8 जून 2019

सप्तर्षि श्रंखला १०.३ - महर्षि वशिष्ठ

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार राजा कौशिक (विश्वामित्र) महर्षि वशिष्ठ की गाय नंदिनी को ले जाने का प्रयास करते हैं और फिर महर्षि वशिष्ठ द्वारा पराजित होते हैं। उनसे प्रतिशोध लेने के लिए विश्वामित्र महादेव की तपस्या करते हैं और उनसे समस्त प्रकार के अस्त्र-शस्त्र प्राप्त करते हैं। इसके बाद वे पुनः महर्षि वशिष्ठ को ललकारते हैं किन्तु वशिष्ठ अपने ब्रह्माण्ड अस्त्र की शक्ति से उन्हें पुनः परास्त कर देते हैं। इससे निराश होकर विश्वामित्र पुनः तपस्या करने को चले जाते हैं। अब आगे... 

विश्वामित्र अपमान की अग्नि में जलते हुए पुनः ब्रह्मदेव की तपस्या करते हैं। उनकी घोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मदेव प्रकट होते हैं और उन्हें 'राजर्षि' कहकर सम्बोधित करते हैं। ये सोच कर विश्वामित्र ब्रह्मदेव से कहते हैं - 'हे प्रभु! मुझे भी वशिष्ठ की तरह ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त करना है।' तब ब्रह्मदेव उनसे कहते हैं - 'वत्स! तुम्हे ब्रह्मर्षि का पद तभी प्राप्त हो सकता है जब स्वयं वशिष्ठ तुम्हे ब्रह्मर्षि मान लें।' ये सुनकर विश्वामित्र ब्रह्माजी की आज्ञा से वशिष्ठ से मिलने जाते हैं। 

मार्ग में विश्वामित्र के मन में ये विचार आया कि मैं छिपकर वशिष्ठ पर ब्रह्मास्त्र का प्रहार करूँगा जिससे उनकी मृत्यु हो जाएगी। जब वो नहीं रहेंगे तो सारा जगत मुझे ही ब्रह्मर्षि मानेगा। ये कुत्सित विचार लेकर विश्वामित्र वशिष्ठ के आश्रम पहुँचे और उन्होंने द्वार पर से ही ब्रह्मास्त्र का संधान किया। तभी उनके कानों में महर्षि वशिष्ठ और उनकी पत्नी देवी अरुंधति का संवाद पड़ा। 

देवी अरुंधति कह रही थी - 'हे स्वामी! आज की चाँदनी रात कितनी सुहानी है। इस जगत में इसके अतिरिक्त ऐसा प्रकाश और कहाँ प्राप्त हो सकता है?' तब महर्षि वशिष्ठ ने कहा - 'प्रिये! निश्चय ही ये शीतलता और प्रकाश अद्भुत है किन्तु इससे भी अधिक शीतलता और प्रकाश राजर्षि विश्वामित्र के तप में है।' 

अपने प्रति महर्षि वशिष्ठ का ये कोमल भाव देख कर विश्वामित्र के हाथ से ब्रह्मास्त्र छूट गया और पश्चाताप के मारे वे वहीँ रुदन करने लगे। उनका रुदन सुनकर जब वशिष्ठ बाहर आये तब विश्वामित्र ने उनके चरण पकड़ते हुए उनसे अपने सभी अपराधों की क्षमा माँगी। अपनी इस ग्लानि को लेकर विश्वामित्र एक बार फिर घोर तपस्या में लीन हुए और तब अंततः अपने पिता ब्रह्मा की आज्ञा से स्वयं वशिष्ठ वहाँ आये और उन्होंने विश्वामित्र को 'ब्रह्मर्षि' कहकर सम्बोधित किया। 

पुराणों में कुल १२ वशिष्ठ ऋषियों का वर्णन है। एक ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ब्रह्मा के पुत्र हैं, दूसरे इक्क्षवाकुवंशी त्रिशंकु के काल में हुए जिन्हें वशिष्ठ देवराज कहते थे। तीसरे कार्तवीर्य सहस्रबाहु के समय में हुए जिन्हें वशिष्ठ अपव कहते थे। चौथे अयोध्या के राजा बाहु के समय में हुए जिन्हें वशिष्ठ अथर्वनिधि (प्रथम) कहा जाता था। पांचवें राजा सौदास के समय में हुए थे जिनका नाम वशिष्ठ श्रेष्ठभाज था। कहते हैं कि सौदास ही सौदास ही आगे जाकर राजा कल्माषपाद कहलाये। छठे वशिष्ठ राजा दिलीप के समय हुए जिन्हें वशिष्ठ अथर्वनिधि (द्वितीय) कहा जाता था। इसके बाद सातवें भगवान राम के समय में हुए जिन्हें महर्षि वशिष्ठ कहते थे और आठवें श्रेष्ठ वशिष्ठ महाभारत के काल में हुए जिनके पुत्र का नाम शक्ति और पौत्र का नाम पराशर था। इनके अलावा वशिष्ठ मैत्रावरुण, वशिष्ठ शक्ति, वशिष्ठ सुवर्चस जैसे दूसरे वशिष्ठों का भी जिक्र आता है। वेदव्यास की तरह वशिष्ठ भी एक पद हुआ करता था।

महाराज इक्ष्वाकु ने १०० वर्षों तक कठोर तप करके सूर्य देवता की सिद्धि प्राप्त की। उन्होंने महर्षि वशिष्ठ को अपना गुरु बनाया और उनके मार्गदर्शन में अपना पृथक राज्य और राजधानी अयोध्यापुरी स्थापित कराया और फिर वे वहीँ बस गए। प्रथम वशिष्‍ठ ही पुष्कर में प्रजापति ब्रह्मा के यज्ञ के आचार्य रहे थे। इसके अतिरिक्त श्रीराम के काल में वशिष्ठ ने ही दशरथ का पुत्रेष्ठि यज्ञ कराया, श्रीरामजी का जातकर्म, यज्ञोपवीत, विवाह और उनका राज्याभिषेक करवाया। उन्होंने ही महाराज दशरथ को मनाया कि वे श्रीराम और लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ वन में भेज दें। 

नक्षत्रमण्डल में दो चमकदार तारे हैं जो सदैव एक दूसरे के इर्द-गिर्द चक्कर लगते रहते हैं। इस युग्म तारे को नासा ने हाल में खोजा है किन्तु आज से सैकड़ों वर्ष पूर्व हमारे विद्वानों ने इन दोनों का पता लगा लिया था। इन्होने उसे 'अरुंधति-वशिष्ठ' का नाम दिया और आज पूरी दुनिया उसे इसी नाम से जानती है। महर्षि वशिष्ठ सदैव शांत रहते हैं। सुख-दुःख, प्रसन्नता-क्रोध, मान-अपमान, लाभ-हानि सभी उनके लिए एक सामान थी। यहाँ तक कि जब सुदास ने विश्वामित्र के श्राप के कारण राक्षस बन महर्षि वशिष्ठ के पुत्रों की हत्या कर दी, तब भी उन्होंने सुदास और विश्वामित्र को क्षमा कर दिया। यही कारण था कि स्वयं श्रीराम भी उन्हें अपने गुरु के रूप में पाकर गर्व का अनुभव करते थे।

आज के लेख के साथ ही सप्तर्षि श्रंखला समाप्त होती है। 

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