2 जुलाई 2019

मृतसञ्जीवनी स्त्रोत्र - ३

पिछले लेख में आपने श्री मृतसंजीवनी स्त्रोत्र के पहले १० श्लोकों का अर्थ पढ़ा। इस लेख में ३० श्लोकों वाले इस स्त्रोत्र के अगले १० श्लोकों का अर्थ दिया जा रहा है।

शूलाभयकर: सर्वविद्यानामधिनायक:।
ईशानात्मा तथैशान्यां पातु मां परमेश्वर:।।११।।

अर्थात: हाथों में शंख और अभयमुद्रा धारण करने वाले, सभी विद्याओं के स्वामी, ईशान स्वरूप भगवान् परमेश्वर शिव ईशान कोण में मेरी रक्षा करें।

ऊर्ध्वभागे ब्रह्मरूपी विश्वात्माऽध: सदावतु।
शिरो मे शङ्कर: पातु ललाटं चन्द्रशेखर:।।१२।।

अर्थात: ब्रह्मरूपी शिव मेरी ऊर्ध्वभाग में तथा विश्वात्मस्वरूप शिव अधोभाग में मेरी सदा रक्षा करें। शंकर मेरे सिर की और चन्द्रशेखर मेरे ललाट की रक्षा करें।

भूमध्यं सर्वलोकेशस्त्रिणेत्रो लोचनेऽवतु।।
भ्रूयुग्मं गिरिश: पातु कर्णौ पातु महेश्वर:।।१३।।

अर्थात: मेरे भौंहों के मध्य में सर्वलोकेश और दोनों नेत्रों की त्रिनेत्र भगवान् शंकर रक्षा करें। दोनों भौंहों की रक्षा गिरिश एवं दोनों कानों की रक्षा भगवान् महेश्वर करें।

नासिकां मे महादेव ओष्ठौ पातु वृषध्वज:।
जिव्हां मे दक्षिणामूर्तिर्दन्तान्मे गिरिशोऽवतु।।१४।।

अर्थात: महादेव मेरी नासीका की तथा वृषभध्वज मेरे दोनों अधरों की सदा रक्षा करें। दक्षिणामूर्ति मेरी जिह्वा की तथा गिरिश मेरे दन्तों की रक्षा करें।

मृत्युञ्जयो मुखं पातु कण्ठं मे नागभूषण:।
पिनाकि मत्करौ पातु त्रिशूलि हृदयं मम।।१५।।

अर्थात: मृत्युञ्जय मेरे मुख की एवं नागभूषण भगवान् शिव मेरे कण्ठ की रक्षा करें। पिनाकी मेरे दोनों हाथों की तथा त्रिशूलि मेरे हृदय की रक्षा करें।

पञ्चवक्त्र: स्तनौ पातु उदरं जगदीश्वर:।
नाभिं पातु विरूपाक्ष: पार्श्वो मे पार्वतिपति:।।१६।।

अर्थात: पञ्चवक्त्र मेरे दोनों स्तनो की और जगदीश्वर मेरे उदरकी रक्षा करें। विरूपाक्ष नाभि की और पार्वतीपति पार्श्वभाग की रक्षा करें।

कटद्वयं गिरिशौ मे पृष्ठं मे प्रमथाधिप:।
गुह्यं महेश्वर: पातु ममोरु पातु भैरव:।।१७।।

अर्थात: गिरीश मेरे दोनों कटिभाग की तथा प्रमथाधिप पृष्टभाग की रक्षा करें। महेश्वर मेरे गुह्यभाग की और भैरव मेरे दोनों ऊरुओं की रक्षा करें।

जानुनी मे जगद्धर्ता जङ्घे मे जगदंबिका।
पादौ मे सततं पातु लोकवन्द्य: सदाशिव:।।१८।।

अर्थात: जगद्धर्ता मेरे दोनों घुटनों की, जगदम्बिका मेरे दोनों जंघो की तथा लोकवन्दनीय सदाशिव निरन्तर मेरे दोनों पैरों की रक्षा करें।

गिरिश: पातु मे भार्या भव: पातु सुतान्मम।
मृत्युञ्जयो ममायुष्यं चित्तं मे गणनायक:।।१९।।

अर्थात: गिरीश मेरी भार्या की रक्षा करें तथा भव मेरे पुत्रों की रक्षा करें। मृत्युञ्जय मेरे आयु की गणनायक मेरे चित्त की रक्षा करें।

सर्वाङ्गं मे सदा पातु कालकाल: सदाशिव:।
एतत्ते कवचं पुण्यं देवतानांच दुर्लभम्।।२०।।

अर्थात: कालों के काल सदाशिव मेरे सभी अंगो की रक्षा करें। देवताओंके लिये भी दुर्लभ इस पवित्र कवच का वर्णन मैंने तुमसे किया है।

...शेष

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