24 जुलाई 2019

जब महर्षि भृगु ने त्रिदेवों की परीक्षा ली - ३: नारायण

पिछले लेखों में आपने पढ़ा कि किस प्रकार महर्षि भृगु ब्रह्मदेव एवं महादेव की परीक्षा लेते हैं और दोनों ये बताते हैं कि वे त्रिगुणातीत नहीं हैं। अब महर्षि भृगु अंतिम त्रिदेव श्रीहरि विष्णु की परीक्षा लेने के लिए क्षीरसागर पहुँचते हैं। जब महर्षि भृगु वहाँ पहुँचे तो नारायण के पार्षद जय-विजय ने उन्हें रोका। तब महर्षि भृगु ने उन्हें अपने वहाँ आने का कारण बताया। कोई भगवान नारायण की भी परीक्षा ले सकता है ये सोच कर जय-विजय को बड़ा कौतुहल हुआ और उन्होंने भृगु को प्रवेश की आज्ञा दे दी।

जब भृगु ऋषि अंदर गए तो वहाँ का अलौकिक दृश्य देख कर एक क्षण को मंत्रमुग्ध हो गए। अनंत तक फैले क्षीरसागर में स्वयं देव अनंत (शेषनाग) की शैय्या पर नारायण विश्राम कर रहे थे। त्रिलोक में जिनके रूप का कोई जोड़ नहीं था, वो देवी लक्ष्मी, जो स्वयं महर्षि भृगु और दक्षपुत्री ख्याति की पुत्री थी, नारायण की पाद सेवा कर रही थी। अपनी पुत्री और जमाता का ऐसा अलौकिक रूप देख कर महर्षि भृगु एक क्षण के लिए खो से गए।

जब उनकी चेतना लौटी तब उन्होंने सोचा कि श्रीहरि तो इस जगत के स्वामी है हीं किन्तु उसके साथ-साथ वे उनके जमाता भी लगते हैं। फिर किस प्रकार वे उनकी परीक्षा लें? जमाता को तो लोग अपने शीश पर बिठाते हैं और इसी कारण वे किस प्रकार श्रीहरि को कटु शब्द बोलेंगे? उनकी समझ में कुछ नहीं आया कि वे किस प्रकार भगवान विष्णु की परीक्षा लें। वे उसी प्रकार द्वार पर खड़े रह गए। 

उसी समय अचानक माता लक्ष्मी की दृष्टि द्वार पर खड़े अपने पिता पर पड़ी। उन्होंने उन्हें प्रणाम किया और श्रीहरि के समक्ष बुलाया। महर्षि भृगु अब नारायण की शेष शैय्या तक पहुँचे और देवी लक्ष्मी से कहा कि वे अपने पति को सूचित करे कि उनके पिता वहाँ उपस्थित हैं। ये सुनकर देवी लक्ष्मी ने कहा कि अभी उनके स्वामी योग निद्रा में हैं अतः उन्हें जगाया नहीं जा सकता। उन्हें उनके जागने की प्रतीक्षा करनी होगी।

अब यहाँ प्रभु की माया आरम्भ हुई। अभी तक भृगु त्रिदेवों की परीक्षा ले रहे थे अब उनकी परीक्षा आरम्भ हुई। उन्हें ये पता भी नहीं चला कि कब प्रभु ने उनकी परीक्षा आरम्भ कर दी है। उसी माया के कारण अकस्मात् उन्हें माता लक्ष्मी अपनी एक साधारण पुत्री प्रतीत होने लगी। उस कारण देवी लक्ष्मी के ऐसा करने से उनमें क्रोध का भाव उत्पन्न हो गया। त्रिगुणातीत की खोज करते-करते महर्षि भृगु ये भूल गए कि वे स्वयं त्रिगुणातीत नहीं हैं।

प्रभु की माया से वशीभूत महर्षि भृगु ने क्रोधपूर्वक देवी लक्ष्मी से कहा - "पुत्री! तुम्हे तो अपने पिता से वार्तालाप करने का शिष्टाचार भी नहीं पता। क्या तुम्हे ये ज्ञात नहीं कि पिता की आज्ञा अन्य सभी की आज्ञा से ऊपर होती है। और अगर तुम्हे ये ज्ञात है तो तुम अपने पति को मेरे स्वागत हेतु क्यों नहीं उठा रही। जान पड़ता है कि इस छलिये के साथ रहते-रहते तुम अपने पिता का सम्मान करना भी भूल गयी हो।"

देवी लक्ष्मी ने भृगु की दम्भ भरी बातें सुनी किन्तु ये जानकार कि ये प्रभु की माया से ग्रसित हैं, उन्होंने कुछ नहीं कहा। अब भृगु भगवान विष्णु की ओर मुड़े और ऊँचे स्वर में कहा - "हे नारायण! क्या आपको ये भी नहीं पता कि अपने अतिथि का स्वागत सत्कार कैसे करना चाहिए? मैं ब्रह्मपुत्र भृगु जो महान सप्तर्षिओं में से एक है, स्वयं आपके सामने खड़ा है किन्तु आप समाधि का ढोंग कर मेरा अपमान कर रहे हैं। ये ना भूलिए कि मैं आपका स्वसुर भी हूँ और उस नाते आपको मेरे सम्मान हेतु अपने आसन से उठना चाहिए।"

महर्षि भृगु के इतना कहने पर भी जब नारायण योगनिद्रा से नहीं जागे तो उन्हें लगा कि प्रभु जान बूझ कर उनकी अवहेलना कर रहे हैं। योगमाया से घिरे भृगु को उचित-अनुचित का ध्यान ना रहा और उन्होंने क्रोध में आकर भगवान विष्णु के वक्ष पर पाद-प्रहार कर दिया। त्रिलोक ये देख कर कांप उठा कि इस जगत के पालनहार के वक्ष पर एक मनुष्य ने अपने पैरों से प्रहार किया। देवता और सप्तर्षि ये सोच कर चिंतित हो उठे कि अब पता नहीं भृगु को इस अपराध का क्या दंड मिले।

नारायण पर प्रहार करते ही महर्षि भृगु उनकी माया से बाहर निकल आये। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि उन्होंने कितना बड़ा पाप कर दिया है तो लज्जा के मारे उनके नेत्र ना उठे। उसी समय भृगु के पाद प्रहार के कारण नारायण जागे और इससे पहले भृगु कुछ समझ पाते, भगवान विष्णु ने शेषशैय्या से उतर कर उनके पैर पकड़ लिए। उन्होंने कहा - "हे महर्षि! आपने मेरे वज्र समान वक्ष पर प्रहार किया। कही उससे आपके पैरों में कोई आघात तो नहीं पहुँचा? मैं अत्यंत लज्जित हूँ कि मेरे कारण आपको ऐसा कष्ट उठाना पड़ा।"

अब क्या था? महर्षि भृगु नारायण के चरणों में गिर गए और अपने अश्रुओं से उनके चरण पखारने लगे। आत्मग्लानि के कारण उनके अश्रु रुक ही नहीं पा रहे थे। अंततः नारायण ने स्वयं उन्हें उठाया और उनके अश्रु पोंछे। तब उनकी इस विनम्रता से अभिभूत महर्षि भृगु ने समस्त जगत में घोषणा की - "ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का महत्त्व एक सामान ही है किन्तु इन तीनों में केवल भगवान् विष्णु ही त्रिगुणातीत हैं।" जय श्रीहरि!

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