18 जून 2019

मृतसंजीवनी मंत्र

हिन्दू धर्म में अनेकानेक मन्त्रों का वर्णन है किन्तु जो दो मन्त्र सबसे प्रमुख हैं वो है भगवान शिव का 'महामृत्युञ्जय मन्त्र' और वेदमाता गायत्री का 'श्री गायत्री मन्त्र'। इन दोनों के सामान शक्तिशाली और कोई मन्त्र नहीं है। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद गीता में कहा है कि 'मन्त्रों में मैं गायत्री मन्त्र हूँ'। ऐसा माना जाता है कि दोनों मन्त्रों में किसी का १२५०००० बार जाप करके बड़ी से बड़ी इच्छा को फलीभूत किया जा सकता है।

लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि हमारे भगवान शिव ने महामृत्युञ्जय और गायत्री मन्त्र को मिलाकर एक और अद्भुत एवं महाशक्तिशाली मन्त्र की रचना की थी। उस मन्त्र को 'महामृत्युञ्जयगायत्री मन्त्र' कहा गया और उसे ही आम भाषा में हम 'मृतसञ्जीवनी मन्त्र' के नाम से जानते हैं। कहा जाता है कि इस मन्त्र से मृत व्यक्ति को भी जीवित किया जा सकता था। ये मन्त्र बहुत ही संवेदनशील माना जाता है और हमारे ऋषि-मुनियों ने इसके उपयोग को स्पष्ट रूप से निषिद्ध भी किया है। अगर योग्य गुरु का मार्गदर्शन ना मिले तो इस मन्त्र का उच्चारण कभी भी १०८ बार से अधिक नहीं करना चाहिए अन्यथा उसके विपरीत परिणाम हो सकते हैं।

16 जून 2019

प्रमुख अप्सराओं के नाम और उनके मंत्र

प्रधान अप्सरा
  • रम्भा: ॐ सः रम्भे आगच्छागच्छ स्वाहा 
३ सर्वोत्तम अप्सराएँ:
  1. उर्वशी: ॐ श्री उर्वशी आगच्छागच्छ स्वाहा
  2. मेनका 
  3. तिलोत्तमा: ॐ श्री तिलोत्तामे आगच्छागच्छ स्वाहा

14 जून 2019

शिवलिंग पर क्या अर्पण करना चाहिए?

वैसे तो शिवलिंग पर कई चीजें चढ़ाई जाती है जिनमे से प्रमुख है दुग्ध, घृत, शहद, दही इत्यादि किन्तु आम तौर पर दो चीजों का महत्त्व बहुत अधिक है। वो हैं बिल्वपत्र (बेलपत्र) और गंगाजल। किन्तु इनके अतिरिक्त कई अन्य चीजों को शिवलिंग को अर्पण करने का विधान पुराणों में बताया गया है। इसका पता हमें शिवपुराण के एक श्लोक से चलता है:

12 जून 2019

अप्सराएँ

हिन्दू धर्म में अप्सराएँ सौंदर्य का प्रतीक मानी जाती है और बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। अप्सराओं से अधिक सुन्दर रचना और किसी की भी नहीं मानी जाती। पृथ्वी पर जो कोई भी स्त्री अत्यंत सुन्दर होती है उसे भी अप्सरा कह कर उनके सौंदर्य को सम्मान दिया जाता है। कहा जाता है कि देवराज इंद्र ने अप्सराओं का निर्माण किया था। कई अप्सराओं की उत्पत्ति परमपिता ब्रह्मा ने भी की थी जिनमे से तिलोत्तमा प्रमुख है। इसके अतिरिक्त कई अप्सराएं महान ऋषिओं की पुत्रियां भी थी। भागवत पुराण के अनुसार अप्सराओं का जन्म महर्षि कश्यप और दक्षपुत्री मुनि से हुआ था। कामदेव और रति से भी कई अप्सराओं की उत्पत्ति बताई जाती है।

8 जून 2019

सप्तर्षि श्रंखला १०.३ - महर्षि वशिष्ठ

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार राजा कौशिक (विश्वामित्र) महर्षि वशिष्ठ की गाय नंदिनी को ले जाने का प्रयास करते हैं और फिर महर्षि वशिष्ठ द्वारा पराजित होते हैं। उनसे प्रतिशोध लेने के लिए विश्वामित्र महादेव की तपस्या करते हैं और उनसे समस्त प्रकार के अस्त्र-शस्त्र प्राप्त करते हैं। इसके बाद वे पुनः महर्षि वशिष्ठ को ललकारते हैं किन्तु वशिष्ठ अपने ब्रह्माण्ड अस्त्र की शक्ति से उन्हें पुनः परास्त कर देते हैं। इससे निराश होकर विश्वामित्र पुनः तपस्या करने को चले जाते हैं। अब आगे... 

6 जून 2019

सप्तर्षि श्रंखला १०.२ - महर्षि वशिष्ठ

पिछले लेख में आपने महर्षि वशिष्ठ के विषय में पढ़ा। महर्षि वशिष्ठ एवं राजर्षि विश्वामित्र की प्रतिद्वंदिता बहुत प्रसिद्ध है। प्राचीन काल में एक महान राजा हुए गाधि। उनके पुत्र थे कौशिक जो आगे चलकर विश्वामित्र के नाम से प्रसिद्ध हुए। एक बार विश्वामित्र अपने १०० पुत्रों और एक अक्षौहिणी सेना लेकर वन से गुजर रहे थे। वहीँ उन्हें पता चला कि पास में ही महर्षि वशिष्ठ का आश्रम है। तो उनका आशीर्वाद लेने के लिए विश्वामित्र उनके आश्रम पहुँचे। राज्य के राजा को अपने आश्रम में आया हुआ देख कर महर्षि वशिष्ठ बड़े प्रसन्न हुए और उनसे कहा कि वे कुछ दिन अपनी सेना के साथ उनका आथित्य ग्रहण करें।

4 जून 2019

जब श्रीराम पारिजात और कल्पवृक्ष को पृथ्वी पर ले आये

महर्षि दुर्वासा के विषय में हम सभी जानते हैं। वे महर्षि अत्रि और माता अनुसूया के पुत्र थे जो भगवान शिव के अंश से जन्मे थे। इनकी गणना सर्वाधिक क्रोधी ऋषि के रूप में की जाती है। श्राप तो जैसे इनकी जिह्वा की नोक पर रखा रहता था। इन्ही महर्षि दुर्वासा ने एक बार श्रीराम की परीक्षा लेने की ठानी। उन्हें पता था कि श्रीराम भगवान विष्णु के अवतार हैं किन्तु फिर भी सामान्य जन को उनका महत्त्व और महानता दिखाने के लिए वे श्रीराम की परीक्षा लेने अयोध्या पहुँचे। उस समय तक लंका युद्ध समाप्त हो गया था और श्रीराम सुखपूर्वक अयोध्या पर राज्य कर रहे थे।

2 जून 2019

सप्तर्षि श्रंखला १०.१ - महर्षि वशिष्ठ

महर्षि वशिष्ठ परमपिता ब्रह्मा के पुत्र एवं सातवें सप्तर्षि हैं। इनकी उत्पत्ति ब्रह्मदेव की प्राण वायु से हुई बताई जाती है।  महर्षि वशिष्ठ को ऋग्वेद के ७वें मण्डल का लेखक और अधिपति माना जाता है। ऋग्वेद में कई जगह, विशेषकर १०वें मण्डल में महर्षि वशिष्ठ एवं उनके परिवार के विषय में बहुत कुछ लिखा गया है। इसके अतिरिक्त अग्नि पुराण एवं पुराण में भी उनका विस्तृत वर्णन है। महर्षि वशिष्ठ ही ३२००० श्लोकों वाले योगवशिष्ठ रामायण, वशिष्ठ धर्मसूत्र, वशिष्ठ संहिता और वशिष्ठ पुराण के जनक हैं। स्वयं श्री आदिशंकराचार्य ने महर्षि वशिष्ठ को वेदांत के आदिऋषियों में प्रथम स्थान प्रदान किया है। 'वशिष्ठ' का अर्थ भी सर्वश्रेष्ठ ही होता है।

31 मई 2019

भीष्मक

महाराज भीष्मक विदर्भ के सम्राट थे। ये महाराज जरासंध और शिशुपाल के मित्र थे और मगध सदैव इनके राज्य की सुरक्षा के लिए तत्पर रहता था। इनके रुक्मी, रुक्मरथ, रुक्मबाहु, रुक्मकेश एवं रुक्ममाली नामक एक पुत्र और रुक्मिणी नामक एक पुत्री थी। उनकी पुत्री रुक्मिणी का विवाह श्रीकृष्ण से हुआ। इस प्रकार भीष्मक यदुवंश के भी सम्बन्धी बन गए। हालाँकि रुक्मिणी हरण के समय श्रीकृष्ण से पराजित होने के बाद रुक्मी ने विदर्भ छोड़ दिया और भोजकट में अपना राज्य बसाया। इस विषय में आप यहाँ पर पढ़ सकते हैं। 

29 मई 2019

सप्तर्षि श्रंखला ९ - महर्षि पुलस्त्य

महर्षि पुलस्त्य भी परमपिता ब्रह्मा के मानस पुत्रों एवं प्रजापतियों में से एक हैं। महाभारत और पुराणों में इनके विषय में बहुत कुछ लिखा गया है। कहते हैं कि जगत में जो कुछ भी शांति और सुख का अनुभव होता है, उसमे महर्षि पुलस्त्य की बहुत बड़ी भूमिका है। इनका स्वाभाव अत्यंत दयालु बताया गया है जो देव, दानव, मानव में कोई भेद-भाव नहीं करते। महाभारत में इस बात का उल्लेख है कि अपने पिता ब्रह्मा की आज्ञा से महर्षि पुलस्त्य ने पितामह भीष्म को ज्ञान प्रदान किया था।

27 मई 2019

सोलह संस्कार

शास्त्रों के अनुसार मनुष्य जीवन के लिए कुछ आवश्यक नियम बनाए गए हैं जिनका पालन करना हमारे लिए आवश्यक माना गया है। हिन्दू धर्म के अनुसार जीवन में हर व्यक्ति को अनिवार्य रूप से सोलह संस्कारों का पालन करना चाहिए। यह संस्कार व्यक्ति के जन्म से आरम्भ होते हैं और मृत्यु तक अलग-अलग समय पर किए जाते हैं। इन संस्कारों की व्याख्या प्राचीन काल से अलग-अलग काल में कई महर्षियों ने की थी पर वर्तमान समय में जो हम १६ संस्कार की बात करते हैं तो महाभारत काल में महर्षि वेदव्यास द्वारा प्रतिपादित है। 

25 मई 2019

सप्तर्षि श्रंखला ८ - महर्षि क्रतु

सप्तर्षियों एवं प्रजापतियों में से एक महर्षि क्रतु परमपिता ब्रह्मा के पुत्र है जिनकी उत्पत्ति उनके हाथ से हुई बताई गयी है। इनकी गणना विश्व के सबसे महान बुद्धिजीवियों में होती है। महर्षि क्रतु ने ही परमपिता ब्रह्मा द्वारा उत्पन्न किये गए वेदों का विभाजन किया था। कहा जाता है कि सर्वप्रथम वेद एक रूप में ही ब्रह्मदेव द्वारा उत्पन्न किये गए थे। बाद में अपने पिता की आज्ञा से महर्षि क्रतु ने ही वेदों के चार भाग (ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद) करने में उनकी सहायता की थी। उनके इस ज्ञान बुद्धि से प्रसन्न होकर परमपिता ब्रह्मा ने उनका नाम क्रतु रखा जिसका अर्थ होता है शक्ति अथवा सामर्थ्य।

23 मई 2019

शिवलिंगों के स्थापत्य का वैज्ञानिक महत्त्व

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा की भारत में ऐसे शिव मंदिर है जो केदारनाथ से लेकर रामेश्वरम तक एक सीधी रेखा में बनाये गये है। आश्चर्य है कि हमारे पूर्वजों के पास ऐसा कैसा विज्ञान और तकनीक था जिसे हम आज तक समझ ही नहीं पाये। आश्चर्यजनक रूप से इन मंदिरों को ७९° E ४१’५४” देशांतर रेखा के भौगोलिक सीधी रेखा में बनाया गया है। यहाँ पर हम ५ मुख्य मंदिरों को सम्मलित कर रहे हैं। 

21 मई 2019

सप्तर्षि शृंखला ७ - महर्षि पुलह

महर्षि पुलह भी अन्य सप्तर्षियों की भांति परमपिता ब्रह्मा के पुत्र एवं १० प्रजापतियों में से एक माने जाते हैं। जिस प्रकार भगवान ब्रह्मा की उत्पत्ति श्रीविष्णु की नाभि से हुई है, ठीक उसी प्रकार महर्षि पुलह का जन्म भी परमपिता ब्रह्मा की नाभि से ही हुआ था। हालाँकि कुछ ग्रंथों में इनकी उत्पत्ति ब्रह्मदेव के मस्तक से भी बताई जाती है। अन्य सप्तर्षियों से अलग महर्षि पुलह विश्व की आध्यात्मिक शक्ति के विकास के लिए सदैव तपस्यारत रहे।

कहा जाता है कि महर्षि पुलह ने भी ब्रह्माण्ड की रचना और विस्तार के लिए अपने पिता भगवान ब्रह्मा की सहायता की थी। यही कारण है कि इन्हे तेज और गुण में स्वयं अपने पिता परमपिता ब्रह्मा की ही भांति माना जाता है। ये ब्रह्मापुत्र प्रजापति ये दक्ष के जमाता भी थे। अन्य ऋषियों और देवताओं की तरह ही प्रजापति दक्ष ने महर्षि पुलह को भी अपनी एक पुत्री 'क्षमा' का दान किया। इनसे इन्हे पीवरी नामक एक पुत्री एवं ३ पुत्र प्राप्त हुए:

19 मई 2019

परशुराम - ५

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार सहस्त्रार्जुन जमदग्नि के आश्रम से कामधेनु को बलात ले जाता है जिससे परशुराम और सहस्त्रार्जुन में युद्ध होता है और सहत्रार्जुन मारा जाता है। फिर उसके पुत्र परशुराम की अनुपस्थिति में जमदग्नि की हत्या कर देते हैं। इससे परशुराम क्रोध में आकर पूरे विश्व को क्षत्रियों से शून्य कर देते हैं। तब महर्षि कश्यप परशुराम से पूरी पृथ्वी दान में ले लेते हैं और उन्हें महेंद्र पर्वत पर जाने को कहते हैं। अब आगे...

17 मई 2019

परशुराम - ४

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि अपने नाना और गुरु विश्वामित्र के सुझाव पर परशुराम महादेव, श्रीहरि और ब्रह्मदेव की तपस्या करते हैं। त्रिदेवों से परशुराम को अनेक दिव्यास्त्र और वरदान प्राप्त होते हैं जिनमे उनका प्रसिद्ध परशु भी होता है। उन दिव्यास्त्रों और वरदानों के कारण परशुराम तीनों लोकों में अजेय हो जाते हैं। अब आगे...

13 मई 2019

परशुराम - ३

पिछले भाग में आपने पढ़ा कि अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण करने के बाद परशुराम अपने पिता से शस्त्रविद्या प्राप्त करने का हठ करते हैं। उनका हठ देख कर उनके पितामह ऋचीक उन्हें युद्धकला की शिक्षा लेने की अनुमति दे देते हैं। फिर परशुराम अपने नाना विश्वामित्र से सभी प्रकार की शस्त्रविद्या और दिव्यास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करते हैं। अपनी शिक्षा पूर्ण होने के बाद परशुराम विश्वामित्र से और शिक्षा प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं। तब विश्वामित्र उन्हें महादेव की तपस्या करने का सुझाव देते हैं। अब आगे...

11 मई 2019

महाराज जनक की वंश परंपरा

  1. सारी सृष्टि परमपिता ब्रह्मा से आरम्भ हुई।
  2. ब्रह्मा के पुत्र सप्तर्षियों में एक महर्षि मरीचि हुए। 
  3. मरीचि के पुत्र महर्षि कश्यप हुए जिनसे सभी प्रकार के प्राणियों का जन्म हुआ। 
  4. कश्यप के पुत्र विवस्वान (सूर्य) हुए। 
  5. सूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु हुए जो वर्तमान मन्वन्तर के अधिपति हैं। 
  6. उनके पुत्र महाराज इक्ष्वाकु हुए। इन्ही से इक्ष्वाकु कुल चला। 
  7. इक्ष्वाकु के पुत्र निमि हुए। इक्ष्वाकु के ही दूसरे पुत्र कुक्षि के वंश में आगे चल कर श्रीराम का जन्म हुआ।
  8. निमि के पुत्र मिथि हुए जिनके नाम पर इनकी राजधानी मिथिला कहलायी। 

9 मई 2019

परशुराम - २

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार परशुराम की दादी सत्यवती की माता के छल के कारण परशुराम ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय संस्कारों के साथ जन्मे। ८ वर्ष की आयु तक उन्होंने अधिकांश विद्या अपनी माता रेणुका से प्राप्त कर ली थी। साथ ही साथ वे सभी प्रकार के पशु पक्षियों से भी बात कर सकने में सक्षम थे। अब आगे...

ब्राह्मण होने के कारण परशुराम को समस्त वेदों और शास्त्रों की शिक्षा दी गयी। उन्होंने सर्वप्रथम अपनी विद्या अपने पिता जमदग्नि से प्राप्त की। फिर वे उच्च शिक्षा हेतु अपने दादा महर्षि ऋचीक के आश्रम में वेद वेदाङ्गों की शिक्षा लेने लगे। वे मेधावी थे इसी कारण शीघ्र ही वे समस्त शास्त्रों के ज्ञाता हो गए। फिर पुनः अपने पिता जमदग्नि के आश्रम में लौट कर उन्होंने सभी प्रकार के कर्मकांडों की शिक्षा ली। उनके माता पिता अपने पुत्र के संस्कार देख कर अत्यंत संतुष्ट थे। किन्तु नियति ने परशुराम का केवल वेदपाठी ब्राह्मण होना निश्चित नहीं किया था।

7 मई 2019

परशुराम - १

आप सभी को परशुराम जयंती (अक्षय तृतीया) की हार्दिक शुभकामनायें। आज अक्षय तृतीया के ही दिन जब नवग्रहों में से ६ ग्रह उच्च दशा में थे, ऐसे शुभ मुहूर्त में भगवान विष्णु के छठे अवतार के रूप में परशुराम का जन्म हुआ था। वैसे तो इनका मूल नाम 'राम' था किन्तु भगवान शिव द्वारा प्रदत्त विकराल परशु को सदैव धारण करने के कारण इनका नाम 'परशुराम' पड़ गया और वे इसी नाम से जगत विख्यात हुए।

परशुराम भृगुकुल में जन्मे थे। महर्षि भृगु के एक पुत्र थे ऋचीक। उनका विवाह कन्नौज के राजा महाराज गाधि की कन्या सत्यवती से हुआ। सत्यवती राजर्षि विश्वामित्र की बहन भी थी। उस विवाह में ऋचीक के पिता और सत्यवती के श्वसुर महर्षि भृगु पधारे। सत्यवती ने अपने श्वसुर की बड़ी सेवा की जिससे प्रसन्न होकर महर्षि भृगु ने उसे वरदान माँगने को कहा।

5 मई 2019

सप्तर्षि शृंखला ६.२ - महर्षि अंगिरस - २

पिछले लेख में आपने महर्षि अंगिरस के जन्म और वेदों में उनके महत्त्व के विषय में पढ़ा। महर्षि अंगिरस के कई संतानें हुई किन्तु उनमे से सर्वाधिक प्रसिद्ध देवगुरु बृहस्पति और महर्षि गौतम हैं। बृहस्पति उनके ज्येष्ठ पुत्र हैं जिन्हे आगे चल कर देवताओं के गुरु बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। महर्षि गौतम, जिन्होंने अपनी पत्नी अहल्या को पाषाण में बदलने का श्राप दे दिया था, इन्होने भी आगे चल कर सप्तर्षि का पद ग्रहण किया। 

3 मई 2019

सप्तर्षि शृंखला ६.१ - महर्षि अंगिरस - १

सप्तर्षियों एवं प्रजापतियों में से एक महर्षि अंगिरस की उत्पत्ति परमपिता ब्रह्मा के मुख से हुई मानी जाती है। गुणों में ये अपने पिता ब्रह्मा की ही भांति माने जाते हैं। आधुनिक युग में इन्हे ही 'अंगिरा' के नाम से जाना जाता है। ये एक मात्र ऐसे सप्तर्षि हैं जिन्हे चार वेदज्ञों में स्थान मिला है। वेदज्ञ वे चार लोग कहलाते हैं जिन्हे स्वयं परमपिता ब्रह्मा ने वेदों की शिक्षा दी। ये चार हैं - अंगिरस, अग्नि, वायु एवं आदित्य। इन्ही चारों ने चार वेदों का ज्ञान लिया और उसे आगे विश्व को प्रदान किया। 

1 मई 2019

जब श्रवण कुमार ने अपने माता पिता को पालकी से उतार दिया

हिन्दू धर्म में श्रवणकुमार का स्थान मातृ-पितृ भक्त के रूप में सर्वश्रेष्ठ है। शायद ही कोई ऐसा हो जिसे श्रवणकुमार के विषय में ना पता हो। जब भी हम श्रवण का नाम लेते हैं, हमारी दृष्टि में एक ऐसे किशोर का चित्र उभरता है जो अपने कन्धों पर रखे पालकी में आपने माता-पिता को ले जा रहा होता है। अपने माता पिता के प्रति ऐसी भक्ति विरले ही देखने को मिलती है।

हालाँकि इस लेख में हम श्रवणकुमार के जीवन के बारे में बात नहीं करने वाले हैं क्यूंकि इसके बारे में पहले ही बहुत कुछ कहा और सुना जा चुका है। इस लेख में हम श्रवणकुमार के जीवन की उस घटना के बारे में बताएँगे जब उन्होंने अपने वृद्ध और नेत्रहीन माता पिता को पैदल चलने के लिए विवश किया। तो आखिर क्या कारण था कि श्रवणकुमार जैसे मातृ-पितृ भक्त ने अपने वृद्ध माता पिता को पैदल चलने को विवश किया।

29 अप्रैल 2019

सप्तर्षि शृंखला ५ - महर्षि अत्रि

ऋषियों में श्रेष्ठ अत्रि मुनि अन्य सप्तर्षियो की भांति परमपिता ब्रह्मा के मानस पुत्र थे जिनकी उत्पत्ति ब्रह्मा की जिह्वा से हुई बताई जाती है। इन्होने ने ही इंद्र, अग्नि, वरुण और अन्य वैदिक देवताओं के लिए ऋचाओं की रचना की थी। महर्षि अत्रि के विषय में सर्वाधिक वर्णन ऋग्वेद में किया गया है जहाँ ऋग्वेद के ५वें मंडल को महर्षि अत्रि के सम्मान स्वरुप 'अत्रि मंडल' के नाम से जाना जाता है। इस मंडल में महर्षि अत्रि से सम्बंधित ८७ सूक्त वर्णित हैं। इसके अतिरिक्त महर्षि अत्रि पुराणों, रामायण और महाभारत में भी वर्णित हैं। 

27 अप्रैल 2019

सप्तर्षि शृंखला ४ - महर्षि मरीचि

महर्षि मरीचि परमपिता ब्रह्मा के प्रथम मानस पुत्रों में से एक हैं जिनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के नेत्रों से हुई मानी जाती है। नेत्रों से उत्पन्न होने के कारण उनका नाम 'मरिचि' पड़ा जिसका अर्थ होता है 'प्रकाश की किरण'। प्रथम मनु स्वयंभू के मन्वन्तर में जो ७ ऋषि (मरीचि, पुलत्स्य, पुलह, क्रतु, अंगिरा, अत्रि एवं वशिष्ठ) सप्तर्षि कहलाये वो सभी ब्रह्मपुत्र थे। ब्रह्मदेव के पुत्र होने के कारण उन्हें 'समब्रह्म' अर्थात ब्रह्मा के सामान कहा जाता है किन्तु मरीचि को उनकी महानता के कारण साक्षात् द्वितीय ब्रह्मा भी कहा जाता है।

25 अप्रैल 2019

सप्तर्षि शृंखला ३ - विभिन्न धर्मग्रंथों में वर्णिंत सप्तर्षि

पिछले लेख में आपने प्रत्येक मन्वन्तर में सप्तर्षियों का पद ग्रहण करने वाले महर्षियों के बारे में पढ़ा था। इसके अतिरिक्त विभिन्न धर्म ग्रंथों में भी सप्तर्षियों का अलग-अलग वर्णन है। आपको ये जानकर हैरानी होगी कि जैन धर्म में भी सप्तर्षियों की अवधारणा है। वहाँ इन्हे 'सप्त दिगंबर' कहा जाता है। तो आइये इनके बारे में जानते हैं।

23 अप्रैल 2019

सप्तर्षि शृंखला २ - प्रत्येक मन्वन्तर के सप्तर्षि

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि ब्रह्मदेव ने सर्प्रथम सप्तर्षियों को जन्म दिया। इस प्रकार वे ब्रह्मा के मानस पुत्र कहलाये। प्रथम मनु स्वयंभू के शासनकाल में ब्रह्मा के इन सातों पुत्रों ने सप्तर्षि का पद ग्रहण किया। किन्तु प्रत्येक मनु के शासनकाल में सप्तर्षि भी अलग-अलग होते हैं। आज के इस लेख में हम ये जानेंगे कि किस मनु के शासनकाल में कौन-कौन से ऋषि सप्तर्षि कहलाये।

21 अप्रैल 2019

सप्तर्षि शृंखला १ - परिचय एवं भूमिका

हिन्दू धर्म में सप्तर्षि वो सात सर्वोच्च ऋषि हैं जो ब्रह्मा के मानस पुत्र कहलाते हैं। कथाओं के अनुसार जब परमपिता ब्रह्मा ने इस सृष्टि की रचना की तब उन्होंने विश्व में ज्ञान के प्रसार के लिए अपने शरीर से ७ ऋषियों को प्रकट किया और उन्हें वेदों का ज्ञान देकर उस ज्ञान का प्रसार करने को कहा। ये ७ ऋषि ही समस्त ऋषिओं में श्रेष्ठ एवं अग्रगणी, 'सप्तर्षि' कहे जाते हैं। ब्रह्मा के अन्य पुत्रों जैसे मनु, प्रजापति इत्यादि का महत्त्व हो हैं ही किन्तु ब्राह्मणों के प्रणेता होने के कारण सप्तर्षिओं का महत्त्व सबसे अधिक माना जाता है।

19 अप्रैल 2019

रुक्मी - ३: बलराम से विवाद और मृत्यु

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार रुक्मी अपने बल का दम्भ भरते हुए पांडव और कौरव पक्ष की सहायता करने के लिए जाता है किन्तु उसके घमंड के कारण युधिष्ठिर और दुर्योधन दोनों उसकी सहायता लेने से मना कर देते हैं। इस प्रकार बलराम के अतिरिक्त वो आर्यावर्त का दूसरा ऐसा योद्धा बनता है जिसने महाभारत के युद्ध में भाग नहीं लिया था। अब आगे...

कृष्ण से पराजय के पश्चात उसने भोजकट को ही अपनी राजधानी बना लिया था और वही से विदर्भ का राज-काज संभालता था। कुण्डिनपुर में उसके पिता भीष्मक की छत्रछाया में उसका छोटा भाई रुक्मण भी उसकी सहायता करता था। बाद में उसने भीष्मक की सहमति से अपनी पुत्री रुक्मवती का विवाह श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ पुत्र प्रद्युम्न से कर दिया। प्रद्युम्न की पहले से एक पत्नी थी जिसका नाम माया था। किन्तु इतना करने के बाद भी उसे महाभारत के युद्ध में भाग लेने का अवसर नहीं मिला। अंततः उसकी सहायता के बिना ही युद्ध समाप्त हुआ और पांडव उस युद्ध में विजयी हुए।

17 अप्रैल 2019

रुक्मी - २: युद्ध में दोनों पक्षों ने ठुकराया

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि कैसे रुक्मी अपनी बहन रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल के साथ करना चाहता है किन्तु रुक्मिणी के विवाह के दिन ही श्रीकृष्ण उन्हें हर ले जाते हैं। रुक्मी उन्हें भोजकट में रोकता है और श्रीकृष्ण के साथ द्वन्द करता है जिसमे उसकी पराजय होती है। उस पराजय से वो इतना दुखी होता है कि लौटकर कुण्डिनपुर नहीं जाता और वहीँ भोजकट में ही अपनी राजधानी बना कर राज काज सँभालने लगता है। अब आगे...

15 अप्रैल 2019

रुक्मी - १: कृष्ण से बैर, युद्ध और पराजय

रुक्मी महाभारत का एक प्रसिद्ध पात्र है जो विदर्भ के राजा महाराज भीष्मक का सबसे बड़ा पुत्र था। महाराज भीष्मक के रुक्मी के अतिरिक्त रुक्मण सहित तीन अन्य पुत्र और रुक्मिणी नामक एक पुत्री थी। रुक्मी युवराज था और विदर्भ की राजधानी कुण्डिनपुर में अपने पिता की क्षत्रछाया में राज-काज संभालता था। बचपन से ही रुक्मी बहुत बलशाली और युद्ध विद्या में पारंगत था। किंपुरुष द्रुम उसके गुरु थे और उन्होंने रुक्मी को सभी प्रकार की युद्धकला में पारंगत किया था। इसके अतिरिक्त उसने भगवान परशुराम की कृपा से कई दिव्य अस्त्र भी प्राप्त किये थे। महाभारत में उसकी गिनती मुख्य अतिरथियों में की जाती है।

13 अप्रैल 2019

कालयवन - २: वरदान ने वरदान को काटा

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किसी प्रकार ऋषि शेशिरायण ने अपने अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए महादेव की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। उनकी कृपा से उन्हें एक ऐसे पुत्र की प्राप्ति हुई जो चंद्रवंशी या सूर्यवंशी द्वारा किसी भी अस्त्र अथवा शस्त्र से नहीं मारा जा सकता था। उसकी ख्याति सुनकर मलीच देश का राजा कालजंग उसे शेशिरायण से माँग कर ले गया। उसे उसने अपना पुत्र माना और कालयवन नाम दिया। इस प्रकार एक ब्राह्मणपुत्र एवं देश और यवनों का राजा बन गया। अब आगे...

11 अप्रैल 2019

कालयवन - १: ब्राह्मणपुत्र राक्षस बना

कालयवन महाभारत काल का एक योद्धा था जो यवनों का राजा था। नहुष के पुत्र ययाति के ५ पुत्र हुए और उन्ही से समस्त राजवंश चले। किन्तु पुरु को छोड़ कर ययाति ने किसी को भी एकछत्र सम्राट बनने का अधिकार नहीं दिया। उन्ही के एक पुत्र और पुरु के बड़े भाई 'द्रुहु' से म्लेच्छों का राजवंश चला। यवन भी द्रुहु के ही वंश में आते थे और उनका राज्य आर्यावर्त से बहुत दूर उजाड़ जगह पर अलग-थलग बसा हुआ था। अधिकतर लोगों को लगता है मुस्लिम ही प्राचीन काल में यवन थे किन्तु ऐसा नहीं है। हो सकता है इन्ही की कोई जाति से आगे चल कर मुस्लिम धर्म आरम्भ हुआ हो किन्तु मुस्लिम बहुत बाद में (लगभग ३५००-४०००) वर्ष बाद अस्तित्व में आये। 

9 अप्रैल 2019

लंका कैसे काली पड़ी?

रामायण का 'लंका दहन' प्रसंग उसके सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रसंगों में से एक है। आम धारणा है कि जब रावण ने महाबली हनुमान को बंदी बना कर उनकी पूछ में आग लगा दी तब उसी जलती हुई पूछ से हनुमान ने पूरी लंका में आग लगा दी। इससे पूरी लंका खण्डहर हो गयी जिसे बाद में रावण ने पुनः अपने स्वर्ण भंडार से पहले जैसा बसाया। हालाँकि इसके विषय में एक कथा हमें वाल्मीकि रामायण के साथ-साथ अन्य भाषाओँ की रामायण में भी मिलती है। इसके बारे में जो कथा प्रचलित है वो बजरंगबली और शनिदेव के संबंधों को भी दर्शाती है।

7 अप्रैल 2019

पुराणों में वर्णित पवन के प्रकार

पुराणों में पवनदेव की महत्ता के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। इंद्र, अग्नि, वरुण इत्यादि देवताओं के साथ पवनदेव भी मुख्य एवं सर्वाधिक प्रसिद्ध देताओं में से एक हैं। पवन को बल का भी प्रतीक माना जाता है क्यूंकि इसकी शक्ति के सामने बड़े-बड़े पर्वत भी नहीं टिक पाते। उल्लेखनीय है कि रुद्रावतार महावीर हनुमान और पाण्डवपुत्र महाबली भीमसेन भी पवन के ही अंशावतार थे।

सृष्टि में जीवन के लिए पवन का प्रवाह भी अति आवश्यक है। इसीलिए इसे प्राणवायु भी कहा जाता है क्यूंकि ये जीवों में जीवन का संचार करती है। पवन वैसे तो एक शब्द है लेकिन इसके भी कई प्रकार होते हैं। भौगोलिक रूप से तो पवन के कई प्रचलित प्रकार हैं जैसे व्यापारिक, पछुआ, ध्रुवीय इत्यादि किन्तु पौराणिक रूप से भी इसे ७ भागों में बांटा गया है। आइये इसके बारे में जानते हैं: 

5 अप्रैल 2019

पुरुरवा और उर्वशी की कथा: २ - उर्वशी की शर्त और देवताओं का छल

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार उर्वशी और पुरुरवा एक दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं किन्तु उर्वशी को स्वर्गलोग वापस जाना पड़ता है। पुरुरवा का ध्यान करते हुए स्वर्गलोक में हुए एक प्रहासन में उर्वशी से एक गलती हो जाती है जिस कारण भारत मुनि उसे पृथ्वीलोक में जाने का श्राप देते हैं। ये श्राप उर्वशी को वरदान के समान ही प्रतीत होता है और वो पृथ्वीलोक जाकर पुरुरवा से विवाह कर लेती है। अब आगे...

विवाह करने से पूर्व उर्वशी ने पुरुरवा से कहा कि उसकी तीन शर्तें हैं और अगर पुरुरवा उन्हें वचन देंगे कि वे उनकी तीन शर्तों को मानेंगे तभी उन दोनों का विवाह संभव है। पुरुरवा तो किसी भी स्थिति में उर्वशी से विवाह करना चाहते थे इसीलिए उन्होंने कहा कि वो जो कोई भी शर्त रखना चाहे रख सकती है। उनसे आश्वासन मिलने के बाद उर्वशी ने कहा: 

3 अप्रैल 2019

पुरुरवा और उर्वशी की कथा: १ - जब श्राप वरदान बना

ब्रह्मपुत्र मनु के एक पुत्र हुए जिनका नाम था इला। इला को पुरुष तथा स्त्री दोनों माना जाता है। अपने स्त्री रूप में इला ने चन्द्रमा और तारा (बृहस्पति की पत्नी) के अवैध पुत्र बुध से विवाह किया। इन्ही दोनों के पुत्र पुरुरवा हुए जिन्हे पुरुवंश का जनक माना जाता है। इन्ही के पुत्र आयु हुए, आयु के पुत्र नहुष और नहुष के पुत्र चक्रवर्ती सम्राट ययाति हुए जिनके पुत्रों से ही आगे समस्त कुल चले। पुरुरवा ने देवराज की सर्वश्रेठ अप्सरा उर्वशी से विवाह किया। इस तरह से उर्वशी पुरुवंश की राजमाता बनी।

1 अप्रैल 2019

नवरत्न

ज्योतिष शास्त्र में नवरत्नों का बड़ा महत्त्व है। इन नवरत्नों को नवग्रहों से जोड़ कर देखा जाता है। अलग-अलग ग्रहों से प्रभावित व्यक्तियों को अलग-अलग रत्नों को धारण करने की सलाह दी जाती है। हर रत्न के लिए एक विशेष मन्त्र भी है। कई बार रत्न काफी महंगे होते हैं इसी कारण इसके स्थान पर उपरत्नों को भी धारण किया जा सके ताकि निर्धन व्यक्ति भी इसका लाभ उठा सके। टूटा-फूटा, चिटका, दाग-धब्बेदार, रक्त या ताम्रवर्णीय मोती धारण करना हानिकारक होता है। तो आइये नवरत्नों के विषय में कुछ जानते हैं:

30 मार्च 2019

जब दुर्योधन ने सहदेव से युद्ध का मुहूर्त पूछा

महाभारत का युद्ध होना तय हो चुका था। अंतिम प्रयास के रूप में श्रीकृष्ण हस्तिनापुर गए किन्तु मूढ़ कौरवों ने उनका भी अपमान किया और उनके केवल ५ गाँव देने के प्रस्ताव को अभी अस्वीकार कर दिया। कृष्ण को तो खैर ये पता ही था कि ये युद्ध किसी भी स्थिति में टल नहीं सकता है किन्तु भीष्म और द्रोण ने दुर्योधन के हठ की ऐसी पराकाष्ठा देखी तो वे भी समझ गए कि कुरुवंश के नाश का समय अब आ गया है।

अब युद्ध की तैयारियाँ आरम्भ हो गयी और उसके लिए स्थान और दिन निश्चित करने की बात आयी। जब स्थान नियत करने का प्रश्न आया तो श्रीकृष्ण और भीष्म ने एक स्वर में कुरुक्षेत्र के सम्यक पञ्चक प्रदेश का चुनाव किया। ये वही स्थान था जहाँ भगवान परशुराम ने २१ बार क्षत्रियों का नाश करके उनके रक्त से पाँच सरोवर भर दिए थे। कौरवों और पांडवों के पूर्वज महाराज कुरु को देवराज इंद्र ने वरदान दिया था कि यहाँ जो भी मृत्यु को प्राप्त होगा, वे निश्चय ही स्वर्ग को प्राप्त करेगा। इसी कारण दोनों ने इस स्थान का चुनाव किया। कुछ समय में दोनों ओर की सेनाएँ कुरुक्षेत्र में उपस्थित हो गयी।

28 मार्च 2019

मकरध्वज

महाबली हनुमान को बाल ब्रह्मचारी कहा जाता है। हालाँकि पुराणों में उनके विवाह का वर्णन है जहाँ उन्हें भगवान सूर्यनारायण की पुत्री सुवर्चला से विवाह करना पड़ा था। किन्तु ये विवाह केवल उनकी शिक्षा पूर्ण करने के लिए था और इसके अतिरिक्त उन दोनों में कोई और सम्बन्ध नहीं रहा। इस बारे में आप विस्तार से यहाँ पढ़ सकते हैं। इसके अतिरिक्त हनुमान के एक पुत्र मकरध्वज का भी वर्णन रामायण में मिलता है। ये कथा तब आती है जब हनुमान श्रीराम और लक्ष्मण को अहिरावण की कैद से मुक्त करवाने जाते हैं। इसके बारे में आप विस्तार से यहाँ पढ़ सकते हैं।

संक्षेप में कथा ये है कि रावण अपने भाई अहिरावण को सहायता के लिए बुलाता है और अहिरावण अपनी माया से श्रीराम और लक्ष्मण का अपहरण कर लेता है। जब सबको पता चलता है कि श्रीराम और लक्ष्मण शिविर में नहीं हैं तो सभी चिंतित हो जाते हैं। विभीषण द्वारा ये पुष्टि करने पर कि दोनों भाइयों को अहिरावण ले गया है, हनुमान उन्हें मुक्त करवाने पाताल लोक पहुँचते हैं। जब वे पाताल लोक के मुख्य द्वार पर पहुँचते हैं तो उन्हें वहाँ एक वानर द्वार की रक्षा करते हुए दिखता है। 

26 मार्च 2019

पौराणिक घटनाओं का कालखंड

पौराणिक काल गणना के विषय में हम सब जानते हैं। इसमें १२००० दिव्य वर्षोंका एक चतुर्युग होता है जिसमे ४८०० दिव्य वर्ष का कृतयुग (सतयुग), ३६०० दिव्य वर्षका त्रेतायुग, २४०० दिव्य वर्षका द्वापरयुग और १२०० दिव्य वर्ष का कलियुग होता है। इसी गणना से ब्रह्माजी की आयु १०० वर्ष की होती है अर्थात् २ परार्ध (३११०४०००००००००० सौर वर्ष)। काल गणना और युगों की समय सीमा के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए निम्न लेखों को पढ़ें:
  1. कालचक्र और युगों का वर्णन
  2. हिन्दू काल गणना
  3. दशावतार

24 मार्च 2019

राक्षसराज सुकेश

राक्षसराज सुकेश राक्षस जाति के पूर्व पुरुषों में से एक है। वही एकलौता ऐसा राक्षस है जिसे स्वयं महादेव और माता पार्वती का पुत्र होने का गौरव प्राप्त है। पुराणों के अनुसार परमपिता ब्रह्मा से दो विकराल राक्षसों की उत्पत्ति हुई और वहीँ से राक्षस कुल का आरम्भ हुआ। उनका नाम था हेति और प्रहेति। प्रहेति सच्चरित्र था और तपस्या में लीन हो गया। हेति का विवाह यमराज की बहन भया से हुआ जिससे उन्हें विद्युत्केश नाम का पुत्र प्राप्त हुआ।

22 मार्च 2019

श्रीकृष्ण और ८ अंक

जिस प्रकार महाभारत में १८ अंक की विशेष महत्ता है उसी प्रकार श्रीकृष्ण के जीवन में भी ८ अंक का बहुत महत्त्व है। उनके जीवन के कई घटनाक्रम है जो ८ अंक से जुडी हुई हैं। आइये उनमे से कुछ जानते हैं:
  • श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के वें अवतार थे। 
  • उनका जन्म वें मनु वैवस्वत के कार्यकाल में हुआ। 
  • उनका जन्म रात्रि के वें प्रहर में हुआ। 
  • जब उनका जन्म हुआ तो उस लग्न पर ग्रहों (शनि को छोड़ कर अन्य नवग्रह) की शुभ दृष्टि थी। 
  • उनका जन्म रोहिणी नक्षत्र के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था। 

20 मार्च 2019

रावण संहिता - २

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि रावण को परमपिता ब्रह्मा और भगवान रूद्र से कई अवतार प्राप्त हुए किन्तु जो विशेष अवतार उसे प्राप्त हुआ वो था पृथ्वी के समस्त प्राणियों के तीन जन्मों का लेखा जोखा प्राप्त होना। इस कारण वो ये पहले ही जान गया था कि उसकी मृत्यु श्रीराम के हाथों ही होगी। अब आगे...

अपनी मृत्यु का कारण जानने के बाद उसने उसे बदलने का निश्चय किया। वो महान योद्धा था। नारायणास्त्र को छोड़कर विश्व के सभी दिव्यास्त्र उसके पास थे (हालाँकि पाशुपतास्त्र उसके लिए उपयोगी सिद्ध नहीं हुआ)। उसके बल का ऐसा प्रताप था कि युद्ध में उसने यमराज को भी पराजित किया और स्वयं नारायण के सुदर्शन चक्र को पीछे हटने पर विवश कर दिया। ब्रह्मा के वरदान से उसकी नाभि में अमृत था जिसके सूखने पर ही उसकी मृत्यु हो सकती थी। रूद्र के वरदान से उसका शीश चाहे कितनी बार भी काटो, उससे उसकी मृत्यु नहीं हो सकती थी। किन्तु इतना सब होने के बाद भी वो अजेय और अवध्य नहीं था। उसने निश्चय किया कि वो अपने पुत्र, जो अभी मंदोदरी के गर्भ में था, उसे अविजित और अवध्य बनाएगा।

18 मार्च 2019

रावण संहिता - १

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि रावण में चाहे जैसे भी अवगुण हों पर वो अपने समय का सबसे महान पंडित था। मातृकुल से राक्षस होने के बाद भी वो ब्राह्मण कहलाया क्यूंकि उसका पितृकुल ब्राह्मण था। वो परमपिता ब्रह्मा के पुत्र महर्षि पुलत्स्य का पौत्र और महर्षि विश्रवा पुत्र था। तो जो व्यक्ति इतना बड़ा पंडित हो वो अपना ज्ञान विश्व को अवश्य देना चाहता है। इसी कारण रावण ने कई ग्रंथों की रचना की जिसमे से 'शिवस्त्रोत्रताण्डव' एवं 'रावण संहिता' प्रमुख है। इस लेख में हम रावण द्वारा रचित महान ग्रन्थ रावण संहिता के विषय में जानेंगे। 

रावण संहिता विशेष रूप से 'कर्म फल' को बताती है। अर्थात इसमें मनुष्यों के कर्म फल का लेखा जोखा है। ये पुस्तक मुख्यतः ज्योतिष और तंत्र-मन्त्र पर आधारित है जो आपके सभी प्रकार के दुखों से मुक्ति का मार्ग बताती है। यहाँ एक बात विशेष रूप से बोलना चाहूँगा कि रावण संहिता में समस्त दुखों को मिटाने के किसी ज्योतिष एवं तांत्रिक उपाय (टोने-टोटके) का वर्णन मैं इस लेख में नहीं करूँगा क्यूंकि इस लेख का मुख्य उद्देश्य रावण संहिता के महत्त्व के बारे में हैं ना कि उसमे दिए गए उपायों के विषय में। अगर कोई उन उपायों के विषय में जानना चाहता हो तो वो गीताप्रेस द्वारा प्रकाशित वृहद् रावण संहिता पढ़ सकता है। 

16 मार्च 2019

जब ब्रह्मदेव ने बताया क्यों देवता दैत्यों से श्रेष्ठ हैं

एक बार देवर्षि नारद घूमते-घूमते अपने पिता के पास ब्रह्मलोक पहुँचे। वहाँ परमपिता ने उनका स्वागत किया और उनके आने का उद्देश्य पूछा। तब नारद ने कहा - "हे पिताश्री! आप इस समस्त संसार के जनक हैं। सृष्टि में जो कुछ भी है उनकी उत्पत्ति आपसे ही हुई है। देव और दैत्य दोनों आपके पौत्र महर्षि कश्यप की संतानें हैं। जिस प्रकार कश्यप की पत्नी अदिति से देवों की उत्पत्ति हुई है, उसी प्रकार उनकी पत्नी दिति से दैत्यों की। दिति अदिति की अग्रज है इसी कारण दैत्य देवताओं के बड़े भाई हुए। इसके अतिरिक्त बल में भी वे देवताओं से बढ़कर ही हैं। फिर क्या कारण है कि आज जहाँ देवता स्वर्ग में समस्त सुख भोग रहे हैं, वहीं दैत्य पाताल में निवास करने को विवश हैं। महादेव के विषय में तो मैं नहीं कह सकता किन्तु आपने और नारायण ने सदैव देवों को ही श्रेष्ठ समझा है। मैं इसका कारण समझने में असमर्थ हूँ। कृपया बताइये कि क्यों आप और श्रीहरि देवों को दैत्यों से श्रेष्ठ समझते हैं?"

12 मार्च 2019

रावण का मानमर्दन १: दैत्यराज बलि

चित्र के लिए आभार - वेबदुनिया
रावण की वीरता के किस्से तो सबने सुने होंगे किन्तु कई ऐसी अवसर थे जब रावण को भी पराजय का सामना करना पड़ा। इसी को ध्यान में रखकर मैंने 'रावण का मानमर्दन' नाम की श्रृंखला लिखने का निश्चय किया है जिसमे विभिन्न योद्धाओं द्वारा रावण की पराजय का वर्णन है। इस पहली कथा में हम आपको बताएँगे कि किस प्रकार रावण अपनी शक्ति के मद में दैत्यराज बलि से उलझा और उसे मुँह की खानी पड़ी। महाराज बलि के विषय में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ।