20 जुलाई 2019

राघवयादवीयम् - विश्व की सबसे अद्भुत रचना

क्या आप किसी ऐसे ग्रन्थ के विषय में सोच सकते हैं जिसे आप सीधे पढ़े तो कुछ और अर्थ निकले और अगर उल्टा पढ़ें तो कोई और अर्थ? ग्रन्थ को तो छोड़िये, ऐसा केवल एक श्लोक भी बनाना अत्यंत कठिन है। लेकिन क्या आपको पता है कि एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमें एक नहीं बल्कि ३० ऐसे श्लोक हैं जिसे अगर आप सीधा पढ़ें तो रामकथा बनती है और उसी को अगर आप उल्टा पढ़ें तो कृष्णकथा। जी हाँ, ऐसा अद्भुत ग्रन्थ हमारे भारत में ही है।

उस ग्रन्थ का नाम है राघवयादवीयम् जिसे १७वीं सदी में कांचीपुरम के महान विद्वान् कवि श्री वेंकटाध्वरि ने रचा था। ये ऐसी अद्भुत रचना है जिसमें ३० श्लोक इस निपुणता के साथ रचे गए हैं कि सीधा पढ़ने पर वो रामकथा और उल्टा पढ़ने पर कृष्णकथा बन जाते हैं। इस ग्रन्थ का नाम राघवयादवीयम् भी राघव (श्रीराम) और यादव (श्रीकृष्ण) के योग से बना है। इसे "अनुलोम-विलोम काव्य" भी कहा जाता है जिसका अर्थ होता है ऐसा काव्य जिसके दो अर्थ हों।

वैसे तो इस ग्रन्थ में केवल ३० श्लोक हैं किन्तु अगर हम श्रीराम और श्रीकृष्ण की कथाओं का अलग अलग वर्णन करें तो श्लोकों की कुल संख्या ६० हो जाती है। तो ३० श्लोकों को इस प्रकार से लिखना कि उनमे श्रीराम और श्रीकृष्ण का भाव पूर्ण रूप से रहे, अपने आप में ही एक आश्चर्य है। ये ग्रन्थ संस्कृत भाषा में लिखा गया है। शब्दों का ऐसा अद्भुत ताना बाना केवल संस्कृत में ही बुना जा सकता है।

इस कथा के निर्माता श्री वेंकटाध्वरि का जन्म कांचीपुरम के एक गाँव अरसनीपलै में हुआ था। इन्होने कुल १४ रचनाएँ लिखी हैं जिनमे से "राघवयादवीयम्" और "लक्ष्मीसहस्त्रम्" सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। ऐसी किवदंती है कि वेंकटाध्वरि नेत्रहीन थे किन्तु जैसे ही इन्होने लक्ष्मीसहस्त्रम् रचना समाप्त की, माँ लक्ष्मी की कृपा से इन्हे इनकी नेत्रों की ज्योति पुनः प्राप्त हो गयी।

वेंकटाध्वरि श्री वेदांत देशिक के शिष्य थे जिन्होंने इन्हे शास्त्रों की शिक्षा दी। वेदांत देशिक ने ही श्री रामनुजमाचार्य द्वारा स्थापित रामानुज सम्प्रदाय को वेडगलई गुट के द्वारा आगे बढ़ाया। उन्ही के ज्ञान को वेंकटाध्वरि ने अपनी रचनाओं के रूप में आगे बढ़ाया। राघवयादवीयम् में रामकथा बहुत हद तक वाल्मीकि रामायण से मिलती जुलती है किन्तु कृष्णकथा में थोड़ा सा भेद है जो श्लोकों के साथ ही समझ में आता है।

इस रचना के सन्दर्भ में एक आश्चर्यजनक बात ये है कि अगर हम श्रीराम और श्रीकृष्ण के जीवन को देखें तो उन दोनों के जीवन भी एक दूसरे से बिलकुल उलटे हैं। श्रीराम भगवान विष्णु की १२ कलाओं के साथ जन्मे तो श्रीकृष्ण १६, श्रीराम क्षत्रिय कुल में जन्में तो श्रीकृष्ण यादव कुल में, श्रीराम को जीवन भर कष्ट भोगना पड़ा तो श्रीकृष्ण जीवन भर ऐश्वर्य में रहे, श्रीराम को पत्नी का वियोग सहना पड़ा तो श्रीकृष्ण को १६१०८ पत्नियों का सुख प्राप्त हुआ, श्रीराम ने धर्म के लिए कभी छल नहीं किया तो श्रीकृष्ण ने धर्म के लिए छल भी किया।

अगले लेख में हम आपको राघवयादवीयम् के सभी ६० (३० + ३०) श्लोकों का वर्णन हिंदी अर्थ के साथ बताएँगे। इस रचना में एक श्लोक के दो अर्थ हैं इसी लिए इसे कुल ६ भागों में प्रकाशित किया जाएगा। एक भाग में ५ श्लोकों अर्थात रामकथा और कृष्णकथा को मिला कर कुल १० श्लोकों का अर्थ बताया जाएगा। आप भी इस अद्भुत रचना को पढ़ें और उसपर गौरव का अनुभव करें। जय श्रीराम। जय श्रीकृष्ण।।

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