25 मई 2019

सप्तर्षि श्रंखला ८ - महर्षि क्रतु

सप्तर्षियों एवं प्रजापतियों में से एक महर्षि क्रतु परमपिता ब्रह्मा के पुत्र है जिनकी उत्पत्ति उनके हाथ से हुई बताई गयी है। इनकी गणना विश्व के सबसे महान बुद्धिजीवियों में होती है। महर्षि क्रतु ने ही परमपिता ब्रह्मा द्वारा उत्पन्न किये गए वेदों का विभाजन किया था। कहा जाता है कि सर्वप्रथम वेद एक रूप में ही ब्रह्मदेव द्वारा उत्पन्न किये गए थे। बाद में अपने पिता की आज्ञा से महर्षि क्रतु ने ही वेदों के चार भाग (ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद) करने में उनकी सहायता की थी। उनके इस ज्ञान बुद्धि से प्रसन्न होकर परमपिता ब्रह्मा ने उनका नाम क्रतु रखा जिसका अर्थ होता है शक्ति अथवा सामर्थ्य।

उनका महत्त्व आप इस बात से समझ सकते हैं कि क्रतु का एक अर्थ 'आषाढ़' भी होता है और वर्ष के इसी मास में अधिकांश यज्ञ करने का प्रावधान शास्त्रों में बताया गया है। तो इस प्रकार आषाढ़ महीने में किये जाने वाले यज्ञ महर्षि क्रतु के प्रति सम्मान को प्रदर्शित करना भी है। महर्षि क्रतु के नाम पर ही प्लक्षद्वीप की सबसे महान नदी का नाम भी 'क्रतु' ही है जिसकी तुलना जम्बूद्वीप की गंगा से की गयी है।

पुराणों में महर्षि क्रतु की दो बहनों - पुण्य एवं सत्यवती का भी वर्णन है। अपने पिता की आज्ञा से महर्षि क्रतु ने प्रजापति दक्ष की पुत्री सन्नति से विवाह किया। महर्षि क्रतु को सन्नति से ६०००० पुत्र प्राप्त हुए जिन्हे 'बालखिल्य'  कहा जाता था। पुराणों में इन बालखिल्यों का भी बड़ा महत्त्व बताया गया है। महर्षि क्रतु के इन सभी पुत्रों का अकार अँगूठे के बराबर बताया गया है। ये सभी ऋषि भगवान सूर्यनारायण के उपासक बताये गए हैं।

कहते हैं कि सभी बालखिल्य सूर्यदेव की ओर अपना मुख करके उनके रथ के आगे-आगे उनकी स्तुति करते हुए चलते हैं। इस प्रकार इन ६०००० ऋषियों के तप की शक्ति भगवान सूर्यनारायण को प्राप्त होती रहती है और इसी शक्ति के बल पर सूर्यदेव संसार का पोषण करते हैं।

पुराणों में एक वर्णन आता है कि एक बार महर्षि मरीचि के पुत्र महर्षि कश्यप एक यज्ञ कर रहे थे। उन्होंने अपने तात महर्षि क्रतु से प्रार्थना की कि वे उस यज्ञ के लिए ब्रह्मा का स्थान ग्रहण करें। अपने भतीजे की इस प्रार्थना पर महर्षि क्रतु अपने ६०००० पुत्रों के साथ महर्षि कश्यप के यज्ञ में पधारे। उसी यज्ञ में देवराज इंद्र और महर्षि क्रतु के पुत्र बालखिल्यों में विवाद हो गया और अपने पिता और महर्षि कश्यप द्वारा बीच-बचाव करने पर बालखिल्यों ने ही पक्षीराज गरुड़ को महर्षि कश्यप को पुत्र रूप में प्रदान किया। इसके बारे में विस्तृत जानकारी बाद में अलग से दी जाएगी।

महर्षि क्रतु और सन्नति की एक पुत्री का नाम भी पुण्य ही बताया गया है (जो उनकी बहन का भी नाम है) और इसके साथ ही पर्वासा नाम की एक पुत्रवधु का भी वर्णन है। पुराणों में महर्षि क्रतु को महर्षि अगस्त्य के वातापि भक्षण और समुद्र को पी जाने के कारण उनकी प्रशंसा करते हुए भी बताया गया है। कुछ ग्रंथों में इस बात का वर्णन है कि महर्षि क्रतु ने महर्षि अगस्त्य के पुत्र ईधवाहा को भी गोद लिया था। 

मनु के पुत्र उत्तानपाद पर महर्षि क्रतु की विशेष कृपा थी। वे उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव से अत्यंत प्रेम करते थे। जब अपने पिता से उपेक्षित होकर ध्रुव ने परमलोक की प्राप्ति करने की ठानी तो वो सर्वप्रथम महर्षि क्रतु के पास गया। उन्होंने ध्रुव को भगवान विष्णु की तपस्या करने की सलाह दी। बाद में देवर्षि नारद द्वारा अनुमोदन करने पर ध्रुव ने नारायण की घोर तपस्या की और उनकी कृपा से परम लोक को प्राप्त हुआ।

आकाश में स्थित ध्रुव तारा भी उसी ध्रुव का रूप माना जाता है जो सृष्टि के अंत तक रहेगा। ध्रुव के प्रति अपने प्रेम के कारण ही महर्षि क्रतु उसके समीप चले गए। माना जाता है कि ध्रुव की प्रदक्षिणा करने में महर्षि क्रतु आज भी तत्पर रहते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी तारामंडल के उत्तर दिशा में स्थित ध्रुव तारे की प्रदक्षिणा एक तारा करता है जिसे वैज्ञानिकों ने क्रतु ही नाम दिया है।

आगे चलकर वाराहकल्प में महर्षि क्रतु ने ही महर्षि वेदव्यास के रूप में अवतार ग्रहण किया। जिस प्रकार महर्षि क्रतु ने वेदों का विभाजन किया था, ठीक उसी प्रकार महर्षि वेदव्यास ने पुराणों की रचना की और उसे १८ भागों में विभाजित किया। इस सब के अतिरिक्त महर्षि क्रतु ने अपने ज्ञान को समस्त विश्व के साथ साझा किया। महाराज भरत ने महर्षि क्रतु से पूर्वरंग के देवताओं के चरित्र के विषय में प्रश्न किया था। तब महर्षि क्रतु ने उनकी इस शंका का समाधान किया था। 

मैत्रेय संहिता के ४.२.१२ श्लोक के अनुसार जब देवताओं ने यज्ञ में प्राप्त पशुओं का स्वयं विभाजन कर लिया और भगवान रूद्र के लिए कुछ नहीं रखा, तब रूद्र ने क्रोधित होकर देवताओं पर आक्रमण किया। इस आक्रमण में रूद्र ने पूषणा के दन्त, भग के नेत्र और क्रतु के अंडकोषों को नष्ट कर दिया। उनका ये रौद्र रूप देखकर परमपिता ब्रह्मा ने उनकी स्तुति कर उन्हें शांत किया और उन्हें 'पशुपति' की उपाधि दी। तत्पश्चात भगवान रूद्र ने सभी को पहले जैसा कर दिया। अपना पुरुषार्थ लौटने के बाद ही महर्षि क्रतु ने सन्नति से विवाह किया था। 

भगवतगीता के नवें अध्याय के १६वें श्लोक में श्रीकृष्ण महर्षि क्रतु के सम्मान में कहते हैं:

अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्। 
मन्त्रोSहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्।।

अर्थात: मैं ही कर्मकाण्ड, मैं ही यज्ञ, पितरों को दिया जाने वाला अर्पण, औषधि, दिव्य ध्वनि (मन्त्र), घी, अग्नि तथा आहुति हूँ। (यहाँ कर्मकांड की अभिव्यक्ति महर्षि क्रतु के सम्मानार्थ ही की गयी है)।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें