13 मई 2019

परशुराम - ३

पिछले भाग में आपने पढ़ा कि अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण करने के बाद परशुराम अपने पिता से शस्त्रविद्या प्राप्त करने का हठ करते हैं। उनका हठ देख कर उनके पितामह ऋचीक उन्हें युद्धकला की शिक्षा लेने की अनुमति दे देते हैं। फिर परशुराम अपने नाना विश्वामित्र से सभी प्रकार की शस्त्रविद्या और दिव्यास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करते हैं। अपनी शिक्षा पूर्ण होने के बाद परशुराम विश्वामित्र से और शिक्षा प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं। तब विश्वामित्र उन्हें महादेव की तपस्या करने का सुझाव देते हैं। अब आगे...

भगवान परशुराम अपने गुरु की आज्ञा लेकर महादेव की तपस्या करने पूर्व दिशा में चक्रतीर्थ की ओर गए। भारत के अरुणाचल प्रदेश के उत्तर पूर्वी सीमा में जहाँ ब्रह्मपुत्र नदी लोहित नदी से मिलती है, वहीँ परशुराम ने तपस्या की थी। आज भी वहाँ 'परशुराम कुण्ड' स्थित है जिनमे स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं। ये कुंड लोहित का सबसे पड़ा पर्यटन केंद्र भी है जहाँ हर वर्ष मकर संक्रांति के अवसर पर भारी संख्या में लोग आते हैं।

चक्रतीर्थ में परशुराम ने महादेव की घोर आराधना की। उनकी घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने आकाशवाणी के माध्यम से उन्हें आज्ञा दी कि वे कैलाश की भूमि से दैत्यों का नाश करें। उनकी आज्ञा पाकर परशुराम ने अकेले ही दैत्यों से युद्ध किया और उनका समूल नाश कर दिया। किन्तु इस युद्ध में उनका शरीर क्षत-विक्षत हो गया। वो मृत्यु को प्राप्त होने ही वाले थे कि उनकी इस भक्ति से अंततः महादेव ने उन्हें दर्शन दिए।

उन्होंने परशुराम का शरीर पुनः पहले जैसा कर दिया और उनका शारीरिक बल सहस्त्र गुणा बढ़ा दिया। उन्होंने कहा कि परशुराम के शरीर पर जितने अधिक प्रहार हुए हैं, उतना अधिक ही उन्हें देवत्व प्राप्त होगा। उन्होंने ही सर्वप्रथम कहा था कि युद्ध और गुण में परशुराम स्वयं नारायण के समान हैं। तब परशुराम ने महादेव से उनका शिष्य बनने की याचना की। उनकी तपस्या से प्रसन्न महादेव ने उन्हें अपना शिष्य स्वीकार किया और त्रिलोक में जो दुर्लभ है ऐसी युद्धकला उन्हें सिखाई। साथ ही साथ उन्होंने परशुराम को अपना पुत्र भी माना।

महादेव के आशीर्वाद से उन्हें कई दिव्यास्त्र प्राप्त हुए जिसमे से सबसे प्रमुख था 'विद्युदभि' नामक विकराल परशु। इसी परशु के कारण जमदग्नि पुत्र राम 'परशुराम' कहलाये। इस परशु के विषय में लिखा गया है कि ये विश्व के सबसे मारक अस्त्रों में से एक था। इसे किसी भी प्रकार नष्ट नहीं किया जा सकता था और ना ही इसे परशुराम के अतिरिक्त कोई और संचालित कर सकता था। इसकी तुलना का अस्त्र केवल इंद्र का वज्र, नारायण का सुदर्शन, शिव का त्रिशूल एवं ब्रह्मा का ब्रह्मास्त्र ही था।

इसके अतिरिक्त उन्हें भगवान शिव से नारायण का त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्त्रोत्र एवं कल्पतरु मन्त्र भी प्राप्त हुआ। तब भगवान की स्तुति करते हुए परशुराम ने उनके सम्मान में एकादश छन्दयुक्त 'शिव पंचत्वारिंशनाम स्तोत्र' की रचना की। इसके बाद भगवान शिव ने उन्हें भगवान विष्णु की तपस्या करने का आदेश दिया।

महादेव की आज्ञा मान कर परशुराम ने चक्रतीर्थ में ही श्रीहरि विष्णु की घोर आराधना की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर श्रीहरि ने उन्हें दर्शन दिए और 'श्राङ्ग' नामक अपना महान धनुष एवं महान 'सुदर्शन चक्र' उन्हें प्रदान किया। उसके अतिरिक्त उन्होंने परशुराम को अविनाशी वैष्णव मन्त्र प्रदान किया जिसकी कृपा से परशुराम अमर हो गए। उसके बाद भगवान विष्णु ने उन्हें कल्प के अंत तक जीवित रहने का आशीर्वाद दिया। उन्होंने परशुराम को आज्ञा दी कि त्रेतायुग के अंत में वे श्रीराम को अपना श्राङ्ग धनुष एवं द्वापर के अंत में श्रीकृष्ण को वे सुदर्शन चक्र प्रदान कर संन्यास ग्रहण कर लें।

तत्पश्चात भगवान विष्णु ने उन्हें ब्रह्मदेव को भी प्रसन्न करने को कहा। उनकी आज्ञा पाकर परशुराम ने परमपिता ब्रह्मा की भी आराधना की और उनके प्रसन्न होने पर उनसे सर्वाधिक मारक अस्त्र 'ब्रह्मास्त्र' प्राप्त किया। इससे परशुराम वशिष्ठ, विश्वामित्र आदि के सामान उन गिने-चुने योद्धाओं में शामिल हुए जिन्हे ब्रह्मास्त्र का ज्ञान था। इस प्रकार त्रिदेवों से वरदान प्राप्त कर परशुराम त्रिलोक में अजेय हो गए।

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