22 जुलाई 2019

राघवयादवीयम् (श्लोक १ - ५)

श्लोक १
अनुलोम (रामकथा)

वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः। 
रामः रामाधीः आप्यागः लीलाम् आर अयोध्ये वासे ॥ १॥

अर्थात: मैं उन भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम करता हूं जिन्होंने अपनी पत्नी सीता के संधान में मलय और सहयाद्री की पहाड़ियों से होते हुए लंका जाकर रावण का वध किया तथा अयोध्या वापस लौट दीर्घ काल तक सीता संग वैभव विलास संग वास किया।

विलोम (कृष्णकथा)


सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी मारामोराः।

यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥

अर्थात: मैं भगवान श्रीकृष्ण, जो तपस्वी व त्यागी हैं, रूक्मिणी तथा गोपियों संग क्रीड़ारत रहते हैं, गोपियों के पूज्य हैं, के चरणों में प्रणाम करता हूं। जिनके ह्रदय में मां लक्ष्मी विराजमान हैं तथा जो शुभ्र आभूषणों से मंडित हैं।

श्लोक २

अनुलोम (रामकथा)

साकेताख्या ज्यायामासीत् या विप्रादीप्ता आर्याधारा।
पूः आजीत अदेवाद्याविश्वासा अग्र्या सावाशारावा ॥ २॥

अर्थात: पृथ्वी पर साकेत अर्थात अयोध्या नामक एक नगर था जो वेदों में निपुण ब्राह्मणों तथा वणिको के लिए प्रसिद्द था।  ये अज के पुत्र दशरथ का धाम था एवं यहाँ होने वाले यज्ञों में अर्पण को स्वीकार करने के लिए देवता भी सदा आतुर रहते थे। यह विश्व के सर्वोत्तम नगरों में श्रेष्ठ था।

विलोम (कृष्णकथा)

वाराशावासाग्र्या साश्वाविद्यावादेताजीरा पूः।
राधार्यप्ता दीप्रा विद्यासीमा या ज्याख्याता के सा ॥ २॥

अर्थात: समुद्र के मध्य में अवस्थित, विश्व के स्मरणीय नगरों में से एक द्वारका नगर था जहाँ अनगिनत हाथी-घोड़े थे। ये अनेकों विद्वानों के वाद-विवाद की प्रतियोगिता स्थली थी, ये आध्यात्मिक ज्ञान का प्रसिद्द केंद्र था एवं जहाँ राधास्वामी श्रीकृष्ण का निवास था।

श्लोक ३

अनुलोम (रामकथा)

कामभारस्स्थलसारश्रीसौधा असौ घन्वापिका।
सारसारवपीना सरागाकारसुभूररिभूः ॥ ३॥

अर्थात: सर्वकामनापूरक, भवन-बहुल, वैभवशाली धनिकों का निवास, सारस पक्षियों के कूँ-कूँ से गुंजायमान एवं गहरे कूपों (कुओं) से भरा यह स्वर्णिम अयोध्या नगर था।

विलोम (कृष्णकथा)

भूरिभूसुरकागारासना पीवरसारसा।
का अपि व अनघसौध असौ श्रीरसालस्थभामका ॥ ३॥

अर्थात: मकानों में निर्मित पूजा वेदी के चंहुओर ब्राह्मणों का जमावड़ा इस बड़े कमलों वाले नगर द्वारका में है। निर्मल भवनों वाले इस नगर में ऊंचे आम्रवृक्षों के ऊपर सूर्य की छटा निखर रही है।

श्लोक ४

अनुलोम (रामकथा)

रामधाम समानेनम् आगोरोधनम् आस ताम्।
नामहाम् अक्षररसं ताराभाः तु न वेद या ॥ ४॥

अर्थात: श्रीराम की अलौकिक आभा जो सूर्यतुल्य है एवं जिससे समस्त पापों का नाश होता है, उससे पूरा नगर प्रकाशित था। उत्सवों में कमी ना रखने वाला यह नगर अनन्त सुखों का स्रोत तथा ऊंचे भवन एवं वृक्षों के कारण नक्षत्रों की आभा से अनभिज्ञ था।

विलोम (कृष्णकथा)

यादवेनः तु भाराता संररक्ष महामनाः।
तां सः मानधरः गोमान् अनेमासमधामराः ॥ ४॥

अर्थात: यादवों के सूर्य, सबों को प्रकाश देने वाले, विनम्र, दयालु, गऊओं के स्वामी, अतुल शक्तिशाली श्रीकृष्ण के द्वारा की रक्षा भली-भांति की जाती थी।

श्लोक ५

अनुलोम (रामकथा)

यन् गाधेयः योगी रागी वैताने सौम्ये सौख्ये असौ।
तं ख्यातं शीतं स्फीतं भीमान् आम अश्रीहाता त्रातम् ॥ ५॥

अर्थात: गाधीपुत्र गाधेय (ऋषि विश्वामित्र) एक निर्विघ्न, सुखी एवं आनददायक यज्ञ करने को इक्षुक थे पर आसुरी शक्तियों से आक्रान्त थे। उन्होंने शांत, शीतल, गरिमामय त्राता श्रीराम का संरक्षण प्राप्त किया था।

विलोम (कृष्णकथा)

तं त्राता हा श्रीमान् आम अभीतं स्फीतं शीतं ख्यातं।
सौख्ये सौम्ये असौ नेता वै गीरागी यः योधे गायन ॥ ५॥

अर्थात: नारद मुनि, जो दैदीप्यमान, अपनी संगीत से योद्धाओं में शक्ति संचारक, त्राता, सद्गुणों से पूर्ण एवं ब्राह्मणों के नेतृत्वकर्ता के रूप में विख्यात थे, उन्होंने विश्व के कल्याण के लिए गायन करते हुए श्रीकृष्ण से याचना की जिनकी ख्याति में दयावान, शांत, एवं परोपकार को इक्षुक होने के कारण दिनोदिन वृद्धि हो रही थी।

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