18 मार्च 2019

रावण संहिता - १

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि रावण में चाहे जैसे भी अवगुण हों पर वो अपने समय का सबसे महान पंडित था। मातृकुल से राक्षस होने के बाद भी वो ब्राह्मण कहलाया क्यूंकि उसका पितृकुल ब्राह्मण था। वो परमपिता ब्रह्मा के पुत्र महर्षि पुलत्स्य का पौत्र और महर्षि विश्रवा पुत्र था। तो जो व्यक्ति इतना बड़ा पंडित हो वो अपना ज्ञान विश्व को अवश्य देना चाहता है। इसी कारण रावण ने कई ग्रंथों की रचना की जिसमे से 'शिवस्त्रोत्रताण्डव' एवं 'रावण संहिता' प्रमुख है। इस लेख में हम रावण द्वारा रचित महान ग्रन्थ रावण संहिता के विषय में जानेंगे। 

रावण संहिता विशेष रूप से 'कर्म फल' को बताती है। अर्थात इसमें मनुष्यों के कर्म फल का लेखा जोखा है। ये पुस्तक मुख्यतः ज्योतिष और तंत्र-मन्त्र पर आधारित है जो आपके सभी प्रकार के दुखों से मुक्ति का मार्ग बताती है। यहाँ एक बात विशेष रूप से बोलना चाहूँगा कि रावण संहिता में समस्त दुखों को मिटाने के किसी ज्योतिष एवं तांत्रिक उपाय (टोने-टोटके) का वर्णन मैं इस लेख में नहीं करूँगा क्यूंकि इस लेख का मुख्य उद्देश्य रावण संहिता के महत्त्व के बारे में हैं ना कि उसमे दिए गए उपायों के विषय में। अगर कोई उन उपायों के विषय में जानना चाहता हो तो वो गीताप्रेस द्वारा प्रकाशित वृहद् रावण संहिता पढ़ सकता है। 

लेकिन रावण संहिता में क्या है इसे जानने के लिए हमें थोड़ा इतिहास में जाना होगा अन्यथा हमें इसका सन्दर्भ समझ में नहीं आएगा। जब रावण को अपने नाना सुमाली से राक्षस कुल के दुर्दशा के विषय में पता चला तो उसने शक्ति प्राप्त करने के लिए अपने भाई कुम्भकर्ण एवं विभीषण के साथ परमपिता ब्रह्मा की घोर आराधना। ब्रह्मदेव के प्रसन्न होने पर उसने अमरता का वरदान माँगा पर ब्रह्माजी ने मना कर दिया। तब उसने वरदान माँगा कि देव, दैत्य, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग, किन्नर और अन्य कोई जाति उसका वध ना कर सके। इस वरदान में उसने अभिमान वश मानव एवं वानर जाति का उल्लेख ये सोच कर, कि उनका बल ही क्या है, नहीं किया। ब्रह्मदेव ने वरदान दिया और अंतर्धान हो गए।

उसके बाद अभिमानवश वो महादेव से युद्ध कर बैठा और पराजित हुआ। कैलाश को उठाने के प्रक्रिया में उसके हाँथ कैलाश के नीचे दब गए और उसे अपार कष्ट हुआ। उस कष्ट से मुक्ति पाने हेतु उसने महारुद्र की १०० वर्षों (कहीं-कहीं १००० वर्षों का भी विवरण है) तक प्रार्थना की। वही प्रार्थना जो उसने छंदों के रूप में की, 'शिवस्त्रोत्रताण्डव' कहलाया। शिव प्रसन्न हुए और उसे अतुल बल प्रदान किया। तब उसने कहा कि 'प्रभु! मैं आपसे युद्ध करने की भूल अज्ञानता में कर बैठा और तब समझ में आया कि ज्ञान ही सबसे बड़ा मित्र है। इसीलिए मैं इस संसार का समस्त ज्ञान अर्जित करना चाहता हूँ।' तब शिव ने उसे फिर से तपस्या करने को कहा।

उनके आदेशानुसार उसने इतनी घोर तपस्या की कि एक-एक करके दस बार अपना शीश उसने महादेव को अर्पण कर दिया। तब महादेव प्रसन्न हुए और उसे दस शीश प्रदान किये जिस कारण वो दशानन कहलाया। फिर महादेव ने उसे विश्व का समस्त ज्ञान देना आरम्भ किया और पहले चार मुख से उसने चार वेद और फिर अन्य छः मुख से उसने छः शास्त्रों का ज्ञान महादेव से अर्जित किया। इस प्रकार वो विश्व का पहला प्राणी बना जिसने एक साथ चारो वेदों और छः शास्त्रों का ज्ञान अर्जित किया। उसके बाद उन्ही दस मुख से वो एक साथ निरंतर वेदों और शास्त्रों का का पठन-पाठन किया करता था।

इस प्रकार सभी प्रकार से अजेय होकर वो राज्य कर रहा था कि एक दिन आकाशवाणी हुई कि उसकी मृत्यु एक मानव के हाथों होगी। वो मानव कौन है ये जानने के लिए उसने फिर महादेव की तपस्या की। उनके प्रसन्न होने पर उसने वरदान माँगा कि उसे इस पृथ्वी पर उपस्थित समस्त प्राणियों के तीन जन्मों (भूत, वर्तमान और भविष्य) का ज्ञान हो जाये। महारुद्र ने उसे ये वरदान दिया। तब उसी ज्ञान से उसे पता चला कि भविष्य में दशरथ के होने वाले पुत्र राम के हाथों उसकी मृत्यु होगी। इसी कारण उसने हर प्रयास किया कि श्रीराम का जन्म ही ना हो। इसके लिए ऐसा वर्णन है कि उसने महारानी कौशल्या का विवाह मंडप से अपहरण भी कर लिया। किन्तु उसके सभी प्रयासों के बाद भी दशरथ और कौशल्या का विवाह हुआ और श्रीराम का जन्म हुआ। कहा जाता है कि रावणको को पता था कि उसकी मृत्यु श्रीराम के हाथों ही होगी इसी कारण उसने जान-बूझ कर सीता का हरण किया ताकि उसे शीघ्र मुक्ति मिल सके।

जब रावण को समस्त प्राणियों के तीन जन्मों का ज्ञान हुआ तो उसे अपने जन्म के बारे में भी पता चला। उसे पता चला कि उसकी माता कैकसी पुत्र प्राप्ति हेतु ऋतुस्नान कर संध्या समय अपने पति महर्षि विश्रवा के पास पहुँची। उसकी इच्छा देख कर विश्रवा ने कैकसी को समझाया कि संध्या समय भगवत्पूजन का होता है अतः इस समय संसर्ग उचित नहीं है किन्तु स्त्रीहठ के समक्ष उनकी एक ना चली। तब विश्रवा ने विवश होकर अनुचित काल में अपनी पत्नी के साथ संसर्ग किया जिस कारण नवग्रह रुष्ट हो अमंगलकारी भाव में स्थित हो गए और इसी कारण रावण में राक्षसी गुण अधिक था और वो अमर नहीं बन सका। अपने जन्म के विषय में जान कर रावण ने ये निश्चय किया कि जो उसके साथ हुआ है वो उसके पुत्र के साथ नहीं होगा। उस समय मंदोदरी गर्भवती थी और रावण ने वो ज्योतिष उपाय करने का निश्चय किया जो रावण संहिता का मूल है। 

शेष... 

2 टिप्‍पणियां:

  1. मान्यवर
    आपका हारदिक आभारी हूं ।
    इस सूचना हेतु आपका धन्यवाद।
    मैने ही यह सूचना एक अन्य मित्र के फोन से आपके ग्रुप में मागी थी ।
    शिवकुमार खत्री
    हापुड़

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    उत्तर
    1. आपका धन्यवाद। आपके अनुरोध के कारण मुझे भी बहुत कुछ नया जानने को मिला। इसका दूसरा और अंतिम भाग कल धर्मसंसार पर पढ़ना ना भूलें।

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