5 मई 2019

सप्तर्षि शृंखला ६.२ - महर्षि अंगिरस - २

पिछले लेख में आपने महर्षि अंगिरस के जन्म और वेदों में उनके महत्त्व के विषय में पढ़ा। महर्षि अंगिरस के कई संतानें हुई किन्तु उनमे से सर्वाधिक प्रसिद्ध देवगुरु बृहस्पति और महर्षि गौतम हैं। बृहस्पति उनके ज्येष्ठ पुत्र हैं जिन्हे आगे चल कर देवताओं के गुरु बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। महर्षि गौतम, जिन्होंने अपनी पत्नी अहल्या को पाषाण में बदलने का श्राप दे दिया था, इन्होने भी आगे चल कर सप्तर्षि का पद ग्रहण किया। 

पुराणों में मुख्यतः महर्षि अंगिरस की चार पत्नियों का वर्णन है। उनकी पहली पत्नी सुरूपा महर्षि मरीचि की पुत्री थी। दूसरी पत्नी स्वराट कर्दम ऋषि की पुत्री, तीसरी मनु पुत्री पथ्या एवं चौथी पत्नी स्मृति, जिनका एक नाम श्रद्धा भी था, दक्ष प्रजापति की पुत्री थी। इनसे इनके वंश का अनंत विस्तार हुआ जिसका संक्षिप्त वर्णन नीचे दिया जा रहा है।
  • सुरूपा: इनसे इन्हे देवगुरु बृहस्पति की प्राप्ति हुई। बृहस्पति के पुत्र कच एवं भारद्वाज हुए। कच ने ही दैत्यगुरु शुक्राचार्य से मृतसञ्जीविनी विद्या प्राप्त की थी किन्तु शुक्र की पुत्री देवयानी के श्राप के कारण वो विद्या उनके किसी काम ना आयी। भारद्वाज के भवमन्यु तथा भवमन्यु के महावीर्य, नर और गर्भ - ये तीन पुत्र हुए। महावीर्य के उरुक्षय और उरुक्षय के कवि आदि अनेक पुत्र हुए। नर की संकृति और संकृति के गुरु, वीति और रन्तिदेव आदि पुत्र हुए। गर्भ के सिनि, सिनि के सैन्य, सैन्य के महर्षि गर्ग हुए। गर्ग के पुत्र शिनि, शिनि के शैन्य तथा इनसे अनेक पुत्र पैदा हुए। इसके अतिरिक्त सुरूपा से महर्षि अंगिरस की एक पुत्री 'भुवना' का भी वर्णन आता है। उस काल में भुवना एक मात्र ऐसी स्त्री थी जिसे ब्रह्मविद्या का ज्ञान था। भुवना का विवाह आठवें वसु प्रभास के साथ हुआ जिससे उन्हें पुत्र के रूप में महान विश्वकर्मा की प्राप्ति हुई जो आगे चल कर देव शिल्पी बनें। प्रभास ने ही महर्षि वशिष्ठ की प्रसिद्ध गाय 'नंदनी' का हरण किया था जिसके कारण उसे श्राप मिला और वो महारथी भीष्म के रूप में गंगा के गर्भ से जन्मा।
  • स्वराट: इनसे महर्षि गौतम का जन्म हुआ। गौतम एवं अहल्या के पुत्र शतानन्द हुए। शतानन्द के पुत्र सत्यधृति हुए।
  • पथ्या: इनसे अबन्ध्य, वामदेव, उशिज,अतथ्य तथा धिष्णु - ये पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। वामदेव के पुत्र वृहदुत्थ, उशिज के दीर्घतमा तथा धिष्णु के पुत्र सुधन्वा हुए। सुधन्वा के ऋषभ और ऋषभ के रथकार एवं संझक हुए। इसके अतिरिक्त इनके आत्मा, आयु, ऋतु, गविष्ठ, दक्ष, दमन, प्राण, सद, सत्य तथा हविष्मान्‌ नामक पुत्र भी हुए जिन्हे देवगण कहा जाता था। 
  • स्मृति: इनके गर्भ से सिनीबाली, कुहू, राका, अनुमति, भानुमति, हविष्मति एवं महिष्मति नामक ७ पुत्रियाँ एवं दो पुत्र - भरताग्नि एवं कीर्तिमन्त हुए। भरतग्नि की पत्ती संहति से पर्जन्य हुए। पर्जन्य से कीर्तिमान और कीर्तिमान की पत्नी धेनुका से वरिष्ठ और छतिमन्त हुए।
श्रीकृष्ण ने एक बार व्याघ्रपाद ऋषि के आश्रम पर महर्षि अंगिरस से पाशुपतयोग की प्राप्ति के लिए बड़ी दुष्कर तपस्या की थी। इसके अतिरिक्त भागवत में स्यमंतक मणि की चोरी के प्रसंग में इनके श्री कृष्ण से मिलने का भी उल्लेख आया है। महाभारत युद्ध के समय ये शरशैय्या पर पड़े भीष्म पितामह से भी उनके अंतिम समय मिलने गए थे। महर्षि शौनक को महर्षि अंगिरस ने ही विद्या के दो रूपों - 'परा' तथा 'अपरा' से परिचित कराया था।

महर्षि अंगिरस के एक प्रिय शिष्य थे उदयन। उदयन को अपनी विद्या का घमंड हो गया तब महर्षि अंगिरस ने उसे चूल्हे से एक अंगार लाने को कहा। जब उदयन अंगार लेकर आया तो थोड़े ही देर में कोयला ठंडा होकर अपनी ऊष्मा खो बैठा। तब महर्षि अंगिरस ने उदयन को शिक्षा दी कि इसी प्रकार किसी को भी अपनी विद्या पर अभिमान नहीं करना चाहिए अन्यथा वो भी समाज से अलग होकर अपनी इसी कोयले की भांति अपनी श्रेष्ठता खो देता है।

महर्षि अंगिरस ने ही रानी चोलादेवी, जिसे देवी लक्ष्मी ने 'शूकरी' मुख हो जाने का श्राप दिया था (इसी सन्दर्भ में इस लेख का चित्र डाला गया है), उसे महालक्ष्मी व्रत की दीक्षा दी थी जिससे चोलादेवी के श्राप का निवारण हो सका। इसके विषय में विस्तार में एक लेख बाद में प्रकाशित किया जाएगा। 

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