28 जून 2019

विकर्ण

विकर्ण कुरु सम्राट धृतराष्ट्र एवं गांधारी का १९वां पुत्र था (१०० कौरवों का नाम जानने के लिए यहाँ जाएँ)। महाभारत में दुर्योधन और दुःशासन के अतिरिक्त केवल विकर्ण ही है जिसकी प्रसिद्धि अधिक है। अन्य कौरवों के बारे में लोग अधिक नहीं जानते हैं। वैसे तो युयत्सु भी धृतराष्ट्र का एक प्रसिद्ध पुत्र है किन्तु दासी पुत्र होने के कारण उसे वो सम्मान नहीं मिला जिसका वो अधिकारी था। हालाँकि कौरवों में केवल युयुत्सु ही ऐसा था जो महाभारत के युद्ध के बाद जीवित बच गया था। कौरवों में विकर्ण ही ऐसा था जो अपने सच्चरित्र के कारण प्रसिद्ध हुआ।

महर्षि व्यास की कृपा से गांधारी द्वारा प्रसव किये गए मांस पिंड से अन्य कौरवों की भांति विकर्ण का भी जन्म हुआ। कहते हैं सभी कौरव बचपन में सच्चरित्र ही थे किन्तु दुर्योधन और दुःशासन की संगति के कारण वे सभी उनके समान ही अधर्मी हो गए। लेकिन उनमें से केवल विकर्ण ऐसा था जिसने अपने चरित्र और विचार को कभी गिरने नहीं दिया। महाभारत में बचपन में विकर्ण द्वारा दुर्योधन को भीम से द्वेष ना रखने की सलाह देने का भी वर्णन मिलता है। इसके अतिरिक्त भी विकर्ण दुर्योधन को उपयुक्त सुझाव देता रहता था।

26 जून 2019

महावीर हनुमान की अष्ट सिद्धियाँ

आप सभी ने हनुमान चालीसा में एक चौपाई अवश्य पढ़ी होगी - "अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता"। इसका अर्थ ये है कि महावीर हनुमान आठ प्रकार की सिद्धि और नौ प्रकार की निधियों को प्रदान करने वाले हैं। इस लेख में हम महाबली हनुमान की आठ सिद्धियों के बारे में बात करेंगे। सिद्धि ऐसी आलौकिक शक्तियों को कहा जाता है जो घोर साधना अथवा तपस्या से प्राप्त होती है। हिन्दू धर्म में अनेक प्रकार की सिद्धियों का वर्णन है किन्तु उसमे से ८ सिद्धियाँ सर्वाधिक शक्तिशाली और महत्वपूर्ण मानी जाती है। जिनके पास ये सभी सिद्धियाँ होती हैं वो अजेय हो जाता है। इन सिद्धियों को एक श्लोक से दर्शाया गया है:

24 जून 2019

मृतसञ्जीवनी स्त्रोत्र - २

पिछले लेख में आपने मृतसञ्जीवनी स्त्रोत्र के मूल ३० श्लोक संस्कृत में पढ़े। इस श्रृंखला में हम इन ३० श्लोकों को ३ भाग में विभक्त करेंगे और १०-१० श्लोकों के तीन लेख धर्मसंसार पर प्रकाशित किये जाएंगे। नीचे मृतसञ्जीवनी स्त्रोत्र के १ से १० तक के श्लोकों का अर्थ दिया जा रहा है:

एवमाराध्य गौरीशं देवं मृत्युञ्जयेश्वरम्।
मृतसञ्जीवनं नाम्ना कवचं प्रजपेत् सदा।।१।।

अर्थात: गौरीपति मृत्युञ्जयेश्र्वर भगवान् शंकर की विधिपूर्वक आराधना करने के पश्चात भक्त को सदा मृतसञ्जीवन नामक कवच का सुस्पष्ट पाठ करना चाहिये।

22 जून 2019

मृतसञ्जीवनी स्त्रोत्र - १

पिछले लेख में आपने मृतसञ्जीवनी मन्त्र के विषय में पढ़ा। इस भाग में हम 'मृतसंजीवनी स्त्रोत्र' के विषय में आपको बताएँगे। ऐसा माना जाता है कि इस महान स्त्रोत्र को परमपिता ब्रह्मा के पुत्र महर्षि वशिष्ठ ने लिखा था। ३० श्लोकों का ये स्त्रोत्र भगवान शिव को समर्पित है और उनके कई अनजाने पहलुओं पर प्रकाश डालता है। जो कोई भी इस स्त्रोत्र का पूर्ण चित्त से पाठ करता है, उसे जीवन में किसी भी कष्ट का सामना नहीं करना पड़ता। 

इस लेख में हम आपको पूर्ण मृतसञ्जीवनी मन्त्र से परिचित करवा रहे हैं। इस भाग में उन श्लोकों का अर्थ नहीं दिया गया है। आगे आने वाले लेखों में हम इन ३० श्लोकों को ३ भाग में विभक्त करेंगे और १०-१० श्लोकों के तीन लेख उसके अर्थ सहित धर्मसंसार पर प्रकाशित किये जाएंगे। ये महान मृतसञ्जीवनी स्त्रोत्र है:

18 जून 2019

मृतसंजीवनी मंत्र

हिन्दू धर्म में अनेकानेक मन्त्रों का वर्णन है किन्तु जो दो मन्त्र सबसे प्रमुख हैं वो है भगवान शिव का 'महामृत्युञ्जय मन्त्र' और वेदमाता गायत्री का 'श्री गायत्री मन्त्र'। इन दोनों के सामान शक्तिशाली और कोई मन्त्र नहीं है। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद गीता में कहा है कि 'मन्त्रों में मैं गायत्री मन्त्र हूँ'। ऐसा माना जाता है कि दोनों मन्त्रों में किसी का १२५०००० बार जाप करके बड़ी से बड़ी इच्छा को फलीभूत किया जा सकता है।

लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि हमारे भगवान शिव ने महामृत्युञ्जय और गायत्री मन्त्र को मिलाकर एक और अद्भुत एवं महाशक्तिशाली मन्त्र की रचना की थी। उस मन्त्र को 'महामृत्युञ्जयगायत्री मन्त्र' कहा गया और उसे ही आम भाषा में हम 'मृतसञ्जीवनी मन्त्र' के नाम से जानते हैं। कहा जाता है कि इस मन्त्र से मृत व्यक्ति को भी जीवित किया जा सकता था। ये मन्त्र बहुत ही संवेदनशील माना जाता है और हमारे ऋषि-मुनियों ने इसके उपयोग को स्पष्ट रूप से निषिद्ध भी किया है। अगर योग्य गुरु का मार्गदर्शन ना मिले तो इस मन्त्र का उच्चारण कभी भी १०८ बार से अधिक नहीं करना चाहिए अन्यथा उसके विपरीत परिणाम हो सकते हैं।

16 जून 2019

प्रमुख अप्सराओं के नाम और उनके मंत्र

प्रधान अप्सरा
  • रम्भा: ॐ सः रम्भे आगच्छागच्छ स्वाहा 
३ सर्वोत्तम अप्सराएँ:
  1. उर्वशी: ॐ श्री उर्वशी आगच्छागच्छ स्वाहा
  2. मेनका 
  3. तिलोत्तमा: ॐ श्री तिलोत्तामे आगच्छागच्छ स्वाहा

14 जून 2019

शिवलिंग पर क्या अर्पण करना चाहिए?

वैसे तो शिवलिंग पर कई चीजें चढ़ाई जाती है जिनमे से प्रमुख है दुग्ध, घृत, शहद, दही इत्यादि किन्तु आम तौर पर दो चीजों का महत्त्व बहुत अधिक है। वो हैं बिल्वपत्र (बेलपत्र) और गंगाजल। किन्तु इनके अतिरिक्त कई अन्य चीजों को शिवलिंग को अर्पण करने का विधान पुराणों में बताया गया है। इसका पता हमें शिवपुराण के एक श्लोक से चलता है:

12 जून 2019

अप्सराएँ

हिन्दू धर्म में अप्सराएँ सौंदर्य का प्रतीक मानी जाती है और बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। अप्सराओं से अधिक सुन्दर रचना और किसी की भी नहीं मानी जाती। पृथ्वी पर जो कोई भी स्त्री अत्यंत सुन्दर होती है उसे भी अप्सरा कह कर उनके सौंदर्य को सम्मान दिया जाता है। कहा जाता है कि देवराज इंद्र ने अप्सराओं का निर्माण किया था। कई अप्सराओं की उत्पत्ति परमपिता ब्रह्मा ने भी की थी जिनमे से तिलोत्तमा प्रमुख है। इसके अतिरिक्त कई अप्सराएं महान ऋषिओं की पुत्रियां भी थी। भागवत पुराण के अनुसार अप्सराओं का जन्म महर्षि कश्यप और दक्षपुत्री मुनि से हुआ था। कामदेव और रति से भी कई अप्सराओं की उत्पत्ति बताई जाती है।

8 जून 2019

सप्तर्षि श्रंखला १०.३ - महर्षि वशिष्ठ

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार राजा कौशिक (विश्वामित्र) महर्षि वशिष्ठ की गाय नंदिनी को ले जाने का प्रयास करते हैं और फिर महर्षि वशिष्ठ द्वारा पराजित होते हैं। उनसे प्रतिशोध लेने के लिए विश्वामित्र महादेव की तपस्या करते हैं और उनसे समस्त प्रकार के अस्त्र-शस्त्र प्राप्त करते हैं। इसके बाद वे पुनः महर्षि वशिष्ठ को ललकारते हैं किन्तु वशिष्ठ अपने ब्रह्माण्ड अस्त्र की शक्ति से उन्हें पुनः परास्त कर देते हैं। इससे निराश होकर विश्वामित्र पुनः तपस्या करने को चले जाते हैं। अब आगे... 

6 जून 2019

सप्तर्षि श्रंखला १०.२ - महर्षि वशिष्ठ

पिछले लेख में आपने महर्षि वशिष्ठ के विषय में पढ़ा। महर्षि वशिष्ठ एवं राजर्षि विश्वामित्र की प्रतिद्वंदिता बहुत प्रसिद्ध है। प्राचीन काल में एक महान राजा हुए गाधि। उनके पुत्र थे कौशिक जो आगे चलकर विश्वामित्र के नाम से प्रसिद्ध हुए। एक बार विश्वामित्र अपने १०० पुत्रों और एक अक्षौहिणी सेना लेकर वन से गुजर रहे थे। वहीँ उन्हें पता चला कि पास में ही महर्षि वशिष्ठ का आश्रम है। तो उनका आशीर्वाद लेने के लिए विश्वामित्र उनके आश्रम पहुँचे। राज्य के राजा को अपने आश्रम में आया हुआ देख कर महर्षि वशिष्ठ बड़े प्रसन्न हुए और उनसे कहा कि वे कुछ दिन अपनी सेना के साथ उनका आथित्य ग्रहण करें।

4 जून 2019

जब श्रीराम पारिजात और कल्पवृक्ष को पृथ्वी पर ले आये

महर्षि दुर्वासा के विषय में हम सभी जानते हैं। वे महर्षि अत्रि और माता अनुसूया के पुत्र थे जो भगवान शिव के अंश से जन्मे थे। इनकी गणना सर्वाधिक क्रोधी ऋषि के रूप में की जाती है। श्राप तो जैसे इनकी जिह्वा की नोक पर रखा रहता था। इन्ही महर्षि दुर्वासा ने एक बार श्रीराम की परीक्षा लेने की ठानी। उन्हें पता था कि श्रीराम भगवान विष्णु के अवतार हैं किन्तु फिर भी सामान्य जन को उनका महत्त्व और महानता दिखाने के लिए वे श्रीराम की परीक्षा लेने अयोध्या पहुँचे। उस समय तक लंका युद्ध समाप्त हो गया था और श्रीराम सुखपूर्वक अयोध्या पर राज्य कर रहे थे।

2 जून 2019

सप्तर्षि श्रंखला १०.१ - महर्षि वशिष्ठ

महर्षि वशिष्ठ परमपिता ब्रह्मा के पुत्र एवं सातवें सप्तर्षि हैं। इनकी उत्पत्ति ब्रह्मदेव की प्राण वायु से हुई बताई जाती है।  महर्षि वशिष्ठ को ऋग्वेद के ७वें मण्डल का लेखक और अधिपति माना जाता है। ऋग्वेद में कई जगह, विशेषकर १०वें मण्डल में महर्षि वशिष्ठ एवं उनके परिवार के विषय में बहुत कुछ लिखा गया है। इसके अतिरिक्त अग्नि पुराण एवं पुराण में भी उनका विस्तृत वर्णन है। महर्षि वशिष्ठ ही ३२००० श्लोकों वाले योगवशिष्ठ रामायण, वशिष्ठ धर्मसूत्र, वशिष्ठ संहिता और वशिष्ठ पुराण के जनक हैं। स्वयं श्री आदिशंकराचार्य ने महर्षि वशिष्ठ को वेदांत के आदिऋषियों में प्रथम स्थान प्रदान किया है। 'वशिष्ठ' का अर्थ भी सर्वश्रेष्ठ ही होता है।