29 अप्रैल 2019

सप्तर्षि शृंखला ५ - महर्षि अत्रि

ऋषियों में श्रेष्ठ अत्रि मुनि अन्य सप्तर्षियो की भांति परमपिता ब्रह्मा के मानस पुत्र थे जिनकी उत्पत्ति ब्रह्मा की जिह्वा से हुई बताई जाती है। इन्होने ने ही इंद्र, अग्नि, वरुण और अन्य वैदिक देवताओं के लिए ऋचाओं की रचना की थी। महर्षि अत्रि के विषय में सर्वाधिक वर्णन ऋग्वेद में किया गया है जहाँ ऋग्वेद के ५वें मंडल को महर्षि अत्रि के सम्मान स्वरुप 'अत्रि मंडल' के नाम से जाना जाता है। इस मंडल में महर्षि अत्रि से सम्बंधित ८७ सूक्त वर्णित हैं। इसके अतिरिक्त महर्षि अत्रि पुराणों, रामायण और महाभारत में भी वर्णित हैं। 

27 अप्रैल 2019

सप्तर्षि शृंखला ४ - महर्षि मरीचि

महर्षि मरीचि परमपिता ब्रह्मा के प्रथम मानस पुत्रों में से एक हैं जिनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के नेत्रों से हुई मानी जाती है। नेत्रों से उत्पन्न होने के कारण उनका नाम 'मरिचि' पड़ा जिसका अर्थ होता है 'प्रकाश की किरण'। प्रथम मनु स्वयंभू के मन्वन्तर में जो ७ ऋषि (मरीचि, पुलत्स्य, पुलह, क्रतु, अंगिरा, अत्रि एवं वशिष्ठ) सप्तर्षि कहलाये वो सभी ब्रह्मपुत्र थे। ब्रह्मदेव के पुत्र होने के कारण उन्हें 'समब्रह्म' अर्थात ब्रह्मा के सामान कहा जाता है किन्तु मरीचि को उनकी महानता के कारण साक्षात् द्वितीय ब्रह्मा भी कहा जाता है।

25 अप्रैल 2019

सप्तर्षि शृंखला ३ - विभिन्न धर्मग्रंथों में वर्णिंत सप्तर्षि

पिछले लेख में आपने प्रत्येक मन्वन्तर में सप्तर्षियों का पद ग्रहण करने वाले महर्षियों के बारे में पढ़ा था। इसके अतिरिक्त विभिन्न धर्म ग्रंथों में भी सप्तर्षियों का अलग-अलग वर्णन है। आपको ये जानकर हैरानी होगी कि जैन धर्म में भी सप्तर्षियों की अवधारणा है। वहाँ इन्हे 'सप्त दिगंबर' कहा जाता है। तो आइये इनके बारे में जानते हैं।

23 अप्रैल 2019

सप्तर्षि शृंखला २ - प्रत्येक मन्वन्तर के सप्तर्षि

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि ब्रह्मदेव ने सर्प्रथम सप्तर्षियों को जन्म दिया। इस प्रकार वे ब्रह्मा के मानस पुत्र कहलाये। प्रथम मनु स्वयंभू के शासनकाल में ब्रह्मा के इन सातों पुत्रों ने सप्तर्षि का पद ग्रहण किया। किन्तु प्रत्येक मनु के शासनकाल में सप्तर्षि भी अलग-अलग होते हैं। आज के इस लेख में हम ये जानेंगे कि किस मनु के शासनकाल में कौन-कौन से ऋषि सप्तर्षि कहलाये।

21 अप्रैल 2019

सप्तर्षि शृंखला १ - परिचय एवं भूमिका

हिन्दू धर्म में सप्तर्षि वो सात सर्वोच्च ऋषि हैं जो ब्रह्मा के मानस पुत्र कहलाते हैं। कथाओं के अनुसार जब परमपिता ब्रह्मा ने इस सृष्टि की रचना की तब उन्होंने विश्व में ज्ञान के प्रसार के लिए अपने शरीर से ७ ऋषियों को प्रकट किया और उन्हें वेदों का ज्ञान देकर उस ज्ञान का प्रसार करने को कहा। ये ७ ऋषि ही समस्त ऋषिओं में श्रेष्ठ एवं अग्रगणी, 'सप्तर्षि' कहे जाते हैं। ब्रह्मा के अन्य पुत्रों जैसे मनु, प्रजापति इत्यादि का महत्त्व हो हैं ही किन्तु ब्राह्मणों के प्रणेता होने के कारण सप्तर्षिओं का महत्त्व सबसे अधिक माना जाता है।

19 अप्रैल 2019

रुक्मी - ३: बलराम से विवाद और मृत्यु

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार रुक्मी अपने बल का दम्भ भरते हुए पांडव और कौरव पक्ष की सहायता करने के लिए जाता है किन्तु उसके घमंड के कारण युधिष्ठिर और दुर्योधन दोनों उसकी सहायता लेने से मना कर देते हैं। इस प्रकार बलराम के अतिरिक्त वो आर्यावर्त का दूसरा ऐसा योद्धा बनता है जिसने महाभारत के युद्ध में भाग नहीं लिया था। अब आगे...

कृष्ण से पराजय के पश्चात उसने भोजकट को ही अपनी राजधानी बना लिया था और वही से विदर्भ का राज-काज संभालता था। कुण्डिनपुर में उसके पिता भीष्मक की छत्रछाया में उसका छोटा भाई रुक्मण भी उसकी सहायता करता था। बाद में उसने भीष्मक की सहमति से अपनी पुत्री रुक्मवती का विवाह श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ पुत्र प्रद्युम्न से कर दिया। प्रद्युम्न की पहले से एक पत्नी थी जिसका नाम माया था। किन्तु इतना करने के बाद भी उसे महाभारत के युद्ध में भाग लेने का अवसर नहीं मिला। अंततः उसकी सहायता के बिना ही युद्ध समाप्त हुआ और पांडव उस युद्ध में विजयी हुए।

17 अप्रैल 2019

रुक्मी - २: युद्ध में दोनों पक्षों ने ठुकराया

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि कैसे रुक्मी अपनी बहन रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल के साथ करना चाहता है किन्तु रुक्मिणी के विवाह के दिन ही श्रीकृष्ण उन्हें हर ले जाते हैं। रुक्मी उन्हें भोजकट में रोकता है और श्रीकृष्ण के साथ द्वन्द करता है जिसमे उसकी पराजय होती है। उस पराजय से वो इतना दुखी होता है कि लौटकर कुण्डिनपुर नहीं जाता और वहीँ भोजकट में ही अपनी राजधानी बना कर राज काज सँभालने लगता है। अब आगे...

15 अप्रैल 2019

रुक्मी - १: कृष्ण से बैर, युद्ध और पराजय

रुक्मी महाभारत का एक प्रसिद्ध पात्र है जो विदर्भ के राजा महाराज भीष्मक का सबसे बड़ा पुत्र था। महाराज भीष्मक के रुक्मी के अतिरिक्त रुक्मण सहित तीन अन्य पुत्र और रुक्मिणी नामक एक पुत्री थी। रुक्मी युवराज था और विदर्भ की राजधानी कुण्डिनपुर में अपने पिता की क्षत्रछाया में राज-काज संभालता था। बचपन से ही रुक्मी बहुत बलशाली और युद्ध विद्या में पारंगत था। किंपुरुष द्रुम उसके गुरु थे और उन्होंने रुक्मी को सभी प्रकार की युद्धकला में पारंगत किया था। इसके अतिरिक्त उसने भगवान परशुराम की कृपा से कई दिव्य अस्त्र भी प्राप्त किये थे। महाभारत में उसकी गिनती मुख्य अतिरथियों में की जाती है।

13 अप्रैल 2019

कालयवन - २: वरदान ने वरदान को काटा

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किसी प्रकार ऋषि शेशिरायण ने अपने अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए महादेव की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। उनकी कृपा से उन्हें एक ऐसे पुत्र की प्राप्ति हुई जो चंद्रवंशी या सूर्यवंशी द्वारा किसी भी अस्त्र अथवा शस्त्र से नहीं मारा जा सकता था। उसकी ख्याति सुनकर मलीच देश का राजा कालजंग उसे शेशिरायण से माँग कर ले गया। उसे उसने अपना पुत्र माना और कालयवन नाम दिया। इस प्रकार एक ब्राह्मणपुत्र एवं देश और यवनों का राजा बन गया। अब आगे...

11 अप्रैल 2019

कालयवन - १: ब्राह्मणपुत्र राक्षस बना

कालयवन महाभारत काल का एक योद्धा था जो यवनों का राजा था। नहुष के पुत्र ययाति के ५ पुत्र हुए और उन्ही से समस्त राजवंश चले। किन्तु पुरु को छोड़ कर ययाति ने किसी को भी एकछत्र सम्राट बनने का अधिकार नहीं दिया। उन्ही के एक पुत्र और पुरु के बड़े भाई 'द्रुहु' से म्लेच्छों का राजवंश चला। यवन भी द्रुहु के ही वंश में आते थे और उनका राज्य आर्यावर्त से बहुत दूर उजाड़ जगह पर अलग-थलग बसा हुआ था। अधिकतर लोगों को लगता है मुस्लिम ही प्राचीन काल में यवन थे किन्तु ऐसा नहीं है। हो सकता है इन्ही की कोई जाति से आगे चल कर मुस्लिम धर्म आरम्भ हुआ हो किन्तु मुस्लिम बहुत बाद में (लगभग ३५००-४०००) वर्ष बाद अस्तित्व में आये। 

9 अप्रैल 2019

लंका कैसे काली पड़ी?

रामायण का 'लंका दहन' प्रसंग उसके सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रसंगों में से एक है। आम धारणा है कि जब रावण ने महाबली हनुमान को बंदी बना कर उनकी पूछ में आग लगा दी तब उसी जलती हुई पूछ से हनुमान ने पूरी लंका में आग लगा दी। इससे पूरी लंका खण्डहर हो गयी जिसे बाद में रावण ने पुनः अपने स्वर्ण भंडार से पहले जैसा बसाया। हालाँकि इसके विषय में एक कथा हमें वाल्मीकि रामायण के साथ-साथ अन्य भाषाओँ की रामायण में भी मिलती है। इसके बारे में जो कथा प्रचलित है वो बजरंगबली और शनिदेव के संबंधों को भी दर्शाती है।

7 अप्रैल 2019

पुराणों में वर्णित पवन के प्रकार

पुराणों में पवनदेव की महत्ता के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। इंद्र, अग्नि, वरुण इत्यादि देवताओं के साथ पवनदेव भी मुख्य एवं सर्वाधिक प्रसिद्ध देताओं में से एक हैं। पवन को बल का भी प्रतीक माना जाता है क्यूंकि इसकी शक्ति के सामने बड़े-बड़े पर्वत भी नहीं टिक पाते। उल्लेखनीय है कि रुद्रावतार महावीर हनुमान और पाण्डवपुत्र महाबली भीमसेन भी पवन के ही अंशावतार थे।

सृष्टि में जीवन के लिए पवन का प्रवाह भी अति आवश्यक है। इसीलिए इसे प्राणवायु भी कहा जाता है क्यूंकि ये जीवों में जीवन का संचार करती है। पवन वैसे तो एक शब्द है लेकिन इसके भी कई प्रकार होते हैं। भौगोलिक रूप से तो पवन के कई प्रचलित प्रकार हैं जैसे व्यापारिक, पछुआ, ध्रुवीय इत्यादि किन्तु पौराणिक रूप से भी इसे ७ भागों में बांटा गया है। आइये इसके बारे में जानते हैं: 

5 अप्रैल 2019

पुरुरवा और उर्वशी की कथा: २ - उर्वशी की शर्त और देवताओं का छल

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार उर्वशी और पुरुरवा एक दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं किन्तु उर्वशी को स्वर्गलोग वापस जाना पड़ता है। पुरुरवा का ध्यान करते हुए स्वर्गलोक में हुए एक प्रहासन में उर्वशी से एक गलती हो जाती है जिस कारण भारत मुनि उसे पृथ्वीलोक में जाने का श्राप देते हैं। ये श्राप उर्वशी को वरदान के समान ही प्रतीत होता है और वो पृथ्वीलोक जाकर पुरुरवा से विवाह कर लेती है। अब आगे...

विवाह करने से पूर्व उर्वशी ने पुरुरवा से कहा कि उसकी तीन शर्तें हैं और अगर पुरुरवा उन्हें वचन देंगे कि वे उनकी तीन शर्तों को मानेंगे तभी उन दोनों का विवाह संभव है। पुरुरवा तो किसी भी स्थिति में उर्वशी से विवाह करना चाहते थे इसीलिए उन्होंने कहा कि वो जो कोई भी शर्त रखना चाहे रख सकती है। उनसे आश्वासन मिलने के बाद उर्वशी ने कहा: 

3 अप्रैल 2019

पुरुरवा और उर्वशी की कथा: १ - जब श्राप वरदान बना

ब्रह्मपुत्र मनु के एक पुत्र हुए जिनका नाम था इला। इला को पुरुष तथा स्त्री दोनों माना जाता है। अपने स्त्री रूप में इला ने चन्द्रमा और तारा (बृहस्पति की पत्नी) के अवैध पुत्र बुध से विवाह किया। इन्ही दोनों के पुत्र पुरुरवा हुए जिन्हे पुरुवंश का जनक माना जाता है। इन्ही के पुत्र आयु हुए, आयु के पुत्र नहुष और नहुष के पुत्र चक्रवर्ती सम्राट ययाति हुए जिनके पुत्रों से ही आगे समस्त कुल चले। पुरुरवा ने देवराज की सर्वश्रेठ अप्सरा उर्वशी से विवाह किया। इस तरह से उर्वशी पुरुवंश की राजमाता बनी।

1 अप्रैल 2019

नवरत्न

ज्योतिष शास्त्र में नवरत्नों का बड़ा महत्त्व है। इन नवरत्नों को नवग्रहों से जोड़ कर देखा जाता है। अलग-अलग ग्रहों से प्रभावित व्यक्तियों को अलग-अलग रत्नों को धारण करने की सलाह दी जाती है। हर रत्न के लिए एक विशेष मन्त्र भी है। कई बार रत्न काफी महंगे होते हैं इसी कारण इसके स्थान पर उपरत्नों को भी धारण किया जा सके ताकि निर्धन व्यक्ति भी इसका लाभ उठा सके। टूटा-फूटा, चिटका, दाग-धब्बेदार, रक्त या ताम्रवर्णीय मोती धारण करना हानिकारक होता है। तो आइये नवरत्नों के विषय में कुछ जानते हैं: