19 मई 2019

परशुराम - ५

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार सहस्त्रार्जुन जमदग्नि के आश्रम से कामधेनु को बलात ले जाता है जिससे परशुराम और सहस्त्रार्जुन में युद्ध होता है और सहत्रार्जुन मारा जाता है। फिर उसके पुत्र परशुराम की अनुपस्थिति में जमदग्नि की हत्या कर देते हैं। इससे परशुराम क्रोध में आकर पूरे विश्व को क्षत्रियों से शून्य कर देते हैं। तब महर्षि कश्यप परशुराम से पूरी पृथ्वी दान में ले लेते हैं और उन्हें महेंद्र पर्वत पर जाने को कहते हैं। अब आगे...

परशुराम ८ चिरंजीवियों में से एक हैं अर्थात वे कल्प के अंत तक जीवित रहेंगे। यही कारण है कि त्रेतायुग के मध्य में जन्म लेने वाले परशुराम त्रेतायुग के अंत में श्रीराम को भी दर्शन देते हैं, द्वापरयुग में श्रीकृष्ण को दर्शन देते हैं और भीष्म, द्रोण एवं कर्ण के गुरु भी बनते हैं। कलियुग के अंत समय में जब भगवान विष्णु के दसवें अवतार भगवान कल्कि का अवतरण होगा तब परशुराम ही उनके गुरु बनकर उन्हें शस्त्र एवं शास्त्र विद्या प्रदान करेंगे। 

ब्रह्मवैवर्त पुराण में ये वर्णन है कि एक बार कैलाश स्थित भगवान शंकर के अन्त:पुर में प्रवेश करते समय गणेश जी द्वारा रोके जाने पर परशुराम ने बलपूर्वक अन्दर जाने की चेष्ठा की। तब गणपति ने उन्हें स्तम्भित कर अपनी सूँड में लपेटकर समस्त लोकों का भ्रमण कराते हुए गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन कराके भूतल पर पटक दिया। चेतनावस्था में आने पर कुपित परशुरामजी ने श्रीगणेश को युद्ध के लिए ललकारा और उसी युद्ध में उनके परशु के प्रहार से गणेश जी का एक दाँत टूट गया। इसी कारण गणेश एकदन्त भी कहलाये।

सीता स्वयंवर में जब श्रीराम ने पिनाक धनुष को भंग किया तो इससे क्रोधित परशुराम वहाँ पहुँचे और श्रीराम का वध करने को उद्धत हो गए। तब श्रीहरि की कृपा से परशुराम को दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई जिससे वे श्रीराम के वास्तविक स्वरुप को जान गए। फिर अपना वैष्णव धनुष दिया और उसपर बाण संधान करने को कहा। तब श्रीराम ने उस धनुष पर अपने 'राम बाण' का संधान किया और परशुराम की सहमति से उनके सारे अर्जित पुण्य का नाश कर दिया। उसके पश्चात परशुराम एक वर्ष तक लज्जित, तेजहीन तथा अभिमानशून्य होकर तपस्या में लगे रहे और अंततः वधूसर नामक नदी के तीर्थ पर स्नान करके उन्होंने अपना तेज़ पुनः प्राप्त किया।

ऐसा वर्णन है कि वे सौ वर्षों तक सौम नामक विमान पर बैठे हुए शाल्व से युद्ध करते रहे किंतु गीत गीत गाती हुई नग्निका (कन्या) कुमारियों के मुंह से यह सुनकर कि शाल्व का वध प्रद्युम्न और साँब को साथ लेकर विष्णु अवतार श्रीकृष्ण करेंगे, उन्होंने अपने अस्त्र शस्त्र इत्यादि पानी में डुबा दिए और कृष्णावतार की प्रतीक्षा में तपस्या करने लगे। जब श्रीकृष्ण ने अवतार लिया तब भगवान परशुराम उनसे महर्षि सांदीपनि के आश्रम में मिले और विश्व कल्याण हेतु श्रीहरि से प्राप्त सुदर्शन चक्र उन्हें प्रदान किया। उसी सुदर्शन से श्रीकृष्ण में महाभारत काल में दुष्टों को नाश किया। 

परशुराम के शिष्य: परशुराम के तीन प्रमुख शिष्यों में भीष्म, द्रोण और कर्ण का नाम आता है। तीनों अपने युग के महान योद्धा थे और उन गिने चुने योद्धाओं में थे जिनके पास ब्रह्मास्त्र था। तीनों को ब्रह्मास्त्र का ज्ञान भगवान परशुराम से ही प्राप्त हुआ था।
  1. भीष्म: परशुराम केवल ब्राह्मणों को शिक्षा देते थे। उनके एकमात्र क्षत्रिय शिष्य महारथी भीष्म बनें (कर्ण भी क्षत्रिय थे किन्तु ये बात परशुराम नहीं जानते थे)। वे क्षत्रिय होते हुए भी ब्राह्मणों की भांति सत्तरित्र थे इसी कारण परशुराम ने उन्हें अपने शिष्य के रूप में स्वीकार किया। अम्बा स्वयंवर में जब भीष्म तीनों बहनों का हरण कर लाये तब अम्बा ने परशुराम से ये प्रार्थना की कि वे भीष्म को उससे विवाह करने को विवश करें। किन्तु भीष्म ब्रह्मचारी थे और इसी कारण परशुराम और भीष्म में युद्ध हुआ किन्तु २३ दिनों तक लगातार युद्ध करने के बाद भी परशुराम भीष्म को परास्त नहीं कर पाए। तब भीष्म ने प्रस्वपात्र का संधान किया जिससे परशुराम की पराजय निश्चित थी किन्तु देवताओं के कहने पर, कि इससे उनके गुरु का अपमान होगा, उन्होंने उसका प्रयोग नहीं किया और परशुराम का आशीर्वाद लेकर वापस लौट गए।
  2. द्रोणाचार्य: कुछ दान लेने की इच्छा लेकर द्रोणाचार्य परशुराम के पास पहुँचे किन्तु उस समय तक वे अपना सब कुछ दान कर चुके थे। तब द्रोण ने उनसे उनकी बची हुई धनुर्विद्या का ज्ञान देने की याचना की। तब परशुराम ने उन्हें द्रोण को धनुर्विद्या का ज्ञान दिया और ब्रह्मास्त्र सहित सभी प्रकार के दिव्यास्त्र प्रदान किये। यही शिक्षा द्रोणाचार्य से अर्जुन को प्राप्त हुई और वो भी उनकी ही भांति महान योद्धा बना। 
  3. कर्ण: द्रोणाचार्य द्वारा ठुकराए जाने के बाद कर्ण शिक्षा प्राप्त करने परशुराम के पास पहुँचे। तब परशुराम ने उससे पूछा कि क्या वो क्षत्रिय है। तब कर्ण ने कहा नहीं कहा (क्यूंकि वो स्वयं भी नहीं जनता था) किन्तु चूँकि परशुराम ने उससे पूछा नहीं था इसी कारण उसने ये भी नहीं बताया कि वो ब्राह्मण नहीं है। तब परशुराम ने उसे भी वो ब्रह्मास्त्र सहित सभी दिव्यास्त्र प्रदान किये। किन्तु एक बार वो कर्ण की जंघा पर सर रखकर सो रहे थे तो एक कीड़ा कर्ण जंघा को चीर कर उसमे घुस गया। गुरु की निद्रा में व्यवधान ना पड़े इसी कारण कर्ण बिना हिले-डुले बैठे रहे। जब परशुराम उठे तो ये देख कर उन्होंने कहा कि किसी भी ब्राह्मण में इतनी सहनशक्ति नहीं हो सकती। उन्होंने ये समझा कि कर्ण ने उससे झूठ कहा और इसी कारण परशुराम ने उसे श्राप दे दिया कि आवश्यकता के समय वो उनसे प्राप्त ज्ञान को भूल जाएगा। इसी कारण कर्ण अर्जुन पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग नहीं कर सका क्यूंकि उसे उसकी विद्या का विस्मरण हो गया था। अर्जुन से निर्णायक युद्ध से पहले कर्ण ने परशुराम से प्रार्थना की कि वो केवल एक दिन के लिए उसकी विद्या लौटा दें। तब परशुराम ने उसे समझाते हुए कहा कि इस युद्ध में पांडवों की विजय आवश्यक है और इसी कारण कर्ण ने उनसे पुनः अपनी विद्या नहीं माँगी और मृत्यु को प्राप्त हुए। 
भगवान परशुराम के विषय में जितना लिखा जाये उतना कम है। इसी कारण अंत में इस इच्छित फल-प्रदाता परशुराम गायत्री को लिखते हुए मैं ये लेख समाप्त करता हूँ। इस परशुराम गायत्री मन्त्र का जो कोई भी सच्चे मन से ध्यान करता है उसे सभी पापों से मुक्ति मिलती है। 

'ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि,तन्नोपरशुराम: प्रचोदयात्।'

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