13 अप्रैल 2019

कालयवन - २: वरदान ने वरदान को काटा

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किसी प्रकार ऋषि शेशिरायण ने अपने अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए महादेव की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। उनकी कृपा से उन्हें एक ऐसे पुत्र की प्राप्ति हुई जो चंद्रवंशी या सूर्यवंशी द्वारा किसी भी अस्त्र अथवा शस्त्र से नहीं मारा जा सकता था। उसकी ख्याति सुनकर मलीच देश का राजा कालजंग उसे शेशिरायण से माँग कर ले गया। उसे उसने अपना पुत्र माना और कालयवन नाम दिया। इस प्रकार एक ब्राह्मणपुत्र एवं देश और यवनों का राजा बन गया। अब आगे...

अपने बाहुबल और वरदान के बल पर कालयवन ने समस्त एवं देशों पर अपना अधिपत्य जमा लिया। दूसरी और उसी समय आर्यावर्त में जरासंध श्रीकृष्ण के बढ़ते हुए प्रभाव से दुखी था। उसने मथुरा पर १७ बार आक्रमण किया किन्तु हर बार कृष्ण और बलराम के सामर्थ्य के कारण उसे मुँह की कहानी पड़ी। उसी समय जरासंध को कालयवन और उसे प्राप्त वरदान के बारे में पता चला। कृष्ण उसके वरदान के कारण उसे मार नहीं सकते थे और यही सोच कर जरासंध ने कालयवन को अपने साथ मिलाने के बारे में सोचा। 

ये सोच कर उसने मद्रदेश के राजा शल्य को यवनदेश कालयवन से मिलने को भेजा। उसकी आज्ञा पाकर शल्य आर्यावर्त से बहुत दूर यवनों के देश में पहुँचे और कालयवन से मिले। उन्होंने उसे जरासंध का प्रस्ताव सुनाया कि उसकी सहायता कर कालयवन आर्यावर्त में भी अपना प्रभाव बढ़ा सकता है। किन्तु कालयवन पर उनकी बातों का कोई असर नहीं हुआ। उसे ये समझ में नहीं आया कि क्यों उसे अपना बसा बसाया देश छोड़कर एक अनजान राजा की मदद के लिए अनजान देश जाना चाहिए। 

दैवयोग से देवर्षि नारद उस समय यवन देश पहुंचे। उन्हें पता था कि कालयवन के अंत का समय अब आ गया है। उन्होंने कालयवन को कहा कि भले ही तुम्हारे वरदानों के कारण कोई तुमसे युद्ध नहीं करता किन्तु आर्यवर्त में कृष्ण नाम का एक व्यक्ति है जो तुम्हे परास्त कर सकता है। देवर्षि की ये युक्ति काम कर गयी और कृष्ण को पराजित करने का स्वप्न लेकर कालयवन शल्य के साथ आर्यावर्त चलने को तैयार हो गया।

शल्य कालयवन और उसकी विशाल सेना को लेकर आर्यावर्त पहुँचा। वहाँ जरासंध ने उसका बहुत सत्कार किया और फिर कालयवन की सेना के साथ मिलकर अपनी विशाल सेना के साथ कृष्ण पर १८वीं बार आक्रमण करने को मथुरा की ओर बढ़ा। कृष्ण जरासंध के इस बार-बार के आक्रमण से तंग आ चुके थे। इस बार उन्हें पता चला कि कालयवन भी जरसंध की सेना के साथ आ रहा है। कृष्ण को उसके वरदान के विषय में पता था इसी कारण उन्होंने द्वारका नामक एक नया नगर बसाया और समस्त मथुरावासियों को वहाँ भेज दिया। वे स्वयं बलराम के साथ बिना किसी सेना के मथुरा में ही रुक गए। 

जब जरासंध मथुरा पहुँचा तो वहाँ कृष्ण और बलराम को अकेला देख कर बड़ा हैरान हुआ। कालयवन ने जब श्रीकृष्ण को देखा तो उसे लगा कि ये ग्वाला किस प्रकार मुझे हरा सकता है? इससे पहले कि युद्ध आरम्भ होता, श्रीकृष्ण ने कहा कि युद्ध कर के कई सैनिकों की प्राणों की बलि लेने से अच्छा है कि दो योद्धा आपस में द्वन्द कर लें। जरासंध मान गया और कालयवन को कृष्ण ने युद्ध करने को भेजा। उसे विश्वास था कि अपने वरदान के कारण कालयवन अवश्य कृष्ण का वध कर देगा। 

जब कालयवन कृष्ण से लड़ने आया तो उन्होंने कहा कि हम किसी खुले स्थान पर चलते हैं जहाँ हम खुल कर युद्ध कर सकें। कालयवन उनके झांसे में आ गया। वो कृष्ण के पीछे-पीछे अकेला चल पड़ा। जब सेना पीछे छूट गयी तो श्रीकृष्ण तीव्र गति से युद्ध क्षेत्र छोड़ कर निकल गए। ये देख कर कालयवन को बड़ा क्रोध आया और वो रणछोड़-रणछोड़ कहता हुआ श्रीकृष्ण के पीछे दौड़ा। तभी से कृष्ण का एक नाम 'रणछोड़' भी पड़ा। 

भागते-भागते श्रीकृष्ण एक गुफा के पास आये जिसके अंदर राजा मुचुकुन्द सहस्त्रों वर्षों से सो रहे थे। उन्होंने अपना उत्तरीय राजा मुचुकुन्द के ऊपर डाला और पास में ही छिप गए। मुचुकुन्द श्रीराम के पूर्वज महाराज मान्धाता के पुत्र थे। उन्होंने देवासुर संग्राम में देवराज इंद्र की सहायता की जिसमे उनका सारा परिवार मारा गया। उनके पीछे उनके पिता मान्धाता ने मुचुकुन्द के भाई सुसन्धि को राजा बना दिया।

इन सब से दुखी होकर मुचुकुन्द इंद्र के पास पहुँचे और उनसे कहा कि इतना लम्बा युद्ध कर और अपने परिजनों की मृत्यु का समाचर सुनकर मैं बहुत थक गया हूँ और सोना चाहता हूँ। मैं नहीं चाहता कि कोई मुझे जगाये। तब इंद्र ने उन्हें निद्रा का वरदान दिया और साथ ही ये भी कहा कि जो भी तुम्हे जगायेगा वो तत्काल जल कर भस्म हो जाएगा। तभी से मुचुकुन्द युगों से उसी गुफा में सो रहे थे। 

श्रीकृष्ण का पीछा करता हुआ जब कालयवन वहाँ पहुँचा तो उनका उत्तरीय मुचुकुन्द पर डाला देख उसने उन्हें ही कृष्ण समाझ लिया। तब उसने क्रोध में कृष्ण का उत्तरीय ओढ़े मुचुकंद को लात मारी जिससे उनकी निद्रा टूट गयी। जैसे ही मुचुकुन्द ने आँख खोली, उनके सामने खड़ा कालयवन भस्म हो गया। इस प्रकार श्रीकृष्ण की युक्ति से उस दुष्ट का अंत हुआ। उसके बाद श्रीकृष्ण ने मुचुकुन्द को दर्शन दिए और फिर मुचुकुन्द ने अपने देह को त्याग कर उत्तम लोक को प्राप्त किया।

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