30 जुलाई 2019

राघवयादवीयम् (श्लोक ६ - १०)

श्लोक ६

अनुलोम (रामकथा)

मारमं सुकुमाराभं रसाज आप नृताश्रितं। 
काविरामदलाप गोसम अवामतरा नते ॥ ६॥

अर्थात: लक्ष्मीपति नारायण के सुन्दर, सलोने एवं तेजस्वी मानव अवतार श्रीराम का वरण रसाजा (भूमिपुत्री), धरातुल्य धैर्यशील, निज वाणी से असीम आनन्द प्रदाता एवं सुधि सत्यवादी सीता ने किया था।

28 जुलाई 2019

क्या श्रीकृष्ण माँ काली के अवतार हैं? - २

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार देवी पुराण में श्रीकृष्ण को माँ काली का और राधा को भगवान शंकर का अवतार माना गया है। इसका साक्ष्य है वृन्दावन में स्थित श्रीकृष्ण-काली मंदिर। आज के इस लेख में हम मुख्यतः दो बातों का जिक्र करेंगे - पहली एक घटना जिसमे माँ काली ने राधा रूपी भगवान शंकर के मान की रक्षा की। और दूसरी कि माँ काली और श्रीकृष्ण में क्या-क्या समानताएं हैं। तो चलिए आरम्भ करते हैं।

26 जुलाई 2019

क्या श्रीकृष्ण माँ काली के अवतार हैं? - १

अगर आपसे कोई पूछे कि श्रीकृष्ण किसके अवतार थे तो १००० में से ९९९ लोग बिना संकोच के कहेंगे कि श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के अवतार थे। हमारे धार्मिक ग्रंथों में भी इस बात की स्पष्ट व्याख्या है कि भगवान श्रीकृष्ण के रूप में श्रीहरि ने अपना ८वां अवतार लिया। कहीं-कहीं उन्हें भगवान विष्णु का नवां अवतार भी कहा जाता है क्यूंकि गौतम बुद्ध को विष्णु अवतार के रूप में मान्यता मिलने में मतभेद है। दशावतार के बारे में आप विस्तार से यहाँ पढ़ सकते हैं। लेकिन इसका एक दूसरा पहलु भी है।

जब आप उत्तर प्रदेश में भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली वृन्दावन जायेंगे तो यहाँ का एक विशेष आकर्षण "कृष्ण-काली" मंदिर है। इस मंदिर की विशेषता ये है कि यहाँ पर श्रीकृष्ण की पूजा माँ काली के रूप में होती है। अब आप पूछेंगे कि ये कैसे संभव है? इसका उत्तर ये है कि बहुत कम, लेकिन कुछ जगह श्रीकृष्ण को माँ काली का अवतार ही माना जाता है। विशेषकर "देवी पुराण" में इस बात का वर्णन है कि स्वयं माँ काली ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया था। इसके पीछे एक बड़ी रोचक कथा है।

24 जुलाई 2019

जब महर्षि भृगु ने त्रिदेवों की परीक्षा ली - ३: नारायण

पिछले लेखों में आपने पढ़ा कि किस प्रकार महर्षि भृगु ब्रह्मदेव एवं महादेव की परीक्षा लेते हैं और दोनों ये बताते हैं कि वे त्रिगुणातीत नहीं हैं। अब महर्षि भृगु अंतिम त्रिदेव श्रीहरि विष्णु की परीक्षा लेने के लिए क्षीरसागर पहुँचते हैं। जब महर्षि भृगु वहाँ पहुँचे तो नारायण के पार्षद जय-विजय ने उन्हें रोका। तब महर्षि भृगु ने उन्हें अपने वहाँ आने का कारण बताया। कोई भगवान नारायण की भी परीक्षा ले सकता है ये सोच कर जय-विजय को बड़ा कौतुहल हुआ और उन्होंने भृगु को प्रवेश की आज्ञा दे दी।

22 जुलाई 2019

राघवयादवीयम् (श्लोक १ - ५)

श्लोक १
अनुलोम (रामकथा)

वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः। 
रामः रामाधीः आप्यागः लीलाम् आर अयोध्ये वासे ॥ १॥

अर्थात: मैं उन भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम करता हूं जिन्होंने अपनी पत्नी सीता के संधान में मलय और सहयाद्री की पहाड़ियों से होते हुए लंका जाकर रावण का वध किया तथा अयोध्या वापस लौट दीर्घ काल तक सीता संग वैभव विलास संग वास किया।

20 जुलाई 2019

राघवयादवीयम् - विश्व की सबसे अद्भुत रचना

क्या आप किसी ऐसे ग्रन्थ के विषय में सोच सकते हैं जिसे आप सीधे पढ़े तो कुछ और अर्थ निकले और अगर उल्टा पढ़ें तो कोई और अर्थ? ग्रन्थ को तो छोड़िये, ऐसा केवल एक श्लोक भी बनाना अत्यंत कठिन है। लेकिन क्या आपको पता है कि एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमें एक नहीं बल्कि ३० ऐसे श्लोक हैं जिसे अगर आप सीधा पढ़ें तो रामकथा बनती है और उसी को अगर आप उल्टा पढ़ें तो कृष्णकथा। जी हाँ, ऐसा अद्भुत ग्रन्थ हमारे भारत में ही है।

18 जुलाई 2019

जब महर्षि भृगु ने त्रिदेवों की परीक्षा ली - २: महादेव

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार सप्तर्षियों के अनुरोध पर महर्षि भृगु त्रिदेवों की परीक्षा लेने निकले, ये जानने के लिए कि तीनों में त्रिगुणातीत कौन है? सबसे पहले वे अपने पिता ब्रह्मदेव की परीक्षा लेने पहुँचे किन्तु परमपिता ब्रह्मा ने उन्हें बताया कि वे त्रिगुणातीत नहीं हैं क्यूंकि उनमे रजोगुण की अधिकता है। सृष्टि की रचना के लिए ये गुण होना भी आवश्यक है। तब ब्रह्मदेव ने उन्हें महादेव के पास जाने को कहा। अब आगे...

16 जुलाई 2019

हनुमानजी की दस गौण सिद्धियां

पिछले लेखों में आपने महाबली हनुमान की अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों के विषय में पढ़ा। इसके अतिरिक्त पवनपुत्र के पास १० गौण सिद्धियों के होने का भी वर्णन है। ये गोपनीय और रहस्य्मयी १० गौण सिद्धियां जिस किसी के पास भी होती हैं वो अजेय हो जाता है। भागवत पुराण में श्रीकृष्ण ने भी इन १० गौण सिद्धियों के महत्त्व का वर्णन किया है। ये सिद्धियां चमत्कारी हैं और देवों तथा दानवों के लिए भी दुर्लभ हैं। आइये इन १० गौण सिद्धियों के बारे में कुछ जानते हैं: 

14 जुलाई 2019

जब महर्षि भृगु ने त्रिदेवों की परीक्षा ली - १: ब्रह्मदेव

बहुत काल के बाद महान ऋषियों द्वारा पृथ्वी पर एक महान यज्ञ किया गया। तब उस समय प्रश्न उठा कि इसका पुण्यफल त्रिदेवों में सर्वप्रथम किसे प्रदान किया जाये। तब महर्षि अंगिरा ने सुझाव दिया कि इन तीनों में जो कोई भी "त्रिगुणातीत", अर्थात सत, राज और तम गुणों के अधीन ना हो उसे ही सर्वश्रेष्ठ मान कर यज्ञ का पुण्य सबसे पहले प्रदान किया जाये। किन्तु अब त्रिदेवों की परीक्षा कौन ले? वे तो त्रिकालदर्शी हैं। जो कोई भी उनकी परीक्षा लेने का प्रयास करेगा उसे उनके कोप का भाजन भी बनना पड़ सकता है। तब सप्तर्षियों ने महर्षि भृगु का नाम सुझाया। उनके अनुमोदन पर भृगु त्रिदेवों की परीक्षा लेने को तैयार हो गए। त्रिदेवों से क्या छुपा है, वे भी इस लीला में भाग लेने के लिए सज्ज हो गए।

12 जुलाई 2019

बालखिल्य

हमारे सप्तर्षि श्रृंखला में आपने महर्षि क्रतु के विषय में पढ़ा। बालखिल्य इन्ही महर्षि क्रतु के पुत्र हैं। प्रजापति दक्ष की पुत्री सन्नति से महर्षि क्रतु ने विवाह किया जिससे इन्हे ६०००० तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुए। इन बाल ऋषियों का आकर केवल अंगूठे जितना था। ये सारे ६०००० पुत्र ही सामूहिक रूप से बालखिल्य कहलाते हैं। महर्षि क्रतु के ये तेजस्वी पुत्र गुण और तेज में अपने पिता के समान ही माने जाते हैं। बालखिल्यों और पक्षीराज गरुड़ का सम्बन्ध बहुत पुराना है। 

पक्षीराज गरुड़ महर्षि कश्यप और वनिता के पुत्र थे। कश्यप की दूसरी पत्नी कुद्रू के गर्भ से १००० नागों से जन्म लिया था और उनकी सहायता से कुद्रू ने छल से विनता को अपनी दासी बना लिया। विनता के गर्भ से सबसे पहले अरुण का जन्म हुआ तो भगवान सूर्यनारायण का सारथि बना। उसके दूसरे पुत्र के रूप में गरुड़ का जन्म हुआ जिसने नागों के कहने पर स्वर्गलोक से अमृत लाकर अपनी माता को दासत्व से मुक्त किया। उस श्रम के बाद गरुड़ को भूख लगी। तब उसके पिता कश्यप ने कहा कि सामने पर्वत शिखर पर एक महाविशालकाय हाथी और कछुआ रहते हैं। तुम उन्हें खाकर अपनी भूख मिटा लो।

10 जुलाई 2019

महावीर हनुमान की नौ निधियाँ

पवनपुत्र हनुमान को अष्ट सिद्धि और नौ निधियों का स्वामी कहा गया है। पिछले लेख में आपने बजरंगबली की आठ सिद्धियों के बारे में पढ़ा था। इस लेख में हम आपको उनकी नौ निधियों के बारे में बताएँगे। निधि का अर्थ धन अथवा ऐश्वर्य होता है। ऐसी वस्तुएं जो अत्यंत दुर्लभ होती हैं, बहुत ही कम लोगों के पास रहती हैं और उन्हें प्राप्त करने के लिए घोर तप करना होता हो, उन्हें ही निधि कहा जाता है। वैसे तो ब्रह्माण्ड पुराण एवं वायु पुराण में कई निधियों का उल्लेख किया गया है किन्तु उनमे से नौ निधियाँ मुख्य होती हैं। कहा जाता है कि हनुमानजी को ये नौ निधियाँ माता सीता ने वरदान स्वरुप दी थी।

8 जुलाई 2019

मृतसञ्जीवनी स्त्रोत्र - ४

आज इस लेख के साथ मृतसञ्जीवनी स्त्रोत्र श्रंखला समाप्त हो रही है। पिछले लेख में हमने आपको इस महान स्त्रोत्र के ११ से २० श्लोकों का अर्थ बताया था। इस लेख में हम इस स्त्रोत्र के आखिरी १० श्लोकों (२१-३०) को अर्थ सहित बता रहे हैं।

मृतसञ्जीवनं नाम्ना महादेवेन कीर्तितम्।
सहस्त्रावर्तनं चास्य पुरश्चरणमीरितम्।।२१।।

अर्थात: महादेव ने स्वयं मृतसञ्जीवन नामक इस कवच को कहा है। इस कवच की सहस्त्र आवृत्ति को पुरश्चरण कहा गया है। 

य: पठेच्छृणुयानित्यं श्रावयेत्सु समाहित:।
सकालमृत्यु निर्जित्य सदायुष्यं समश्नुते।।२२।।

अर्थात: जो अपने मन को एकाग्र करके नित्य इसका पाठ करता है, सुनता अथावा दूसरों को सुनाता है, वह अकाल मृत्यु को जीतकर पूर्ण आयु का उपयोग करता है।

6 जुलाई 2019

क्यों श्रीकृष्ण ने अपने ही पुत्र को श्राप दिया?

महाभारत काल के दौरान सत्राजित की समयान्तक मणि ढूंढने के दौरान श्रीकृष्ण एक गुफा में पहुँचे जहाँ उन्होंने ऋक्षराज जांबवंत को देखा। जांबवंत के पास श्रीकृष्ण की समयान्तक मणि थी और जब उन्होंने उसे श्रीकृष्ण को वापस देने से मना किया तब दोनों के बीच भयानक युद्ध आरम्भ हुआ। ये युद्ध २८ दिनों तक चलता रहा किन्तु दोनों के बीच हार-जीत का निर्णय नहीं हो सका। तब जांबवंत ने अपने आराध्य श्रीराम का स्मरण किया तो उन्हें श्रीकृष्ण में ही अपने प्रभु श्रीराम दिखाई दिए। इससे जांबवंत को समझ आ गया कि श्रीकृष्ण ही श्रीराम के दूसरे रूप हैं। उन्होंने मणि श्रीकृष्ण को दे दी और अपनी पुत्री जांबवंती का विवाह भी श्रीकृष्ण के साथ कर दिया।

2 जुलाई 2019

मृतसञ्जीवनी स्त्रोत्र - ३

पिछले लेख में आपने श्री मृतसंजीवनी स्त्रोत्र के पहले १० श्लोकों का अर्थ पढ़ा। इस लेख में ३० श्लोकों वाले इस स्त्रोत्र के अगले १० श्लोकों का अर्थ दिया जा रहा है।

शूलाभयकर: सर्वविद्यानामधिनायक:।
ईशानात्मा तथैशान्यां पातु मां परमेश्वर:।।११।।

अर्थात: हाथों में शंख और अभयमुद्रा धारण करने वाले, सभी विद्याओं के स्वामी, ईशान स्वरूप भगवान् परमेश्वर शिव ईशान कोण में मेरी रक्षा करें।

ऊर्ध्वभागे ब्रह्मरूपी विश्वात्माऽध: सदावतु।
शिरो मे शङ्कर: पातु ललाटं चन्द्रशेखर:।।१२।।

अर्थात: ब्रह्मरूपी शिव मेरी ऊर्ध्वभाग में तथा विश्वात्मस्वरूप शिव अधोभाग में मेरी सदा रक्षा करें। शंकर मेरे सिर की और चन्द्रशेखर मेरे ललाट की रक्षा करें।