19 अप्रैल 2019

रुक्मी - ३: बलराम से विवाद और मृत्यु

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार रुक्मी अपने बल का दम्भ भरते हुए पांडव और कौरव पक्ष की सहायता करने के लिए जाता है किन्तु उसके घमंड के कारण युधिष्ठिर और दुर्योधन दोनों उसकी सहायता लेने से मना कर देते हैं। इस प्रकार बलराम के अतिरिक्त वो आर्यावर्त का दूसरा ऐसा योद्धा बनता है जिसने महाभारत के युद्ध में भाग नहीं लिया था। अब आगे...

कृष्ण से पराजय के पश्चात उसने भोजकट को ही अपनी राजधानी बना लिया था और वही से विदर्भ का राज-काज संभालता था। कुण्डिनपुर में उसके पिता भीष्मक की छत्रछाया में उसका छोटा भाई रुक्मण भी उसकी सहायता करता था। बाद में उसने भीष्मक की सहमति से अपनी पुत्री रुक्मवती का विवाह श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ पुत्र प्रद्युम्न से कर दिया। प्रद्युम्न की पहले से एक पत्नी थी जिसका नाम माया था। किन्तु इतना करने के बाद भी उसे महाभारत के युद्ध में भाग लेने का अवसर नहीं मिला। अंततः उसकी सहायता के बिना ही युद्ध समाप्त हुआ और पांडव उस युद्ध में विजयी हुए।

युद्ध के आरम्भ में रुक्मी का जो मतभेद कृष्ण और पांडवों से हो गया था उसे मिटाने के लिए उसने अपनी पौत्री रोचना का विवाह प्रद्युम्न के पुत्र अनिरुद्ध से करने का निर्णय लिया। उसने इस प्रस्ताव को अपने पुत्र के द्वारा द्वारका भेजा जिसे कृष्ण और बलराम ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। अनिरुद्ध ने भी बाणासुर की पुत्री उषा से विवाह किया था किन्तु उसने भी इस सम्बन्ध को सहर्ष स्वीकार किया। 

रोचना को ब्याहने यादवों की बारात भोजकट पहुँची। शुभ मुहूर्त देख कर रोचना और अनिरुद्ध का विवाह कर दिया गया। श्रीकृष्ण विवाह के पश्चात वापस लौटना चाहते थे किन्तु रुक्मी ने उन्हें अनुरोध कर के रोक लिया। जब उन्हें वहाँ रहते कुछ समय हो गया तो एक दिन पुनः श्रीकृष्ण ने वापस जाने की आज्ञा मांगी। इस बार रुक्मी ने उनकी इच्छा का सम्मान किया किन्तु एक दिन चौसर के खेल के लिए उन्हें रोक लिया। 

अगले दिन रात्रि में चौसर का आयोजन किया गया। उस चौसर में एक और रुक्मी अपने भाइयों के साथ बैठा था तो दूसरी ओर कृष्ण और बलराम अपने बंधु बांधवों के साथ उपस्थित थे। खेल आरम्भ हुआ और दोनों पक्ष बढ़-चढ़ कर दांव लगाने लगे। इस प्रकार खेलते-खेलते बहुत समय बीत गया। उस खेल में दैवयोग से यादवों की बार-बार हार हो रही थी। कृष्ण को वो खेल कुछ जंचा नहीं और उन्होंने उस खेल को बंद करवाने का प्रयास किया किन्तु दोनों पक्ष के लोग इतने आनंद से खेल रहे थे कि उन्होंने कृष्ण की बात नहीं सुनी। ये देख कर श्रीकृष्ण खिन्न होकर सभा से चले गए। 

उधर बलराम और रुक्मी बार बार दांव लगा रहे थे और संयोग से रुक्मी हर बार विजयी हो रहा था। ऐसे करते हुए बलराम ने ९९ बार दांव लगाया और सारे दांव वो हार गए। उनके पास जितना भी धन था उसमे से १ लाख स्वर्ण मुद्राएं छोड़ कर वे सब हार गए। अंत में उन्होंने अंतिम १००वां दांव लगाने का निश्चय किया और अपने पास पड़ी आखिरी १००००० स्वर्ण मुद्राओं को दांव पर लगा दिया। इस बार भाग्य से वो विजयी हुए। 

जब रुक्मी ने जीता हुआ धन वापस जाता हुआ देखा तो वो छल पर उतर आया। वो बार-बार बलराम जी के पांसों से आये छः अंक को चार बताने लगा और कहने लगा कि आपने ये दांव जीता ही नहीं है। लम्बे समय से बार-बार दांव हारने के कारण बलराम पहले ही क्रोध में थे। अब रुक्मी को इस प्रकार खुले रूप से छल करते हुए देख उनका क्रोध और बढ़ गया। उन्होंने रुक्मी को कई बार समझाने का प्रयत्न किया कि वे विजयी हुए हैं किन्तु रुक्मी बार-बार उन्हें ही छली बोलने लगा। 

बात को बिगड़ते देख कई यादव वीर श्रीकृष्ण को बुलाने दौड़े किन्तु जब तक कृष्ण वहाँ आ पाते, बलराम का क्रोध अपनी सीमा को लाँघ गया था। रुक्मी का खुला छल और उनपर बार बार झूठा लांछन लगाना उनसे बिलकुल बर्दाश्त नहीं हुआ। ऐसे में जब रुक्मी ने फिर से उन्हें छली बोला तो क्रोध में आकर बलराम ने वहीँ पड़े मदिरा के बड़े पात्र से रुक्मी को इतनी जोर से मारा कि उसकी तत्काल वहीँ मृत्यु हो गयी। 

जब कृष्ण वहाँ पहुंचे तो रुक्मी को मरा देख कर बड़े दुखी हुए। बलराम का क्रोध भी तत्काल उतरा और उन्हें भी अपने किये पर बहुत पछतावा हुआ। किन्तु अब हो भी क्या सकता था? अंततः उन्होंने रुक्मी का अंतिम संस्कार किया और फिर अनिरुद्ध और रोचना को लेकर वापस द्वारिका आ गए। बलराम इस घटना से इतने क्षुब्ध हुए कि उन्होंने कहा - 'चौसर विनाश का ही दूसरा रूप है जो मनुष्य की बुद्धि और विवेक को हर लेता है। आज से मेरी ये बात नियम समझी जाये कि जो कोई भी चौसर का खेल खेलेगा, सौभाग्य उसी क्षण उसका साथ छोड़ देगा।'

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