30 जुलाई 2019

राघवयादवीयम् (श्लोक ६ - १०)

श्लोक ६

अनुलोम (रामकथा)

मारमं सुकुमाराभं रसाज आप नृताश्रितं। 
काविरामदलाप गोसम अवामतरा नते ॥ ६॥

अर्थात: लक्ष्मीपति नारायण के सुन्दर, सलोने एवं तेजस्वी मानव अवतार श्रीराम का वरण रसाजा (भूमिपुत्री), धरातुल्य धैर्यशील, निज वाणी से असीम आनन्द प्रदाता एवं सुधि सत्यवादी सीता ने किया था।

विलोम (कृष्णकथा)

तेन रातम् अवाम अस गोपालात् अमराविक।
तं श्रित नृपजा सारभं रामा कुसुमं रमा ॥ ६॥

अर्थात: नारद द्वारा लाए गए, देवताओं के रक्षक, सत्यवादी, सत्य द्वारा प्रेषित, तत्वतः (वास्तव में) उज्जवल पारिजात पुष्प के सामान श्रीकृष्ण को नृपजा (नरेश-पुत्री) रमा (रुक्मिणी) ने निज पति के रूप में प्राप्त किया।

श्लोक ७

अनुलोम (रामकथा)

रामनामा सदा खेदभावे दयावान् अतापीनतेजाः रिपौ आनते।
कादिमोदासहाता स्वभासा रसामे सुगः रेणुकागात्रजे भूरुमे ॥ ७॥

अर्थात: श्री राम दुःखियों के प्रति सदैव दयालु, सूर्य की तरह तेजस्वी मगर सहज प्राप्य, देवताओं के सुख में विघ्न डालने वाले राक्षसों के विनाशक, अपने बैरी एवं समस्त भूमि के विजेता, भ्रमणशील रेणुका-पुत्र परशुराम को पराजित कर जिन्होंने अपने तेज-प्रताप से शीतल शांत किया था।

विलोम (श्रीकृष्ण कथा)

मेरुभूजेत्रगा काणुरे गोसुमे सा अरसा भास्वता हा सदा मोदिका।
तेन वा पारिजातेन पीता नवा यादवे अभात् अखेदा समानामर ॥ ७॥

अर्थात: अपराजेय मेरु (सुमेरु) पर्वत से भी सुन्दर रैवतक पर्वत पर निवास करते समय रुक्मिणी को स्वर्णिम चमकीले पारिजात पुष्पों की प्राप्ति उपरांत धरती के अन्य पुष्प कम सुगन्धित एवं अप्रिय लगने लगे। उन्हें कृष्ण की संगत में ओजस्वी, नवकलेवर एवं दैवीय रूप प्राप्त करने की अनुभूति होने लगी।

श्लोक ८

अनुलोम (रामकथा)

सारसासमधात अक्षिभूम्ना धामसु सीतया।
साधु असौ इह रेमे क्षेमे अरम् आसुरसारहा ॥ ८॥

अर्थात: समस्त आसुरी सेना के विनाशक, सौम्यता के प्रतीक एवं प्रभावशाली नेत्रधारी रक्षक राम अपने अयोध्या निवास में सीता संग सानंद रह रहे है थे।

विलोम (कृष्णकथा)

हारसारसुमा रम्यक्षेमेर इह विसाध्वसा।
य अतसीसुमधाम्ना भूक्षिता धाम ससार सा ॥ ८॥

अर्थात: अपने गले में मोतियों के हार जैसे पारिजात पुष्पों को धारण किए हुए, प्रसन्नता व परोपकार की अधिष्ठात्री, निर्भीक रुक्मिणी आतशी पुष्पधारी कृष्ण संग निज गृह को प्रस्थान कर गयी।

श्लोक ९

अनुलोम (रामकथा)

सागसा भरताय इभमाभाता मन्युमत्तया।
स अत्र मध्यमय तापे पोताय अधिगता रसा ॥ ९॥

अर्थात: पाप से परिपूर्ण कैकेयी अपने पुत्र भरत के लिए क्रोधाग्नि से विक्षिप्त हो तप रही थी। लक्ष्मी की कान्ति से उज्जवलित धरती (अयोध्या) को उस मध्यमा (मझली पत्नी) ने पापी विधि से अपने पुत्र भरत के लिए ले लिया।

विलोम (कृष्णकथा)

सारतागधिया तापोपेता या मध्यमत्रसा।
यात्तमन्युमता भामा भयेता रभसागसा ॥ ९॥

अर्थात: सूक्ष्मकटि (पतले कमर वाली), अति विदुषी सत्यभामा, श्रीकृष्ण द्वारा उतावलेपन में पारिजात पुष्प रुक्मिणी को देने से उसे भेदभावपूर्वक जानकर आहत होकर क्रोध और घृणा से भर गई।

श्लोक १०

अनुलोम (रामकथा)

तानवात् अपका उमाभा रामे काननद आस सा।
या लता अवृद्धसेवाका कैकेयी महद अहह ॥ १०॥

अर्थात: क्षीणता के कारण लता जैसी पीतवर्णी और समस्त आनन्दों से परे कैकेयी, श्रीराम के वनगमन का कारण बन उनके अभिषेक को अस्वीकारते हुए वृद्ध राजा की सेवा से विमुख हो गयी।

विलोम (कृष्णकथा)

हह दाहमयी केकैकावासेद्धवृतालया।
सा सदाननका आमेरा भामा कोपदवानता ॥ १०॥

अर्थात: सुमुखी (सुन्दर चहरे वाली) सत्यभामा ने अत्यंत विचलित और अशांत होकर दावाग्नि (जंगल की आग) की तरह क्रोध से लाल हो अपने भवन, जो मयूरों का वास और क्रीडास्थल था, उनके कपाटों को बंद कर दिया ताकि सेविकाओं का प्रवेश अवरुद्ध हो जाए।

...शेष

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