9 मई 2019

परशुराम - २

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार परशुराम की दादी सत्यवती की माता के छल के कारण परशुराम ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय संस्कारों के साथ जन्मे। ८ वर्ष की आयु तक उन्होंने अधिकांश विद्या अपनी माता रेणुका से प्राप्त कर ली थी। साथ ही साथ वे सभी प्रकार के पशु पक्षियों से भी बात कर सकने में सक्षम थे। अब आगे...

ब्राह्मण होने के कारण परशुराम को समस्त वेदों और शास्त्रों की शिक्षा दी गयी। उन्होंने सर्वप्रथम अपनी विद्या अपने पिता जमदग्नि से प्राप्त की। फिर वे उच्च शिक्षा हेतु अपने दादा महर्षि ऋचीक के आश्रम में वेद वेदाङ्गों की शिक्षा लेने लगे। वे मेधावी थे इसी कारण शीघ्र ही वे समस्त शास्त्रों के ज्ञाता हो गए। फिर पुनः अपने पिता जमदग्नि के आश्रम में लौट कर उन्होंने सभी प्रकार के कर्मकांडों की शिक्षा ली। उनके माता पिता अपने पुत्र के संस्कार देख कर अत्यंत संतुष्ट थे। किन्तु नियति ने परशुराम का केवल वेदपाठी ब्राह्मण होना निश्चित नहीं किया था।

शास्त्र विद्या का पूर्ण अध्ययन करने के बाद परशुराम ने अपने पिता से शस्त्र विद्या प्रदान करने का अनुरोध किया। अपने पुत्र के इस अनुरोध पर जमदग्नि आश्चर्यचकित हो गए। उन्होंने परशुराम को समझाया कि वे ब्राह्मण हैं और विषय को अपने ज्ञान से प्रकाशित करना ही उनका धर्म है। शस्त्र विद्या की ब्राह्मणों को कोई आवश्यकता नहीं होती क्यूंकि क्षत्रिय इस विद्या को प्राप्त कर अपने बाहुबल से ब्राह्मणों की रक्षा करते हैं। किन्तु परशुराम युद्धकला में पारंगत होना चाहते थे इसी कारण वे अपनी जिद पर अड़े रहे।

एक दिन परशुराम के पितामह ऋचीक मुनि अपनी पत्नी सहित अपने पुत्र से मिलने आये। तब जमदग्नि ने अपने पिता से परशुराम के हठ के बारे में बताया। तब ऋचीक ने परशुराम से पूछा - 'हे वत्स! जब क्षत्रियों का ये धर्म है कि वे शस्त्रविद्या प्राप्त कर हम ब्राह्मणों की रक्षा करें, तो तुम उनकी भांति युद्धकला की शिक्षा लेने को क्यों आतुर हो। इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी ब्राह्मण ने शस्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया हो। हम सब परमपिता ब्रह्मा की संतानें हैं पुत्र जो स्वयं ब्रह्मास्त्र जैसे सर्वाधिक शक्तिशाली दिव्यास्त्र के होते हुए भी सदैव युद्ध से विरत रहते हैं। फिर क्या कारण है कि तुम इस प्रकार शस्त्रों का ज्ञान प्राप्त करना चाहते हो।?'

तब परशुराम ने विनम्रता से कहा - 'हे पितामह! आपने सत्य कहा कि आज तक शस्त्रविद्या पर केवल क्षत्रियों का अधिकार रहा है और वे अपने बाहुबल से हम ब्राह्मणों की रक्षा भी करते हैं किन्तु अगर कभी क्षत्रिय ही अपने कर्तव्य पथ से भटक गए तब उनके अत्याचारों का प्रतिकार कौन करेगा। शस्त्र विद्या भी तो विद्या ही होती है और पिताश्री और स्वयं आपने मुझे ये शिक्षा दी है कि किसी भी प्रकार की विद्या पर किसी समुदाय विशेष का अधिकार नहीं होता। फिर मैं किस प्रकार ये मानूं कि शस्त्र विद्या केवल क्षत्रियों के लिए है?'

परशुराम को इस प्रकार बोलते देख कर सत्यवती और ऋचीक को अपने माता का छल और महर्षि भृगु द्वारा दिए गए आशीर्वाद का ध्यान आया। वे समझ गए कि उनके पिता महर्षि भृगु के आशीर्वाद के कारण ही परशुराम ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय हैं। यही कारण है कि वे युद्धविद्या प्राप्त करने के लिए इतना हठ कर रहे हैं। ये सोचकर उन्होंने परशुराम को रोकना उचित नहीं समझा और उन्हें शस्त्रविद्या प्राप्त करने की अनुमति दे दी।

महर्षि ऋचीक ने परशुराम को उसके नाना राजर्षि विश्वामित्र के पास भेजा जो उस समय शस्त्रविद्या के महान ज्ञाता थे। विश्वामित्र उन गिने चुने गुरुओं में थे जिनके पास समस्त प्रकार के दिव्यास्त्र थे और युद्धकला का ज्ञान देने में उसने श्रेष्ठ और कोई नहीं था। जब परशुराम राजर्षि विश्वामित्र के पास पहुँचे तो उन्होंने उनकी शस्त्रविद्या सीखने की आकांक्षा का अनुमोदन किया। उन्होंने कहा कि जब वे क्षत्रिय होकर ब्राह्मणत्व को प्राप्त कर सकते हैं तो फिर परशुराम ब्राह्मण होकर क्षत्रियों की विद्या क्यों नहीं सीख सकते? उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक परशुराम को युद्ध कला का ज्ञान देना आरम्भ किया।

शीघ्र ही परशुराम ने विश्वामित्र से समस्त प्रकार की युद्धकालाओं का ज्ञान प्राप्त कर लिया। उन्हें उत्तम शिष्य जान कर विश्वामित्र ने उन्हें समस्त प्रकार के दिव्यास्त्रों का भी पूर्ण ज्ञान दे दिया। उन महान अस्त्रों का ज्ञान प्राप्त कर परशुराम विश्व के सर्वश्रेष्ठ अजेय योद्धा बन गए। फिर वो दिन भी आया जब विश्वामित्र ने सार्वजानिक ये घोषणा कर दी कि परशुराम उनके सर्वश्रेष्ठ शिष्य हैं और आज पूरे विश्व में उनके सामान योद्धा और कोई नहीं है।

किन्तु परशुराम की विद्या प्राप्त करने की क्षुधा अभी नहीं मिटी थी। उन्होंने अपने नाना विश्वामित्र से पूछा - 'हे मातामह! आपने मुझे तो शस्त्रज्ञान दिया उसे पाकर मैं धन्य हो गया। किन्तु मेरी इच्छा और विद्या प्राप्त करने की है। मैं चाहता हूँ कि त्रिलोक में कोई मुझे परास्त ना कर सके।' 

तब विश्वामित्र ने कहा 'पुत्र! मेरे पास जितनी विद्या और दिव्यास्त्र थे मैंने सब तुम्हे प्रदान कर दिया। उससे भी ऊपर मैंने तुम्हे ब्रह्मास्त्र का ज्ञान भी प्रदान कर दिया। आज विश्व में तुम्हारे सामान कोई योद्धा नहीं है। सामान्य मनुष्य तो छोडो, कदाचित स्वयं देवराज इंद्र भी तुमपर विजय प्राप्त नहीं कर सकते। किन्तु अगर तुम और ज्ञान प्राप्त करना चाहते हो तो वो तुम्हे केवल भगवान शंकर ही दे सकते हैं। ब्रह्मास्त्र, नारायणास्त्र सहित विश्व के सभी अस्त्र-शस्त्रों के अधिपति महादेव ही हैं। अतः उन्हें प्रसन्न करो। उनके प्रसन्न होने पर ही तुम्हे बचे हुए दिव्यास्त्र भी प्राप्त हो जाएँगे।' 

विश्वामित्र की प्रेरणा से परशुराम ने ये निश्चय किया कि वे भगवान शंकर के शिष्य बनने का गौरव प्राप्त करेंगे। फिर उन्होंने अपनी गुरु की आज्ञा लेकर महादेव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या करने को प्रस्थान किया।

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