11 अप्रैल 2019

कालयवन - १: ब्राह्मणपुत्र राक्षस बना

कालयवन महाभारत काल का एक योद्धा था जो यवनों का राजा था। नहुष के पुत्र ययाति के ५ पुत्र हुए और उन्ही से समस्त राजवंश चले। किन्तु पुरु को छोड़ कर ययाति ने किसी को भी एकछत्र सम्राट बनने का अधिकार नहीं दिया। उन्ही के एक पुत्र और पुरु के बड़े भाई 'द्रुहु' से म्लेच्छों का राजवंश चला। यवन भी द्रुहु के ही वंश में आते थे और उनका राज्य आर्यावर्त से बहुत दूर उजाड़ जगह पर अलग-थलग बसा हुआ था। अधिकतर लोगों को लगता है मुस्लिम ही प्राचीन काल में यवन थे किन्तु ऐसा नहीं है। हो सकता है इन्ही की कोई जाति से आगे चल कर मुस्लिम धर्म आरम्भ हुआ हो किन्तु मुस्लिम बहुत बाद में (लगभग ३५००-४०००) वर्ष बाद अस्तित्व में आये। 

कालयवन इन्ही यवनों का राजा था। हालाँकि जन्म से कालयवन एक ब्राह्मण था। एक ब्राह्मण थे जिनका नाम था 'शेशिरायण' जिन्होंने सिद्धि प्राप्त करने के लिए १२ वर्षों का ब्रह्मचर्य धारण किया हुआ था। उन्हें ब्रह्मचर्य धारण किये हुए ११ वर्ष से अधिक हो गया था और कुछ ही दिनों में उनका व्रत पूर्ण होने वाला था। एक दिन वे एक सभा में गए जहाँ कुछ लोगों ने उनके इस ब्रह्मचर्य का मजाक उड़ाते हुए उन्हें नपुंसक कह दिया। ये अपमान उन्हें इतना चुभा कि मारे क्रोध के उन्होंने अपने ब्रह्मचर्य व्रत का ध्यान ना रखते हुए महादेव की घोर तपस्या आरम्भ की। 

जब महादेव प्रसन्न हुए तो शेशिरायण ने उनसे एक ऐसे पुत्र की कामना की जिसे कोई मार ना सके। उनकी इच्छा सुनकर भोलेनाथ ने उन्हें वरदान दिया कि उन्हें एक ऐसा पुत्र प्राप्त होगा जिसे सूर्यवंशी या चंद्रवंशी किसी भी अस्त्र-शस्त्र से ना मार सके। किन्तु अमरता संभव नहीं थी इसी कारण उन्होंने ये प्रतिबन्ध लगा दिया कि जब भी वो किसी ऐसे व्यक्ति का अपमान करेगा जिसे स्वयं किसी को मृत्यु देने का वरदान प्राप्त हो, तब उसकी मृत्यु हो जाएगी। साथ में महादेव ने ये जान लिया कि इतने दिन ब्रह्मचारी रहने के कारण शेशिरायण के मन में भोग विलास की इच्छा भी है इसीलिए उन्होंने उसे काम-वासना की पूर्ति का भी वरदान दे दिया।

महादेव के वरदान से ऋषि का शरीर पूर्ण यौवनत्व को प्राप्त हुआ। वापस जाते समय उन्हें सरोवर में एक अत्यंत सुन्दर स्त्री क्रीड़ा करते हुए दिखी। वो इंद्र की श्रेष्ठ अप्सरा रम्भा थी। ऋषि ने उसे अपना परिचय दिया और विवाह की आकांक्षा रखी। उनका रूप और गुण देखकर रम्भा ने विवाह की सहमति दे दी और दोनों का विवाह हो गया। इन दोनों का पुत्र ही कालयवन हुआ।

उसी समय आर्यावर्त से दूर मलीच देश पर 'कालजंग' नामक यवन राज्य करता था। उसकी इच्छा थी कि वो अपने आस पास के राज्यों पर अधिकार जमा ले किन्तु उसकी सैन्य शक्ति उतनी नहीं थी। एक दिन उसके गुरु ने कहा कि आर्यावर्त में शेशिरायण के पुत्र को ये वरदान प्राप्त है कि उसे कोई पराजित नहीं कर सकता। तुम जाकर उनसे उनका पुत्र माँग लोग जिसके प्रभाव से तुम्हारा कोई विरोध नहीं कर पायेगा।

अपनी गुरु की आज्ञा अनुसार कालजंग शेशिरायण के पास पहुँचा और उनसे उनके पुत्र को माँगा। इसपर ऋषि हिचकिचाए कि किस प्रकार वे अपने पुत्र को उस यवन के हाथों सौंप सकते हैं? ये सोच कर उन्होंने कालजंग के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। तब कालजंग ने उन्हें बताया कि उसे पता है कि किस प्रकार उन्होंने भगवान शिव की तपस्या से उस पुत्र को प्राप्त किया है।

उसने कहा - 'हे महर्षि! आपने अजेय पुत्र तो प्राप्त कर लिया किन्तु आप तो ब्राह्मण हैं। युद्ध और राज्य से आपको कोई मतलब नहीं है। धन का आपको कोई लोभ नहीं। ना ही आपका कोई राज्य है जिसके विस्तार की आपको कोई इच्छा है। फिर ऐसे असाधारण वरदान प्राप्त पुत्र की आपको आवश्यकता ही क्या है? ऐसे तो इसका वरदान आपके आश्रम में रहते-रहते व्यर्थ हो जाएगा। इससे अच्छा आप इस मुझे सौंप दें। इसके वरदान की सहायता से मैं इसे विश्व विजेता बना दूँगा और आपका यश समस्त संसार में फ़ैल जाएगा।'

ये सुनकर ऋषि सोच में पड़ गए। कालजंग सत्य ही कह रहा था। जिस प्रकार का वरदान उन्होंने महादेव से माँगा था उसका कोई भी उपयोग उनका पुत्र उनके साथ रहकर नहीं कर सकता था। उन्हें इस प्रकार चिंतामग्न देख कर कालजंग ने पुनः कहा - 'हे महर्षि! आप किसी भी प्रकार की चिंता ना करें। ये सदा आपका ही पुत्र कहलायेगा और मैं केवल इसका दत्तक पिता कहा जाऊँगा। आपने १२ वर्षों तक घोर ब्रह्मचर्य का पालन किया है और उसके पश्चात आपको स्त्री सुख प्राप्त हुआ है। आप अपने पुत्र के पालन पोषण की जिम्मदारी मुझे सौंप कर निश्चिंत हो अपने विवाहित जीवन का आनंद उठायें।'

कालजंग के इस प्रकार समझने पर अंततः ऋषि मान गए और अपने पुत्र को कालजंग का दत्तक पुत्र बना कर उसके साथ भेज दिया। कालजंग प्रसन्नतापूर्वक उस बालक को लेकर मलीच देश वापस आ गया और उसे अपना युवराज घोषित कर दिया। उसने उसका नाम 'कालयवन' रखा। उसके वापस आते ही सब जगह ये बात फ़ैल गयी कि उसका पुत्र महारुद्र का कृपापात्र है। अब कालजंग ने आस-पास के समस्त राजाओं पर आक्रमण किया। अधिकतर राजाओं ने तो केवल उसके पुत्र के वरदान की बात सुकर उसकी अधीनता स्वीकार कर ली। जिन्होंने नहीं की उसे उसने अपने पुत्र के वरदान के कारण बल पूर्वक जीता। 

जल्द ही वो बालक तरुण हुआ और महादेव के वरदान के कारण सभी के द्वारा अवध्य होकर उसने अतुल बल प्राप्त किया। वो साम्राज्य जिसे कालजंग नहीं जीत पाया था उसे कालयवन ने अपने बाहुबल से जीता। सभी जानते थे कि वो अवध्य है, इसी कारण कोई भी उसके विरुद्ध खड़ा नहीं होता था। इस प्रकार अपने बल और पराक्रम से उसने अपने साम्राज्य का अनंत विस्तार किया। सत्ता के विस्तार की उसकी इस लालसा ने उसके अंदर से मनुष्यत्व की भावना मिटा दी और वो निरंकुश हो गया। इस प्रकार जन्म से ब्राह्मण कालयवन कर्म से राक्षस बन गया। 

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