7 मई 2019

परशुराम - १

आप सभी को परशुराम जयंती (अक्षय तृतीया) की हार्दिक शुभकामनायें। आज अक्षय तृतीया के ही दिन जब नवग्रहों में से ६ ग्रह उच्च दशा में थे, ऐसे शुभ मुहूर्त में भगवान विष्णु के छठे अवतार के रूप में परशुराम का जन्म हुआ था। वैसे तो इनका मूल नाम 'राम' था किन्तु भगवान शिव द्वारा प्रदत्त विकराल परशु को सदैव धारण करने के कारण इनका नाम 'परशुराम' पड़ गया और वे इसी नाम से जगत विख्यात हुए।

परशुराम भृगुकुल में जन्मे थे। महर्षि भृगु के एक पुत्र थे ऋचीक। उनका विवाह कन्नौज के राजा महाराज गाधि की कन्या सत्यवती से हुआ। सत्यवती राजर्षि विश्वामित्र की बहन भी थी। उस विवाह में ऋचीक के पिता और सत्यवती के श्वसुर महर्षि भृगु पधारे। सत्यवती ने अपने श्वसुर की बड़ी सेवा की जिससे प्रसन्न होकर महर्षि भृगु ने उसे वरदान माँगने को कहा।

ये सुनकर सत्यवती ने कहा - 'हे पिताश्री! अगर आप मुझे कोई वरदान देना चाहते हैं तो कृपया मुझे एक ब्राह्मण पुत्र और मेरी माता को एक क्षत्रिय पुत्र प्राप्त होने का वरदान दीजिये।' तब महर्षि भृगु ने सत्यवती को रस के दो पात्र प्रदान किये और कहा - 'हे पुत्री! बांयें हाथ पर रखे गए पात्र को तुम अपनी माता को दे देना और दाहिने हाथ में रखे गए पात्र को तुम स्वयं रखना। ऋतुस्नान करने के बाद अपनी माता से कहना कि पुत्र प्राप्ति की कामना लेकर वो पीपल के वृक्ष का आलिंगन करे और तुम स्वयं वही भावना रखकर गूलर के वृक्ष का आलिंगन करना। उसके बाद अपन-अपने पात्र का रस सावधानी से अलग-अलग पी लेना। इससे तुम्हे ब्राह्मण और तुम्हारी माता को क्षत्रिय पुत्र की प्राप्ति होगी।'

ऐसा सुनकर सत्यवती दोनों पात्र लेकर अपनी माता के पास गयी और उन्हें उनका पात्र देकर महर्षि भृगु का आदेश सुनाया। उसकी माता ने ये सोचकर कि महर्षि भृगु ने अवश्य अपनी पुत्रवधु को उससे श्रेष्ठ पुत्र का वरदान दिया होगा, दोनों पात्र बदल दिए। उसके इस कार्य के कारण सत्यवती ने अपनी माता के पात्र का रस पी लिया। महर्षि भृगु को अपनी योगविद्या से इसका ज्ञान हो गया। तब वे पुनः सत्यवती के पास आये और उससे कहा कि - 'हे पुत्री! तुम्हारी माता ने छल करके तुम्हे अपना पात्र दे दिया था इसी कारण तुम्हारा पुत्र जन्म से तो ब्राह्मण ही होगा किन्तु कर्म से घोर क्षत्रिय होगा।'

ये सुनकर सत्यवती घबरा गयी और उसने महर्षि भृगु से प्रार्थना की कि उसने सदैव एक ब्राह्मण पुत्र की ही कामना की है। अतः कृपा कर उसे जन्म और कर्म से ब्राह्मण पुत्र की ही प्राप्ति हो। उसे मिलने वाला क्षत्रिय गुण उसके पोते अर्थात उसके पुत्र के पुत्र को मिल जाये। महर्षि भृगु ने उसकी ये प्रार्थना स्वीकार कर ली और उसके पुत्र को मिलने वाले क्षत्रिय गुण उसके होने वाले पौत्र में स्थानांतरित कर दिया।

महर्षि भृगु के आशीर्वाद स्वरुप ऋषि ऋचीक और सत्यवती को एक तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई जो जन्म और कर्म दोनों से ब्राह्मण था। उन दोनों ने उसका नाम जमदग्नि रखा। महर्षि जमदग्नि अपने समय के महान ब्राह्मण सुधारक के रूप में जाने जाते हैं किन्तु उनकी कथा कभी और। समय आने पर जमदग्नि का विवाह प्रसेनजित नामक क्षत्रिय की पुत्री रेणुका से हुआ। रेणुका से उन्हें ५ पुत्रों की प्राप्ति हुई:
  1. रुक्मवान
  2. सुखेण
  3. वसु
  4. विश्वानस
  5. राम (यही आगे चलकर परशुराम कहलाये)
कहा जाता है कि अपने पाँचवे पुत्र की प्राप्ति हेतु जमदग्नि ने देवराज इंद्र के समक्ष पुत्रेष्टि यज्ञ किया और इंद्र के अनुग्रह पर स्वयं श्रीहरि ने राम के रूप में जन्म लिया। महर्षि भृगु के वरदान और सत्यवती की माता के छल के कारण वे पूर्ण क्षत्रिय गुणों के साथ जन्मे। क्रोधी स्वाभाव उन्हें जन्मजात ही प्राप्त हुआ। पिता जमदग्नि के कारण वे 'जामदग्नेय' कहलाये और अपने परदादा महर्षि भृगु के वंश में सबसे तेजस्वी होने के कारण उन्हें 'भार्गव' के नाम से भी जाना गया। 

भृगुक्षेत्र के शोधकर्ता साहित्यकार शिवकुमार सिंह कौशिकेय के अनुसार परशुराम का जन्म वर्तमान बलिया के खैराडीह में हुआ था। ८ वर्ष की आयु तक उन्होंने अधिकांश विद्याएँ अपनी माता रेणुका से प्राप्त कर ली। बालयकाल में उनमे करुणा की भावना भी थी और वे सभी से प्रेम करते थे। यहाँ तक कि सभी प्रकार के पशु पक्षियों से वे बात कर सकते थे और उन्हें अपने अंकुश में रख सकते थे। किन्तु आगे उनके जीवन में एक ऐसी घटना घटने वाली थी जिस कारण वे अपने पूर्ण क्षत्रिय रूप को प्राप्त करने वाले थे।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें