21 अप्रैल 2019

सप्तर्षि - परिचय एवं भूमिका

हिन्दू धर्म में सप्तर्षि वो सात सर्वोच्च ऋषि हैं जो ब्रह्मा के मानस पुत्र कहलाते हैं। कथाओं के अनुसार जब परमपिता ब्रह्मा ने इस सृष्टि की रचना की तब उन्होंने विश्व में ज्ञान के प्रसार के लिए अपने शरीर से ७ ऋषियों को प्रकट किया और उन्हें वेदों का ज्ञान देकर उस ज्ञान का प्रसार करने को कहा। ये ७ ऋषि ही समस्त ऋषिओं में श्रेष्ठ एवं अग्रगणी, 'सप्तर्षि' कहे जाते हैं। ब्रह्मा के अन्य पुत्रों जैसे मनु, प्रजापति इत्यादि का महत्त्व हो हैं ही किन्तु ब्राह्मणों के प्रणेता होने के कारण सप्तर्षिओं का महत्त्व सबसे अधिक माना जाता है।

19 अप्रैल 2019

रुक्मी - ३: बलराम से विवाद और मृत्यु

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार रुक्मी अपने बल का दम्भ भरते हुए पांडव और कौरव पक्ष की सहायता करने के लिए जाता है किन्तु उसके घमंड के कारण युधिष्ठिर और दुर्योधन दोनों उसकी सहायता लेने से मना कर देते हैं। इस प्रकार बलराम के अतिरिक्त वो आर्यावर्त का दूसरा ऐसा योद्धा बनता है जिसने महाभारत के युद्ध में भाग नहीं लिया था। अब आगे...

कृष्ण से पराजय के पश्चात उसने भोजकट को ही अपनी राजधानी बना लिया था और वही से विदर्भ का राज-काज संभालता था। कुण्डिनपुर में उसके पिता भीष्मक की छत्रछाया में उसका छोटा भाई रुक्मण भी उसकी सहायता करता था। बाद में उसने भीष्मक की सहमति से अपनी पुत्री रुक्मवती का विवाह श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ पुत्र प्रद्युम्न से कर दिया। प्रद्युम्न की पहले से एक पत्नी थी जिसका नाम माया था। किन्तु इतना करने के बाद भी उसे महाभारत के युद्ध में भाग लेने का अवसर नहीं मिला। अंततः उसकी सहायता के बिना ही युद्ध समाप्त हुआ और पांडव उस युद्ध में विजयी हुए।

17 अप्रैल 2019

रुक्मी - २: युद्ध में दोनों पक्षों ने ठुकराया

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि कैसे रुक्मी अपनी बहन रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल के साथ करना चाहता है किन्तु रुक्मिणी के विवाह के दिन ही श्रीकृष्ण उन्हें हर ले जाते हैं। रुक्मी उन्हें भोजकट में रोकता है और श्रीकृष्ण के साथ द्वन्द करता है जिसमे उसकी पराजय होती है। उस पराजय से वो इतना दुखी होता है कि लौटकर कुण्डिनपुर नहीं जाता और वहीँ भोजकट में ही अपनी राजधानी बना कर राज काज सँभालने लगता है। अब आगे...

15 अप्रैल 2019

रुक्मी - १: कृष्ण से बैर, युद्ध और पराजय

रुक्मी महाभारत का एक प्रसिद्ध पात्र है जो विदर्भ के राजा महाराज भीष्मक का सबसे बड़ा पुत्र था। महाराज भीष्मक के रुक्मी के अतिरिक्त रुक्मण सहित तीन अन्य पुत्र और रुक्मिणी नामक एक पुत्री थी। रुक्मी युवराज था और विदर्भ की राजधानी कुण्डिनपुर में अपने पिता की क्षत्रछाया में राज-काज संभालता था। बचपन से ही रुक्मी बहुत बलशाली और युद्ध विद्या में पारंगत था। किंपुरुष द्रुम उसके गुरु थे और उन्होंने रुक्मी को सभी प्रकार की युद्धकला में पारंगत किया था। इसके अतिरिक्त उसने भगवान परशुराम की कृपा से कई दिव्य अस्त्र भी प्राप्त किये थे। महाभारत में उसकी गिनती मुख्य अतिरथियों में की जाती है।

13 अप्रैल 2019

कालयवन - २: वरदान ने वरदान को काटा

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किसी प्रकार ऋषि शेशिरायण ने अपने अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए महादेव की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। उनकी कृपा से उन्हें एक ऐसे पुत्र की प्राप्ति हुई जो चंद्रवंशी या सूर्यवंशी द्वारा किसी भी अस्त्र अथवा शस्त्र से नहीं मारा जा सकता था। उसकी ख्याति सुनकर मलीच देश का राजा कालजंग उसे शेशिरायण से माँग कर ले गया। उसे उसने अपना पुत्र माना और कालयवन नाम दिया। इस प्रकार एक ब्राह्मणपुत्र एवं देश और यवनों का राजा बन गया। अब आगे...

11 अप्रैल 2019

कालयवन - १: ब्राह्मणपुत्र राक्षस बना

कालयवन महाभारत काल का एक योद्धा था जो यवनों का राजा था। नहुष के पुत्र ययाति के ५ पुत्र हुए और उन्ही से समस्त राजवंश चले। किन्तु पुरु को छोड़ कर ययाति ने किसी को भी एकछत्र सम्राट बनने का अधिकार नहीं दिया। उन्ही के एक पुत्र और पुरु के बड़े भाई 'द्रुहु' से म्लेच्छों का राजवंश चला। यवन भी द्रुहु के ही वंश में आते थे और उनका राज्य आर्यावर्त से बहुत दूर उजाड़ जगह पर अलग-थलग बसा हुआ था। अधिकतर लोगों को लगता है मुस्लिम ही प्राचीन काल में यवन थे किन्तु ऐसा नहीं है। हो सकता है इन्ही की कोई जाति से आगे चल कर मुस्लिम धर्म आरम्भ हुआ हो किन्तु मुस्लिम बहुत बाद में (लगभग ३५००-४०००) वर्ष बाद अस्तित्व में आये। 

9 अप्रैल 2019

लंका कैसे काली पड़ी?

रामायण का 'लंका दहन' प्रसंग उसके सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रसंगों में से एक है। आम धारणा है कि जब रावण ने महाबली हनुमान को बंदी बना कर उनकी पूछ में आग लगा दी तब उसी जलती हुई पूछ से हनुमान ने पूरी लंका में आग लगा दी। इससे पूरी लंका खण्डहर हो गयी जिसे बाद में रावण ने पुनः अपने स्वर्ण भंडार से पहले जैसा बसाया। हालाँकि इसके विषय में एक कथा हमें वाल्मीकि रामायण के साथ-साथ अन्य भाषाओँ की रामायण में भी मिलती है। इसके बारे में जो कथा प्रचलित है वो बजरंगबली और शनिदेव के संबंधों को भी दर्शाती है।

7 अप्रैल 2019

पुराणों में वर्णित पवन के प्रकार

पुराणों में पवनदेव की महत्ता के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। इंद्र, अग्नि, वरुण इत्यादि देवताओं के साथ पवनदेव भी मुख्य एवं सर्वाधिक प्रसिद्ध देताओं में से एक हैं। पवन को बल का भी प्रतीक माना जाता है क्यूंकि इसकी शक्ति के सामने बड़े-बड़े पर्वत भी नहीं टिक पाते। उल्लेखनीय है कि रुद्रावतार महावीर हनुमान और पाण्डवपुत्र महाबली भीमसेन भी पवन के ही अंशावतार थे।

सृष्टि में जीवन के लिए पवन का प्रवाह भी अति आवश्यक है। इसीलिए इसे प्राणवायु भी कहा जाता है क्यूंकि ये जीवों में जीवन का संचार करती है। पवन वैसे तो एक शब्द है लेकिन इसके भी कई प्रकार होते हैं। भौगोलिक रूप से तो पवन के कई प्रचलित प्रकार हैं जैसे व्यापारिक, पछुआ, ध्रुवीय इत्यादि किन्तु पौराणिक रूप से भी इसे ७ भागों में बांटा गया है। आइये इसके बारे में जानते हैं: 

5 अप्रैल 2019

पुरुरवा और उर्वशी की कथा: २ - उर्वशी की शर्त और देवताओं का छल

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार उर्वशी और पुरुरवा एक दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं किन्तु उर्वशी को स्वर्गलोग वापस जाना पड़ता है। पुरुरवा का ध्यान करते हुए स्वर्गलोक में हुए एक प्रहासन में उर्वशी से एक गलती हो जाती है जिस कारण भारत मुनि उसे पृथ्वीलोक में जाने का श्राप देते हैं। ये श्राप उर्वशी को वरदान के समान ही प्रतीत होता है और वो पृथ्वीलोक जाकर पुरुरवा से विवाह कर लेती है। अब आगे...

विवाह करने से पूर्व उर्वशी ने पुरुरवा से कहा कि उसकी तीन शर्तें हैं और अगर पुरुरवा उन्हें वचन देंगे कि वे उनकी तीन शर्तों को मानेंगे तभी उन दोनों का विवाह संभव है। पुरुरवा तो किसी भी स्थिति में उर्वशी से विवाह करना चाहते थे इसीलिए उन्होंने कहा कि वो जो कोई भी शर्त रखना चाहे रख सकती है। उनसे आश्वासन मिलने के बाद उर्वशी ने कहा: 

3 अप्रैल 2019

पुरुरवा और उर्वशी की कथा: १ - जब श्राप वरदान बना

ब्रह्मपुत्र मनु के एक पुत्र हुए जिनका नाम था इला। इला को पुरुष तथा स्त्री दोनों माना जाता है। अपने स्त्री रूप में इला ने चन्द्रमा और तारा (बृहस्पति की पत्नी) के अवैध पुत्र बुध से विवाह किया। इन्ही दोनों के पुत्र पुरुरवा हुए जिन्हे पुरुवंश का जनक माना जाता है। इन्ही के पुत्र आयु हुए, आयु के पुत्र नहुष और नहुष के पुत्र चक्रवर्ती सम्राट ययाति हुए जिनके पुत्रों से ही आगे समस्त कुल चले। पुरुरवा ने देवराज की सर्वश्रेठ अप्सरा उर्वशी से विवाह किया। इस तरह से उर्वशी पुरुवंश की राजमाता बनी।

1 अप्रैल 2019

नवरत्न

ज्योतिष शास्त्र में नवरत्नों का बड़ा महत्त्व है। इन नवरत्नों को नवग्रहों से जोड़ कर देखा जाता है। अलग-अलग ग्रहों से प्रभावित व्यक्तियों को अलग-अलग रत्नों को धारण करने की सलाह दी जाती है। हर रत्न के लिए एक विशेष मन्त्र भी है। कई बार रत्न काफी महंगे होते हैं इसी कारण इसके स्थान पर उपरत्नों को भी धारण किया जा सके ताकि निर्धन व्यक्ति भी इसका लाभ उठा सके। टूटा-फूटा, चिटका, दाग-धब्बेदार, रक्त या ताम्रवर्णीय मोती धारण करना हानिकारक होता है। तो आइये नवरत्नों के विषय में कुछ जानते हैं:

30 मार्च 2019

जब दुर्योधन ने सहदेव से युद्ध का मुहूर्त पूछा

महाभारत का युद्ध होना तय हो चुका था। अंतिम प्रयास के रूप में श्रीकृष्ण हस्तिनापुर गए किन्तु मूढ़ कौरवों ने उनका भी अपमान किया और उनके केवल ५ गाँव देने के प्रस्ताव को अभी अस्वीकार कर दिया। कृष्ण को तो खैर ये पता ही था कि ये युद्ध किसी भी स्थिति में टल नहीं सकता है किन्तु भीष्म और द्रोण ने दुर्योधन के हठ की ऐसी पराकाष्ठा देखी तो वे भी समझ गए कि कुरुवंश के नाश का समय अब आ गया है।

अब युद्ध की तैयारियाँ आरम्भ हो गयी और उसके लिए स्थान और दिन निश्चित करने की बात आयी। जब स्थान नियत करने का प्रश्न आया तो श्रीकृष्ण और भीष्म ने एक स्वर में कुरुक्षेत्र के सम्यक पञ्चक प्रदेश का चुनाव किया। ये वही स्थान था जहाँ भगवान परशुराम ने २१ बार क्षत्रियों का नाश करके उनके रक्त से पाँच सरोवर भर दिए थे। कौरवों और पांडवों के पूर्वज महाराज कुरु को देवराज इंद्र ने वरदान दिया था कि यहाँ जो भी मृत्यु को प्राप्त होगा, वे निश्चय ही स्वर्ग को प्राप्त करेगा। इसी कारण दोनों ने इस स्थान का चुनाव किया। कुछ समय में दोनों ओर की सेनाएँ कुरुक्षेत्र में उपस्थित हो गयी।

28 मार्च 2019

मकरध्वज

महाबली हनुमान को बाल ब्रह्मचारी कहा जाता है। हालाँकि पुराणों में उनके विवाह का वर्णन है जहाँ उन्हें भगवान सूर्यनारायण की पुत्री सुवर्चला से विवाह करना पड़ा था। किन्तु ये विवाह केवल उनकी शिक्षा पूर्ण करने के लिए था और इसके अतिरिक्त उन दोनों में कोई और सम्बन्ध नहीं रहा। इस बारे में आप विस्तार से यहाँ पढ़ सकते हैं। इसके अतिरिक्त हनुमान के एक पुत्र मकरध्वज का भी वर्णन रामायण में मिलता है। ये कथा तब आती है जब हनुमान श्रीराम और लक्ष्मण को अहिरावण की कैद से मुक्त करवाने जाते हैं। इसके बारे में आप विस्तार से यहाँ पढ़ सकते हैं।

संक्षेप में कथा ये है कि रावण अपने भाई अहिरावण को सहायता के लिए बुलाता है और अहिरावण अपनी माया से श्रीराम और लक्ष्मण का अपहरण कर लेता है। जब सबको पता चलता है कि श्रीराम और लक्ष्मण शिविर में नहीं हैं तो सभी चिंतित हो जाते हैं। विभीषण द्वारा ये पुष्टि करने पर कि दोनों भाइयों को अहिरावण ले गया है, हनुमान उन्हें मुक्त करवाने पाताल लोक पहुँचते हैं। जब वे पाताल लोक के मुख्य द्वार पर पहुँचते हैं तो उन्हें वहाँ एक वानर द्वार की रक्षा करते हुए दिखता है। 

26 मार्च 2019

पौराणिक घटनाओं का कालखंड

पौराणिक काल गणना के विषय में हम सब जानते हैं। इसमें १२००० दिव्य वर्षोंका एक चतुर्युग होता है जिसमे ४८०० दिव्य वर्ष का कृतयुग (सतयुग), ३६०० दिव्य वर्षका त्रेतायुग, २४०० दिव्य वर्षका द्वापरयुग और १२०० दिव्य वर्ष का कलियुग होता है। इसी गणना से ब्रह्माजी की आयु १०० वर्ष की होती है अर्थात् २ परार्ध (३११०४०००००००००० सौर वर्ष)। काल गणना और युगों की समय सीमा के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए निम्न लेखों को पढ़ें:
  1. कालचक्र और युगों का वर्णन
  2. हिन्दू काल गणना
  3. दशावतार

24 मार्च 2019

राक्षसराज सुकेश

राक्षसराज सुकेश राक्षस जाति के पूर्व पुरुषों में से एक है। वही एकलौता ऐसा राक्षस है जिसे स्वयं महादेव और माता पार्वती का पुत्र होने का गौरव प्राप्त है। पुराणों के अनुसार परमपिता ब्रह्मा से दो विकराल राक्षसों की उत्पत्ति हुई और वहीँ से राक्षस कुल का आरम्भ हुआ। उनका नाम था हेति और प्रहेति। प्रहेति सच्चरित्र था और तपस्या में लीन हो गया। हेति का विवाह यमराज की बहन भया से हुआ जिससे उन्हें विद्युत्केश नाम का पुत्र प्राप्त हुआ।

22 मार्च 2019

श्रीकृष्ण और ८ अंक

जिस प्रकार महाभारत में १८ अंक की विशेष महत्ता है उसी प्रकार श्रीकृष्ण के जीवन में भी ८ अंक का बहुत महत्त्व है। उनके जीवन के कई घटनाक्रम है जो ८ अंक से जुडी हुई हैं। आइये उनमे से कुछ जानते हैं:
  • श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के वें अवतार थे। 
  • उनका जन्म वें मनु वैवस्वत के कार्यकाल में हुआ। 
  • उनका जन्म रात्रि के वें प्रहर में हुआ। 
  • जब उनका जन्म हुआ तो उस लग्न पर ग्रहों (शनि को छोड़ कर अन्य नवग्रह) की शुभ दृष्टि थी। 
  • उनका जन्म रोहिणी नक्षत्र के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था। 

20 मार्च 2019

रावण संहिता - २

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि रावण को परमपिता ब्रह्मा और भगवान रूद्र से कई अवतार प्राप्त हुए किन्तु जो विशेष अवतार उसे प्राप्त हुआ वो था पृथ्वी के समस्त प्राणियों के तीन जन्मों का लेखा जोखा प्राप्त होना। इस कारण वो ये पहले ही जान गया था कि उसकी मृत्यु श्रीराम के हाथों ही होगी। अब आगे...

अपनी मृत्यु का कारण जानने के बाद उसने उसे बदलने का निश्चय किया। वो महान योद्धा था। नारायणास्त्र को छोड़कर विश्व के सभी दिव्यास्त्र उसके पास थे (हालाँकि पाशुपतास्त्र उसके लिए उपयोगी सिद्ध नहीं हुआ)। उसके बल का ऐसा प्रताप था कि युद्ध में उसने यमराज को भी पराजित किया और स्वयं नारायण के सुदर्शन चक्र को पीछे हटने पर विवश कर दिया। ब्रह्मा के वरदान से उसकी नाभि में अमृत था जिसके सूखने पर ही उसकी मृत्यु हो सकती थी। रूद्र के वरदान से उसका शीश चाहे कितनी बार भी काटो, उससे उसकी मृत्यु नहीं हो सकती थी। किन्तु इतना सब होने के बाद भी वो अजेय और अवध्य नहीं था। उसने निश्चय किया कि वो अपने पुत्र, जो अभी मंदोदरी के गर्भ में था, उसे अविजित और अवध्य बनाएगा।

18 मार्च 2019

रावण संहिता - १

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि रावण में चाहे जैसे भी अवगुण हों पर वो अपने समय का सबसे महान पंडित था। मातृकुल से राक्षस होने के बाद भी वो ब्राह्मण कहलाया क्यूंकि उसका पितृकुल ब्राह्मण था। वो परमपिता ब्रह्मा के पुत्र महर्षि पुलत्स्य का पौत्र और महर्षि विश्रवा पुत्र था। तो जो व्यक्ति इतना बड़ा पंडित हो वो अपना ज्ञान विश्व को अवश्य देना चाहता है। इसी कारण रावण ने कई ग्रंथों की रचना की जिसमे से 'शिवस्त्रोत्रताण्डव' एवं 'रावण संहिता' प्रमुख है। इस लेख में हम रावण द्वारा रचित महान ग्रन्थ रावण संहिता के विषय में जानेंगे। 

रावण संहिता विशेष रूप से 'कर्म फल' को बताती है। अर्थात इसमें मनुष्यों के कर्म फल का लेखा जोखा है। ये पुस्तक मुख्यतः ज्योतिष और तंत्र-मन्त्र पर आधारित है जो आपके सभी प्रकार के दुखों से मुक्ति का मार्ग बताती है। यहाँ एक बात विशेष रूप से बोलना चाहूँगा कि रावण संहिता में समस्त दुखों को मिटाने के किसी ज्योतिष एवं तांत्रिक उपाय (टोने-टोटके) का वर्णन मैं इस लेख में नहीं करूँगा क्यूंकि इस लेख का मुख्य उद्देश्य रावण संहिता के महत्त्व के बारे में हैं ना कि उसमे दिए गए उपायों के विषय में। अगर कोई उन उपायों के विषय में जानना चाहता हो तो वो गीताप्रेस द्वारा प्रकाशित वृहद् रावण संहिता पढ़ सकता है। 

16 मार्च 2019

जब ब्रह्मदेव ने बताया क्यों देवता दैत्यों से श्रेष्ठ हैं

एक बार देवर्षि नारद घूमते-घूमते अपने पिता के पास ब्रह्मलोक पहुँचे। वहाँ परमपिता ने उनका स्वागत किया और उनके आने का उद्देश्य पूछा। तब नारद ने कहा - "हे पिताश्री! आप इस समस्त संसार के जनक हैं। सृष्टि में जो कुछ भी है उनकी उत्पत्ति आपसे ही हुई है। देव और दैत्य दोनों आपके पौत्र महर्षि कश्यप की संतानें हैं। जिस प्रकार कश्यप की पत्नी अदिति से देवों की उत्पत्ति हुई है, उसी प्रकार उनकी पत्नी दिति से दैत्यों की। दिति अदिति की अग्रज है इसी कारण दैत्य देवताओं के बड़े भाई हुए। इसके अतिरिक्त बल में भी वे देवताओं से बढ़कर ही हैं। फिर क्या कारण है कि आज जहाँ देवता स्वर्ग में समस्त सुख भोग रहे हैं, वहीं दैत्य पाताल में निवास करने को विवश हैं। महादेव के विषय में तो मैं नहीं कह सकता किन्तु आपने और नारायण ने सदैव देवों को ही श्रेष्ठ समझा है। मैं इसका कारण समझने में असमर्थ हूँ। कृपया बताइये कि क्यों आप और श्रीहरि देवों को दैत्यों से श्रेष्ठ समझते हैं?"

12 मार्च 2019

रावण का मानमर्दन १: दैत्यराज बलि

चित्र के लिए आभार - वेबदुनिया
रावण की वीरता के किस्से तो सबने सुने होंगे किन्तु कई ऐसी अवसर थे जब रावण को भी पराजय का सामना करना पड़ा। इसी को ध्यान में रखकर मैंने 'रावण का मानमर्दन' नाम की श्रृंखला लिखने का निश्चय किया है जिसमे विभिन्न योद्धाओं द्वारा रावण की पराजय का वर्णन है। इस पहली कथा में हम आपको बताएँगे कि किस प्रकार रावण अपनी शक्ति के मद में दैत्यराज बलि से उलझा और उसे मुँह की खानी पड़ी। महाराज बलि के विषय में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ। 

10 मार्च 2019

संध्यावंदन एवं उपचार

हिन्दू धर्म में पूजा एवं संध्यावंदन का महत्वपूर्ण स्थान है। प्रतिदिन संध्यावंदन करने से मनुष्य को इष्ट वस्तुओं की प्राप्ति होती है और साथ ही ये हमें शांति भी प्रदान करती है। हिन्दू धर्म में सन्ध्योपासना के ५ प्रकार बताये गए हैं जो इस प्रकार हैं:
  1. संध्या वंदन
  2. प्रार्थना 
  3. ध्यान 
  4. कीर्तन 
  5. आरती

8 मार्च 2019

भीष्म के १२ नाम

  1. देवव्रत: ये उनका असली नाम था जो उन्हें उनकी माता गंगा ने दिया था। भीष्म प्रतिज्ञा लेने तक वे इसी नाम से जाने जाते रहे। 
  2. भीष्म: ये नाम उन्हें उनकी प्रतिज्ञा के कारण प्राप्त हुआ जो उन्होंने सदैव ब्रह्मचारी रहने के लिए की थी। भीष्म का अर्थ होता है भीषण और उनकी भीषण प्रतिज्ञा के कारण देवताओं और शांतनु से उन्हें ये नाम प्राप्त हुआ। 
  3. गंगापुत्र: ये नाम उन्हें गंगा का पुत्र होने के कारण प्राप्त हुआ।  
  4. शान्तनव: ये नाम उन्हें शांतनु का पुत्र होने के कारण प्राप्त हुआ। 
  5. पितामह: कुरुवंश के वयोवृद्ध होने के कारण उन्हें ये नाम प्राप्त हुआ। 

6 मार्च 2019

महर्षि जैमिनी की शंका और ४ पक्षियों द्वारा उसका निवारण - २

पिछली कथा में आपने पढ़ा कि जैमिनी मुनि के मन में महाभारत और श्रीकृष्ण को लेकर भ्रम उत्पन्न हो गया। वे उसके निवारण हेतु मार्कण्डेय ऋषि के पास गए। उन्होंने जैमिनी मुनि को महर्षि शमीक के आश्रम रह रहे पिंगाक्ष, निवोध, सुपुत्र और सुमुख नामक ४ पक्षियों के पास जाने को कहा। उधर उन पक्षियों ने ऋषि शमीक से ये पूछा कि वे चारो मनुष्यों की भाषा कैसे बोल लेते हैं। तब शमीक ऋषि ने उन्हें उनके पिछले जन्म की कथा सुनाई। अब आगे... 

4 मार्च 2019

त्रिपुर संहार - महादेव कैसे कहलाये त्रिपुरारि

आप सभी को महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें। आज भोलेनाथ का दिन है इसीलिए उनपर एक लेख प्रकाशित करना चाह रहा था। महाशिवरात्रि पर एक विस्तृत लेख धर्मसंसार पर पहले ही प्रकाशित हो चुका है जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं। आज हम आपको उन तीन प्रसिद्ध पुरों के बारे में बताएँगे जिन्हे "त्रिपुर" कहा जाता था और जिसका विनाश स्वयं महादेव ने किया और "त्रिपुरारि" कहलाये।

2 मार्च 2019

महर्षि जैमिनी की शंका और ४ पक्षियों द्वारा उसका निवारण - १

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था और पांडव एवं श्रीकृष्ण निर्वाण को प्राप्त हो चुके थे। उस समय एक ऋषि थे उनका नाम था जैमिनी। जब उन्होंने महाभारत का विवरण जाना तो उनके मन में श्रीकृष्ण, पांडव एवं उस महायुद्ध के विषय में संदेह उत्पन्न हो गया। वे अपनी शंका के समाधान के लिए कई महात्माओं से मिले पर कोई उनके संदेह का निवारण नहीं कर सका। फिर वे विचरण करते हुए मार्कण्डेय ऋषि के पास पहुँचे। 

28 फ़रवरी 2019

कैसे सहदेव बने त्रिकालदर्शी

पांडवों के गुणों की जितनी भी प्रसंशा की जाये वो कम है। सभी पांडव महान योद्धा और उच्च चरित्र वाले व्यक्ति थे। साथ ही सभी में कोई ना कोई विशेष गुण अवश्य था। युधिष्ठिर धर्मराज थे और उसके विरुद्ध कोई कार्य नहीं करते थे। भीम उस युग के सर्वाधिक बलशाली व्यक्ति थे। अर्जुन जैसा धनुर्धर उस समय कोई और नहीं था। नकुल उस काल के सर्वाधिक सुन्दर व्यक्ति थे और सहदेव की भांति सहनशीलता विश्व में किसी और के पास नहीं थी। लेकिन इसके अतिरिक्त सहदेव के पास एक ऐसी शक्ति थी जो किसी अन्य पांडवों के पास नहीं थी। वे त्रिकालदर्शी थे और भूत, वर्तमान और भविष्य में होने वाली घटनाओं का पूर्ण ज्ञान रखते थे। लेकिन उनकी ये शक्ति जन्मजात नहीं थी बल्कि ये उन्हें अपने पिता के आशीर्वाद स्वरूप मिली थी।

26 फ़रवरी 2019

वो घटना जिसने कर्ण के प्रति दुर्योधन के अटूट विश्वास को सिद्ध किया

अगर महाभारत की बात की जाये तो जब भी मैत्री का नाम आता है तो हमें कृष्ण और सुदामा या अर्जुन और कृष्ण की मैत्री की याद आती है। लेकिन एक मित्र जोड़ी ऐसी भी है जिनकी मैत्री कही से भी कम नहीं दिखती है। वो है दुर्योधन एवं कर्ण की मित्रता। ये अवश्य है कि दोनों अधर्म के पक्ष में खड़े दीखते हैं लेकिन उससे दोनों की मैत्री का महत्त्व तनिक भी कम नहीं होता। कई लोग दुर्योधन पर ये आक्षेप लगा सकते हैं कि उसने कर्ण को अंगदेश का राजा इसीलिए बनाया ताकि उसके पास अर्जुन के समकक्ष कोई योद्धा हो। कदाचित ये सही भी हो किन्तु दोनों ने जीवन भर अपनी उस मित्रता को निभाया। दोनों की मित्रता के वैसे तो कई किस्से हैं लेकिन आज हम जिस घटना के बारे में बताने जा रहे हैं वो निश्चित रूप से इस बात को सिद्ध करता है कि दुर्योधन को कर्ण पर कितना अधिक विश्वास था।

24 फ़रवरी 2019

शक्तिपीठ और भैरव

पिछले लेख में आपने शक्तिपीठों के बारे में पढ़ा था। भैरव भी उन्ही से सम्बंधित हैं। कहा जाता है कि जब माता के ५१ भागों से ५१ शक्तिपीठों की स्थापना हुई तो उन सभी शक्तिपीठों की रक्षा के लिए भगवान शिव ने अपने अंश से ५१ भैरवों को प्रकट किया। ये सभी भैरव उन शक्तिपीठों में स्थापित माताओं की एक पुत्र की भांति रक्षा करते हैं। 

22 फ़रवरी 2019

शक्तिपीठ

हिंदू धर्म में हिंदू धर्म में शक्तिपीठों का बहुत महत्व है। दक्ष के यज्ञ में जब सती ने आत्मदाह किया तब महारुद्र ने वीरभद्र को भेजकर यज्ञ का ध्वंस करवा दिया। फिर वे सती का मृतशरीर उठा कर इधर-उधर घूमने लगे। महादेव को इस प्रकार व्यथित देख कर ब्रह्माजी के सुझाव पर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के ५१ खंड कर दिए। वे अंग जहाँ-जहाँ भी गिरे वो स्थान शक्तिपीठ कहलाया। ये पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैले हुए हैं (सबसे अधिक पश्चिम बंगाल में)। तो आज हम यह जानने का प्रयास करते हैं कि जब सती के शव को भगवान शिव अपने कंधे पर उठाकर ले जा रहे थे तो उनके अंग कहां - कहां गिरे और वहां पर कौन-कौन सी शक्तिपीठ स्थापित हुए।

20 फ़रवरी 2019

जब देवर्षि नारद को माया का भ्रम हो गया

एक बार देवर्षि नारद घूमते-घूमते बैकुंठ पहुंचे। वहाँ उन्होंने श्रीहरि विष्णु से पूछा कि "हे भगवन! संसार आपको मायापति कहता है किन्तु ये माया है क्या? मनुष्य क्यों सदैव माया के बंधन में जकड़ा होता है और व्यर्थ दुखी रहता है? जबकि बंधु-बांधव, धन संपत्ति आदि तो केवल मिथ्या है। अगर मनुष्यों को भी वैसा ज्ञान हो जाये जैसा हम देवताओं को होता है तो उन्हें इन व्यर्थ चीजों का दुःख नहीं होगा।" देवर्षि की ऐसी गर्व भरी बातें सुनकर भगवान विष्णु मुस्कुराये और कहा - "कोई बात नहीं। समय आने पर माया क्या है ये तुम्हे समझ आ जाएगा।"

18 फ़रवरी 2019

ऋषि मैत्रेय

ऋषि मैत्रेय महाभारत कालीन एक महान ऋषि थे। ये महर्षि पराशर के प्रिय शिष्य और और उनके पुत्र वेदव्यास के कृपा पात्र थे। इन्होने ही दुर्योधन को श्राप दिया था जिससे उसकी मृत्यु भीमसेन के हाथों हुई। इनका नाम इनकी माता "मित्रा" के नाम पर पड़ा और इन्हे अपने पिता "कुषरव" के कारण कौषारन भी कहा जाता है। वैसे तो इन्हे महर्षि पराशर ने समस्त वेदों और पुराणों की शिक्षा दी थी किन्तु ये विशेषकर विष्णु पुराण के महान वक्ता के रूप में विश्व प्रसिद्ध थे। युधिष्ठिर ने अपने राजसू यज्ञ में इन्हे भी आमंत्रित किया था।

16 फ़रवरी 2019

जब ऋषि मार्कण्डेय ने उर्वशी का मान भंग किया

उर्वशी के विषय में हम सभी जानते है। वो देवराज इंद्र की सबसे  सुन्दर अप्सरा और अन्य अप्सराओं की प्रमुख थी। पृथ्वी महान ऋषिओं-मुनिओं से भरी हुई थी और जब भी कोई मनुष्य घोर तपस्या करता था, देवराज इंद्र अपनी कोई अप्सरा उसकी तपस्या भंग करने के लिए भेज देते थे। कदाचित अपने सिंहासन के लिए वे कुछ अधिक ही चिंतित रहते थे। उनकी ही एक अप्सरा मेनका ने राजर्षि विश्वामित्र की तपस्या भंग कर दी थी। स्वयं उर्वशी ने पुरुओं के पूर्वज पुरुरवा की तपस्या भंग की और उनके साथ विवाह भी किया जिससे उन्हें आयु नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। इसी उर्वशी ने ऋष्यश्रृंग के पिता ऋषि विभाण्डक की तपस्या तब भंग की जब अन्य अप्सराएं हार मान बैठी। एक तरह से कहा जाये तो उर्वशी देवराज इंद्र का अचूक अस्त्र थी। किन्तु उर्वशी को भी एक बार मुँह की खानी पड़ी।

14 फ़रवरी 2019

जब रावण और हनुमान के बीच शर्त लगी

जैसा कि हम जानते हैं कि रावण निःसंदेह एक महान योद्धा था। उसने अपने शासन में सातों द्वीपों को जीत लिया था। उसे ब्रह्मा का वरदान प्राप्त था। उसने देवताओं को परास्त किया और नवग्रह उसके राजसभा की शोभा बढ़ाते थे। यहाँ तक कि वो शनि के सर पर अपना पैर रख कर बैठा करता था। यहाँ तक कि उसने भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र को वापस लौटने पर मजबूर कर दिया था। उसका वीर रूप ऐसा था कि उसके साथ अपने अंतिम युद्ध करते समय स्वयं श्रीराम ने कहा था कि आज रावण जिस रौद्ररूप में है कि उसे पराजित करना समस्त देवताओं के साथ स्वयं देवराज इंद्र के लिए भी संभव नहीं है। जाहिर था कि इतना बलशाली रावण सदैव अपने वीर रस में ही डूबा रहता था। इसी कारण उसे वानरराज बालि और कर्त्यवीर अर्जुन के हाथों पराजय का सामना भी करना पड़ा था लेकिन उसने उन दोनों से कोई बैर नहीं रखा और बालि के साथ उसकी मित्रता तो विश्व प्रसिद्ध थी। उसका इतना अधिक बल ही वास्तव में उसके अभिमान और पतन का कारण बना। 

12 फ़रवरी 2019

क्या आपको महादेव की बहन के बारे में पता है?

भगवान शिव के परिवार के बारे में हम सभी जानते हैं। उनकी पत्नी देवी पार्वती, पुत्र कार्तिकेय एवं गणेश तो प्रसिद्ध है ही, साथ ही साथ उनकी पुत्री अशोकसुन्दरी के बारे में भी जानने को मिलता है। इसके अतिरिक्त उनके अन्य चार पुत्रों (सुकेश, जालंधर, अयप्पा और भूमा) के विषय में भी पुराणों में जानकारी मिलती है। लेकिन क्या आपको महादेव की बहन के बारे में पता है? पुराणों और लोक कथाओं में भगवान शिव की बहन "असावरी देवी" के बारे में भी वर्णन मिलता है जिन्हे स्वयं महादेव ने देवी पार्वती के अनुरोध पर उत्पन्न किया था। तो आइये आज महादेव की बहन के विषय में जानते हैं। 

10 फ़रवरी 2019

सरस्वती, लक्ष्मी एवं गंगा का विवाद

आप सबको वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनायें। पिछले वर्ष इस अवसर पर हमने देवी सरस्वती पर एक लेख प्रकाशित किया था जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं। इस वर्ष हमने सोचा देवी सरस्वती पर कोई विशेष जानकारी लेकर आपके सामने आएं। तो आज हम आपको देवी सरस्वती और देवी गंगा के बीच हुए एक विवाद के विषय में बताएँगे। इस कथा का विवरण कुछ पौराणिक ग्रंथों में मिलता है।

7 फ़रवरी 2019

पूजा सम्बंधित १० महत्वपूर्ण जानकारियाँ

  1. पूजागृह में दो शिवलिंग, तीन गणेश, दो शंख, दो सूर्य प्रतिमा, तीन देवी प्रतिमा, दो गोमती चक्र या दो शालिग्राम का पूजन नहीं करना चाहिए। 
  2. घर में ९ इंच (२२ सेंटीमीटर) या उससे छोटी प्रतिमा होनी चाहिए। इससे बड़ी प्रतिमा घर के लिए शुभ नहीं होती है। उसे मंदिर में ही स्थापित करना चाहिए। 
  3. देवी की १ बार, सूर्य की ७ बार, गणेश की ३ बार, विष्णु की ४ बार तथा शिव की आधी परिक्रमा करनी चाहिए।

5 फ़रवरी 2019

मौनी अमावस्या

मौनी अमावस्या का वर्णन कुम्भ के सन्दर्भ में मिलता है। जब अमृत को बचाने के लिए जब धन्वन्तरि कलश लेकर भागे, अमृत की कुछ बूंदें पृथ्वी पर ४ स्थानों पर गिरी जहाँ आज कुम्भ का आयोजन किया जाता है। वे हैं प्रयाग, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन। मौनी अमावस्या को अत्यंत ही शुभ माना जाता है। इस दिन मौन रहकर स्नान करने की प्रथा बहुत पुरानी है। आज के दिन गंगास्नान कई गुणा अधिक फल देता है। यदि ये तिथि सोमवार को पड़े तो इसका महत्त्व बहुत ही बढ़ जाता है और अगर उस समय कुम्भ का ही आयोजन हो रहा हो तब तो मौनी अमावस्या को गंगास्नान का अर्थ एक प्रकार से अमृत में नहाने के समान है। सौभाग्य से इस वर्ष ऐसा ही संयोग पड़ा है जब मौनी अमावस्या सोमवार को है और प्रयाग महाकुम्भ का आयोजन हो रहा है। आइये इसके विषय में कुछ जानते हैं:

3 फ़रवरी 2019

देवर्षि नारद द्वारा प्रह्लाद को गर्भ में दिया गया उपदेश

महाभारत में देवर्षि नारद और युधिष्ठिर का एक संवाद है जहाँ देवर्षि नारद उन्हें भक्तराज प्रह्लाद के विषय में एक अनोखी बात बताते हैं। बात तब की है जब हिरण्यकशिपु तपस्या करने वन में चला गया। उसकी पत्नी कयाधु उस समय गर्भवती थी। हिरण्यकशिपु के जाने के बाद उस अवसर का लाभ उठा कर देवों ने दैत्यों पर आक्रमण कर दिया। जब दैत्य सेनापतियों को देवताओं की भारी तैयारी का पता चला तो उनका साहस जाता रहा। वे उनका सामना नहीं कर सके। मार खाकर स्त्री, पुत्र, मित्र, गुरुजन, महल, पशु और साज-सामान की कुछ चिन्ता न करके वे अपने प्राण बचाने के लिये बड़ी जल्दी में इधर-उधर भाग गये। अपनी जीत चाहने वाले देवताओं ने राजमहल को नष्ट कर दिया और देवराज इन्द्र ने हिरण्यकशिपु की पत्नी कयाधु को भी बन्दी बना लिया।

1 फ़रवरी 2019

जब भीम ने युधिष्ठिर को धर्म ज्ञान दिया

महाभारत में भीम को मुख्यतः बल का प्रतीक माना जाता है। उनकी बुद्धि के विषय में ज्यादा चर्चा नहीं की जाती। जबकि सत्य ये है कि वो जितने बलशाली थे उतने ही बुद्धिमान भी थे। उससे भी अधिक कहा जाये तो वे अत्यंत स्पष्टवादी थे। कदाचित ही महाभारत में कोई ऐसा पात्र है जो उतना स्पष्टवादी हो। वैसे तो उनकी स्पष्टवादिता के कई उदाहरण है लेकिन एक कथा ऐसी भी है जिसके द्वारा उन्होंने युधिष्ठिर को उनके कर्तव्य की याद दिलाई। इससे ये भी सिद्ध होता है कि वे सही चीज के लिए अपने भाइयों को भी नहीं छोड़ते थे। 

30 जनवरी 2019

नागा साधु

महाकुंभ, अर्धकुंभ या फिर सिंहस्थ कुंभ में आपने नागा साधुओं को जरूर देखा होगा। इनको देखकर आप सभी के मन में अक्सर यह सवाल उठते होंगे कि आखिर कौन हैं ये नागा साधु? कहाँ से आते हैं? और कुंभ खत्म होते ही कहां चले जाते हैं? आइए आज हम लोग चर्चा करते है हिंदू धर्म के इन सबसे रहस्यमयी लोगों के बारे में। 

"नागा" शब्द बहुत पुराना है। यह शब्द संस्कृत के "नग" शब्द से निकला है, जिसका अर्थ "पहाड़" होता है। इस पर रहने वाले लोग पहाड़ी या नागा कहलाते हैं। नागा का अर्थ "नग्न" रहने वाले व्यक्तियों से भी है। भारत में नागवंश और नागा जाति का बहुत पुराना इतिहास है। शैव पंथ से कई संन्यासी पंथों और परंपराओं की शुरुआत मानी गई है। भारत में प्राचीन काल से नागवंशी, नागा जाति और दसनामी संप्रदाय के लोग रहते आए हैं। उत्तर भारत का एक संप्रदाय "नाथ संप्रदाय" भी दसनामी संप्रदाय से ही संबंध रखता है। नागा से तात्पर्य एक बहादुर लड़ाकू व्यक्ति से लिया जाता है।

28 जनवरी 2019

माता अनुसूया

ब्रह्मा के दाहिने भाग से स्वयंभू मनु उत्पन्न हुए जिनका विवाह ब्रह्मा के वाम अंग से उत्पन्न होने वाली शतरूपा से हुआ। इन दोनो की पाँच संताने थी। दो पुत्र प्रियव्रत एवं उत्तानपाद और तीन पुत्रियाँ - आकूति, देवहूति एवं प्रसूति। आकूति का विवाह रूचि प्रजापति एवं प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति के साथ हुआ। देवहुति का विवाह कर्दम ऋषि से हुआ जिनसे उन्हें एक पुत्र - कपिल मुनि और नौ कन्याएं प्राप्त हुई - कला, अनुसूया, श्रद्धा, हविर्भू, गति, क्रिया, ख्याति, अरुंधती एवं शांति।

26 जनवरी 2019

जब हनुमान को विवाह करना पड़ा - सती सुवर्चला के महान त्याग की कथा

जब आप हैदराबाद से करीब २२५ किलोमीटर दूर आँध्रप्रदेश के खम्मम जिले में पहुँचते है तो एक ऐसा मंदिर मिलता है जो आपको हैरान कर सकता है। क्यूँकि ये विश्व का एकलौता ऐसा मंदिर है जहाँ पवनपुत्र हनुमान अपनी पत्नी सुवर्चला के साथ विराजमान हैं। अब आप ये प्रश्न कर सकते हैं कि हनुमान तो बाल ब्रह्मचारी हैं। फिर उनकी पत्नी कैसे हो सकती है। वैसे आप भी अपनी जगह ठीक हैं क्यूँकि जब आप वाल्मीकि रामायण या तुलसीदास कृत रामचरितमानस पढ़ते हैं तो बजरंगबली के विवाह का कोई वर्णन नहीं आता। इन दोनों ग्रंथों में हनुमान को बाल ब्रह्मचारी ही बताया गया है। लेकिन अगर आप महर्षि पराशर द्वारा रचित "पराशर संहिता" पढ़ते हैं तो आपको हनुमान के विवाह का प्रसंग पता चलता है। आज हम उसी प्रसंग के बारे में आपको बताने वाले हैं।

24 जनवरी 2019

चौरासी लाख योनियों का रहस्य

हिन्दू धर्म में पुराणों में वर्णित ८४००००० योनियों के बारे में आपने कभी ना कभी अवश्य सुना होगा। हम जिस मनुष्य योनि में जी रहे हैं वो भी उन चौरासी लाख योनियों में से एक है। अब समस्या ये है कि कई लोग ये नहीं समझ पाते कि वास्तव में इन योनियों का अर्थ क्या है? ये देख कर और भी दुःख होता है कि आज की पढ़ी-लिखी नई पीढ़ी इस बात पर व्यंग करती और हँसती है कि इतनी सारी योनियाँ कैसे हो सकती है। कदाचित अपने सीमित ज्ञान के कारण वे इसे ठीक से समझ नहीं पाते। गरुड़ पुराण में योनियों का विस्तार से वर्णन दिया गया है। तो आइये आज इसे समझने का प्रयत्न करते हैं। 

22 जनवरी 2019

शाकम्भरी जयंती

दुर्गम नाम का एक दैत्य था। हिरण्याक्ष के वंश में वह पैदा हुआ था और उसके पिता का नाम रुरु था। वो देवताओं से शत्रुता रखता था और देवताओं को कष्ट देने के लिए उसने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप आरम्भ कर दिया। तपस्या का फल देने आए ब्रह्मा जी ने उसे वरदान मांगने के लिए कहा। तब उस दैत्य ने ब्रह्मा जी से कहा सारे वेद मंत्र मेरे आधीन हो जाए। ब्रह्मा जी उसे तपस्या का वरदान देते हुए अंतर्ध्यान हो गए। उस दैत्य को पता था कि देवताओं की शक्ति वेद मंत्र है। ब्राह्मण जब वेद मंत्रों का उच्चारण करते हुये अग्नि में आहुति देते हैं उसी आहुति से देवताओं की शक्ति बढ़ती है। उस दैत्य ने वेद मंत्रों को छुपा दिया। वेद मंत्रों के अदृश्य हो जाने पर ब्राह्मण वेद मंत्रों को भूल गए। संध्या, देव पूजा, पितृ तर्पण आदि के आभाव में ब्राह्मण वैदिक मार्ग से भ्रष्ट हो गए। ब्राह्मणों के धर्म विहीन हो जाने पर देवताओं की शक्ति समाप्त हो गई।  तब उस दैत्य ने स्वर्ग पर आक्रमण किया और शक्तिहीन देवता स्वर्ग त्याग कर हिमालय की कन्दराओं में छुप गये।

19 जनवरी 2019

कृष्ण का वो पुत्र जिसके कारण सम्पूर्ण यदुवंश का नाश हो गया

साम्ब कृष्ण और उनकी दूसरी पत्नी जांबवंती के ज्येष्ठ पुत्र थे जिसका विवाह दुर्योधन की पुत्री लक्ष्मणा से हुआ था। जब महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ तो गांधारी ने कृष्ण को इसका दोषी मानते हुए यदुकुल के नाश का श्राप दे दिया जिसे कृष्ण ने सहर्ष स्वीकार किया। उन्होंने ये भी कहा कि समय आने पर वे और बलराम स्वयं यदुकुल का नाश कर देंगे। हालाँकि किसी ने उस समय ये नहीं सोचा था कि कृष्ण के कुल का नाश उनके अपने पुत्र साम्ब के कारण होगा। महाभारत को समाप्त हुए ३६ वर्ष बीत चुके थे। एक बार महर्षि दुर्वासा एवं अन्य ऋषि द्वारका पधारे। ऋषियों का इतना बड़ा झुण्ड देख कर साम्ब और उनके मित्रों ने उनसे ठिठोली करने की सोची।

17 जनवरी 2019

कुम्भ मेला

इस वर्ष की मकर संक्रांति अत्यंत पवित्र और शुभ है क्यूंकि उसके आरम्भ के साथ ही महाकुम्भ का भी शुभारम्भ हुआ। तो आज हम बात करते हैं कुंभ मेले की या कुंभ पर्व की। हिंदू धर्म में कुंभ पर्व बहुत ही धूमधाम से मनाया जाने वाला पर्व है। यह एक ऐसा पर्व है जो वैज्ञानिक होने के साथ-साथ पूर्ण प्रमाणिकता लिए हुए है। यह बहुत ही प्रामाणिक है और जिस प्रकार हमारी १२ राशियां है उसी के अनुसार ग्रहों की चाल एवं उनका समय निश्चित है।

15 जनवरी 2019

विजेता - धार्मिक कहानी प्रतियोगिता २ - "भक्तवत्सला शीतला माता"

एक बार देवर्षि नारद "नारायण! नारायण!" का जाप करते हुए तीनों लोकों की यात्रा पर निकले। सभी देवों के दर्शन करते हुए "शीतला माता" के धाम पहुँचे। ध्यान-मुद्रा में बैठी मातारानी को मुस्कुराते हुए देख विस्मित महर्षि ने अभिवादन के साथ ही कहा -"माँ! आज तो आपके मुख पर अद्वितीय तेज और प्रसन्नता झलक रही है। कौन है, जिसने आपके मुख पर प्रसन्नता बिखेर दी है?" माता ने उसी स्मित हास्य के साथ कहा - वत्स! एक निश्छल हृदय भक्त के अतिरिक्त और कौन हो सकता है?" तब महर्षि ने आश्चर्य से पूछा - "माता! आपके तो असंख्य भक्त हैं। फिर ऐसा कौन भक्तविशेष है जो आपके ह्रदय के इतने समीप है?" इसपर देवी ने कहा - "देवर्षि! कुण्डिनपुर में रहने वाली निर्मला ने अपनी सच्ची व निस्पृह भक्ति से मेरे हृदय को जीत लिया है।" तब देवर्षि ने मुस्कुराते हुए कहा - "अगर आज्ञा हो तो मैं भी आपकी इस विशेष भक्त से मिल आऊं।" तब देवी ने हँसते हुए कहा - "देवर्षि! मैं आपकी प्रकृति से अनभिज्ञ नहीं हूँ। मैं जानती हूँ कि आप निर्मला की परीक्षा लेना चाहते हैं। अगर ऐसा है तो आप अवश्य अपने मन की करें।"