14 जुलाई 2019

जब महर्षि भृगु ने त्रिदेवों की परीक्षा ली - १: ब्रह्मदेव

बहुत काल के बाद महान ऋषियों द्वारा पृथ्वी पर एक महान यज्ञ किया गया। तब उस समय प्रश्न उठा कि इसका पुण्यफल त्रिदेवों में सर्वप्रथम किसे प्रदान किया जाये। तब महर्षि अंगिरा ने सुझाव दिया कि इन तीनों में जो कोई भी "त्रिगुणातीत", अर्थात सत, राज और तम गुणों के अधीन ना हो उसे ही सर्वश्रेष्ठ मान कर यज्ञ का पुण्य सबसे पहले प्रदान किया जाये। किन्तु अब त्रिदेवों की परीक्षा कौन ले? वे तो त्रिकालदर्शी हैं। जो कोई भी उनकी परीक्षा लेने का प्रयास करेगा उसे उनके कोप का भाजन भी बनना पड़ सकता है। तब सप्तर्षियों ने महर्षि भृगु का नाम सुझाया। उनके अनुमोदन पर भृगु त्रिदेवों की परीक्षा लेने को तैयार हो गए। त्रिदेवों से क्या छुपा है, वे भी इस लीला में भाग लेने के लिए सज्ज हो गए।

सबसे पहले महर्षि भृगु अपने पिता ब्रह्मा के पास पहुँचे। वहाँ पहुँच कर उन्होंने ब्रह्मदेव और माता सरस्वती को प्रणाम नहीं किया। इससे ब्रह्मदेव को क्रोध तो बहुत आया किन्तु पुत्र की नासमझी समझ कर उन्होंने कुछ कहा नहीं। तब भृगु ऋषि ने कठोर स्वर में ब्रह्मदेव से कहा - "हे पिताश्री! क्या आप अपने लोक में आने वालों का यही आथित्य करते हैं? आपने तो मुझे आसन ग्रहण करने को भी नही पूछा।" तब परमपिता ब्रह्मा ने हँसते हुए कहा - "पुत्र! तुम अथिति कब से हो गए? तुम तो हमारे पुत्र हो अतः कभी भी यहाँ आ सकते हो। क्या पुत्रों को भी आसन ग्रहण करने के लिए कहने की आवश्यकता है? अतः निःसंकोच आसन ग्रहण करो।" 

लेकिन तब तक भृगु ऋषि के क्रोध का पारा आसमान पर चढ़ गया। उन्होंने बड़े ही कठोर स्वर में अपने पिता से कहा - "हे वृद्ध! आपको तो अपने अतिथि और पुत्र का सम्मान करना भी नहीं आता। क्या आपको ये ज्ञात नहीं कि मैं कितना बड़ा महर्षि हूँ और मेरा तपोबल क्या है? मुझे तो सप्तर्षियों में भी सम्मलित होने का सम्मान प्राप्त है और आपको इतनी भी समझ नहीं है कि इतने सम्माननीय व्यक्ति का स्वागत कैसे करना चाहिए।"

ब्रह्माजी तो सब कुछ जानते ही थे इसीलिए अपने पुत्र की दम्भ भरी बातें सुनकर मुस्कुराते रहे। महर्षि भृगु ने अपनी परीक्षा और कठिन की और खुलकर अपने पिता को अपशब्द बोलने लगे। अपने माता पिता के समक्ष इस प्रकार अपने पुत्र को अपशब्द बोलते देख कर अंततः ब्रह्मदेव को क्रोध आ ही गया। उन्होंने क्रोधित होते हुए कहा - "रे धृष्ट! क्या तुम्हारे यही संस्कार हैं जो अपने पिता से इस स्वर में बात कर रहे हो? तुमने तो ना प्रवेश से पहले आज्ञा ली और ना ही अपने माता पिता को प्रणाम किया। उसपर भी मैंने तुम्हे क्षमा कर दिया किन्तु तुम तो सीमा से परे चले गए हो। अतः अब मैं अवश्य तुम्हे श्राप दे दूंगा।"

ब्रह्माजी को इतना क्रोध में देख कर महर्षि भृगु ने हाथ जोड़ कर उनसे क्षमा मांगी और कहा - "हे परमपिता! मुझे क्षमा कर दें। आपसे क्या छुपा है? आप तो जानते ही हैं कि सप्तर्षियों के कहने पर मैं त्रिदेवों की परीक्षा लेने निकला हूँ। उसी उद्देश्य से मैं यहाँ आया था किन्तु मैंने देखा कि आप भी मेरे अपशब्द कहने पर क्रोधित हो गए। अतः आप त्रिगुणातीत नहीं हो सकते।"

तब ब्रह्मदेव ने कहा - "हे पुत्र! इसमें इतना प्रहसन करने की क्या आवश्यकता थी? अगर तुम मुझसे सीधे भी पूछते तो मैं तुम्हे बता देता कि मैं त्रिगुणातीत नहीं हूँ। मुझमे रजोगुण की अधिकता है और ये सृष्टि के निर्माण के लिए भी आवश्यक है। अतः तुम महादेव और श्रीहरि के पास जा कर उन्हें परखो।"

तब भृगु ऋषि ने कहा - "हे प्रभु! आपको तो अवश्य ही ज्ञात होगा कि आप तीनों में त्रिगुणातीत कौन है। तो आप ही मुझे क्यों नहीं बता देते? आपने तो फिर भी मुझे पुत्र समझ कर क्षमा कर दिया किन्तु महादेव का रौद्र रूप कौन नहीं जानता? मुझे तो उनके समक्ष जाने में ही भय लगता है। अगर आपकी तरह वो भी मुझपर रुष्ट हो गए तब तो मेरी रक्षा त्रिलोक में कोई नहीं करेगा। अतः आप ही मुझे इस प्रश्न का उत्तर दे दीजिये।"

तब ब्रह्मदेव ने हँसते हुए कहा - "वत्स! इसका उत्तर तो मैं अवश्य जनता हूँ किन्तु तुम्हे बताऊंगा नहीं। ऐसा इसलिए क्यूंकि लीलाओं का अपना आनंद है। ये कैसे संभव है कि तुमने मेरी लीला देख ली किन्तु महादेव और श्रीहरि की लीला देखने से वंचित रह जाओ। तुम निःसंकोच होकर महादेव के पास जाओ। वो तो सर्वज्ञ हैं अतः तुम्हारी प्राणहानि नहीं करेंगे। तुम बहुत भाग्यशाली हो कि तुम्हे त्रिदेवों की लीला को देखने का अवसर मिला है।" अपने पिता से ये वचन सुनकर महर्षि भृगु उन्हें प्रणाम कर कैलाश की ओर प्रस्थान कर गए।

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