5 अप्रैल 2019

पुरुरवा और उर्वशी की कथा: २ - उर्वशी की शर्त और देवताओं का छल

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार उर्वशी और पुरुरवा एक दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं किन्तु उर्वशी को स्वर्गलोग वापस जाना पड़ता है। पुरुरवा का ध्यान करते हुए स्वर्गलोक में हुए एक प्रहासन में उर्वशी से एक गलती हो जाती है जिस कारण भारत मुनि उसे पृथ्वीलोक में जाने का श्राप देते हैं। ये श्राप उर्वशी को वरदान के समान ही प्रतीत होता है और वो पृथ्वीलोक जाकर पुरुरवा से विवाह कर लेती है। अब आगे...

विवाह करने से पूर्व उर्वशी ने पुरुरवा से कहा कि उसकी तीन शर्तें हैं और अगर पुरुरवा उन्हें वचन देंगे कि वे उनकी तीन शर्तों को मानेंगे तभी उन दोनों का विवाह संभव है। पुरुरवा तो किसी भी स्थिति में उर्वशी से विवाह करना चाहते थे इसीलिए उन्होंने कहा कि वो जो कोई भी शर्त रखना चाहे रख सकती है। उनसे आश्वासन मिलने के बाद उर्वशी ने कहा: 
  1. 'मेरे पास २ बकरियाँ हैं जो मुझे अत्यंत प्रिय हैं। ये सदैव मेरे साथ रहती हैं। आपको सदैव मेरे साथ-साथ इनकी भी रक्षा करनी होगी।' 
  2. 'मैं सदैव घी का ही सेवन करुँगी।'
  3. 'केवल और केवल सहवास के समय हम एक दूसरे को नग्न देख सकते हैं। इसके अतिरिक्त आप मेरे समक्ष कभी भी, किसी भी परिस्थित में नग्न ना आएं।' 
महाराज पुरुरवा ने उसकी तीनों शर्तें मान ली। फिर उर्वशी ने कहा - 'हे महाराज! अगर आपने इनमे से कोई एक भी शर्त तोड़ दी तो मैं उसी समय आपको छोड़कर वापस स्वर्ग लौट जाऊँगी।' ये सुनकर पुरुरवा ने उसे आश्वासन दिया कि वे उसकी तीनों शर्तों का सदैव ध्यान रखेंगे। इसके बाद दोनों ने विधिवत रूप से विवाह कर लिया। दोनों जो चाहते थे वो उन्हें मिला और दोनों सुख पूर्वक जीवन बिताने लगे। इस प्रकार बहुत काल बीत गया। महाराज पुरुरवा सदैव उर्वशी की उन तीन बातों का ख्याल रखते थे और उर्वशी भी सदैव उन्हें हर प्रकार से संतुष्ट रखती थी। 

उधर स्वर्गलोक का हाल बुरा था। जब उर्वशी को श्राप मिला तब तो इंद्र ने ये सोच कर कुछ नहीं कहा कि उर्वशी कुछ काल में ही पृथ्वी लोक में रहते-रहते परेशान हो जाएगी और वापस स्वर्ग लौट आएगी, किन्तु उर्वशी तो पृथ्वी जाकर बस ही गयी। उसके बिना स्वर्गलोक की आभा कम हो गयी और देवराज को भी अपनी प्रिय अप्सरा की याद सताने लगी। वे किसी भी मूल्य पर उर्वशी को वापस लाना चाहते थे किन्तु तब तक उन्हें पता चल गया था कि उर्वशी पुरुरवा से प्रेम करती है और वो वापस नहीं आना चाहती। तब इंद्र ने एक छल करने का निश्चय किया। 

देवराज को उर्वशी की शर्त के विषय में पता था। उन्होंने गंधर्वों को ये कार्य करने की आज्ञा दी। इंद्र की आज्ञा पर एक रात जब उर्वशी महाराज पुरुरवा की सेवा में जा रही थी उसी समय गंधर्वों ने उर्वशी की दोनों बकरियों को चुरा लिया। ये देख कर उर्वशी ने उनकी सुरक्षा के लिए पुरुरवा को गुहार लगाई। उस समय पुरुरवा निर्वस्त्र थे। उन्होंने सोचा कि यदि उन्होंने वस्त्र पहनने में विलम्ब किया तो चोर अवश्य उन बकरियों को ले जाएंगे और फिर उर्वशी उन्हें छोड़ कर चली जाएगी। उस समय गहन अंधकार था, हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। उन्होंने सोचा कि ऐसे तो उर्वशी उन्हें देख ही नहीं पायेगी और वे चोरों को भी पकड़ लेंगे।

यही सोच कर वे अपने पहले वचन की रक्षा के लिए बाहर भागे। ठीक उसी समय इंद्र ने स्वर्ग से बिजली चमका कर उजाला कर दिया और उर्वशी ने पुरुरवा को निर्वस्त्र देख लिया। इससे उर्वशी की शर्त टूट गयी और उर्वशी वापस स्वर्गलोक जाने के लिए तैयार हुई। जाते-जाते उर्वशी अपने ज्येष्ठ पुत्र आयु को भी साथ ले गयी किन्तु बाद में उसने कुरुक्षेत्र में पुरुरवा को उनका पुत्र सौप दिया। किन्तु अलग होने के बाद भी दोनों का प्रेम कम नहीं हुआ। वे दोनों उसके बाद एक साथ तो नहीं रह सके किन्तु बाद में भी उर्वशी कई घटनाक्रम की वजह से पृथ्वी पर आती रही और पुरुरवा से मिलती रही। इस कारण बाद में भी दोनों के कई पुत्र हुए। उर्वशी से पुरुरवा को आयु, अमावसु, श्रुतायु, दृढ़ायु, विश्वायु, शतायु आदि ९ पुत्र प्राप्त हुए। 

पुरुरवा के बाद उनके पुत्र आयु को राज्य मिला और आयु के पश्चात उसके पुत्र नहुष ने सिंहासन संभाला। नहुष के पुत्र ययाति हुए और उन्ही के पांच पुत्रों से समस्त राजवंश चला। ययाति के छोटे पुत्र पुरु से पुरुवंश चला जिसमे आगे चलकर कौरवों और पांडवों ने जन्म लिया। ययाति के बड़े पुत्र यदु से ही यदुवंश चला जिसमें आगे चलकर श्रीकृष्ण ने जन्म लिया। इंद्र के इस छल के कारण पुरुरवा इतने दुखी हुए कि उन्होंने ये प्रतिज्ञा की कि एक ना एक दिन उन्ही के कुल से कोई इंद्र को पदच्युत करेगा। उनकी ये प्रतिज्ञा पूर्ण हुई जब उनके पौत्र नहुष ने आगे चलकर इंद्र का पद ग्रहण किया। हालाँकि उसके घमंड और वासना ने अंततः उसे उस पद से च्युत कर दिया। वहीँ उर्वशी ने भी इस कारण इंद्र का कभी पहले जैसा सम्मान नहीं किया। इस प्रेम कथा के बारे में हमें अधिक नहीं बताया जाता किन्तु ये हिन्दू धर्म की सबसे पहली और पवित्र प्रेम कथाओं में से एक है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें