20 मार्च 2019

रावण संहिता - २

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि रावण को परमपिता ब्रह्मा और भगवान रूद्र से कई अवतार प्राप्त हुए किन्तु जो विशेष अवतार उसे प्राप्त हुआ वो था पृथ्वी के समस्त प्राणियों के तीन जन्मों का लेखा जोखा प्राप्त होना। इस कारण वो ये पहले ही जान गया था कि उसकी मृत्यु श्रीराम के हाथों ही होगी। अब आगे...

अपनी मृत्यु का कारण जानने के बाद उसने उसे बदलने का निश्चय किया। वो महान योद्धा था। नारायणास्त्र को छोड़कर विश्व के सभी दिव्यास्त्र उसके पास थे (हालाँकि पाशुपतास्त्र उसके लिए उपयोगी सिद्ध नहीं हुआ)। उसके बल का ऐसा प्रताप था कि युद्ध में उसने यमराज को भी पराजित किया और स्वयं नारायण के सुदर्शन चक्र को पीछे हटने पर विवश कर दिया। ब्रह्मा के वरदान से उसकी नाभि में अमृत था जिसके सूखने पर ही उसकी मृत्यु हो सकती थी। रूद्र के वरदान से उसका शीश चाहे कितनी बार भी काटो, उससे उसकी मृत्यु नहीं हो सकती थी। किन्तु इतना सब होने के बाद भी वो अजेय और अवध्य नहीं था। उसने निश्चय किया कि वो अपने पुत्र, जो अभी मंदोदरी के गर्भ में था, उसे अविजित और अवध्य बनाएगा।

18 मार्च 2019

रावण संहिता - १

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि रावण में चाहे जैसे भी अवगुण हों पर वो अपने समय का सबसे महान पंडित था। मातृकुल से राक्षस होने के बाद भी वो ब्राह्मण कहलाया क्यूंकि उसका पितृकुल ब्राह्मण था। वो परमपिता ब्रह्मा के पुत्र महर्षि पुलत्स्य का पौत्र और महर्षि विश्रवा पुत्र था। तो जो व्यक्ति इतना बड़ा पंडित हो वो अपना ज्ञान विश्व को अवश्य देना चाहता है। इसी कारण रावण ने कई ग्रंथों की रचना की जिसमे से 'शिवस्त्रोत्रताण्डव' एवं 'रावण संहिता' प्रमुख है। इस लेख में हम रावण द्वारा रचित महान ग्रन्थ रावण संहिता के विषय में जानेंगे। 

रावण संहिता विशेष रूप से 'कर्म फल' को बताती है। अर्थात इसमें मनुष्यों के कर्म फल का लेखा जोखा है। ये पुस्तक मुख्यतः ज्योतिष और तंत्र-मन्त्र पर आधारित है जो आपके सभी प्रकार के दुखों से मुक्ति का मार्ग बताती है। यहाँ एक बात विशेष रूप से बोलना चाहूँगा कि रावण संहिता में समस्त दुखों को मिटाने के किसी ज्योतिष एवं तांत्रिक उपाय (टोने-टोटके) का वर्णन मैं इस लेख में नहीं करूँगा क्यूंकि इस लेख का मुख्य उद्देश्य रावण संहिता के महत्त्व के बारे में हैं ना कि उसमे दिए गए उपायों के विषय में। अगर कोई उन उपायों के विषय में जानना चाहता हो तो वो गीताप्रेस द्वारा प्रकाशित वृहद् रावण संहिता पढ़ सकता है। 

16 मार्च 2019

जब ब्रह्मदेव ने बताया क्यों देवता दैत्यों से श्रेष्ठ हैं

एक बार देवर्षि नारद घूमते-घूमते अपने पिता के पास ब्रह्मलोक पहुँचे। वहाँ परमपिता ने उनका स्वागत किया और उनके आने का उद्देश्य पूछा। तब नारद ने कहा - "हे पिताश्री! आप इस समस्त संसार के जनक हैं। सृष्टि में जो कुछ भी है उनकी उत्पत्ति आपसे ही हुई है। देव और दैत्य दोनों आपके पौत्र महर्षि कश्यप की संतानें हैं। जिस प्रकार कश्यप की पत्नी अदिति से देवों की उत्पत्ति हुई है, उसी प्रकार उनकी पत्नी दिति से दैत्यों की। दिति अदिति की अग्रज है इसी कारण दैत्य देवताओं के बड़े भाई हुए। इसके अतिरिक्त बल में भी वे देवताओं से बढ़कर ही हैं। फिर क्या कारण है कि आज जहाँ देवता स्वर्ग में समस्त सुख भोग रहे हैं, वहीं दैत्य पाताल में निवास करने को विवश हैं। महादेव के विषय में तो मैं नहीं कह सकता किन्तु आपने और नारायण ने सदैव देवों को ही श्रेष्ठ समझा है। मैं इसका कारण समझने में असमर्थ हूँ। कृपया बताइये कि क्यों आप और श्रीहरि देवों को दैत्यों से श्रेष्ठ समझते हैं?"

12 मार्च 2019

रावण का मानमर्दन १: दैत्यराज बलि

चित्र के लिए आभार - वेबदुनिया
रावण की वीरता के किस्से तो सबने सुने होंगे किन्तु कई ऐसी अवसर थे जब रावण को भी पराजय का सामना करना पड़ा। इसी को ध्यान में रखकर मैंने 'रावण का मानमर्दन' नाम की श्रृंखला लिखने का निश्चय किया है जिसमे विभिन्न योद्धाओं द्वारा रावण की पराजय का वर्णन है। इस पहली कथा में हम आपको बताएँगे कि किस प्रकार रावण अपनी शक्ति के मद में दैत्यराज बलि से उलझा और उसे मुँह की खानी पड़ी। महाराज बलि के विषय में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ। 

10 मार्च 2019

संध्यावंदन एवं उपचार

हिन्दू धर्म में पूजा एवं संध्यावंदन का महत्वपूर्ण स्थान है। प्रतिदिन संध्यावंदन करने से मनुष्य को इष्ट वस्तुओं की प्राप्ति होती है और साथ ही ये हमें शांति भी प्रदान करती है। हिन्दू धर्म में सन्ध्योपासना के ५ प्रकार बताये गए हैं जो इस प्रकार हैं:
  1. संध्या वंदन
  2. प्रार्थना 
  3. ध्यान 
  4. कीर्तन 
  5. आरती

8 मार्च 2019

भीष्म के १२ नाम

  1. देवव्रत: ये उनका असली नाम था जो उन्हें उनकी माता गंगा ने दिया था। भीष्म प्रतिज्ञा लेने तक वे इसी नाम से जाने जाते रहे। 
  2. भीष्म: ये नाम उन्हें उनकी प्रतिज्ञा के कारण प्राप्त हुआ जो उन्होंने सदैव ब्रह्मचारी रहने के लिए की थी। भीष्म का अर्थ होता है भीषण और उनकी भीषण प्रतिज्ञा के कारण देवताओं और शांतनु से उन्हें ये नाम प्राप्त हुआ। 
  3. गंगापुत्र: ये नाम उन्हें गंगा का पुत्र होने के कारण प्राप्त हुआ।  
  4. शान्तनव: ये नाम उन्हें शांतनु का पुत्र होने के कारण प्राप्त हुआ। 
  5. पितामह: कुरुवंश के वयोवृद्ध होने के कारण उन्हें ये नाम प्राप्त हुआ। 

6 मार्च 2019

महर्षि जैमिनी की शंका और ४ पक्षियों द्वारा उसका निवारण - २

पिछली कथा में आपने पढ़ा कि जैमिनी मुनि के मन में महाभारत और श्रीकृष्ण को लेकर भ्रम उत्पन्न हो गया। वे उसके निवारण हेतु मार्कण्डेय ऋषि के पास गए। उन्होंने जैमिनी मुनि को महर्षि शमीक के आश्रम रह रहे पिंगाक्ष, निवोध, सुपुत्र और सुमुख नामक ४ पक्षियों के पास जाने को कहा। उधर उन पक्षियों ने ऋषि शमीक से ये पूछा कि वे चारो मनुष्यों की भाषा कैसे बोल लेते हैं। तब शमीक ऋषि ने उन्हें उनके पिछले जन्म की कथा सुनाई। अब आगे... 

4 मार्च 2019

त्रिपुर संहार - महादेव कैसे कहलाये त्रिपुरारि

आप सभी को महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें। आज भोलेनाथ का दिन है इसीलिए उनपर एक लेख प्रकाशित करना चाह रहा था। महाशिवरात्रि पर एक विस्तृत लेख धर्मसंसार पर पहले ही प्रकाशित हो चुका है जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं। आज हम आपको उन तीन प्रसिद्ध पुरों के बारे में बताएँगे जिन्हे "त्रिपुर" कहा जाता था और जिसका विनाश स्वयं महादेव ने किया और "त्रिपुरारि" कहलाये।

2 मार्च 2019

महर्षि जैमिनी की शंका और ४ पक्षियों द्वारा उसका निवारण - १

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था और पांडव एवं श्रीकृष्ण निर्वाण को प्राप्त हो चुके थे। उस समय एक ऋषि थे उनका नाम था जैमिनी। जब उन्होंने महाभारत का विवरण जाना तो उनके मन में श्रीकृष्ण, पांडव एवं उस महायुद्ध के विषय में संदेह उत्पन्न हो गया। वे अपनी शंका के समाधान के लिए कई महात्माओं से मिले पर कोई उनके संदेह का निवारण नहीं कर सका। फिर वे विचरण करते हुए मार्कण्डेय ऋषि के पास पहुँचे।