13 अगस्त 2019

कुबेर की नौ निधियाँ - १

कुछ समय पहले हमने आपको पवनपुत्र हनुमान की नौ निधियों के बारे में बताया था। हनुमानजी को अष्ट सिद्धि और नौ निधि का दाता कहा जाता है। जिस प्रकार हनुमान के पास नौ निधियाँ हैं, ठीक उसी प्रकार देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर के पास भी नौ निधियाँ हैं। अंतर केवल इतना है कि हनुमान अपनी नौ निधियों को किसी अन्य को प्रदान कर सकते हैं जबकि कुबेर ऐसा नहीं कर सकते।

निधि का अर्थ होता ऐसा धन जो अत्यंत दुर्लभ हो। इनमे से कई का वर्णन युधिष्ठिर ने भी महाभारत में किया है जिसे आप यहाँ देख सकते हैं। कुबेर को इन निधियों की प्राप्ति महादेव से हुई है। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ना केवल भगवान शंकर ने उन्हें इन निधियों का दान दिया अपितु उन्हें देवताओं के कोषाध्यक्ष का पद भी प्रदान किया।
  1. पद्म: जिस व्यक्ति के पास पद्म निधि होती है वो सात्विक गुणों से युक्त होता है। ये भी कहा जा सकता है कि पद्म निधि को प्राप्त करने के लिए मनुष्य में सात्विक वृत्ति होना आवश्यक है। चूँकि ये निधि सात्विक तरीके से ही प्राप्त की जा सकती है इसी कारण इसका अस्तित्व बहुत समय तक रहता है। कहा जाता है कि पद्म निधि मनुष्य के कई पीढ़ियों को तार देती है और उन्हें कभी धन की कमी नहीं रहती। ये धन इतना अधिक होता है कि मनुष्य उसे पीढ़ी दर पीढ़ी इस्तेमाल करता रहता है किन्तु तब भी ये समाप्त नहीं होती। सात्विक गुणों से संपन्न व्यक्ति इस धन का संग्रह तो करता ही है किन्तु साथ ही साथ उसी उन्मुक्त भाव से उसका दान भी करता है। वैसे इस निधि के उपयोग के लिए पीढ़ी का वर्णन तो नहीं दिया गया है किन्तु फिर भी कहा जाता है कि पद्म निधि मनुष्य की २१ पीढ़ियों तक चलता रहता है।
  2. महापद्म: ये निधि भी पद्म निधि के सामान ही होती है किन्तु इसका प्रभाव ७ पीढ़ियों तक रहता है। उसके बाद की पीढ़ियाँ इस निधि का लाभ नहीं ले सकती। पद्म की तरह महापद्म निधि भी सात्विक मानी जाती है और जिस मनुष्य के पास ये निधि होती है वो अपने संग्रह किये हुए धन का दान धार्मिक कार्यों में करता है। कुल मिलकर ये कहा जा सकता है कि महापद्म निधि प्राप्त मनुष्य दानी तो होता है किन्तु उसकी ये निधि केवल ७ पीढ़ियों तक उसके परिवार में रहती है। किन्तु इन सब के पश्चात भी ये निधि या धन इतना अधिक होता है कि अगर मनुष्य दोनों हांथों से भी इसे व्यय करे तो भी पीढ़ी दर पीढ़ी (सात) तक चलता रहता है। इस निधि को प्राप्त व्यक्ति में रजोगुण अत्यंत ही कम मात्रा में रहता है इसी कारण धारक धर्मानुसार इसे व्यय करता है। 
  3. नील: नील निधि को भी सात्विक निधि माना जाता है और इसे प्राप्त व्यक्ति सात्विक तेज से युक्त होता है किन्तु उसमे रजगुण की भी मात्रा रहती है। हालाँकि सत एवं रज गुणों में सतगुण की अधिकता होती है इसी कारण इस निधि को प्राप्त करने वाला व्यक्ति सतोगुणी ही कहलाता है। ये निधि मनुष्य की तीन पीढ़ियों तक उसके पास रहती है। उसके बाद की पीढ़ियों को इसका फल नहीं मिल पाता। सामान्यतः ऐसी निधि व्यापार के माध्यम से ही प्राप्त होती है इसीलिए इसे रजोगुणी संपत्ति भी कहा जाता है। लेकिन चूँकि साधक इस संपत्ति का प्रयोग जनहित में करता है इसीलिए इसे मधुर स्वाभाव वाली निधि भी कहा गया है। रजोगुण की प्रधानता भी होने के कारण ये निधि ३ पीढ़ी से आगे नहीं बढ़ सकती। इसे प्राप्त करने वाले साधक में दान की वैसी भावना नहीं होती जैसी पद्म एवं महापद्म के धारकों में होती है। किन्तु फिर भी नील निधि का धारक धर्म के लिए कुछ दान तो अवश्य करता है।
  4. मुकुंद: ये निधि रजोगुण से संपन्न होती है और इसे प्राप्त करने वाला मनुष्य भी रजोगुण से समपन्न होता है। ऐसा व्यक्ति सदा केवल धन के संचय करने में लगा रहता है। यही कारण है कि इसे राजसी स्वाभाव वाली निधि कहा गया है। इस निधि को प्राप्त साधक अधिकतर भोग-विलास में लिप्त होता है। हालाँकि वो सम्पूर्णतः राजसी स्वाभाव का नहीं होता और उसने सतगुण का भी योग होता है किन्तु दोनों गुणों में रजगुण की अत्यधिक प्रधानता रहती है। ये निधि १ पीढ़ी तक ही रहती है, अर्थात उस व्यक्ति के बाद केवल उसकी संतान ही उस निधि का उपयोग कर सकती है। उसके पश्चात आने वाली पीढ़ी के लिए ये निधि किसी काम की नहीं रहती। इस निधि को प्राप्त करने वाले धारक में दान की भावना नहीं होती। हालाँकि उसे बार-बार धर्म का स्मरण दिलाने पर वो साधक भी दान करता है।
...शेष

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