9 जनवरी 2019

अयप्पा स्वामी

अयप्पा स्वामी भगवान शिव के छः पुत्रों में से एक हैं। उनके जन्म की कथा बहुत पहले महिषासुर के समय से शुरू होती है। महिषासुर की एक छोटी बहन थी महिषा। माँ दुर्गा द्वारा महिषासुर का वध करने के पश्चात उसने देवताओं से प्रतिशोध लेने के लिए ब्रह्माजी की घोर तपस्या की। ब्रह्मदेव उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए और वरदान माँगने को कहा। महिषी ने उनसे अमरत्व का वरदान माँगा किन्तु उन्होंने मना कर दिया। तब महिषी ने उनसे ये वरदान माँगा कि उनका वध केवल भगवान शिव और नारायण के पुत्र द्वारा ही संभव हो। ब्रह्मदेव ने उसे ये वरदान दे दिया और महिषी ने समझा की अब वो अमर हो गयी है क्यूंकि शिव और विष्णु का संयोग तो असंभव है। फिर उनका पुत्र कैसे पैदा होगा? ये वरदान प्राप्त कर वो दैत्या पृथ्वी पर उत्पात मचाने लगी। उसके वध के लिए देवता चिंतित हो गए किन्तु हरि और हर का संयोग कैसे संभव था? प्रकृति में जो कुछ भी होता है किसी ना किसी कारणवश होता है। उसी प्रकार नियति ने भी महिषी के अंत की प्रक्रिया आरम्भ कर दी थी।

एक बार भगवान शिव तपस्यारत थे तभी उनके मन में समुद्र मंथन के समय लिए गए भगवान विष्णु के मोहिनी स्वरुप का ध्यान हो आया। उसी समय भगवान विष्णु उनसे मिलने कैलाश पर पहुँचे। तब महादेव ने उनसे कहा कि उन्हें उनके मोहिनी रूप के दर्शन की परम अभिलाषा है। तब महादेव के अनुरोध पर भगवान विष्णु ने एक बार फिर उस परम सुन्दर मोहिनी रूप को धारण किया जिसे देख कर महादेव के मन में काम की भावना उत्पन्न हुई और उनका तेज स्खलित हो गया। उसी को "पारद" कहा गया और उसी से पारद शिवलिंग की उत्पत्ति हुई। उसी तेज के अंश से एक बालक का जन्म हुआ जिसे नारायण ने उसका नाम "सस्तव" रखा। हरि और हर का पुत्र होने के कारण उनका एक नाम "हरिहर" भी पड़ा। तब भगवान शिव उसके गले में एक स्वर्ण घण्टी बाँधी जिससे उनका एक नाम "मणिकंदन" भी पड़ा। मणि का अभिप्राय स्वर्ण घंटी से है और कंदन का अर्थ होता है गर्दन। उनके जन्म से देवता अत्यंत प्रसन्न हुए और उनकी स्तुति की। फिर शिव और श्रीहरि ने उसे पम्पा नदी के किनारे रख दिया और वापस अपने-अपने लोक लौट गए।

उसी समय पंडालम के राजा राजशेखर वहाँ आये और एक बच्चे को ऐसे अकेले देख कर उन्हें गोद ले लिया। वे संतानहीन थे इसीलिए जब वे सस्तव को लेकर अपने महल आये तो उनकी पत्नी उस संतान को पाकर अत्यंत प्रसन्न हुई। अयप्पा के प्रताप से राजशेखर के दिन बदले और थोड़े ही समय में उनकी रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया। अपना पुत्र हो जाने के बाद रानी का व्यव्हार अयप्पा के लिए बदल गया और अब वो उसे फूटी आँख नहीं सुहाता था। दूसरी और राजशेखर उन्हें अत्यंत प्रेम करते थे जिस कारण रानी को अयप्पा से ईर्ष्या होने लगी। उसे लगा कि प्रेमवश राजशेखर अवश्य ही अयप्पा को ही राज्य सौंप देंगे और उनका पुत्र उपेक्षित रह जाएगा। इसी कारण उसने अयप्पा को रास्ते से हटाने की सोची। उसने बीमारी का बहाना बनाया और जब अयप्पा ने उनसे पूछा तो उन्होंने कहा कि उनकी बीमारी केवल एक बाघिन का दूध पीने से ही ठीक हो सकती है। दरअसल महिषी राजशेखर के राज्य के सीमावर्ती जंगल में ही रह रही थी और रानी का उद्देश्य अयप्पा को उसके हाथों मरवा देना था। अयप्पा अपनी माँ का मन समझ तो गए लेकिन फिर भी अपनी माता की आज्ञा का पालन करने वे जंगल गए। 

वन में उन्हें एक बाघिन दिखी और वे उसका पीछा करते हुए वहाँ पहुँच गए जहाँ महिषी ने वर्षों से उत्पात मचा रखा था। जब उसने एक बालक को अपनी और आता देखा तो वो उसके प्राण लेने झपटी पर अयप्पा ने उससे युद्ध किया और उसका वध कर दिया। इस प्रकार महिषी का अंत शिव और विष्णु के पुत्र द्वारा हो गया। फिर उन्होंने उस बाघिन को अपने वश में किया और उसकी सवारी करते हुए नगर पहुँचे। जब से नगरवासियों ने अयप्पा के वन जाने की बात सुनी थी, वे बड़े चिंतित थे पर जब उन्होने अयप्पा को बाघिन पर सवारी करते हुए देखा तो सब उनकी जयजयकार करने लगे। जब उनकी माता ने अपने पुत्र का ऐसा प्रताप देखा तो बड़ी लज्जित हुई और उनसे क्षमा-याचना की। अयप्पा ने उन्हें क्षमा तो कर दिया किन्तु तब तक उनका मन पृथ्वी की मोह माया से ऊब चुका था। एक स्त्री का ऐसा व्यव्हार देख कर उन्होंने सदा ब्रह्मचारी रहने का निर्णय लिया और अपने पिता को शबरी में एक मंदिर बनाने का अनुरोध कर वे स्वर्ग चले गए। पृथ्वी पर मंदिर बनाने के पीछे उनका ये उद्देश्य था कि उनके पिता के लिए उनकी एक निशानी बनी रहे। अपने पुत्र की इच्छा अनुसार राजशेखर ने शबरी की पहाड़ियों में उसी जगह एक मंदिर का निर्माण करवाया जहाँ श्रीराम ने शबरी के बेर खाये थे। इसीलिए उस स्थान का नाम "शबरीमला" पड़ा। बाद में स्वयं भगवान परशुराम ने अयप्पा की मूरत का निर्माण किया और संक्रांति के दिन उसे मंदिर में स्थापित किया। तब से केरल के शबरीमलई में स्थित उनका ये मंदिर आस्था का केंद्र है। केरल में तो अयप्पा स्वामी की पूजा पुरातन काल से की जा रही है और १९वीं शताब्दी से उनका प्रभाव पुरे दक्षिण भारत में फैला है। चूँकि वे ब्रह्मचारी थे इसीलिए उनके मंदिर में युवतियों का प्रवेश वर्जित है। शबरीमला मंदिर के बारे में एक लेख अलग से प्रकाशित किया जाएगा। जय अयप्पा स्वामी।।

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