27 मई 2019

सोलह संस्कार

शास्त्रों के अनुसार मनुष्य जीवन के लिए कुछ आवश्यक नियम बनाए गए हैं जिनका पालन करना हमारे लिए आवश्यक माना गया है। हिन्दू धर्म के अनुसार जीवन में हर व्यक्ति को अनिवार्य रूप से सोलह संस्कारों का पालन करना चाहिए। यह संस्कार व्यक्ति के जन्म से आरम्भ होते हैं और मृत्यु तक अलग-अलग समय पर किए जाते हैं। इन संस्कारों की व्याख्या प्राचीन काल से अलग-अलग काल में कई महर्षियों ने की थी पर वर्तमान समय में जो हम १६ संस्कार की बात करते हैं तो महाभारत काल में महर्षि वेदव्यास द्वारा प्रतिपादित है। 

वैदिक युग में संस्कारों की संख्या बहुत अधिक थी किन्तु समय के साथ-साथ इसमें संशोधन होता गया। आप ये भी कह सकते हैं कि जैसे जैसे समय बीता और मनुष्य की व्यस्तता बढ़ी, इन संस्कारों में कमी आती चली गयी। मुख्य संस्कार रख लिए गए और गौण संस्कार छोड़ दिए गए। गौतम स्मृति में कुल मुख्य संस्कारों की संख्या ४० बताई गयी है। महर्षि अंगिरा ने २५ संस्कारों के बारे में लिखा है और अगर चल कर महाभारत काल तक महर्षि वेदव्यास ने इसे १६ संस्कारों तक सीमित किया। आज के भागदौड़ वाले समय में हम इनमे से कुछ संस्कारों का पालन ही कर पाते हैं।

कई लोगों को लगता है कि ये संस्कार केवल पुत्रों के लिए किये जाते हैं और ज्ञान के आभाव में ऐसी मान्यता बहुत समय तक रही भी है। हालाँकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। हमारे शास्त्रों में इन संस्कारों को बिना किसी लिंगभेद के पुत्र और पुत्री दोनों के लिए बताया गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि एक शीलवती पुत्री १० पुत्रों के समान है (दश पुत्र-समा कन्या यस्य शीलवती सुता)। इसके विपरीत पुत्र अगर योग्य ना हो तो कुल को नष्ट करने वाला भी हो सकता है (जिमि कपूत के ऊपजे कुल सद्धर्म नसाहिं)। इसी कारण ये सोच कर कि संतान कन्या है, उसे कभी इन संस्कारों से वंचित नहीं करना चाहिए। ये संस्कार हैं:
  1. गर्भाधान संस्कार: यह ऐसा संस्कार है जिससे हमें योग्य, गुणवान और आदर्श संतान प्राप्त होती है। शास्त्रों में मनचाही संतान प्राप्त के लिए गर्भधारण संस्कार किया जाता है। इसी संस्कार से वंश वृद्धि होती है। गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने के बाद इसे पहले संस्कार के रूप में मान्यता दी गयी है। इस संस्कार का लक्ष्य सभी गुणों से युक्त एक उत्तम संतान की प्राप्ति करना है। 
  2. पुंसवन संस्कार: गर्भस्थ शिशु के बौद्धिक और मानसिक विकास के लिए यह संस्कार किया जाता है। पुंसवन संस्कार के प्रमुख लाभ ये है कि इससे स्वस्थ, सुंदर गुणवान संतान की प्राप्ति होती है। आज भी ये देखा जाता है कि स्त्री के गर्भ ठहर जाने के पश्चात उसे कई अच्छी चीजें करने, खाने या देखने को कहा जाता है वहीँ मन को अशुद्ध करने वाली चीजों से उसे दूर रखा जाता है। ऐसी मान्यता है कि गर्भ धारण करने के बाद माता जिस प्रकार का आचरण करती है वही उसकी आने वाली संतान में स्थानांतरित हो जाता है। इसीलिए स्त्री को उस समय ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिससे उसकी संतान को बुरे संस्कार मिलें।
  3. सीमन्तोन्नयन संस्कार: यह संस्कार गर्भ के चौथे, छठवें और आठवें महीने में किया जाता है। इस समय गर्भ में पल रहा बच्चा सीखने के काबिल हो जाता है। उसमें अच्छे गुण, स्वभाव और कर्म का ज्ञान आए, इसके लिए मां उसी प्रकार आचार-विचार, रहन-सहन और व्यवहार करती है। इसका एक श्रेष्ठ उदाहरण हमें महाभारत में देखने को मिलता है जब सुभद्रा अपने गर्भ के अंतिम चरण में होती है और अर्जुन उसे चक्रव्यूह तोड़ने का उपाय सिखा रहे होते हैं तो उसके गर्भ में अभिमन्यु इस ज्ञान को प्राप्त कर लेता है। किन्तु जब अर्जुन चक्रव्यूह से निकलने का उपाय बताते हैं तो सुभद्रा सो जाती है अभिमन्यु का ज्ञान अधूरा रह जाता है। 
  4. जातकर्म संस्कार: बालक का जन्म होते ही इस संस्कार को करने से शिशु के कई प्रकार के दोष दूर होते हैं। इसके अंतर्गत शिशु को शहद और घी चटाया जाता है साथ ही वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया जाता है ताकि बच्चा स्वस्थ और दीर्घायु हो। इस संस्कार में पिता द्वारा संतान को २ बूँद घी एवं ६ बूँद शहद के मिश्रण को चटाने का प्रावधान है। 
  5. नामकरण संस्कार: शिशु के जन्म के बाद ११वे दिन नामकरण संस्कार किया जाता है। ब्राह्मण द्वारा ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बच्चे का नाम तय किया जाता है। संतान का नाम अगर उसकी राशि के अनुसार रखा जाये तो अत्यंत शुभ होता है। अगर प्रसव घर पर ही हुआ हो तो प्रसव वाले कमरे में नामकरण संस्कार नहीं करना चाहिए। अगर घर छोटा हो और एक ही कमरा हो तो उसे धो कर शुद्ध करने के बाद उसमे इस संस्कार को किया जा सकता है। 
  6. निष्क्रमण संस्कार: निष्क्रमण का अर्थ है बाहर निकालना। जन्म के चौथे महीने में यह संस्कार किया जाता है। हमारा शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश जिन्हें पंचभूत कहा जाता है, से बना है। इसलिए पिता इन देवताओं से बच्चे के कल्याण की प्रार्थना करते हैं। साथ ही कामना करते हैं कि शिशु दीर्घायु रहे और स्वस्थ रहे। इस संस्कार में बच्चे को सूर्य और चंद्र के दर्शन करने का प्रावधान है। इसका एक वैज्ञानिक कारण ये भी है कि बच्चे को बहार के वातावरण के अनुकूल बनाया जा सके ताकि उसकी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ सके। 
  7. अन्नप्राशन संस्कार: यह संस्कार बच्चे के दांत निकलने के समय अर्थात ६-७ महीने की उम्र में किया जाता है। इस संस्कार के बाद बच्चे को अन्न खिलाने की शुरुआत हो जाती है। अन्न और मनुष्य का गहरा सम्बन्ध है। मनुष्य जैसा अन्न खता है वैसा ही उसका मन और आचरण भी बनता है। इस संस्कार में पूजन के उपरांत पंचबलि देने के बाद बच्चे को अन्न (सामान्यतः खीर) खिलाया जाता है। 
  8. मुंडन (चूड़ाकर्म) संस्कार: जब शिशु की आयु एक वर्ष हो जाती है तब या तीन वर्ष की आयु में या पांचवे या सातवे वर्ष की आयु में बच्चे के बाल उतारे जाते हैं जिसे मुंडन संस्कार कहा जाता है। इस संस्कार से बच्चे का सिर मजबूत होता है तथा बुद्धि तेज होती है। साथ ही शिशु के बालों में चिपके कीटाणु नष्ट होते हैं जिससे शिशु को स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है। ऐसी मान्यता है कि हमारे बालों में हमारी स्मृतियाँ सुरक्षित रहती हैं। इसी कारण संतान के बालों में सुरक्षित उसके पूर्वजन्म की स्मृतियों को समाप्त करने के लिए ये संस्कार किया जाता है। 
  9. विद्यारम्भ संस्कार: इस संस्कार के माध्यम से शिशु को उचित शिक्षा दी जाती है। शिशु को शिक्षा के प्रारंभिक स्तर से परिचित कराया जाता है। जब संतान विद्या प्राप्त करने के योग्य हो जाये तब उसे एक योग्य गुरु के द्वारा शिक्षा दी जानी चाहिए। आज कल गुरु-शिष्य परंपरा तो रही नहीं इसी लिए उचित समय पर संतान को योग्य शिक्षा देनी चाहिए। ये इस लिए भी आवश्यक है क्यूंकि धन मनुष्य का साथ छोड़ सकता है किन्तु विद्या कभी मनुष्य का साथ नहीं छोड़ती। 
  10. कर्णवेध संस्कार: इस संस्कार में कान छेदे जाते है । इसके दो कारण हैं - एक तो, विशेषकर कन्या को आभूषण पहनने के लिए और दूसरा - कान छेदने से वहाँ दबाव पड़ता है जिसे आजकल एक्यूपंक्चर कहते हैं। इससे मस्तिष्क तक जाने वाली नसों में रक्त का प्रवाह ठीक होता है। इससे श्रवण शक्ति बढ़ती है और कई रोगों की रोकथाम हो जाती है।
  11. उपनयन (यज्ञोपवीत) संस्कार: उप यानी पास और नयन यानी ले जाना। गुरु के पास ले जाने का अर्थ है उपनयन संस्कार। आज भी यह परंपरा है। जनेऊ यानि यज्ञोपवित में तीन सूत्र होते हैं। ये तीन देवता- ब्रह्मा, विष्णु, महेश के प्रतीक हैं। इस संस्कार से शिशु को बल, ऊर्जा और तेज प्राप्त होता है।
  12. वेदारंभ संस्कार: इसके अंतर्गत व्यक्ति को वेदों का ज्ञान दिया जाता है। हिन्दू धर्म में वेदों को मनुष्य के जीवन का अभिन्न अंग माना गया है। यहाँ एक बात और ध्यान देने वाली है कि हमारे धर्म में सभी जाति और वर्ण के लोगों को वेद पढ़ने की स्वतंत्रता है। हालाँकि अतीत में इसका बहुत अपभ्रंश हुआ और शूद्रों को वेदों के ज्ञान से वंचित करने का प्रयत्न किया गया। समय के साथ इसने सुधार हुआ और वेदों का ज्ञान सबके लिए सुलभ हो गया। 
  13. केशांत संस्कार: केशांत संस्कार अर्थ है केश यानी बालों का अंत करना, उन्हें समाप्त करना। विद्या अध्ययन से पूर्व भी केशांत किया जाता है। मान्यता है गर्भ से बाहर आने के बाद बालक के सिर पर माता-पिता के दिए बाल ही रहते हैं। इन्हें काटने से शुद्धि होती है। शिक्षा प्राप्ति के पहले शुद्धि जरूरी है, ताकि मस्तिष्क ठीक दिशा में काम करें। पुराने में गुरुकुल से शिक्षा प्राप्ति के बाद केशांत संस्कार किया जाता था।
  14. समावर्तन संस्कार: समावर्तन संस्कार अर्थ है फिर से लौटना। आश्रम या गुरुकुल से शिक्षा प्राप्ति के बाद व्यक्ति को फिर से समाज में लाने के लिए यह संस्कार किया जाता था। इसका आशय है ब्रह्मचारी व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक रूप से जीवन के संघर्षों के लिए तैयार किया जाना। इस संस्कार के बाद ही मनुष्य गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने का अधिकारी बनता है। 
  15. विवाह संस्कार: पुत्र और पुत्री जब मानसिक और शारीरिक रूप से परिपक्व हो जाते हैं तब उनका विवाह कराया जाता है ताकि वे वंशवृद्धि में अपना योगदान दे सकें। पुत्र के लिए उत्तम कन्या और कन्या के लिए उत्तम वर का चयन करने के भी नियम शास्त्रों में बताये गए हैं। इसके अतिरिक्त विद्वान ब्राह्मण से गोत्र, नाड़ी इत्यादि का मिलान करने के बाद ही दोनों का विवाह करना चाहिए। और हाँ, कभी भी ३६ गुण मिलने की आशा ना करें क्यूंकि भगवान शिव और माता पार्वती के अतिरिक्त आज तक किसी भी दंपत्ति के सभी ३६ गुण नहीं मिल सके हैं। 
  16. अंत्येष्टि (श्राद्धकर्म) संस्कार: हिन्दू धर्म में किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाने के बाद उसके शरीर को विधि पूर्वक जलाने की प्रक्रिया को अंत्येष्टि कहते हैं। हिन्दू धर्म में किसी भी शुभ कार्य से पूर्व अपने माता पिता का आशीर्वाद लेने का प्रावधान है। मनुष्य की मृत्यु पश्चात हम अपने पितरों से आशीर्वाद लेते है और उनसे ये प्रार्थना करते हैं कि उस मनुष्य को मुक्ति प्राप्त हो। इसे श्राद्ध कहते हैं। ये संस्कार मनुष्य को पूर्ण करता है और फिर उसे किसी और संस्कार की आवश्यकता नहीं होती।

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