयमी, स्वस्थ नरेशों के शत्रु भगवान परशुराम को पराजित करने वाले, मनुष्यों को अपने निष्कलंक कीर्ति से आनन्दित करनेवाले श्रीराम ने प्रवेश किया।

विलोम (कृष्णकथा)

न सदातनभोग्याभः नो नेता वनम् आस सः।
हारिकायमताहल्याजारामोदप्रकाण्डदम् ॥ १५॥

अर्थात: सदा आनंददायी जननायक श्रीकृष्ण उस नन्दनवन को जा पहुंचे जो देवराज इंद्र के अतिआनंद का श्रोत था। ये वही इंद्र था जो आकर्षक काया वाली अहिल्या का प्रेमी था एवं जिसने छलपूर्वक अहिल्या की सहमति पा ली थी।

...शेष

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