31 मई 2019

भीष्मक

महाराज भीष्मक विदर्भ के सम्राट थे। ये महाराज जरासंध और शिशुपाल के मित्र थे और मगध सदैव इनके राज्य की सुरक्षा के लिए तत्पर रहता था। इनके रुक्मी, रुक्मरथ, रुक्मबाहु, रुक्मकेश एवं रुक्ममाली नामक एक पुत्र और रुक्मिणी नामक एक पुत्री थी। उनकी पुत्री रुक्मिणी का विवाह श्रीकृष्ण से हुआ। इस प्रकार भीष्मक यदुवंश के भी सम्बन्धी बन गए। हालाँकि रुक्मिणी हरण के समय श्रीकृष्ण से पराजित होने के बाद रुक्मी ने विदर्भ छोड़ दिया और भोजकट में अपना राज्य बसाया। इस विषय में आप यहाँ पर पढ़ सकते हैं। 

29 मई 2019

सप्तर्षि श्रंखला ९ - महर्षि पुलस्त्य

महर्षि पुलस्त्य भी परमपिता ब्रह्मा के मानस पुत्रों एवं प्रजापतियों में से एक हैं। महाभारत और पुराणों में इनके विषय में बहुत कुछ लिखा गया है। कहते हैं कि जगत में जो कुछ भी शांति और सुख का अनुभव होता है, उसमे महर्षि पुलस्त्य की बहुत बड़ी भूमिका है। इनका स्वाभाव अत्यंत दयालु बताया गया है जो देव, दानव, मानव में कोई भेद-भाव नहीं करते। महाभारत में इस बात का उल्लेख है कि अपने पिता ब्रह्मा की आज्ञा से महर्षि पुलस्त्य ने पितामह भीष्म को ज्ञान प्रदान किया था।

27 मई 2019

सोलह संस्कार

शास्त्रों के अनुसार मनुष्य जीवन के लिए कुछ आवश्यक नियम बनाए गए हैं जिनका पालन करना हमारे लिए आवश्यक माना गया है। हिन्दू धर्म के अनुसार जीवन में हर व्यक्ति को अनिवार्य रूप से सोलह संस्कारों का पालन करना चाहिए। यह संस्कार व्यक्ति के जन्म से आरम्भ होते हैं और मृत्यु तक अलग-अलग समय पर किए जाते हैं। इन संस्कारों की व्याख्या प्राचीन काल से अलग-अलग काल में कई महर्षियों ने की थी पर वर्तमान समय में जो हम १६ संस्कार की बात करते हैं तो महाभारत काल में महर्षि वेदव्यास द्वारा प्रतिपादित है। 

25 मई 2019

सप्तर्षि श्रंखला ८ - महर्षि क्रतु

सप्तर्षियों एवं प्रजापतियों में से एक महर्षि क्रतु परमपिता ब्रह्मा के पुत्र है जिनकी उत्पत्ति उनके हाथ से हुई बताई गयी है। इनकी गणना विश्व के सबसे महान बुद्धिजीवियों में होती है। महर्षि क्रतु ने ही परमपिता ब्रह्मा द्वारा उत्पन्न किये गए वेदों का विभाजन किया था। कहा जाता है कि सर्वप्रथम वेद एक रूप में ही ब्रह्मदेव द्वारा उत्पन्न किये गए थे। बाद में अपने पिता की आज्ञा से महर्षि क्रतु ने ही वेदों के चार भाग (ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद) करने में उनकी सहायता की थी। उनके इस ज्ञान बुद्धि से प्रसन्न होकर परमपिता ब्रह्मा ने उनका नाम क्रतु रखा जिसका अर्थ होता है शक्ति अथवा सामर्थ्य।

23 मई 2019

शिवलिंगों के स्थापत्य का वैज्ञानिक महत्त्व

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा की भारत में ऐसे शिव मंदिर है जो केदारनाथ से लेकर रामेश्वरम तक एक सीधी रेखा में बनाये गये है। आश्चर्य है कि हमारे पूर्वजों के पास ऐसा कैसा विज्ञान और तकनीक था जिसे हम आज तक समझ ही नहीं पाये। आश्चर्यजनक रूप से इन मंदिरों को ७९° E ४१’५४” देशांतर रेखा के भौगोलिक सीधी रेखा में बनाया गया है। यहाँ पर हम ५ मुख्य मंदिरों को सम्मलित कर रहे हैं। 

21 मई 2019

सप्तर्षि शृंखला ७ - महर्षि पुलह

महर्षि पुलह भी अन्य सप्तर्षियों की भांति परमपिता ब्रह्मा के पुत्र एवं १० प्रजापतियों में से एक माने जाते हैं। जिस प्रकार भगवान ब्रह्मा की उत्पत्ति श्रीविष्णु की नाभि से हुई है, ठीक उसी प्रकार महर्षि पुलह का जन्म भी परमपिता ब्रह्मा की नाभि से ही हुआ था। हालाँकि कुछ ग्रंथों में इनकी उत्पत्ति ब्रह्मदेव के मस्तक से भी बताई जाती है। अन्य सप्तर्षियों से अलग महर्षि पुलह विश्व की आध्यात्मिक शक्ति के विकास के लिए सदैव तपस्यारत रहे।

कहा जाता है कि महर्षि पुलह ने भी ब्रह्माण्ड की रचना और विस्तार के लिए अपने पिता भगवान ब्रह्मा की सहायता की थी। यही कारण है कि इन्हे तेज और गुण में स्वयं अपने पिता परमपिता ब्रह्मा की ही भांति माना जाता है। ये ब्रह्मापुत्र प्रजापति ये दक्ष के जमाता भी थे। अन्य ऋषियों और देवताओं की तरह ही प्रजापति दक्ष ने महर्षि पुलह को भी अपनी एक पुत्री 'क्षमा' का दान किया। इनसे इन्हे पीवरी नामक एक पुत्री एवं ३ पुत्र प्राप्त हुए:

19 मई 2019

परशुराम - ५

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार सहस्त्रार्जुन जमदग्नि के आश्रम से कामधेनु को बलात ले जाता है जिससे परशुराम और सहस्त्रार्जुन में युद्ध होता है और सहत्रार्जुन मारा जाता है। फिर उसके पुत्र परशुराम की अनुपस्थिति में जमदग्नि की हत्या कर देते हैं। इससे परशुराम क्रोध में आकर पूरे विश्व को क्षत्रियों से शून्य कर देते हैं। तब महर्षि कश्यप परशुराम से पूरी पृथ्वी दान में ले लेते हैं और उन्हें महेंद्र पर्वत पर जाने को कहते हैं। अब आगे...

17 मई 2019

परशुराम - ४

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि अपने नाना और गुरु विश्वामित्र के सुझाव पर परशुराम महादेव, श्रीहरि और ब्रह्मदेव की तपस्या करते हैं। त्रिदेवों से परशुराम को अनेक दिव्यास्त्र और वरदान प्राप्त होते हैं जिनमे उनका प्रसिद्ध परशु भी होता है। उन दिव्यास्त्रों और वरदानों के कारण परशुराम तीनों लोकों में अजेय हो जाते हैं। अब आगे...

13 मई 2019

परशुराम - ३

पिछले भाग में आपने पढ़ा कि अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण करने के बाद परशुराम अपने पिता से शस्त्रविद्या प्राप्त करने का हठ करते हैं। उनका हठ देख कर उनके पितामह ऋचीक उन्हें युद्धकला की शिक्षा लेने की अनुमति दे देते हैं। फिर परशुराम अपने नाना विश्वामित्र से सभी प्रकार की शस्त्रविद्या और दिव्यास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करते हैं। अपनी शिक्षा पूर्ण होने के बाद परशुराम विश्वामित्र से और शिक्षा प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं। तब विश्वामित्र उन्हें महादेव की तपस्या करने का सुझाव देते हैं। अब आगे...

11 मई 2019

महाराज जनक की वंश परंपरा

  1. सारी सृष्टि परमपिता ब्रह्मा से आरम्भ हुई।
  2. ब्रह्मा के पुत्र सप्तर्षियों में एक महर्षि मरीचि हुए। 
  3. मरीचि के पुत्र महर्षि कश्यप हुए जिनसे सभी प्रकार के प्राणियों का जन्म हुआ। 
  4. कश्यप के पुत्र विवस्वान (सूर्य) हुए। 
  5. सूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु हुए जो वर्तमान मन्वन्तर के अधिपति हैं। 
  6. उनके पुत्र महाराज इक्ष्वाकु हुए। इन्ही से इक्ष्वाकु कुल चला। 
  7. इक्ष्वाकु के पुत्र निमि हुए। इक्ष्वाकु के ही दूसरे पुत्र कुक्षि के वंश में आगे चल कर श्रीराम का जन्म हुआ।
  8. निमि के पुत्र मिथि हुए जिनके नाम पर इनकी राजधानी मिथिला कहलायी। 

9 मई 2019

परशुराम - २

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार परशुराम की दादी सत्यवती की माता के छल के कारण परशुराम ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय संस्कारों के साथ जन्मे। ८ वर्ष की आयु तक उन्होंने अधिकांश विद्या अपनी माता रेणुका से प्राप्त कर ली थी। साथ ही साथ वे सभी प्रकार के पशु पक्षियों से भी बात कर सकने में सक्षम थे। अब आगे...

ब्राह्मण होने के कारण परशुराम को समस्त वेदों और शास्त्रों की शिक्षा दी गयी। उन्होंने सर्वप्रथम अपनी विद्या अपने पिता जमदग्नि से प्राप्त की। फिर वे उच्च शिक्षा हेतु अपने दादा महर्षि ऋचीक के आश्रम में वेद वेदाङ्गों की शिक्षा लेने लगे। वे मेधावी थे इसी कारण शीघ्र ही वे समस्त शास्त्रों के ज्ञाता हो गए। फिर पुनः अपने पिता जमदग्नि के आश्रम में लौट कर उन्होंने सभी प्रकार के कर्मकांडों की शिक्षा ली। उनके माता पिता अपने पुत्र के संस्कार देख कर अत्यंत संतुष्ट थे। किन्तु नियति ने परशुराम का केवल वेदपाठी ब्राह्मण होना निश्चित नहीं किया था।

7 मई 2019

परशुराम - १

आप सभी को परशुराम जयंती (अक्षय तृतीया) की हार्दिक शुभकामनायें। आज अक्षय तृतीया के ही दिन जब नवग्रहों में से ६ ग्रह उच्च दशा में थे, ऐसे शुभ मुहूर्त में भगवान विष्णु के छठे अवतार के रूप में परशुराम का जन्म हुआ था। वैसे तो इनका मूल नाम 'राम' था किन्तु भगवान शिव द्वारा प्रदत्त विकराल परशु को सदैव धारण करने के कारण इनका नाम 'परशुराम' पड़ गया और वे इसी नाम से जगत विख्यात हुए।

परशुराम भृगुकुल में जन्मे थे। महर्षि भृगु के एक पुत्र थे ऋचीक। उनका विवाह कन्नौज के राजा महाराज गाधि की कन्या सत्यवती से हुआ। सत्यवती राजर्षि विश्वामित्र की बहन भी थी। उस विवाह में ऋचीक के पिता और सत्यवती के श्वसुर महर्षि भृगु पधारे। सत्यवती ने अपने श्वसुर की बड़ी सेवा की जिससे प्रसन्न होकर महर्षि भृगु ने उसे वरदान माँगने को कहा।

5 मई 2019

सप्तर्षि शृंखला ६.२ - महर्षि अंगिरस - २

पिछले लेख में आपने महर्षि अंगिरस के जन्म और वेदों में उनके महत्त्व के विषय में पढ़ा। महर्षि अंगिरस के कई संतानें हुई किन्तु उनमे से सर्वाधिक प्रसिद्ध देवगुरु बृहस्पति और महर्षि गौतम हैं। बृहस्पति उनके ज्येष्ठ पुत्र हैं जिन्हे आगे चल कर देवताओं के गुरु बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। महर्षि गौतम, जिन्होंने अपनी पत्नी अहल्या को पाषाण में बदलने का श्राप दे दिया था, इन्होने भी आगे चल कर सप्तर्षि का पद ग्रहण किया। 

3 मई 2019

सप्तर्षि शृंखला ६.१ - महर्षि अंगिरस - १

सप्तर्षियों एवं प्रजापतियों में से एक महर्षि अंगिरस की उत्पत्ति परमपिता ब्रह्मा के मुख से हुई मानी जाती है। गुणों में ये अपने पिता ब्रह्मा की ही भांति माने जाते हैं। आधुनिक युग में इन्हे ही 'अंगिरा' के नाम से जाना जाता है। ये एक मात्र ऐसे सप्तर्षि हैं जिन्हे चार वेदज्ञों में स्थान मिला है। वेदज्ञ वे चार लोग कहलाते हैं जिन्हे स्वयं परमपिता ब्रह्मा ने वेदों की शिक्षा दी। ये चार हैं - अंगिरस, अग्नि, वायु एवं आदित्य। इन्ही चारों ने चार वेदों का ज्ञान लिया और उसे आगे विश्व को प्रदान किया। 

1 मई 2019

जब श्रवण कुमार ने अपने माता पिता को पालकी से उतार दिया

हिन्दू धर्म में श्रवणकुमार का स्थान मातृ-पितृ भक्त के रूप में सर्वश्रेष्ठ है। शायद ही कोई ऐसा हो जिसे श्रवणकुमार के विषय में ना पता हो। जब भी हम श्रवण का नाम लेते हैं, हमारी दृष्टि में एक ऐसे किशोर का चित्र उभरता है जो अपने कन्धों पर रखे पालकी में आपने माता-पिता को ले जा रहा होता है। अपने माता पिता के प्रति ऐसी भक्ति विरले ही देखने को मिलती है।

हालाँकि इस लेख में हम श्रवणकुमार के जीवन के बारे में बात नहीं करने वाले हैं क्यूंकि इसके बारे में पहले ही बहुत कुछ कहा और सुना जा चुका है। इस लेख में हम श्रवणकुमार के जीवन की उस घटना के बारे में बताएँगे जब उन्होंने अपने वृद्ध और नेत्रहीन माता पिता को पैदल चलने के लिए विवश किया। तो आखिर क्या कारण था कि श्रवणकुमार जैसे मातृ-पितृ भक्त ने अपने वृद्ध माता पिता को पैदल चलने को विवश किया।