17 अगस्त 2019

राघवयादवीयम् (श्लोक २६ - ३०)

श्लोक २६

अनुलोम (रामकथा)

सागरातिगम् आभातिनाकेशः असुरमासहः।
तं सः मारुतजं गोप्ता अभात् आसाद्य गतः अगजम् ॥ २६॥

अर्थात: समुद्र लांघ कर सहयाद्री पर्वत तक जा समुद्र तट तक पहुंचने वाले हनुमान जैसे दूत होने के कारण इंद्र से भी अधिक प्रतापी, असुरों की समृद्धि के लिए असहनशील उन रक्षक श्रीराम की कीर्ति में वृद्धि हो गई।

15 अगस्त 2019

रक्षा बंधन

आप सभी को रक्षाबंधन एवं स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें। रक्षाबंधन एक अति प्राचीन पर्व है जो हर वर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इस पर्व में बहनें अपने भाइयों के हाथ में रेशम के धागों का एक सूत्र बाँधती है और उसकी रक्षा की कामना करती है। बदले में भाई भी सदैव अपनी बहन की रक्षा का वचन देता है। ये साधारण सा बंधन भाई एवं बहन की रक्षा की कड़ी है और इसी कारण इसे रक्षा बंधन के नाम से जाना जाता है। सांस्कृतिक रूप से तो इसका बहुत महत्त्व है पर आज हम इसके धार्मिक महत्त्व को जानेंगे।

13 अगस्त 2019

कुबेर की नौ निधियाँ - १

कुछ समय पहले हमने आपको पवनपुत्र हनुमान की नौ निधियों के बारे में बताया था। हनुमानजी को अष्ट सिद्धि और नौ निधि का दाता कहा जाता है। जिस प्रकार हनुमान के पास नौ निधियाँ हैं, ठीक उसी प्रकार देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर के पास भी नौ निधियाँ हैं। अंतर केवल इतना है कि हनुमान अपनी नौ निधियों को किसी अन्य को प्रदान कर सकते हैं जबकि कुबेर ऐसा नहीं कर सकते।

11 अगस्त 2019

राघवयादवीयम् (श्लोक २१ - २५)

श्लोक २१

अनुलोम (रामकथा)

ताटकेयलवादत् एनोहारी हारिगिर आस सः।
हा असहायजना सीता अनाप्तेना अदमनाः भुवि ॥ २१॥

अर्थात: ताड़कापुत्र मारीच के वध से प्रसिद्द, अपनी वाणी से पाप का नाश करने वाले तथा जो अत्यंत मनभावन है, उनकी हाय सुनकर (मृगरूपी मारीच द्वारा श्रीराम के स्वर में सीता को पुकारने पर) असहाय सीता अपने उस स्वामी श्रीराम के बिना व्याकुल हो गईं।

9 अगस्त 2019

तिरुपति बालाजी - १

शायद ही कोई ऐसा हो जिसने तिरुपति बालाजी का नाम ना सुना हो। इसे दक्षिण भारत के सब बड़े और प्रसिद्ध मंदिर के रूप में मान्यता प्राप्त है। दक्षिण भारत के अतिरिक्त अन्य राज्यों में भी इस मंदिर की बहुत मान्यता है। यह एक ऐसा मंदिर है जहाँ भगवान विष्णु मनुष्य रूप में  विद्यमान हैं जिन्हे "वेंकटेश" कहा जाता है। इसी कारण इसे "वेंकटेश्वर बालाजी" भी कहते हैं। ये मंदिर विश्व का सबसे अमीर मंदिर है जहाँ की अनुमानित धनराशि ५०००० करोड़ से भी अधिक है। इसके पीछे का कारण बड़ा विचित्र है।

बात तब की है जब देवों और दैत्यों ने मिलकर समुद्र मंथन किया। उस मंथन से अनेक रत्न प्राप्त हुए और उनमे से सबसे दुर्लभ देवी लक्ष्मी की उत्पत्ति हुई। उनका सौंदर्य ऐसा था कि देव और दैत्य दोनों उन्हें प्राप्त करना चाहते थे। किन्तु माता लक्ष्मी ने स्वयं श्रीहरि विष्णु को अपना वर चुन लिया। स्वयं ब्रह्मदेव ने दोनों का विवाह करवाया। विवाह के पश्चात देवी लक्ष्मी ने पूछा कि उनका स्थान कहाँ होगा? तब नारायण ने कहा कि उनका स्थान उनके वक्षस्थल में होगा।

7 अगस्त 2019

राघवयादवीयम् (श्लोक १६ - २०)

श्लोक १६

अनुलोम (रामकथा)

सः अरम् आरत् अनज्ञाननः वेदेराकण्ठकुंभजम्।
तं द्रुसारपटः अनागाः नानादोषविराधहा ॥ १६॥

अर्थात: श्रीराम जो महाज्ञानी हैं, जिनकी वाणी वेद है, जिन्हें वेद कंठस्थ है, वो कुम्भज (महर्षि अगस्त्य, जिन्हे ये नाम मटके में जन्म लेने के कारण मिला) के निकट जा पंहुचे। वे निर्मल वृक्ष वल्कल (छाल) परिधानधारी हैं जो अनेक पाप करने वाले विराध के संहारक हैं।

5 अगस्त 2019

क्यों महाभारत के युद्ध को टालना असंभव था?

कौरवों ने छल से द्युत जीतकर पांडवों को १२ वर्ष के वनवास और एक वर्ष के अज्ञातवास पर भेज दिया। पांडवों ने अपना वनवास और अज्ञातवास नियमपूर्वक पूर्ण किया। विराट के युद्ध के पश्चात स्वयं पितामह भीष्म ने कहा कि पांडवों ने सफलतापूर्वक अपना अज्ञातवास पूर्ण कर लिया था किन्तु दुर्योधन अपने हठ पर अड़ा रहा। पांडवों ने धृतराष्ट्र से विनम्रतापूर्वक अपने हिस्से का राज्य माँगा पर पुत्रमोह में पड़ कर धृतराष्ट्र अच्छे-बुरे का विवेक खो बैठे। जब हस्तिनपुर दूत बनकर गए श्रीकृष्ण स्वयं संधि करवाने में असफल रहे तब अंततः महाभारत का युद्ध निश्चित हो गया।

1 अगस्त 2019

राघवयादवीयम् (श्लोक ११ - १५)

श्लोक ११

अनुलोम (रामकथा)

वरमानदसत्यासह्रीतपित्रादरात् अहो।
भास्वरः स्थिरधीरः अपहारोराः वनगामी असौ ॥ ११॥

अर्थात: विनम्र, आदरणीय, सत्य के त्याग से और वचन पालन ना करने से लज्जित होने वाले, अद्भुत, तेजोमय, मुक्ताहारधारी, वीर एवं साहसी श्रीराम वन को प्रस्थान किए।

30 जुलाई 2019

राघवयादवीयम् (श्लोक ६ - १०)

श्लोक ६

अनुलोम (रामकथा)

मारमं सुकुमाराभं रसाज आप नृताश्रितं। 
काविरामदलाप गोसम अवामतरा नते ॥ ६॥

अर्थात: लक्ष्मीपति नारायण के सुन्दर, सलोने एवं तेजस्वी मानव अवतार श्रीराम का वरण रसाजा (भूमिपुत्री), धरातुल्य धैर्यशील, निज वाणी से असीम आनन्द प्रदाता एवं सुधि सत्यवादी सीता ने किया था।

28 जुलाई 2019

क्या श्रीकृष्ण माँ काली के अवतार हैं? - २

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार देवी पुराण में श्रीकृष्ण को माँ काली का और राधा को भगवान शंकर का अवतार माना गया है। इसका साक्ष्य है वृन्दावन में स्थित श्रीकृष्ण-काली मंदिर। आज के इस लेख में हम मुख्यतः दो बातों का जिक्र करेंगे - पहली एक घटना जिसमे माँ काली ने राधा रूपी भगवान शंकर के मान की रक्षा की। और दूसरी कि माँ काली और श्रीकृष्ण में क्या-क्या समानताएं हैं। तो चलिए आरम्भ करते हैं।

26 जुलाई 2019

क्या श्रीकृष्ण माँ काली के अवतार हैं? - १

अगर आपसे कोई पूछे कि श्रीकृष्ण किसके अवतार थे तो १००० में से ९९९ लोग बिना संकोच के कहेंगे कि श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के अवतार थे। हमारे धार्मिक ग्रंथों में भी इस बात की स्पष्ट व्याख्या है कि भगवान श्रीकृष्ण के रूप में श्रीहरि ने अपना ८वां अवतार लिया। कहीं-कहीं उन्हें भगवान विष्णु का नवां अवतार भी कहा जाता है क्यूंकि गौतम बुद्ध को विष्णु अवतार के रूप में मान्यता मिलने में मतभेद है। दशावतार के बारे में आप विस्तार से यहाँ पढ़ सकते हैं। लेकिन इसका एक दूसरा पहलु भी है।

जब आप उत्तर प्रदेश में भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली वृन्दावन जायेंगे तो यहाँ का एक विशेष आकर्षण "कृष्ण-काली" मंदिर है। इस मंदिर की विशेषता ये है कि यहाँ पर श्रीकृष्ण की पूजा माँ काली के रूप में होती है। अब आप पूछेंगे कि ये कैसे संभव है? इसका उत्तर ये है कि बहुत कम, लेकिन कुछ जगह श्रीकृष्ण को माँ काली का अवतार ही माना जाता है। विशेषकर "देवी पुराण" में इस बात का वर्णन है कि स्वयं माँ काली ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया था। इसके पीछे एक बड़ी रोचक कथा है।

24 जुलाई 2019

जब महर्षि भृगु ने त्रिदेवों की परीक्षा ली - ३: नारायण

पिछले लेखों में आपने पढ़ा कि किस प्रकार महर्षि भृगु ब्रह्मदेव एवं महादेव की परीक्षा लेते हैं और दोनों ये बताते हैं कि वे त्रिगुणातीत नहीं हैं। अब महर्षि भृगु अंतिम त्रिदेव श्रीहरि विष्णु की परीक्षा लेने के लिए क्षीरसागर पहुँचते हैं। जब महर्षि भृगु वहाँ पहुँचे तो नारायण के पार्षद जय-विजय ने उन्हें रोका। तब महर्षि भृगु ने उन्हें अपने वहाँ आने का कारण बताया। कोई भगवान नारायण की भी परीक्षा ले सकता है ये सोच कर जय-विजय को बड़ा कौतुहल हुआ और उन्होंने भृगु को प्रवेश की आज्ञा दे दी।

22 जुलाई 2019

राघवयादवीयम् (श्लोक १ - ५)

श्लोक १
अनुलोम (रामकथा)

वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः। 
रामः रामाधीः आप्यागः लीलाम् आर अयोध्ये वासे ॥ १॥

अर्थात: मैं उन भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम करता हूं जिन्होंने अपनी पत्नी सीता के संधान में मलय और सहयाद्री की पहाड़ियों से होते हुए लंका जाकर रावण का वध किया तथा अयोध्या वापस लौट दीर्घ काल तक सीता संग वैभव विलास संग वास किया।

20 जुलाई 2019

राघवयादवीयम् - विश्व की सबसे अद्भुत रचना

क्या आप किसी ऐसे ग्रन्थ के विषय में सोच सकते हैं जिसे आप सीधे पढ़े तो कुछ और अर्थ निकले और अगर उल्टा पढ़ें तो कोई और अर्थ? ग्रन्थ को तो छोड़िये, ऐसा केवल एक श्लोक भी बनाना अत्यंत कठिन है। लेकिन क्या आपको पता है कि एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमें एक नहीं बल्कि ३० ऐसे श्लोक हैं जिसे अगर आप सीधा पढ़ें तो रामकथा बनती है और उसी को अगर आप उल्टा पढ़ें तो कृष्णकथा। जी हाँ, ऐसा अद्भुत ग्रन्थ हमारे भारत में ही है।

18 जुलाई 2019

जब महर्षि भृगु ने त्रिदेवों की परीक्षा ली - २: महादेव

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार सप्तर्षियों के अनुरोध पर महर्षि भृगु त्रिदेवों की परीक्षा लेने निकले, ये जानने के लिए कि तीनों में त्रिगुणातीत कौन है? सबसे पहले वे अपने पिता ब्रह्मदेव की परीक्षा लेने पहुँचे किन्तु परमपिता ब्रह्मा ने उन्हें बताया कि वे त्रिगुणातीत नहीं हैं क्यूंकि उनमे रजोगुण की अधिकता है। सृष्टि की रचना के लिए ये गुण होना भी आवश्यक है। तब ब्रह्मदेव ने उन्हें महादेव के पास जाने को कहा। अब आगे...

16 जुलाई 2019

हनुमानजी की दस गौण सिद्धियां

पिछले लेखों में आपने महाबली हनुमान की अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों के विषय में पढ़ा। इसके अतिरिक्त पवनपुत्र के पास १० गौण सिद्धियों के होने का भी वर्णन है। ये गोपनीय और रहस्य्मयी १० गौण सिद्धियां जिस किसी के पास भी होती हैं वो अजेय हो जाता है। भागवत पुराण में श्रीकृष्ण ने भी इन १० गौण सिद्धियों के महत्त्व का वर्णन किया है। ये सिद्धियां चमत्कारी हैं और देवों तथा दानवों के लिए भी दुर्लभ हैं। आइये इन १० गौण सिद्धियों के बारे में कुछ जानते हैं: 

14 जुलाई 2019

जब महर्षि भृगु ने त्रिदेवों की परीक्षा ली - १: ब्रह्मदेव

बहुत काल के बाद महान ऋषियों द्वारा पृथ्वी पर एक महान यज्ञ किया गया। तब उस समय प्रश्न उठा कि इसका पुण्यफल त्रिदेवों में सर्वप्रथम किसे प्रदान किया जाये। तब महर्षि अंगिरा ने सुझाव दिया कि इन तीनों में जो कोई भी "त्रिगुणातीत", अर्थात सत, राज और तम गुणों के अधीन ना हो उसे ही सर्वश्रेष्ठ मान कर यज्ञ का पुण्य सबसे पहले प्रदान किया जाये। किन्तु अब त्रिदेवों की परीक्षा कौन ले? वे तो त्रिकालदर्शी हैं। जो कोई भी उनकी परीक्षा लेने का प्रयास करेगा उसे उनके कोप का भाजन भी बनना पड़ सकता है। तब सप्तर्षियों ने महर्षि भृगु का नाम सुझाया। उनके अनुमोदन पर भृगु त्रिदेवों की परीक्षा लेने को तैयार हो गए। त्रिदेवों से क्या छुपा है, वे भी इस लीला में भाग लेने के लिए सज्ज हो गए।

12 जुलाई 2019

बालखिल्य

हमारे सप्तर्षि श्रृंखला में आपने महर्षि क्रतु के विषय में पढ़ा। बालखिल्य इन्ही महर्षि क्रतु के पुत्र हैं। प्रजापति दक्ष की पुत्री सन्नति से महर्षि क्रतु ने विवाह किया जिससे इन्हे ६०००० तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुए। इन बाल ऋषियों का आकर केवल अंगूठे जितना था। ये सारे ६०००० पुत्र ही सामूहिक रूप से बालखिल्य कहलाते हैं। महर्षि क्रतु के ये तेजस्वी पुत्र गुण और तेज में अपने पिता के समान ही माने जाते हैं। बालखिल्यों और पक्षीराज गरुड़ का सम्बन्ध बहुत पुराना है। 

पक्षीराज गरुड़ महर्षि कश्यप और वनिता के पुत्र थे। कश्यप की दूसरी पत्नी कुद्रू के गर्भ से १००० नागों से जन्म लिया था और उनकी सहायता से कुद्रू ने छल से विनता को अपनी दासी बना लिया। विनता के गर्भ से सबसे पहले अरुण का जन्म हुआ तो भगवान सूर्यनारायण का सारथि बना। उसके दूसरे पुत्र के रूप में गरुड़ का जन्म हुआ जिसने नागों के कहने पर स्वर्गलोक से अमृत लाकर अपनी माता को दासत्व से मुक्त किया। उस श्रम के बाद गरुड़ को भूख लगी। तब उसके पिता कश्यप ने कहा कि सामने पर्वत शिखर पर एक महाविशालकाय हाथी और कछुआ रहते हैं। तुम उन्हें खाकर अपनी भूख मिटा लो।

10 जुलाई 2019

महावीर हनुमान की नौ निधियाँ

पवनपुत्र हनुमान को अष्ट सिद्धि और नौ निधियों का स्वामी कहा गया है। पिछले लेख में आपने बजरंगबली की आठ सिद्धियों के बारे में पढ़ा था। इस लेख में हम आपको उनकी नौ निधियों के बारे में बताएँगे। निधि का अर्थ धन अथवा ऐश्वर्य होता है। ऐसी वस्तुएं जो अत्यंत दुर्लभ होती हैं, बहुत ही कम लोगों के पास रहती हैं और उन्हें प्राप्त करने के लिए घोर तप करना होता हो, उन्हें ही निधि कहा जाता है। वैसे तो ब्रह्माण्ड पुराण एवं वायु पुराण में कई निधियों का उल्लेख किया गया है किन्तु उनमे से नौ निधियाँ मुख्य होती हैं। कहा जाता है कि हनुमानजी को ये नौ निधियाँ माता सीता ने वरदान स्वरुप दी थी।

8 जुलाई 2019

मृतसञ्जीवनी स्त्रोत्र - ४

आज इस लेख के साथ मृतसञ्जीवनी स्त्रोत्र श्रंखला समाप्त हो रही है। पिछले लेख में हमने आपको इस महान स्त्रोत्र के ११ से २० श्लोकों का अर्थ बताया था। इस लेख में हम इस स्त्रोत्र के आखिरी १० श्लोकों (२१-३०) को अर्थ सहित बता रहे हैं।

मृतसञ्जीवनं नाम्ना महादेवेन कीर्तितम्।
सहस्त्रावर्तनं चास्य पुरश्चरणमीरितम्।।२१।।

अर्थात: महादेव ने स्वयं मृतसञ्जीवन नामक इस कवच को कहा है। इस कवच की सहस्त्र आवृत्ति को पुरश्चरण कहा गया है। 

य: पठेच्छृणुयानित्यं श्रावयेत्सु समाहित:।
सकालमृत्यु निर्जित्य सदायुष्यं समश्नुते।।२२।।

अर्थात: जो अपने मन को एकाग्र करके नित्य इसका पाठ करता है, सुनता अथावा दूसरों को सुनाता है, वह अकाल मृत्यु को जीतकर पूर्ण आयु का उपयोग करता है।

6 जुलाई 2019

क्यों श्रीकृष्ण ने अपने ही पुत्र को श्राप दिया?

महाभारत काल के दौरान सत्राजित की समयान्तक मणि ढूंढने के दौरान श्रीकृष्ण एक गुफा में पहुँचे जहाँ उन्होंने ऋक्षराज जांबवंत को देखा। जांबवंत के पास श्रीकृष्ण की समयान्तक मणि थी और जब उन्होंने उसे श्रीकृष्ण को वापस देने से मना किया तब दोनों के बीच भयानक युद्ध आरम्भ हुआ। ये युद्ध २८ दिनों तक चलता रहा किन्तु दोनों के बीच हार-जीत का निर्णय नहीं हो सका। तब जांबवंत ने अपने आराध्य श्रीराम का स्मरण किया तो उन्हें श्रीकृष्ण में ही अपने प्रभु श्रीराम दिखाई दिए। इससे जांबवंत को समझ आ गया कि श्रीकृष्ण ही श्रीराम के दूसरे रूप हैं। उन्होंने मणि श्रीकृष्ण को दे दी और अपनी पुत्री जांबवंती का विवाह भी श्रीकृष्ण के साथ कर दिया।

2 जुलाई 2019

मृतसञ्जीवनी स्त्रोत्र - ३

पिछले लेख में आपने श्री मृतसंजीवनी स्त्रोत्र के पहले १० श्लोकों का अर्थ पढ़ा। इस लेख में ३० श्लोकों वाले इस स्त्रोत्र के अगले १० श्लोकों का अर्थ दिया जा रहा है।

शूलाभयकर: सर्वविद्यानामधिनायक:।
ईशानात्मा तथैशान्यां पातु मां परमेश्वर:।।११।।

अर्थात: हाथों में शंख और अभयमुद्रा धारण करने वाले, सभी विद्याओं के स्वामी, ईशान स्वरूप भगवान् परमेश्वर शिव ईशान कोण में मेरी रक्षा करें।

ऊर्ध्वभागे ब्रह्मरूपी विश्वात्माऽध: सदावतु।
शिरो मे शङ्कर: पातु ललाटं चन्द्रशेखर:।।१२।।

अर्थात: ब्रह्मरूपी शिव मेरी ऊर्ध्वभाग में तथा विश्वात्मस्वरूप शिव अधोभाग में मेरी सदा रक्षा करें। शंकर मेरे सिर की और चन्द्रशेखर मेरे ललाट की रक्षा करें।

28 जून 2019

विकर्ण

विकर्ण कुरु सम्राट धृतराष्ट्र एवं गांधारी का १९वां पुत्र था (१०० कौरवों का नाम जानने के लिए यहाँ जाएँ)। महाभारत में दुर्योधन और दुःशासन के अतिरिक्त केवल विकर्ण ही है जिसकी प्रसिद्धि अधिक है। अन्य कौरवों के बारे में लोग अधिक नहीं जानते हैं। वैसे तो युयत्सु भी धृतराष्ट्र का एक प्रसिद्ध पुत्र है किन्तु दासी पुत्र होने के कारण उसे वो सम्मान नहीं मिला जिसका वो अधिकारी था। हालाँकि कौरवों में केवल युयुत्सु ही ऐसा था जो महाभारत के युद्ध के बाद जीवित बच गया था। कौरवों में विकर्ण ही ऐसा था जो अपने सच्चरित्र के कारण प्रसिद्ध हुआ।

महर्षि व्यास की कृपा से गांधारी द्वारा प्रसव किये गए मांस पिंड से अन्य कौरवों की भांति विकर्ण का भी जन्म हुआ। कहते हैं सभी कौरव बचपन में सच्चरित्र ही थे किन्तु दुर्योधन और दुःशासन की संगति के कारण वे सभी उनके समान ही अधर्मी हो गए। लेकिन उनमें से केवल विकर्ण ऐसा था जिसने अपने चरित्र और विचार को कभी गिरने नहीं दिया। महाभारत में बचपन में विकर्ण द्वारा दुर्योधन को भीम से द्वेष ना रखने की सलाह देने का भी वर्णन मिलता है। इसके अतिरिक्त भी विकर्ण दुर्योधन को उपयुक्त सुझाव देता रहता था।

26 जून 2019

महावीर हनुमान की अष्ट सिद्धियाँ

आप सभी ने हनुमान चालीसा में एक चौपाई अवश्य पढ़ी होगी - "अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता"। इसका अर्थ ये है कि महावीर हनुमान आठ प्रकार की सिद्धि और नौ प्रकार की निधियों को प्रदान करने वाले हैं। इस लेख में हम महाबली हनुमान की आठ सिद्धियों के बारे में बात करेंगे। सिद्धि ऐसी आलौकिक शक्तियों को कहा जाता है जो घोर साधना अथवा तपस्या से प्राप्त होती है। हिन्दू धर्म में अनेक प्रकार की सिद्धियों का वर्णन है किन्तु उसमे से ८ सिद्धियाँ सर्वाधिक शक्तिशाली और महत्वपूर्ण मानी जाती है। जिनके पास ये सभी सिद्धियाँ होती हैं वो अजेय हो जाता है। इन सिद्धियों को एक श्लोक से दर्शाया गया है:

24 जून 2019

मृतसञ्जीवनी स्त्रोत्र - २

पिछले लेख में आपने मृतसञ्जीवनी स्त्रोत्र के मूल ३० श्लोक संस्कृत में पढ़े। इस श्रृंखला में हम इन ३० श्लोकों को ३ भाग में विभक्त करेंगे और १०-१० श्लोकों के तीन लेख धर्मसंसार पर प्रकाशित किये जाएंगे। नीचे मृतसञ्जीवनी स्त्रोत्र के १ से १० तक के श्लोकों का अर्थ दिया जा रहा है:

एवमाराध्य गौरीशं देवं मृत्युञ्जयेश्वरम्।
मृतसञ्जीवनं नाम्ना कवचं प्रजपेत् सदा।।१।।

अर्थात: गौरीपति मृत्युञ्जयेश्र्वर भगवान् शंकर की विधिपूर्वक आराधना करने के पश्चात भक्त को सदा मृतसञ्जीवन नामक कवच का सुस्पष्ट पाठ करना चाहिये।

22 जून 2019

मृतसञ्जीवनी स्त्रोत्र - १

पिछले लेख में आपने मृतसञ्जीवनी मन्त्र के विषय में पढ़ा। इस भाग में हम 'मृतसंजीवनी स्त्रोत्र' के विषय में आपको बताएँगे। ऐसा माना जाता है कि इस महान स्त्रोत्र को परमपिता ब्रह्मा के पुत्र महर्षि वशिष्ठ ने लिखा था। ३० श्लोकों का ये स्त्रोत्र भगवान शिव को समर्पित है और उनके कई अनजाने पहलुओं पर प्रकाश डालता है। जो कोई भी इस स्त्रोत्र का पूर्ण चित्त से पाठ करता है, उसे जीवन में किसी भी कष्ट का सामना नहीं करना पड़ता। 

इस लेख में हम आपको पूर्ण मृतसञ्जीवनी मन्त्र से परिचित करवा रहे हैं। इस भाग में उन श्लोकों का अर्थ नहीं दिया गया है। आगे आने वाले लेखों में हम इन ३० श्लोकों को ३ भाग में विभक्त करेंगे और १०-१० श्लोकों के तीन लेख उसके अर्थ सहित धर्मसंसार पर प्रकाशित किये जाएंगे। ये महान मृतसञ्जीवनी स्त्रोत्र है:

18 जून 2019

मृतसंजीवनी मंत्र

हिन्दू धर्म में अनेकानेक मन्त्रों का वर्णन है किन्तु जो दो मन्त्र सबसे प्रमुख हैं वो है भगवान शिव का 'महामृत्युञ्जय मन्त्र' और वेदमाता गायत्री का 'श्री गायत्री मन्त्र'। इन दोनों के सामान शक्तिशाली और कोई मन्त्र नहीं है। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद गीता में कहा है कि 'मन्त्रों में मैं गायत्री मन्त्र हूँ'। ऐसा माना जाता है कि दोनों मन्त्रों में किसी का १२५०००० बार जाप करके बड़ी से बड़ी इच्छा को फलीभूत किया जा सकता है।

लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि हमारे भगवान शिव ने महामृत्युञ्जय और गायत्री मन्त्र को मिलाकर एक और अद्भुत एवं महाशक्तिशाली मन्त्र की रचना की थी। उस मन्त्र को 'महामृत्युञ्जयगायत्री मन्त्र' कहा गया और उसे ही आम भाषा में हम 'मृतसञ्जीवनी मन्त्र' के नाम से जानते हैं। कहा जाता है कि इस मन्त्र से मृत व्यक्ति को भी जीवित किया जा सकता था। ये मन्त्र बहुत ही संवेदनशील माना जाता है और हमारे ऋषि-मुनियों ने इसके उपयोग को स्पष्ट रूप से निषिद्ध भी किया है। अगर योग्य गुरु का मार्गदर्शन ना मिले तो इस मन्त्र का उच्चारण कभी भी १०८ बार से अधिक नहीं करना चाहिए अन्यथा उसके विपरीत परिणाम हो सकते हैं।

16 जून 2019

प्रमुख अप्सराओं के नाम और उनके मंत्र

प्रधान अप्सरा
  • रम्भा: ॐ सः रम्भे आगच्छागच्छ स्वाहा 
३ सर्वोत्तम अप्सराएँ:
  1. उर्वशी: ॐ श्री उर्वशी आगच्छागच्छ स्वाहा
  2. मेनका 
  3. तिलोत्तमा: ॐ श्री तिलोत्तामे आगच्छागच्छ स्वाहा

14 जून 2019

शिवलिंग पर क्या अर्पण करना चाहिए?

वैसे तो शिवलिंग पर कई चीजें चढ़ाई जाती है जिनमे से प्रमुख है दुग्ध, घृत, शहद, दही इत्यादि किन्तु आम तौर पर दो चीजों का महत्त्व बहुत अधिक है। वो हैं बिल्वपत्र (बेलपत्र) और गंगाजल। किन्तु इनके अतिरिक्त कई अन्य चीजों को शिवलिंग को अर्पण करने का विधान पुराणों में बताया गया है। इसका पता हमें शिवपुराण के एक श्लोक से चलता है:

12 जून 2019

अप्सराएँ

हिन्दू धर्म में अप्सराएँ सौंदर्य का प्रतीक मानी जाती है और बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। अप्सराओं से अधिक सुन्दर रचना और किसी की भी नहीं मानी जाती। पृथ्वी पर जो कोई भी स्त्री अत्यंत सुन्दर होती है उसे भी अप्सरा कह कर उनके सौंदर्य को सम्मान दिया जाता है। कहा जाता है कि देवराज इंद्र ने अप्सराओं का निर्माण किया था। कई अप्सराओं की उत्पत्ति परमपिता ब्रह्मा ने भी की थी जिनमे से तिलोत्तमा प्रमुख है। इसके अतिरिक्त कई अप्सराएं महान ऋषिओं की पुत्रियां भी थी। भागवत पुराण के अनुसार अप्सराओं का जन्म महर्षि कश्यप और दक्षपुत्री मुनि से हुआ था। कामदेव और रति से भी कई अप्सराओं की उत्पत्ति बताई जाती है।

8 जून 2019

सप्तर्षि श्रंखला १०.३ - महर्षि वशिष्ठ

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार राजा कौशिक (विश्वामित्र) महर्षि वशिष्ठ की गाय नंदिनी को ले जाने का प्रयास करते हैं और फिर महर्षि वशिष्ठ द्वारा पराजित होते हैं। उनसे प्रतिशोध लेने के लिए विश्वामित्र महादेव की तपस्या करते हैं और उनसे समस्त प्रकार के अस्त्र-शस्त्र प्राप्त करते हैं। इसके बाद वे पुनः महर्षि वशिष्ठ को ललकारते हैं किन्तु वशिष्ठ अपने ब्रह्माण्ड अस्त्र की शक्ति से उन्हें पुनः परास्त कर देते हैं। इससे निराश होकर विश्वामित्र पुनः तपस्या करने को चले जाते हैं। अब आगे... 

6 जून 2019

सप्तर्षि श्रंखला १०.२ - महर्षि वशिष्ठ

पिछले लेख में आपने महर्षि वशिष्ठ के विषय में पढ़ा। महर्षि वशिष्ठ एवं राजर्षि विश्वामित्र की प्रतिद्वंदिता बहुत प्रसिद्ध है। प्राचीन काल में एक महान राजा हुए गाधि। उनके पुत्र थे कौशिक जो आगे चलकर विश्वामित्र के नाम से प्रसिद्ध हुए। एक बार विश्वामित्र अपने १०० पुत्रों और एक अक्षौहिणी सेना लेकर वन से गुजर रहे थे। वहीँ उन्हें पता चला कि पास में ही महर्षि वशिष्ठ का आश्रम है। तो उनका आशीर्वाद लेने के लिए विश्वामित्र उनके आश्रम पहुँचे। राज्य के राजा को अपने आश्रम में आया हुआ देख कर महर्षि वशिष्ठ बड़े प्रसन्न हुए और उनसे कहा कि वे कुछ दिन अपनी सेना के साथ उनका आथित्य ग्रहण करें।

4 जून 2019

जब श्रीराम पारिजात और कल्पवृक्ष को पृथ्वी पर ले आये

महर्षि दुर्वासा के विषय में हम सभी जानते हैं। वे महर्षि अत्रि और माता अनुसूया के पुत्र थे जो भगवान शिव के अंश से जन्मे थे। इनकी गणना सर्वाधिक क्रोधी ऋषि के रूप में की जाती है। श्राप तो जैसे इनकी जिह्वा की नोक पर रखा रहता था। इन्ही महर्षि दुर्वासा ने एक बार श्रीराम की परीक्षा लेने की ठानी। उन्हें पता था कि श्रीराम भगवान विष्णु के अवतार हैं किन्तु फिर भी सामान्य जन को उनका महत्त्व और महानता दिखाने के लिए वे श्रीराम की परीक्षा लेने अयोध्या पहुँचे। उस समय तक लंका युद्ध समाप्त हो गया था और श्रीराम सुखपूर्वक अयोध्या पर राज्य कर रहे थे।

2 जून 2019

सप्तर्षि श्रंखला १०.१ - महर्षि वशिष्ठ

महर्षि वशिष्ठ परमपिता ब्रह्मा के पुत्र एवं सातवें सप्तर्षि हैं। इनकी उत्पत्ति ब्रह्मदेव की प्राण वायु से हुई बताई जाती है।  महर्षि वशिष्ठ को ऋग्वेद के ७वें मण्डल का लेखक और अधिपति माना जाता है। ऋग्वेद में कई जगह, विशेषकर १०वें मण्डल में महर्षि वशिष्ठ एवं उनके परिवार के विषय में बहुत कुछ लिखा गया है। इसके अतिरिक्त अग्नि पुराण एवं पुराण में भी उनका विस्तृत वर्णन है। महर्षि वशिष्ठ ही ३२००० श्लोकों वाले योगवशिष्ठ रामायण, वशिष्ठ धर्मसूत्र, वशिष्ठ संहिता और वशिष्ठ पुराण के जनक हैं। स्वयं श्री आदिशंकराचार्य ने महर्षि वशिष्ठ को वेदांत के आदिऋषियों में प्रथम स्थान प्रदान किया है। 'वशिष्ठ' का अर्थ भी सर्वश्रेष्ठ ही होता है।

31 मई 2019

भीष्मक

महाराज भीष्मक विदर्भ के सम्राट थे। ये महाराज जरासंध और शिशुपाल के मित्र थे और मगध सदैव इनके राज्य की सुरक्षा के लिए तत्पर रहता था। इनके रुक्मी, रुक्मरथ, रुक्मबाहु, रुक्मकेश एवं रुक्ममाली नामक एक पुत्र और रुक्मिणी नामक एक पुत्री थी। उनकी पुत्री रुक्मिणी का विवाह श्रीकृष्ण से हुआ। इस प्रकार भीष्मक यदुवंश के भी सम्बन्धी बन गए। हालाँकि रुक्मिणी हरण के समय श्रीकृष्ण से पराजित होने के बाद रुक्मी ने विदर्भ छोड़ दिया और भोजकट में अपना राज्य बसाया। इस विषय में आप यहाँ पर पढ़ सकते हैं। 

29 मई 2019

सप्तर्षि श्रंखला ९ - महर्षि पुलस्त्य

महर्षि पुलस्त्य भी परमपिता ब्रह्मा के मानस पुत्रों एवं प्रजापतियों में से एक हैं। महाभारत और पुराणों में इनके विषय में बहुत कुछ लिखा गया है। कहते हैं कि जगत में जो कुछ भी शांति और सुख का अनुभव होता है, उसमे महर्षि पुलस्त्य की बहुत बड़ी भूमिका है। इनका स्वाभाव अत्यंत दयालु बताया गया है जो देव, दानव, मानव में कोई भेद-भाव नहीं करते। महाभारत में इस बात का उल्लेख है कि अपने पिता ब्रह्मा की आज्ञा से महर्षि पुलस्त्य ने पितामह भीष्म को ज्ञान प्रदान किया था।

27 मई 2019

सोलह संस्कार

शास्त्रों के अनुसार मनुष्य जीवन के लिए कुछ आवश्यक नियम बनाए गए हैं जिनका पालन करना हमारे लिए आवश्यक माना गया है। हिन्दू धर्म के अनुसार जीवन में हर व्यक्ति को अनिवार्य रूप से सोलह संस्कारों का पालन करना चाहिए। यह संस्कार व्यक्ति के जन्म से आरम्भ होते हैं और मृत्यु तक अलग-अलग समय पर किए जाते हैं। इन संस्कारों की व्याख्या प्राचीन काल से अलग-अलग काल में कई महर्षियों ने की थी पर वर्तमान समय में जो हम १६ संस्कार की बात करते हैं तो महाभारत काल में महर्षि वेदव्यास द्वारा प्रतिपादित है। 

25 मई 2019

सप्तर्षि श्रंखला ८ - महर्षि क्रतु

सप्तर्षियों एवं प्रजापतियों में से एक महर्षि क्रतु परमपिता ब्रह्मा के पुत्र है जिनकी उत्पत्ति उनके हाथ से हुई बताई गयी है। इनकी गणना विश्व के सबसे महान बुद्धिजीवियों में होती है। महर्षि क्रतु ने ही परमपिता ब्रह्मा द्वारा उत्पन्न किये गए वेदों का विभाजन किया था। कहा जाता है कि सर्वप्रथम वेद एक रूप में ही ब्रह्मदेव द्वारा उत्पन्न किये गए थे। बाद में अपने पिता की आज्ञा से महर्षि क्रतु ने ही वेदों के चार भाग (ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद) करने में उनकी सहायता की थी। उनके इस ज्ञान बुद्धि से प्रसन्न होकर परमपिता ब्रह्मा ने उनका नाम क्रतु रखा जिसका अर्थ होता है शक्ति अथवा सामर्थ्य।

23 मई 2019

शिवलिंगों के स्थापत्य का वैज्ञानिक महत्त्व

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा की भारत में ऐसे शिव मंदिर है जो केदारनाथ से लेकर रामेश्वरम तक एक सीधी रेखा में बनाये गये है। आश्चर्य है कि हमारे पूर्वजों के पास ऐसा कैसा विज्ञान और तकनीक था जिसे हम आज तक समझ ही नहीं पाये। आश्चर्यजनक रूप से इन मंदिरों को ७९° E ४१’५४” देशांतर रेखा के भौगोलिक सीधी रेखा में बनाया गया है। यहाँ पर हम ५ मुख्य मंदिरों को सम्मलित कर रहे हैं। 

21 मई 2019

सप्तर्षि शृंखला ७ - महर्षि पुलह

महर्षि पुलह भी अन्य सप्तर्षियों की भांति परमपिता ब्रह्मा के पुत्र एवं १० प्रजापतियों में से एक माने जाते हैं। जिस प्रकार भगवान ब्रह्मा की उत्पत्ति श्रीविष्णु की नाभि से हुई है, ठीक उसी प्रकार महर्षि पुलह का जन्म भी परमपिता ब्रह्मा की नाभि से ही हुआ था। हालाँकि कुछ ग्रंथों में इनकी उत्पत्ति ब्रह्मदेव के मस्तक से भी बताई जाती है। अन्य सप्तर्षियों से अलग महर्षि पुलह विश्व की आध्यात्मिक शक्ति के विकास के लिए सदैव तपस्यारत रहे।

कहा जाता है कि महर्षि पुलह ने भी ब्रह्माण्ड की रचना और विस्तार के लिए अपने पिता भगवान ब्रह्मा की सहायता की थी। यही कारण है कि इन्हे तेज और गुण में स्वयं अपने पिता परमपिता ब्रह्मा की ही भांति माना जाता है। ये ब्रह्मापुत्र प्रजापति ये दक्ष के जमाता भी थे। अन्य ऋषियों और देवताओं की तरह ही प्रजापति दक्ष ने महर्षि पुलह को भी अपनी एक पुत्री 'क्षमा' का दान किया। इनसे इन्हे पीवरी नामक एक पुत्री एवं ३ पुत्र प्राप्त हुए:

19 मई 2019

परशुराम - ५

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार सहस्त्रार्जुन जमदग्नि के आश्रम से कामधेनु को बलात ले जाता है जिससे परशुराम और सहस्त्रार्जुन में युद्ध होता है और सहत्रार्जुन मारा जाता है। फिर उसके पुत्र परशुराम की अनुपस्थिति में जमदग्नि की हत्या कर देते हैं। इससे परशुराम क्रोध में आकर पूरे विश्व को क्षत्रियों से शून्य कर देते हैं। तब महर्षि कश्यप परशुराम से पूरी पृथ्वी दान में ले लेते हैं और उन्हें महेंद्र पर्वत पर जाने को कहते हैं। अब आगे...

17 मई 2019

परशुराम - ४

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि अपने नाना और गुरु विश्वामित्र के सुझाव पर परशुराम महादेव, श्रीहरि और ब्रह्मदेव की तपस्या करते हैं। त्रिदेवों से परशुराम को अनेक दिव्यास्त्र और वरदान प्राप्त होते हैं जिनमे उनका प्रसिद्ध परशु भी होता है। उन दिव्यास्त्रों और वरदानों के कारण परशुराम तीनों लोकों में अजेय हो जाते हैं। अब आगे...

13 मई 2019

परशुराम - ३

पिछले भाग में आपने पढ़ा कि अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण करने के बाद परशुराम अपने पिता से शस्त्रविद्या प्राप्त करने का हठ करते हैं। उनका हठ देख कर उनके पितामह ऋचीक उन्हें युद्धकला की शिक्षा लेने की अनुमति दे देते हैं। फिर परशुराम अपने नाना विश्वामित्र से सभी प्रकार की शस्त्रविद्या और दिव्यास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करते हैं। अपनी शिक्षा पूर्ण होने के बाद परशुराम विश्वामित्र से और शिक्षा प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं। तब विश्वामित्र उन्हें महादेव की तपस्या करने का सुझाव देते हैं। अब आगे...

11 मई 2019

महाराज जनक की वंश परंपरा

  1. सारी सृष्टि परमपिता ब्रह्मा से आरम्भ हुई।
  2. ब्रह्मा के पुत्र सप्तर्षियों में एक महर्षि मरीचि हुए। 
  3. मरीचि के पुत्र महर्षि कश्यप हुए जिनसे सभी प्रकार के प्राणियों का जन्म हुआ। 
  4. कश्यप के पुत्र विवस्वान (सूर्य) हुए। 
  5. सूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु हुए जो वर्तमान मन्वन्तर के अधिपति हैं। 
  6. उनके पुत्र महाराज इक्ष्वाकु हुए। इन्ही से इक्ष्वाकु कुल चला। 
  7. इक्ष्वाकु के पुत्र निमि हुए। इक्ष्वाकु के ही दूसरे पुत्र कुक्षि के वंश में आगे चल कर श्रीराम का जन्म हुआ।
  8. निमि के पुत्र मिथि हुए जिनके नाम पर इनकी राजधानी मिथिला कहलायी।