18 जुलाई 2019

जब महर्षि भृगु ने त्रिदेवों की परीक्षा ली - २: महादेव

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार सप्तर्षियों के अनुरोध पर महर्षि भृगु त्रिदेवों की परीक्षा लेने निकले, ये जानने के लिए कि तीनों में त्रिगुणातीत कौन है? सबसे पहले वे अपने पिता ब्रह्मदेव की परीक्षा लेने पहुँचे किन्तु परमपिता ब्रह्मा ने उन्हें बताया कि वे त्रिगुणातीत नहीं हैं क्यूंकि उनमे रजोगुण की अधिकता है। सृष्टि की रचना के लिए ये गुण होना भी आवश्यक है। तब ब्रह्मदेव ने उन्हें महादेव के पास जाने को कहा। अब आगे...

जब महर्षि भृगु महादेव के पास चले तो वे ये सोच कर चिंतित थे कि त्रिलोक के स्वामी महादेव की किस प्रकार परीक्षा ली जाये? दूसरे, वे तो संहार के स्वामी थे और उनका प्रचंड क्रोध तो जगत में विख्यात था। वे इस बात से भी भयभीत थे कि कही उन्हें महारुद्र के कोप का भाजन ना बनना पड़ जाये। किन्तु महादेव आशुतोष भी थे। वे जितनी जल्दी क्रोधित होते थे उतनी ही जल्दी प्रसन्न भी हो जाते थे। यह सोच कर उन्हें कुछ धीरज बंधा और वे कैलाश पहुँचे। 

वहाँ पहुँचने पर नंदी के नेतृत्व में सभी शिवगणों ने उनका स्वागत किया और उन्हें सूचित किया कि अभी महादेव तपस्या में लीन हैं। जब वे तपस्यारत होते हैं तो किसी को उनसे मिलने की आज्ञा नहीं होती अतः आपको उनके समाधि से बाहर आने तक प्रतीक्षा करनी होगी।

तब उनकी ऐसी बातें सुनकर महर्षि भृगु ने उनसे बिगड़ते हुए कहा - "रे शिव के सेवक! क्या तू मेरे विषय में नहीं जानता? जिस परमपिता ब्रह्मा ने ये समस्त सृष्टि बनाई है, मैं उन्ही ब्रह्मा का पुत्र हूँ। मुझे अपने दर्शनों के लिए तो स्वयं ब्रह्मा और विष्णु भी नहीं रोकते फिर तुम मुझे रोकने का साहस कैसे कर रहा है? तुझे मेरे क्रोध के बारे में ज्ञात नहीं है इसी कारण तू मेरे साथ ऐसी धृष्ट्ता कर रहा है। मुझे रोकने का प्रयास ना कर अन्यथा मैं तुझे अवश्य ही श्राप दे दूंगा।"

महर्षि भृगु की ऐसी बात सुनकर भी नंदी क्रोधित ना होते हुए उनसे बोले - "हे महर्षि! मुझे आपके प्रताप के विषय में सब कुछ पता है और आपका अपमान करना मेरा आशय नहीं था। किन्तु जब महादेव की आज्ञा ना हो तो मैं किस प्रकार आपको भीतर आने दे सकता हूँ। यदि स्वयं ब्रह्मदेव आये होते तो कदाचित मैं उनका मार्ग नहीं रोकता किन्तु उनके और श्रीहरि के अतिरिक्त महादेव की समाधि के समय कोई और कैलाश में प्रवेश नहीं कर सकता। अतः आप अपना क्रोध शांत करें।

अब महर्षि भृगु अत्यंत क्रोध में भरकर बलात कैलाश में प्रवेश करने का प्रयत्न करने लगे। उन्हें रोकने के लिए शिवगणों अहिंसात्मक रूप से प्रयत्न करने लगे। किन्तु इस प्रयास में वहाँ कोलाहल का वातावरण उपस्थित हो गया। इस कोलाहल को सुनकर भगवती पार्वती अपने अंतःपुर से निकल कर वहाँ आ गयी। किन्तु तब तक उस कोलाहल से महादेव की समाधि भंग हो गयी। अब आगे क्या होने वाला है, ये देखने के लिए सारे देवता और सप्तर्षिगण महादेव की लीला को देखने के लिए आकाश में स्थित हो गए।

महादेव ने देखा कि भृगु के कारण ही उनकी समाधि भंग हुई है किन्तु भृगु ब्रह्मा के पुत्र थे इसी कारण उन्होंने अपने क्रोध पर नियंत्रण रखा। उधर शिवगण भृगु को कैलाश में प्रवेश करने से रोक रहे थे तभी महादेव ने उन्हें रोका और भृगु को अपने पास बुलाया और प्रसन्नतापूर्वक उन्हें आलिंगन करने को अपने स्थान से उठे। अब महर्षि भृगु को सही मौका मिला और उन्होंने उनके आलिंगन को अस्वीकार करते हुए कहा - "हे महादेव! आप अनार्यों की भांति भूत-प्रेतों से घिरे रहते हैं और अपने शरीर पर चिता की भस्म लगाए रहते हैं। मैं तो पवित्र ब्राह्मण हूँ अतः मैं आपसे आलिंगन कैसे कर सकता हूँ?"

महादेव अपनी समाधि टूटने से वैसे ही दुखी थे और अब भृगु द्वारा इस प्रकार अपमान करने पर उन्हें बड़ा क्रोध आया। उन्होंने अपना त्रिशूल उठाया और भृगु की ओर बढे। अब भृगु ने सोचा कि अब तो प्राण गए। किन्तु महादेव से उन्हें त्रिलोक में कौन बचा सकता है? तभी उनकी दृष्टि माता पार्वती पर पड़ी। उन्होंने तुरंत माता के चरण पकड़ लिए और उनसे अपनी रक्षा करने की गुहार लगाई। 

अब माता पार्वती आगे आयी और महादेव से प्रार्थना की कि भृगु तो उनके पुत्र की भांति हैं अतः उन्हें प्राणदान दें। उनके ऐसा कहने पर महादेव का क्रोध थोड़ा शांत हुआ। उन्हें शांत देख कर भृगु ने उनके चरण पकड़ते हुए परीक्षा के बारे में बताया। ये सुनकर महादेव हँसते हुए बोले - "महर्षि! आप तो स्वयं ज्ञानी हैं फिर आपने ऐसा कैसे सोचा कि सृष्टि के संहार का जो भार मुझपर है वो बिना तमोगुण के पूर्ण हो सकता है। मुझमे तमोगुण की अधिकता है क्यूंकि संहार के लिए ये आवश्यक है। इसके अतिरिक्त यज्ञ के जिस पुण्य के लिए आप ये परीक्षा ले रहे हैं उसे तो मैंने दक्ष के यज्ञ में ही त्याग दिया था।"

तब भृगु भगवान शिव की स्तुति करते हुए बोले - "हे महादेव! मुझे ये ज्ञात है। आप तो समस्त यज्ञ और पुण्य से परे हैं किन्तु फिर भी इसी बहाने मुझे आपकी इस लीला में भाग लेने का अवसर मिला। इससे मैं कृतार्थ हो गया। अब मेरे लिए क्या आज्ञा है? अब केवल नारायण ही बचे हैं किन्तु सृष्टि के पालनहार की परीक्षा लेने में मुझे संकोच हो रहा है।"

तब महादेव ने कहा - "महर्षि! ये तो कार्य आपने किया है वो नारायण की परीक्षा के बिना अधूरा है। उनकी परीक्षा लेने के बाद ही आपको ज्ञात होगा कि त्रिगुणातीत कौन है। अतः आप निःसंदेह वैकुण्ठ को प्रस्थान करें।" महादेव की ऐसी आज्ञा सुनकर महर्षि भृगु उन्हें प्रणाम कर क्षीरसागर की और बढे।

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