3 अप्रैल 2019

पुरुरवा और उर्वशी की कथा: १ - जब श्राप वरदान बना

ब्रह्मपुत्र मनु के एक पुत्र हुए जिनका नाम था इला। इला को पुरुष तथा स्त्री दोनों माना जाता है। अपने स्त्री रूप में इला ने चन्द्रमा और तारा (बृहस्पति की पत्नी) के अवैध पुत्र बुध से विवाह किया। इन्ही दोनों के पुत्र पुरुरवा हुए जिन्हे पुरुवंश का जनक माना जाता है। इन्ही के पुत्र आयु हुए, आयु के पुत्र नहुष और नहुष के पुत्र चक्रवर्ती सम्राट ययाति हुए जिनके पुत्रों से ही आगे समस्त कुल चले। पुरुरवा ने देवराज की सर्वश्रेठ अप्सरा उर्वशी से विवाह किया। इस तरह से उर्वशी पुरुवंश की राजमाता बनी।

इसी का वर्णन करते हुए शताब्दियों बाद पाण्डुपुत्र अर्जुन उर्वशी के प्रणय याचना को ये कहते हुए ठुकरा देते हैं कि वे उनके पूर्वज पुरुरवा की पत्नी थी इसी कारण वे उनके लिए माता सामान है। अर्जुन के द्वारा इस प्रकार अपमानित होने पर उर्वशी उसे नपुंसक होने का श्राप दे देती है। हालाँकि बाद में ये श्राप अर्जुन के काम ही आता है जब उन्हें अज्ञातवास बिताना होता है। इस बारे में अर्जुन कहते हैं कि माता द्वारा क्रोध में दिया गया श्राप भी पुत्रों का भला ही करता है।

इनकी कथा तब आरम्भ होती है जब एक बार उर्वशी देवराज इंद्र की आज्ञा लेकर धरती की यात्रा पर आयी। उसे पृथ्वी का वातावरण इतना मोहक लगा कि वो कुछ काल तक वही पर रुक गयी। एक दिन वो एक वन में विचरण कर रही थी तभी वहाँ एक राक्षस आ गया। जब उसने उर्वशी को देखा तो कामांध हो गया। ऐसी सुन्दर स्त्री उसने आज तक देखी ना थी। उसने उर्वशी से प्रणय याचना की किन्तु उस राक्षस का भयानक मुख देख कर उर्वशी वहाँ ये भाग निकली। इसे अपना अपमान जान कर उस राक्षस ने उर्वशी का अपहरण कर लिया और जबरन अपने साथ ले जाने लगा। स्वयं को संकट में देख कर उर्वशी उच्च स्वर में अपनी रक्षा की गुहार लगाने लगी।

उसी समय आर्यावर्त के अधिपति महाराज पुरुरवा वही से गुजर रहे थे। जब उन्होंने एक स्त्री के चिल्लाने का स्वर सुना तो उसी ओर भागे। आगे जाकर उन्होंने देखा कि एक राक्षस एक स्त्री का हरण कर उसे बलात अपने साथ ले जा रहा है। वे क्षत्रिय थे, उसपर से राजा सो प्रजा की रक्षा करना उनका धर्म था। उन्होंने उस राक्षस को रोका और उर्वशी को स्वतंत्र करने को कहा। किन्तु जब राक्षस नहीं माना तो दोनों में भयानक युद्ध हुआ। वो राक्षस पुरुरवा के सामर्थ्य को पार ना कर पाया और अंततः उस युद्ध में पुरुरवा ने उस राक्षस का वध कर दिया।

उसके बाद पुरुरवा ने वही अचेत पड़ी उर्वशी को उठाया। एक परपुरुष का स्पर्श पाकर उर्वशी की चेतना लौटी। उस समय उर्वशी से सुन्दर स्त्री त्रिलोक में कोई और नहीं थी और दूसरी और महाराज पुरुरवा भी पुरुषश्रेष्ठ थे। दोनों ने तत्काल एक दूसरे को अपना ह्रदय दे दिया। किन्तु दोनों की अपनी एक मर्यादा थी। पुरुरवा उस समय नरेश थे और और परस्त्री को अपनी भावना बताना उन्हें उचित ना लगा। दूसरी ओर उर्वशी पृथ्वी की थी ही नहीं और से पता था कि अंततः उसे वापस स्वर्गलोक लौटना ही है। यही कारण था कि दोनों एक दूसरे से प्रेम करने के बाद भी अपनी भावनाएं एक दूसरे को ना बता पाए।

पुरुरवा का धन्यवाद अदा कर उर्वशी भरे मन से वापस स्वर्गलोक लौट गयी। दोनों पृथक तो हो गए किन्तु अब उनके लिए ये विरह असहनीय हो गया। किन्तु अब किया ही क्या जा सकता था? इसी बीच एक दिन स्वर्ग में एक प्रहसन (नाटक) रचा गया जिसमे भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कथा कही जानी थी। इस प्रहसन में उर्वशी को माता लक्ष्मी की भूमिका निभानी थी। प्रहसन आरम्भ हुआ किन्तु उर्वशी का मन उसमे नहीं था। उसे उस समय भी पुरुरवा का ही ध्यान था। इसी भटकाव के कारण उर्वशी ने प्रहसन में माता लक्ष्मी के स्वामी भगवान विष्णु के नाम की जगह पुरुरवा का नाम ले लिया।

यह देखकर नाटक को निर्देशित कर रहे भारत मुनि को क्रोध आ गया। उन्होंने उर्वशी को शाप देते हुए कहा कि एक मानव की तरफ आकर्षित होने के कारण तुझे पृथ्वीलोक पर ही रहना पड़ेगा और मानवों की तरह संतान भी उत्पन्न करना होगा। उर्वशी के लिए तो ये श्राप जैसे वरदान साबित हुआ। पृथ्वी पर आने के बाद वो पुरुरवा से मिली जो पहले से ही सदैव उसी का स्मरण करते रहते थे। जब पुरुरवा को उर्वशी के श्राप के विषय में पता चला तो उनकी प्रसन्नता का ठिकाना ना रहा। दोनों का प्रेम अंततः सफल रहा और दोनों ने विवाह कर लिया। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें