3 मई 2019

सप्तर्षि शृंखला ६.१ - महर्षि अंगिरस - १

सप्तर्षियों एवं प्रजापतियों में से एक महर्षि अंगिरस की उत्पत्ति परमपिता ब्रह्मा के मुख से हुई मानी जाती है। गुणों में ये अपने पिता ब्रह्मा की ही भांति माने जाते हैं। आधुनिक युग में इन्हे ही 'अंगिरा' के नाम से जाना जाता है। ये एक मात्र ऐसे सप्तर्षि हैं जिन्हे चार वेदज्ञों में स्थान मिला है। वेदज्ञ वे चार लोग कहलाते हैं जिन्हे स्वयं परमपिता ब्रह्मा ने वेदों की शिक्षा दी। ये चार हैं - अंगिरस, अग्नि, वायु एवं आदित्य। इन्ही चारों ने चार वेदों का ज्ञान लिया और उसे आगे विश्व को प्रदान किया। 

इनके ज्ञान और उपदेशों को 'अंगिरा स्मृति' में समाहित किया गया है। सम्पूर्ण ऋग्वेद में महर्षि अंगिरस एवं उनके वंशधरों (ब्राह्मण, देवता एवं शिष्य) के विषय में जितना विस्तृत उल्लेख है उतना और किसी भी ऋषि के सम्बन्ध में नहीं है। इन्ही से सम्बंधित ऋषियों ने, जिन्हे 'अंगिरसा' कहा जाता है, ऋग्वेद के नवम मंडल की रचना की है। ये मंडल, जिसमें ११४ सूक्त हैं, 'पवमान मंडल' के नाम से विख्यात है जिसकी ऋचाएं पावमानी ऋचाएं कहलाती हैं। इन ऋचाओं में सोम देवता की महिमा की स्तुतियां हैं। इसके अतिरिक्त अंगिरस प्रथम, द्वितीय, तृतीय और अन्य अनेक मंडलों एवं सूक्तों के द्रष्टा ऋषि कहलाते हैं। 

इसके अतिरिक्त वेदों में से एक, 'अथर्ववेद' को कहीं-कहीं 'अथर्वअंगिरस' के नाम से जाना जाता है जो इस ग्रन्थ को महर्षि अथर्वण एवं महर्षि अंगिरा द्वारा लिखित रूप में करने के कारण जाना जाता है। कई जगह महर्षि अंगिरा को ही अथर्वण के रूप में जाना गया है। बौद्ध साहित्य 'दिघा निकाय' में ऐसा वर्णन है कि महात्मा बुद्ध ने अपने शिष्यों को १० प्राचीन ऋषियों के विषय में बताया था जिनमे से महर्षि अंगिरस प्रथम थे। इनके बारे में ये भी कहा जाता है कि पहले ये मनुष्य योनि में थे किन्तु बाद में अपनी महानता के कारण ये देवता भी कहलाये। 

महर्षि अंगिरस ने ही सर्वप्रथम अग्नि को उत्पन्न किया था। अग्नि का एक नाम 'अंगार' भी है और कदाचित उसी से इनका नाम अंगिरस या अंगिरा प्रसिद्ध हुआ। कहते हैं कि इनकी तपस्या और उपासना इतनी तीव्र थी कि इनका तेज और प्रभाव अग्नि से भी बहुत अधिक बढ़ गया। उस समय अग्निदेव भी जल में रहकर तपस्या कर रहे थे। जब उन्होंने महर्षि अंगिरस का तपोबल देखा तो वे दुखी हो कर उनके पास गए और कहा - 'हे महर्षि! आप ही प्रथम अग्नि हैं और मैं आपके तेज़ की तुलना में न्यून होने से द्वितीय अग्नि हूँ। मेरा तेज़ आपके सामने फीका पड़ गया है अतः अब कोई मुझे कोई अग्नि नहीं कहेगा।' तब महर्षि अंगिरा ने सम्मानपूर्वक उन्हें देवताओं को हवि पहुँचाने का कार्य सौंपा और साथ ही पुत्र रूप में अग्नि का वरण किया। यही कारण है कि यज्ञ में अग्नि में आहुति देने पर ही देवताओं को हविष्य की प्राप्ति होती है।

मनुस्मृति में ऐसा वर्णन है कि महर्षि अंगिरा को बहुत छोटी आयु में ही बहुत ज्ञान प्राप्त हो गया था। इसी कारण आयु में उनसे कहीं बड़े लोग उनके पास आकर शिक्षा ग्रहण करते थे। एक बार पाठ करते हुए अंगिरस ने वहाँ उपास्थि लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा - 

पुत्रका इति होवाच ज्ञानेन परिगृह्य तान्। 

अर्थात बालक अंगिरा ने अपने से कहीं बड़ों को 'हे पुत्रों' ऐसा कहकर सम्बोधित किया। ये सुनकर वहाँ बैठे वृद्धजन अत्यंत क्रोधित हुए कि ये बालक हमें पुत्र कहकर कैसे सम्बोधित कर सकता है? ये देख कर उन सभी ने देवताओं का आह्वान किया और जब देवता प्रकट हुए तो उन्होंने अंगिरस की शिकायत करते हुए उनसे उसे दंड देने की प्रार्थना की। तब देवताओं ने कहा - 'इस बालक ने जो कुछ भी कहा है वो बिलकुल सत्य है। क्यूंकि - 


न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः।

यो वै युवाप्यधीयानस्तं देवाः स्थविरं विदुः।।


अर्थात - 'सिर के बाल सफ़ेद हो जाने से ही कोई मनुष्य वृद्ध नहीं कहा जा सकता। देवगण उसी को वृद्ध कहते हैं जो तरुण होने पर भी ज्ञानवान हो।' देवताओं द्वारा इस प्रकार अनुमोदन करने पर वहाँ उपस्थित सभी वृद्धजनों ने एक मत से उस बालक अंगिरस का शिष्य बनना स्वीकार किया।

...शेष

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