2 जून 2019

सप्तर्षि श्रंखला १०.१ - महर्षि वशिष्ठ

महर्षि वशिष्ठ परमपिता ब्रह्मा के पुत्र एवं सातवें सप्तर्षि हैं। इनकी उत्पत्ति ब्रह्मदेव की प्राण वायु से हुई बताई जाती है।  महर्षि वशिष्ठ को ऋग्वेद के ७वें मण्डल का लेखक और अधिपति माना जाता है। ऋग्वेद में कई जगह, विशेषकर १०वें मण्डल में महर्षि वशिष्ठ एवं उनके परिवार के विषय में बहुत कुछ लिखा गया है। इसके अतिरिक्त अग्नि पुराण एवं पुराण में भी उनका विस्तृत वर्णन है। महर्षि वशिष्ठ ही ३२००० श्लोकों वाले योगवशिष्ठ रामायण, वशिष्ठ धर्मसूत्र, वशिष्ठ संहिता और वशिष्ठ पुराण के जनक हैं। स्वयं श्री आदिशंकराचार्य ने महर्षि वशिष्ठ को वेदांत के आदिऋषियों में प्रथम स्थान प्रदान किया है। 'वशिष्ठ' का अर्थ भी सर्वश्रेष्ठ ही होता है।

ब्रह्मा के मानसपुत्रों में जिन्होंने गृहस्थ धर्म को अपनाया उनमे से एक ये भी हैं। अपनी पत्नी अरुंधति के साथ महर्षि वशिष्ठ एक आदर्श, श्रेष्ठ एवं उत्तम गृहस्थ जीवन का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। गऊओं में श्रेष्ठ कामधेनु एवं उनकी पुत्री नंदिनी इन्ही की क्षत्रछाया में सुखपूर्वक रहती हैं। इसी कामधेनु गाय के लिए इनमे और महर्षि विश्वामित्र में विवाद हुआ और विश्वामित्र महर्षि वशिष्ठ के चिर प्रतिद्वंदी बन गए। किन्तु अंततः महर्षि वशिष्ठ की महानता के आगे राजर्षि विश्वामित्र को झुकना पड़ा। 

ऋग्वेद के ७वें अध्याय में ये बताया गया है कि सर्वप्रथम महर्षि वशिष्ठ ने अपना आश्रम सिंधु नदी के किनारे बसाया था। बाद में इन्होने गंगा और सरयू के किनारे भी अपने आश्रम की स्थापना की। बौद्ध धर्म में भी जिन १० महान ऋषियों का वर्णन है, उनमे से एक महर्षि वशिष्ठ हैं। अन्य सप्तर्षियों की तरह ये चिरजीवी हैं और इसी कारण इनका विवरण सतयुग, त्रेता और द्वापर सभी युग में मिलता है। सतयुग में जहाँ ये प्रथम स्वयंभू मन्वन्तर के सप्तर्षियों में से एक कहलाते हैं वहीँ त्रेतायुग में ये भगवान श्रीराम के गुरु भी हैं। साथ ही द्वापर युग में महाभारत के समय ये महर्षि व्यास को तत्वज्ञान भी देते हैं और पितामह भीष्म के भी गुरु बनते हैं। 

महर्षि वशिष्ठ की ख्याति विशेषकर इक्षवाकु कुल के कुलगुरु के रूप में है। वे महाराज इक्षवाकु को राजधर्म की शिक्षा देते हैं और आगे चलकर उनकी कई पीढ़ियों बाद महाराज दशरथ और उनके पुत्र राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के भी गुरु बनते हैं। पुरुवंश में दुष्यन्तपुत्र भरत भी इनके शिष्यों में से एक माने जाते हैं। कहा जाता है कि महर्षि वशिष्ठ के आशीर्वाद से ही भरत चक्रवर्ती सम्राट बनते हैं। आगे चलकर वे देवव्रत भीष्म के गुरु भी बनते हैं और जब वे मृत्यु-शैय्या पर पड़े होते हैं तो अन्य सप्तर्षियों के साथ महर्षि वशिष्ठ भी उनसे मिलने जाते हैं। महर्षि वशिष्ठ ही मनु को अपनी संपत्ति और राज्य अपने दो पुत्रों प्रियव्रत एवं उत्तानपाद में बाँटने का निर्देश देते हैं। 

इसी विषय में एक वर्णन आता है जब परमपिता ब्रह्मा महर्षि वशिष्ठ को सूर्यवंश के पुरोहित का दायित्व सँभालने के लिए कहते हैं। अपने पिता की ऐसी आज्ञा सुनकर महर्षि वशिष्ठ सूर्यवंश का कुलगुरु बनने में अपनी असमर्थता बतलाते हैं। तब भगवान ब्रह्मा उन्हें बताते हैं कि इसी कुल में आगे जाकर भगवान विष्णु अपने श्रीराम अवतार में जन्म लेंगे और उन्हें उनका गुरु बनने का सौभाग्य प्राप्त होगा। उनकी ये बात सुनकर महर्षि वशिष्ठ सहर्ष सूर्यवंश के कुलगुरु का स्थान स्वीकार कर लेते हैं। आगे चलकर वे महाराज इक्षवाकु की राजधानी अयोध्या में ही जाकर बस जाते हैं। 

राजस्थान के अग्रवाल समाज में महर्षि वशिष्ठ का बहुत महत्त्व है और वे इन्हे अपना अग्रपुरुष मानते हैं। उनकी एक लोक कथाओं के अनुसार, एक बार सृष्टि का कष्ट देख कर महर्षि वशिष्ठ आत्महत्या करने के लिए सरस्वती नदी के किनारे जाते हैं। किन्तु जैसे ही वो उसमे छलाँग लगाते हैं, उनकी रक्षा के लिए सरस्वती नदी स्वयं २०० छोटी धाराओं में विभक्त हो जाती है और इस प्रकार महर्षि वशिष्ठ के प्राण बच जाते हैं। ये प्रसंग स्वयं ही उनकी महत्ता को सिद्ध करता है। 

पुराणों में महर्षि वशिष्ठ की दो पत्नियों का वर्णन आता है। उनका पहला विवाह प्रजापति दक्ष की कन्या 'ऊर्जा' से हुआ। ऊर्जा से महर्षि वशिष्ठ को कुकुण्डिहि, कुरूण्डी, दलय, शंख, प्रवाहित, मित और सम्मित नामक ७ पुत्र प्राप्त हुए और इन्ही सात पुत्रों ने तीसरे उत्तम मनु के मन्वन्तर में सप्तर्षि का पद ग्रहण किया। फिर उन्होंने महर्षि कर्दम और देवहुति की कन्या 'अरुंधति' से विवाह किया। अरुंधति देवी अनुसूया की छोटी बहन और महर्षि कपिल की बड़ी बहन थी। अरुंधति से इन्हे चित्रकेतु, सुरोचि, विरत्रा, मित्र, उल्वण, वसु, भृद्यान और द्युतमान नामक पुत्र हुए।

असम राज्य के गुवाहाटी में असम और मेघालय की सीमा पर महर्षि वशिष्ठ का एक भव्य मंदिर है जो गुवाहाटी के मुख्य आकर्षण केंद्रों में से एक है। हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में एक गाँव का नाम ही महर्षि वशिष्ठ के नाम पर है। इस वशिष्ठ गाँव में भी उनका एक बहुत सुन्दर मंदिर स्थापित है। ऋषिकेश से १८ किलोमीटर दूर शिवपुरी में वशिष्ठ और अरुंधति गुफाएँ भी स्थित हैं जिनके अंदर भगवान शिव की कई प्राचीन मूर्तियाँ स्थापित हैं। केरल के त्रिसूर जिले में स्थित अरट्टुपुझा मंदिर के मुख्य देवता भी महर्षि वशिष्ठ ही हैं। प्रत्येक वर्ष त्रिसूर के ही प्रसिद्ध त्रिप्रायर मंदिर से श्रीराम को इस मंदिर में महर्षि वशिष्ठ के सानिध्य में लाया जाता है। 

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