24 जून 2019

मृतसञ्जीवनी स्त्रोत्र - २

पिछले लेख में आपने मृतसञ्जीवनी स्त्रोत्र के मूल ३० श्लोक संस्कृत में पढ़े। इस श्रृंखला में हम इन ३० श्लोकों को ३ भाग में विभक्त करेंगे और १०-१० श्लोकों के तीन लेख धर्मसंसार पर प्रकाशित किये जाएंगे। नीचे मृतसञ्जीवनी स्त्रोत्र के १ से १० तक के श्लोकों का अर्थ दिया जा रहा है:

एवमाराध्य गौरीशं देवं मृत्युञ्जयेश्वरम्।
मृतसञ्जीवनं नाम्ना कवचं प्रजपेत् सदा।।१।।

अर्थात: गौरीपति मृत्युञ्जयेश्र्वर भगवान् शंकर की विधिपूर्वक आराधना करने के पश्चात भक्त को सदा मृतसञ्जीवन नामक कवच का सुस्पष्ट पाठ करना चाहिये।

सारात्सारतरं पुण्यं गुह्यात्गुह्यतरं शुभम्।
महादेवस्य कवचं मृतसञ्जीवनामकम्।।२।।

अर्थात: महादेव भगवान् शङ्कर का यह मृतसञ्जीवन नामक कवच तत्त्व का भी तत्त्व है, पुण्यप्रद है, गुह्य और मङ्गल प्रदान करने वाला है।

समाहितमना भूत्वा शृणुश्व कवचं शुभम्।
शृत्वैतद्दिव्य कवचं रहस्यं कुरु सर्वदा।।३।।

अर्थात: अपने मन को एकाग्र करके इस मृतसञ्जीवन कवच को सुनो। यह परम कल्याणकारी दिव्य कवच है। इसकी गोपनीयता सदा बनाये रखना।

वराभयकरो यज्वा सर्वदेवनिषेवित:।
मृत्युञ्जयो महादेव: प्राच्यां मां पातु सर्वदा।।४।।

अर्थात: जरा से अभय करने वाले, निरन्तर यज्ञ करने वाले, सभी देवतओं से आराधित हे मृत्युञ्जय महादेव! आप पूर्व-दिशा में मेरी सदा रक्षा करें।

दधान: शक्तिमभयां त्रिमुखं षड्भुज: प्रभु:।
सदाशिवोऽग्निरूपी मामाग्नेय्यां पातु सर्वदा।।५।।

अर्थात: अभय प्रदान करनेवाली शक्ति को धारण करनेवाले, तीन मुखोंवाले तथा छ: भुजओंवाले, अग्रिरूपी प्रभु सदाशिव अग्रिकोणमें मेरी सदा रक्षा करें।

अष्टादशभुजोपेतो दण्डाभयकरो विभु:।
यमरूपी महादेवो दक्षिणस्यां सदावतु।।६।।

अर्थात: अट्ठारह भुजाओं से युक्त, हाथ में दण्ड और अभयमुद्रा धारण करने वाले, सर्वत्र व्याप्त यमरुपी महादेव शिव दक्षिण-दिशा में मेरी सदा रक्षा करें।

खड्गाभयकरो धीरो रक्षोगणनिषेवित:।
रक्षोरूपी महेशो मां नैऋत्यां सर्वदावतु।।७।।

अर्थात: हाथ में खड्ग और अभयमुद्रा धारण करने वाले, धैर्यशाली, दैत्यगणों से आराधित, रक्षोरुपी महेश नैर्ऋत्यकोण में मेरी सदा रक्षा करें।

पाशाभयभुज: सर्वरत्नाकरनिषेवित:।
वरूणात्मा महादेव: पश्चिमे मां सदावतु।।८।।

अर्थात: हाथमें अभयमुद्रा और पाश धाराण करनेवाले, शभी रत्नाकरोंसे सेवित, वरुणस्वरूप महादेव भगवान् शंकर पश्चिम- दिशामें मेरी सदा रक्षा करें।

गदाभयकर: प्राणनायक: सर्वदागति:।
वायव्यां वारुतात्मा मां शङ्कर: पातु सर्वदा।।९।।

अर्थात: हाथों में गदा और अभयमुद्रा धारण करने वाले, प्राणोम के रक्षक, सर्वदा गतिशील वायुस्वरूप शंकरजी वायव्यकोण में मेरी सदा रक्षा करें।

शङ्खाभयकरस्थो मां नायक: परमेश्वर:।
सर्वात्मान्तरदिग्भागे पातु मां शङ्कर: प्रभु:।।१०।।

अर्थात: हाथों में शंख और अभयमुद्रा धारण करने वाले नायक (सर्वमार्गद्रष्टा), सर्वात्मा सर्वव्यापक परमेश्वर भगवान् शिव समस्त दिशाओं के मध्य में मेरी रक्षा करें।

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