17 अप्रैल 2019

रुक्मी - २: युद्ध में दोनों पक्षों ने ठुकराया

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि कैसे रुक्मी अपनी बहन रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल के साथ करना चाहता है किन्तु रुक्मिणी के विवाह के दिन ही श्रीकृष्ण उन्हें हर ले जाते हैं। रुक्मी उन्हें भोजकट में रोकता है और श्रीकृष्ण के साथ द्वन्द करता है जिसमे उसकी पराजय होती है। उस पराजय से वो इतना दुखी होता है कि लौटकर कुण्डिनपुर नहीं जाता और वहीँ भोजकट में ही अपनी राजधानी बना कर राज काज सँभालने लगता है। अब आगे...

कहते हैं कि अपने परिवार के प्रति क्रोध चाहे जितना भी हो, समय के साथ-साथ कम हो ही जाता है। किन्तु रुक्मी के साथ ऐसा नहीं हुआ। उस घटना के बाद वो कभी भी अपनी बहन रुक्मिणी को पहले की तरह नहीं अपना सका और ना ही कृष्ण के प्रति उसका वैर कम हुआ। हालाँकि श्रीकृष्ण और बलराम से रुक्मी बाद में ना केवल मिला, बल्कि उनसे अपने पारिवारिक सम्बन्ध भी दृढ किये। 

रुक्मी की पुत्री रुक्मवती का विवाह श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के साथ हुआ था। इससे भी एक कदम आगे बढ़ते हुए रुक्मी ने अपनी पौत्री रोचना का विवाह श्रीकृष्ण के पौत्र और प्रद्युम के पुत्र अनिरुद्ध से कर दिया। इससे द्वारका और विदर्भ के रिश्ते थोड़े तो सुधरे किन्तु फिर ही इन दोनों भाई बहनों में पहले जैसा स्नेह नहीं रहा। महाभारत में कहीं भी रुक्मिणी हरण के पश्चात रुक्मी और रुक्मिणी का मिलने का वर्णन नहीं है।

जब पांडवों और कौरवों में युद्ध की ठन गयी तो रुक्मी को अपना पुरुषार्थ दिखाने का एक अवसर मिला। इससे पहले वो युद्ध में श्रीकृष्ण से मात खा चुका था इसी कारण इस युद्ध में वो अपने बाहुबल से सारी कसर निकाल देना चाहता था। इसी अति-उत्साह में एक दिन रुक्मी अपने दल-बल के साथ पांडवों के शिविर पहुँचा। वहाँ श्रीकृष्ण और पांडवों ने उसका स्वागत किया और उसके आने का कारण पूछा। 

तब रुक्मी ने कहा - 'हे धर्मराज! आप तो जानते हैं कि मैं वासुदेव का सम्बन्धी हूँ और इसी नाते आपका और मेरा भी सम्बन्ध बनता है। यही कारण है कि इस महायुद्ध में मैंने आप लोगों की सहायता करने का निर्णय लिया है। मैंने सुना है कि शत्रुपक्ष की सेना आपकी सेना से अधिक है। किन्तु आप तनिक भी चिंता मत कीजिये। मेरी एक अक्षौहिणी सेना आपकी सेवा में उपस्थित है। मैं महारथी हूँ और पितामह भीष्म, गुरुद्रोण, कर्ण, कृप, अश्वथामा और दुर्योधन को जीतने में भी सक्षम हूँ। इनमे से जिससे भी आपको सबसे अधिक भय हो, आप उसे मुझपर छोड़ दें। और तो और, अगर आप कहें तो मैं अकेले ही पूरी कौरव सेना को जीतकर आपको आपका राज्य दिलवा दूंगा।'

रुक्मी को इस प्रकार दम्भ पूर्वक बोलते हुए देखकर कृष्ण ने हँसते हुए कहा - 'रुक्मी! आपके बल के विषय में तो मुझे पता ही है। आप निश्चय ही महान योद्धा हैं। अगर धर्मराज चाहें तो आप हमारी ओर से युद्ध कर सकते हैं।'

तब अर्जुन ने कहा - 'हे अतिरथी! हमें आपकी शक्ति और पराक्रम पर कोई संदेह नहीं है किन्तु आपने अभी-अभी जिन योद्धाओं का नाम लिया है उनपर विजय पाना तो देवताओं के लिए भी सरल नहीं है। मैंने अपने जीवन में असंख्य युद्ध लड़े हैं और महादेव की कृपा से किसी भी युद्ध में मैंने पराजय का मुँह नहीं देखा। यहाँ तक कि श्रीकृष्ण की सहायता से मैंने स्वयं देवराज इंद्र को भी युद्धक्षेत्र में पीछे हटने को विवश कर दिया था। किन्तु इतने पर भी मैं पूर्ण विश्वास से नहीं कह सकता कि मैं पितामह भीष्म और गुरुद्रोण को परास्त कर सकता हूँ। अतः आपका ये कहना कि आप ये युद्ध अकेले ही जीत सकते हैं, मुझे हास्यप्रद लगता है। हम किसी से भयभीत नहीं हैं और वैसे भी जिनके पक्ष में श्रीकृष्ण हों उसे किसी से कैसा भय? इसीलिए हमारी सेना छोटी भी हो तो भी विजय के लिए हमें आपकी सहायता की आवश्यकता नहीं है।'

अर्जुन के ऐसा कहने पर रुक्मी क्रोध से अपनी सेना लेकर वहाँ से चला गया और सीधा दुर्योधन के शिविर पहुँचा। दुर्योधन ने उसका स्वागत किया और उसके आने का कारण पूछा। तब रुक्मी ने क्रोध में कहा - 'हे युवराज! मैं तो अपनी सेना लेकर पांडवों की सहायता करने को गया था किन्तु अर्जुन ने मेरा बड़ा अपमान किया। इसी लिए मैंने ये निर्णय लिया है कि अब मैं आपकी ओर से युद्ध करूँगा। आप मुझे जिसका भी वध करने कहेंगे, मैं उसे मृत्यु के घाट उतार दूँगा। और तो और अगर आप पितामह भीष्म की जगह मुझे सेनापति नियुक्त करें तो प्रथम दिन ही मैं कृष्ण सहित पांचों पांडवों को मार डालूँगा।'

दुर्योधन जैसा भी था पर उसमे आत्मसम्मान कूट कूट कर भरा था। रुक्मी को इस प्रकार बोलते देख कर उसने कहा - 'रुक्मी! जो पांचों पांडव पितामह भीष्म की नेतृत्व वाली ११ अक्षौहिणी सेना के सामने भी ना घबराये, आप उन्हें मृत्यु के घाट उतारने की बात कर रहे हैं? अगर मैं मान भी लूँ कि आप ऐसा कर सकते हैं तो भी आपको पहले मेरी सहायता के लिए आना चाहिए था। आप ह्रदय से हमारा समर्थन नहीं करते अपितु पांडवों द्वारा ठुकराने के कारण हमारी ओर से युद्ध करना चाहते हैं। और अगर पांडव केवल ७ अक्षौहिणी सेना होने के बाद भी आपके सहायता के बिना युद्ध कर सकते हैं तो मेरे पास तो फिर भी ११ अक्षौहिणी सेना है। अतः मुझे भी आपकी सहायता की कोई आवश्यतकता नहीं है।'

इस प्रकार अपने घमंड के कारण रुक्मी ना पांडवों और ना ही कौरवों की ओर से युद्ध कर सका। उस महायुद्ध में आर्यावर्त के केवल दो ही योद्धा ऐसे थे जिन्होंने युद्ध में भाग नहीं लिया था। वे थे बलराम और रुक्मी। किन्तु जहाँ बलराम अपनी सात्विक प्रकृति के कारण युद्ध से विरत थे, वहीँ रुक्मी अपने अतिआत्मविश्वास के कारण उस महायुद्ध में भाग लेने से वंचित रह गया। 

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