19 अगस्त 2019

कुबेर की नौ निधियाँ - २

पिछले लेख में आपने देवताओं के कोषाध्यक्ष यक्षराज कुबेर की पहली ४ निधियों के बारे में पढ़ा। इस लेख में हम आगे बढ़ते हैं और उनकी बची हुई ५ निधियों के बारे में जानते हैं।

५. नन्द: इस निधि का धारक राजसी एवं तामसी गुणों के मिश्रण वाला होता है। वह अकेला अपने कुल का आधार होता है। ये निधि साधक को लम्बी आयु एवं निरंतर तरक्की प्रदान करती है। ऐसा व्यक्ति अपनी प्रशंसा से अत्यंत प्रसन्न होता है और प्रशंसा करने वाले को आर्थिक रूप से सहायता भी कर देता है। अधिकतर ऐसे साधक अपने परिवार की नींव होता है और अपने परिवार में धन संग्रह करने वाला एकलौता व्यक्ति होता है। इस निधि के साधक के पास धन तो अथाह होता है किन्तु तामसी गुणों के कारण उसका नाश भी जल्दी होता है। पर साधक अपने पुत्र पौत्रों के लिए बहुत धन संपत्ति छोड़ कर जाता है।

६. मकर: इस निधि के धारक में योद्धा के गुण अधिक होते हैं एवं वो अस्त्रों एवं शस्त्रों का संग्रह करने वाला होता है। इस निधि में तामसी गुण अधिक होते हैं। इस निधि को प्राप्त व्यक्ति वीर होता है एवं सदैव युद्ध के लिए तत्पर होता है। वो राज्य के राजा एवं शासन के विरुद्ध जाने वाला होता है। ऐसे व्यक्ति को अगर अपनी पैतृक संपत्ति ना भी मिले तो भी वो अपनी वीरता से अपने लिए बहुत धन अर्जित करता है।

७. कच्छप: इस निधि को प्राप्त साधक तामस गुण वाला होता है। स्वाभाव से वह अत्यंत ही कृपण होता है। वो ना तो स्वयं अपनी संपत्ति का उपयोग करता है और ना ही किसी अन्य को उसका उपयोग करने देता है। ऐसे साधक के पास संपत्ति तो अथाह होती है किन्तु वो अपनी समस्त संपत्ति को छुपा कर रखता है। सांकेतिक रूप में कहा जाता है कि ऐसा व्यक्ति अपने धन पर एक सर्प की भांति कुंडली मार कर रहता है और उसकी रक्षा करता है। साधक के पुत्र-पौत्रादि को उसके मृत्यु के पश्चात ही उसकी संपत्ति प्राप्त होती है।

८. शंख: मुकुंद निधि की भांति ही शंख निधि एक पीढी तक रहती है। इस निधि को प्राप्त साधक केवल स्वयं की ही चिंता करता है सारी संपत्ति को स्वयं ही भोगता है। व्यक्तिगत रूप से उसके पास धन तो बहुत होता है किन्तु उसकी कृपणता के कारण उसके परिवार वाले दरिद्रता में ही जीवन जीते है। ऐसा साधक बहुत स्वार्थी होता है और अपनी समस्त संपत्ति का उपयोग स्वयं ही करता है। 

९. खर्व: इसे मिश्रित निधि भी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि नौ निधियों में केवल इस खर्व निधि को छोड़कर अन्य ८ निधियां के "पद्मिनी" नामक विद्या के सिद्ध होने पर प्राप्त हो जाती है। खर्व निधि विशेष ही क्यूंकि ये अन्य सभी ८ निधियों का मिश्रण मानी जाती है। यही कारण है कि इसके धारक के स्वाभाव में भी मिश्रित गुण प्रधान होते हैं। उसके कार्यों और स्वभाव के बारे में भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। समय अगर सही हो तो साधक अपना सारा धन और संपत्ति दान भी कर सकता है और यदि समय अनुकूल ना हो तो स्वयं उसके परिवार के सदस्यों को भी उसकी संपत्ति नहीं मिलती। इस निधि में सत, रज और तम तीनो गुणों का मिश्रण होता है।

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