17 जनवरी 2019

कुम्भ मेला

इस वर्ष की मकर संक्रांति अत्यंत पवित्र और शुभ है क्यूंकि उसके आरम्भ के साथ ही महाकुम्भ का भी शुभारम्भ हुआ। तो आज हम बात करते हैं कुंभ मेले की या कुंभ पर्व की। हिंदू धर्म में कुंभ पर्व बहुत ही धूमधाम से मनाया जाने वाला पर्व है। यह एक ऐसा पर्व है जो वैज्ञानिक होने के साथ-साथ पूर्ण प्रमाणिकता लिए हुए है। यह बहुत ही प्रामाणिक है और जिस प्रकार हमारी १२ राशियां है उसी के अनुसार ग्रहों की चाल एवं उनका समय निश्चित है।

ज्योतिष शास्त्र एक विज्ञान है, और एक प्रमाणिक विज्ञान है क्योंकि हमारे मनीषियों ने हजारों साल पहले पृथ्वी पर रहते हुए ही आकाशगंगा के अनगिनत ग्रहों के बारे में, उनकी चाल के बारे में, उनके प्रभाव के बारे में प्रमाणिक वर्णन कर दिया था और यह आज भी उतना ही प्रासंगिक है। इसी के अनुसार ही कुंभ मेले का आयोजन भी किया जाता रहा है और आगे भी किया जाता रहेगा। कुम्भ मेला विश्व में होने वाला सबसे बड़ा मेला है। विशेषकर प्रयाग में होने वाले महाकुम्भ में प्रत्येक दिन २ करोड़ से भी अधिक लोग गंगास्नान करते है। ऐसा उदाहरण विश्व में कोई दूसरा नहीं है। कहा जाता है कि प्रयाग में होने वाले कुम्भ मेले को चन्द्रमा से भी देखा जा सकता है। हमारे पुराणों में जो भी वर्णित है, वह पूर्ण प्रमाणिक है एवं ब्रह्म के समान है क्योंकि शब्द अपने आप में ही ब्रह्म कहे गए हैं। इसी के बारे में कुछ जानकारी प्रस्तुत है:
  • वैसे तो कुंभ मेले का आयोजन प्राचीन काल से हो रहा है, लेकिन मेले का प्रथम लिखित प्रमाण महान बौद्ध तीर्थयात्री ह्वेनसांग के लेख से मिलता है जिसमें छठवीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन के शासन में होने वाले कुंभ का प्रसंगवश वर्णन किया गया है। 
  • कुंभ मेले का आयोजन चार जगहों पर होता है - हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन
  • उक्त चार स्थानों पर प्रत्येक तीन वर्ष के अंतराल में कुंभ का आयोजन होता है, इसीलिए किसी एक स्थान पर प्रत्येक १२ वर्ष बाद ही कुंभ का आयोजन होता है। जैसे उज्जैन में कुंभ का अयोजन हो रहा है, तो उसके बाद अब तीन वर्ष बाद हरिद्वार, फिर अगले तीन वर्ष बाद प्रयाग और फिर अगले तीन वर्ष बाद नासिक में कुंभ का आयोजन होगा। उसके तीन वर्ष बाद फिर से उज्जैन में कुंभ का आयोजन होगा। उज्जैन के कुंभ को सिंहस्थ कहा जाता है।
  • कुंभ क्या है? - कलश को कुंभ कहा जाता है। कुंभ का अर्थ होता है घड़ा। इस पर्व का संबंध समुद्र मंथन के दौरान अंत में निकले अमृत कलश से जुड़ा है। देवता-असुर जब अमृत कलश को एक दूसरे से छीन रह थे तब उसकी कुछ बूंदें धरती की तीन नदियों में गिरी थीं। जहां जब ये बूंदें गिरी थी उस स्थान पर तब कुंभ का आयोजन होता है। उन तीन नदियों के नाम है - गंगा, गोदावरी और क्षिप्रा।
  • अर्धकुंभ क्या है? - अर्ध का अर्थ है आधा। हरिद्वार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ का आयोजन होता है। पौराणिक ग्रंथों में भी कुंभ एवं अर्ध कुंभ के आयोजन को लेकर ज्योतिषीय विश्लेषण उपलब्ध है। कुंभ पर्व हर 3 साल के अंतराल पर हरिद्वार से शुरू होता है। हरिद्वार के बाद कुंभ पर्व प्रयाग नासिक और उज्जैन में मनाया जाता है। प्रयाग और हरिद्वार में मनाए जानें वाले कुंभ पर्व में एवं प्रयाग और नासिक में मनाए जाने वाले कुंभ पर्व के बीच में 3 सालों का अंतर होता है। यहां माघ मेला संगम पर आयोजित एक वार्षिक समारोह है।
  • सिंहस्थ क्या है? - सिंहस्थ का संबंध सिंह राशि से है। सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर उज्जैन में कुंभ का आयोजन होता है। इसके अलावा सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर कुंभ पर्व का आयोजन गोदावरी के तट पर नासिक में होता है। इसे महाकुंभ भी कहते हैं, क्योंकि यह योग १२ वर्ष बाद ही आता है। इस कुंभ के कारण ही यह धारणा प्रचलित हो गई की कुंभ मेले का आयोजन प्रत्येक १२ वर्ष में होता है, जबकि यह सही नहीं है।
  • हरिद्वार में कुंभ - हरिद्वार का सम्बन्ध मेष राशि से है। कुंभ राशि में बृहस्पति का प्रवेश होने पर एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर कुंभ का पर्व हरिद्वार में आयोजित किया जाता है। हरिद्वार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ का भी आयोजन होता है।
  • प्रयाग में कुंभ - प्रयाग कुंभ का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि यह १२ वर्षो के बाद गंगा, यमुना एवं सरस्वती के संगम पर आयोजित किया जाता है। ज्योतिषशास्त्रियों के अनुसार जब बृहस्पति कुंभ राशि में और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है तब कुंभ मेले का आयोजन प्रयाग में किया जाता है। अन्य मान्यता अनुसार मेष राशि के चक्र में बृहस्पति एवं सूर्य और चन्द्र के मकर राशि में प्रवेश करने पर अमावस्या के दिन कुंभ का पर्व प्रयाग में आयोजित किया जाता है। एक अन्य गणना के अनुसार मकर राशि में सूर्य का एवं वृष राशि में बृहस्पति का प्रवेश होनें पर कुंभ पर्व प्रयाग में आयोजित होता है। 
  • नासिक में कुम्भ - १२ वर्षों में एक बार सिंहस्थ कुंभ मेला नासिक एवं त्रयम्बकेश्वर में आयोजित होता है। सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर कुकुंभ पर्व गोदावरी के तट पर नासिक में होता है। अमावस्या के दिन बृहस्पति, सूर्य एवं चन्द्र के कर्क राशि में प्रवेश होने पर भी कुंभ पर्व गोदावरी तट पर आयोजित होता है।
  • उज्जैन में कुंभ - सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर यह पर्व उज्जैन में होता है। इसके अलावा कार्तिक अमावस्या के दिन सूर्य और चन्द्र के साथ होने पर एवं बृहस्पति के तुला राशि में प्रवेश होने पर मोक्षदायक कुंभ उज्जैन में आयोजित होता है।
  • कुंभ की कथा - अमृत पर अधिकार को लेकर देवता और दानवों के बीच लगातार बारह दिन तक युद्ध हुआ था। जो मनुष्यों के बारह वर्ष के समान हैं। अतएव कुंभ भी बारह होते हैं। उनमें से चार कुंभ पृथ्वी पर होते हैं और आठ कुंभ देवलोक में होते हैं। समुद्र मंथन की कथा में कहा गया है कि कुंभ पर्व का सीधा सम्बन्ध तारों से है। अमृत कलश को स्वर्गलोक तक ले जाने में जयंत को १२ दिन लगे। देवों का एक दिन मनुष्यों के १ वर्ष के बराबर है। इसीलिए तारों के क्रम के अनुसार हर १२वें वर्ष कुंभ पर्व विभिन्न तीर्थ स्थानों पर आयोजित किया जाता है। युद्ध के दौरान सूर्य, चंद्र और शनि आदि देवताओं ने कलश की रक्षा की थी, अतः उस समय की वर्तमान राशियों पर रक्षा करने वाले चंद्र-सूर्यादिक ग्रह जब आते हैं, तब कुंभ का योग होता है और चारों पवित्र स्थलों पर प्रत्येक तीन वर्ष के अंतराल पर क्रमानुसार कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है। अर्थात अमृत की बूंदे छलकने के समय जिन राशियों में सूर्य, चंद्रमा, बृहस्पति की स्थिति के विशिष्ट योग के अवसर रहते हैं, वहां कुंभ पर्व का इन राशियों में गृहों के संयोग पर आयोजन होता है। इस अमृत कलश की रक्षा में सूर्य, गुरु और चन्द्रमा के विशेष प्रयत्न रहे थे। इसी कारण इन्हीं गृहों की उन विशिष्ट स्थितियों में कुंभ पर्व मनाने की परम्परा है।
  • अमृत की ये बूंदें चार जगह गिरी थी - गंगा नदी (प्रयाग एवं हरिद्वार), गोदावरी नदी (नासिक), क्षिप्रा नदी (उज्जैन)। सभी नदियों का संबंध गंगा से है। गोदावरी को गोमती गंगा के नाम से पुकारते हैं। क्षिप्रा नदी को भी उत्तरी गंगा के नाम से जानते हैं। यहां पर गंगा गंगेश्वर की आराधना की जाती है। ब्रह्म पुराण एवं स्कंध पुराण के दो श्लोकों के माध्यम इसे समझा जा सकता है:
विन्ध्यस्य दक्षिणे गंगा गौतमी सा निगद्यते उत्त्रे सापि विन्ध्यस्य भगीरत्यभिधीयते।
एव मुक्त्वाद गता गंगा कलया वन संस्थिता गंगेश्वेरं तु यः पश्येत स्नात्वा शिप्राम्भासि प्रिये।।
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ये लेख हमें डॉक्टर विदुषी शर्मा से प्राप्त हुआ है। ये दिल्ली की निवासी हैं और वर्तमान में इंदिरा गाँधी मुक्त विश्वविद्यालय में ऐकडेमिक कॉउंसलर के पद पर नियुक्त हैं। साथ ही ये इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स आर्गेनाइजेशन, दिल्ली की महासचिव भी हैं। इनके कई लेख और रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमे २२ शोध, ५ पुस्तक अध्याय एवं १ ईबुक भी है। इन्होने करीब १७ अंतर्राष्ट्रीय एवं १८ राष्ट्रीय सम्मेलनों में हिस्सा लिया है और १५ से अधिक पुरस्कार प्राप्त कर चुकी हैं। इसके अतिरिक्त ये कई पत्रिकाओं और संस्थाओं की सदस्य भी हैं और राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद, उपराष्ट्रपति श्री वेंकैया नायडू, डॉक्टर किरण बेदी, हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री मनोहरलाल खट्टर एवं अन्य गणमान्य व्यक्तियों के समक्ष अपने शोध प्रस्तुत कर चुकी हैं। धर्मसंसार में इनके सहयोग के लिए हम इनके आभारी हैं।

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