20 अक्तूबर 2019

अतिकाय - २

पिछले लेख में आपने रावण के दूसरे पुत्र अतिकाय के जन्म के बारे में पढ़ा। आपने ये भी पढ़ा कि किस प्रकार अतिकाय ने अपने पराक्रम से महारुद्र को प्रसन्न किया और उनसे कई वरदान और दिव्यास्त्र प्राप्त किये। अतिकाय को भगवान रूद्र से एक दिव्य त्रिशूल भी प्राप्त हुआ जो अचूक था। जब अतिकाय शक्ति संपन्न होकर वापस आया तब रावण की शक्ति और बढ़ गयी। अब आगे...

अतिकाय के जन्म के विषय में एक कथा और आती है कि वो और उसका भाई त्रिशिरा, जो रावण और धन्यमालिनी का पुत्र था दोनों दैत्य मधु और कैटभ के अवतार थे। पिछले जन्म में भगवान विष्णु के द्वारा दोनों का वध किये जाने के बाद दोनों ने उनसे प्रतिशोध के लिए पुनः त्रेतायुग में रावण के पुत्र के रूप में जन्म लिया।

18 अक्तूबर 2019

अतिकाय - १

हम सबने रावण के ज्येष्ठ पुत्र मेघनाद के विषय में जरूर पढ़ा होगा किन्तु रावण के दूसरे पुत्र अतिकाय के विषय में अधिक जानकारी नहीं दी गयी है। इस लेख में रावण के दूसरे पुत्र अतिकाय के विषय में बताया जाएगा। वो रावण के ७ पुत्रों में से एक था जो मंदोदरी से उत्पन्न हुआ था। हालाँकि कई ग्रंथों में रावण की दूसरी पत्नी धन्यमालिनी को अतिकाय की माता बताया जाता है। धन्यमालिनी मंदोदरी की छोटी बहन थी जो मय दानव और हेमा अप्सरा की पुत्री थी। 

16 अक्तूबर 2019

भूरिश्रवा - २

पिछले लेख में आपने भूरिश्रवा के वंश के बारे में पढ़ा। वो भी कुरुवंशी थे और धृतराष्ट्र के भाई और भीष्म के भतीजे थे। उनके पिता सोमदत्त और सात्यिकी के पिता शिनि की प्रतिद्वंदिता के कारण कुरुओं और यादवों में वैमनस्व बढ़ गया। दोनों ने भगवान शंकर से पुत्र की कामना की जिससे भूरिश्रवा और सात्यिकी का जन्म हुआ। अब आगे...

14 अक्तूबर 2019

भूरिश्रवा - १

भूरिश्रवा महाभारत के सबसे प्रसिद्ध योद्धाओं में से एक थे। इन्होने महाभारत युद्ध में कौरवों के पक्ष से युद्ध किया था। कौरव सेना के प्रधान सेनापति भीष्म ने अपनी ११ अक्षौहिणी सेना के लिए जिन ११ सेनापतियों का चयन किया था, भूरिश्रवा उन सेनापतियों में से एक थे। भूरिश्रवा का वध युद्ध के १४वें दिन सात्यिकी ने किया था। वास्तव में भूरिश्रवा कुरुवंशी ही थे और महाभारत युद्ध में उनके साथ उनके पिता और दादा ने भी युद्ध किया था। 

12 अक्तूबर 2019

शरद पूर्णिमा

कल शरद पूर्णिमा का पर्व है। इस पर्व का हिन्दू धर्म में विशेष महत्त्व है। आश्विन महीने की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। शरद का एक अर्थ चन्द्रमा भी है और इस दिन चाँद की किरणों का अपना एक अलग ही महत्त्व होता है। कहा जाता है कि शरद पूर्णिमा के दिन चंद्र की किरणों में स्वयं अमृत समाहित होता है। यही कारण है कि आज के दिन गावों में लोग खुले आकाश एवं चांदनी के नीचे सोते हैं। कहते हैं कि शरद पूर्णिमा की रौशनी में रहने से कई प्रकार के रोग समाप्त हो जाते हैं। 

10 अक्तूबर 2019

रावण का मानमर्दन २: असुरराज शंभर

ये रावण के मानमर्दन श्रृंखला का दूसरा लेख है। इससे पहले के लेख में हमने ये बताया था कि किस प्रकार रावण दैत्यराज बलि के हाथों परास्त होने के बाद अपमानित होता है। इस लेख के बारे में विस्तार से यहाँ पढ़ें। इस लेख में हम असुरराज शंभर के हाथों रावण के पराजय की कथा बताएंगे। शंभर वैजंतपुर के सम्राट थे। उनकी पत्नी माया मय दानव की पुत्री एवं रावण की पत्नी मंदोदरी की बड़ी बहन थी। इस प्रकार रावण शंभर का सम्बन्धी था।

8 अक्तूबर 2019

माद्री - २

पिछले लेख में अपने पढ़ा कि किस प्रकार दिग्विजय के दौरान हस्तिनापुर के नरेश पाण्डु को अपनी पहली पत्नी कुंती के रहते हुए भी माद्री से विवाह करना पड़ता है। हालाँकि उसके बाद भी कुंती और माद्री के बीच सम्बन्ध सौहार्दयपूर्ण ही रहता है। उसके बाद वे तीनों एकांतवास के लिए वन को जाते हैं और किंदम ऋषि के आश्रम में ठहरते हैं। अब आगे...

6 अक्तूबर 2019

माद्री - १

आज पंजाब में जिस स्थान पर रावी और चिनाब नदियों का मिलन होता है उसे ही पहले मद्रदेश कहा जाता था। वहाँ के एक राजा थे भगवान, जिन्होंने लम्बे समय तक मद्र पर शासन किया। मद्रदेश उस समय आर्यावर्त के सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली राज्यों में से एक माना जाता था। उनकी दो संतानें थी, एक पुत्र और एक पुत्री। पुत्र का नाम शल्य और पुत्री का माद्री था। 

4 अक्तूबर 2019

माँ गौरी और उनके वाहन की कथा

माता सती की मृत्यु के उपरांत भगवान शिव बैरागी हो गए। तब सती ने पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया। उस जन्म में भी उनका महादेव के प्रति अनुराग था और इसी कारण उन्होंने भगवान शिव की घोर तपस्या की और अंततः उन्हें पति के रूप में प्राप्त किया। दोनों का विवाह बड़ी धूम धाम से हुआ और फिर वे दोनों अपने निवास कैलाश पर लौट आये और कुछ काल उन्होंने बड़े सुख से बिताये। 

एक दिन महादेव और देवी पार्वती कैलाश में बैठे हास-परिहास कर रहे थे कि अचानक महादेव ने उन्हें परिहास में "काली" शब्द से सम्बोधित कर दिया। महादेव का ये सम्बोधन माता पार्वती को चुभ गया और वे तत्काल अपने श्याम रंग से मुक्ति पाने हेतु तपस्या के लिए निकल गयी। महादेव ने उन्हें रोकने का बड़ा प्रयत्न किया किन्तु उन्होंने ये निश्चय कर लिया था कि वो गौर वर्ण प्राप्त कर के ही रहेंगी। 

2 अक्तूबर 2019

माँ दुर्गा के १०८ नाम

माता पार्वती ही संसार की समस्त शक्तियों का स्रोत हैं। उन्ही का एक रूप माँ दुर्गा को भी माना जाता है। उनपर आधारित ग्रन्थ "दुर्गा सप्तसती" में माँ के १०८ नामों का उल्लेख है। प्रातःकाल इन नामों का स्मरण करने से मनुष्य के सभी दुःख दूर होते हैं। आइये उन नामों और उनके अर्थों को जानें:
  1. सती: भगवान शंकर की पहली पत्नी। अपने पिता प्रजापति दक्ष के यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देने वाली इन देवी का माहात्म्य इतना है कि उसके बाद पति परायण सभी स्त्रियों को सती की ही उपमा दी जाने लगी।
  2. साध्वी: ऐसी स्त्री जो आशावादी हो।
  3. भवप्रीता: जिनकी भगवान शिव पर अगाध प्रीति हो। 
  4. भवानी: समस्त ब्रह्माण्ड ही जिनका भवन हो।

30 सितंबर 2019

महर्षि भृगु - २

पिछले लेख में आपने महर्षि भृगु के जन्म, वंश, पत्नियों और पुत्रों के विषय में पढ़ा। अब आगे... शिव पुराण एवं वायु पुराण में ऐसा वर्णन है कि जब दक्ष प्रजापति ने भगवान शिव के अपमान हेतु महायज्ञ का आयोजन किया तो महर्षि भृगु उस यज्ञ में उपस्थित थे। जब सबने देखा कि दक्ष ने महादेव को आमंत्रित नहीं किया है तो महर्षि कश्यप के साथ भृगु ने भी दक्ष को चेतावनी दी कि महादेव के बिना ये यज्ञ सफल नहीं हो सकता। किन्तु अभिमान वश दक्ष ने उनकी बात अनसुनी कर दी। इसका परिणाम ये हुआ कि अपने पति का अपमान देख कर सती ने उसी यञकुंड में आत्मदाह कर लिया।

28 सितंबर 2019

महर्षि भृगु - १

पुराणों में महर्षि भृगु के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। ये भारतवर्ष के सर्वाधिक प्रभावशाली, सिद्ध और प्रसिद्ध ऋषियों में से एक है। ये परमपिता ब्रह्मा और महर्षि अंगिरा के छोटे भाई थे और वर्तमान के बलिया (उत्तरप्रदेश) में जन्मे थे। ये एक प्रजापति भी हैं और स्वयंभू मनु के बाद के मन्वन्तरों में कई जगह इनकी गणना सप्तर्षियों में भी की जाती है। इनके वंशज आगे चल कर भार्गव कहलाये और उनसे भी भृगुवंशियों का प्रादुर्भाव हुआ। नारायण के छठे अवतार श्री परशुराम भी इन्ही के वंश में जन्मे और भृगुवंशी कहलाये।

26 सितंबर 2019

दस दिशाएं - २

पिछले लेख में आपने उर्ध्व, दक्षिण, पूर्व, ईशान एवं आग्नेय दिशाओं के बारे में पढ़ा। इस लेख में हम अन्य ५ दिशाओं के बारे में जानेंगे।

६. नैऋत्य: दक्षिण और पश्चिम दिशा के मध्य के स्थान को नैऋत्य कहा गया है। यह दिशा सूर्यदेव के आधिपत्य में है और इस दिशा के स्वामी राहु हैं। शिवानी देवी इस दिशा की अधिष्ठात्री हैं। इस दिशा में पृथ्वी तत्व प्रमुख रूप से विद्यमान रहता है इसी कारण घर की भारी वस्तुएं इस दिशा में रखनी जाहिए। इस दिशा में जल तत्व को रखने की मनाही है। अर्थात इस दिशा में कुआँ, बोरिंग, गड्ढे इत्यादि नहीं होना चाहिए। सूर्यदेव के संरक्षण में होने के कारण इस दिशा को वास्तु के अनुसार सही रखने पर जीवन में सफलता प्राप्त होती है।

24 सितंबर 2019

दस दिशाएं - १

पिछले लेख में आपने १० दिशों के दिक्पालों के बारे में विस्तार से पढ़ा। आज हम उन १० दिशाओं के महत्त्व के बारे में जानेंगे। 
  1. उर्ध्व: इस दिशा के देवता स्वयं परमपिता ब्रह्मा हैं। उर्ध्व का अर्थ आकाश है और जो कोई भी उर्ध्व की ओर मुख कर सच्चे मन से ईश्वर की प्रार्थना करता है, उसे उसका फल अवश्य प्राप्त होता है। वेदों में ऐसा लिखा है कि अगर कभी भी कुछ मांगना हो तो ब्रह्म और ब्रह्माण्ड से ही मांगना चाहिए। उनसे की हुई हर प्रार्थना स्वीकार होती है। हमारे घर की छत, छज्जे, रोशनदान एवं खिड़कियां इस दिशा का प्रतिनिधित्व करते हैं। कहा जाता है कि कभी भी आकाश की ओर देख कर अपशब्द नहीं बोलना चाहिए, आकाश की ओर कुछ फेंकना, थूकना, चिल्लाना इत्यादि वर्जित है। जिस प्रकार आकाश की ओर फेंकी हुई कोई भी चीज वापस आपके पास ही आती है उसी प्रकार आकाश की ओर देखकर की गयी प्रार्थना आप पर सकारात्मक प्रभाव डालती है और आपका जीवन खुशहाल हो जाता है। दूसरी ओर अगर आप आकाश की ओर देख कर अपशब्द कहते हैं अथवा बद्दुआ देते हैं तो वो वापस आपके ही जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डालती है और उसे दुखों से भर देती है।

22 सितंबर 2019

दिक्पाल - २

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार ब्रह्मदेव के कर्णों से १० दिशाओं की उत्पत्ति होती है और फिर उनके अनुरोध पर ब्रह्मदेव उनके पतियों के रूप में ८ देवताओं की रचना करते हैं और उन्हें ८ दिशाओं के अधिपति बना कर दिक्पालों का पद प्रदान करते हैं। यहाँ पर एक बात ध्यान देने वाली है कि अधिकतर ग्रंथों में ईशान दिशा के स्वामी भगवान शिव और अधो दिशा के स्वामी भगवान विष्णु माने जाते है। इस लेख में हम १० दिशाओं के देवताओं के बारे में विस्तार से जानेंगे।

20 सितंबर 2019

दिक्पाल - १

दिशाओं के विषय में सबको पता है। हमें मुख्यतः ४ दिशाओं के बारे में पता होता है जो हैं पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण। वैज्ञानिक और वास्तु की दृष्टि से ४ और दिशाएं है जो इन चारों दिशाओं के मिलान बिंदु पर होती हैं। ये हैं - उत्तरपूर्व (ईशान), दक्षिणपूर्व (आग्नेय), उत्तरपश्चिम (वायव्य) एवं दक्षिणपश्चिम (नैऋत्य)। तो इस प्रकार ८ होती हैं जो सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं।

18 सितंबर 2019

कार्तवीर्य अर्जुन - ४: सहस्तार्जुन के बाद का वंश

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार अर्जुन को अपने पिता कार्तवीर्य के बाद राजगद्दी मिलती है और वो महर्षि जमदग्नि के आश्रम से उनकी प्रिय गाय कामधेनु को बलात अपने साथ ले जाता है। जब परशुराम को इस बात की जानकारी मिलती है हो तो वे सहस्त्रार्जुन को युद्ध के लिए ललकारते हैं और दोनों में भीषण युद्ध होता है। उस युद्ध में अंततः सहस्त्रार्जुन की मृत्यु हो जाती है। अब आगे...

16 सितंबर 2019

कार्तवीर्य अर्जुन - ३: परशुराम के साथ युद्ध और मृत्यु

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि अपने पिता कार्तवीर्य की मृत्यु के बाद उनके पुत्र कार्तीवीर्य अर्जुन को सिंहासन प्राप्त हुआ। और अधिक शक्ति प्राप्त करने के लिए अर्जुन ने श्री दत्तात्रेय की घोर आराधना कर उनसे १००० भुजाओं का वरदान प्राप्त किया। उन १००० भुजाओं के कारण ही उनका एक नाम सहस्तार्जुन भी हुआ। अपनी इस शक्ति के बल पर उसने सातों द्वीपों पर अपना अधिकार जमा लिया और सप्तद्वीपाधिपति कहलाया। यहाँ तक कि लंकापति रावण को भी उसने युद्ध में परास्त किया। अब आगे...

14 सितंबर 2019

कार्तवीर्य अर्जुन - २: अर्जुन से सहस्त्रार्जुन की यात्रा

पिछले लेख में आपने परमपिता ब्रह्मा से लेकर कार्तवीर्य अर्जुन तक के वंश का वर्णन पढ़ा। कार्तवीर्य अर्जुन चंद्रवंशी राजाओं में सबसे प्रतापी थे। उनके पिता महाराज कार्तवीर्य ने अपने राज्य को बहुत बढ़ाया। फिर अपने मंत्रियों की सलाह पर उन्होंने भृगुवंशी ब्राह्मणों को अपने पुरोहितों के रूप में नियुक्त किया। उस समय भृगुवंशी ब्राह्मणों का नेतृत्व परशुराम के पिता जमदग्नि कर रहे थे। महर्षि जमदग्नि के साथ कार्तवीर्य के बहुत मधुर सम्बन्ध थे। कार्तवीर्य जमदग्नि का बड़ा आदर करते थे और राजकाज में उनका परामर्श लेते थे।

12 सितंबर 2019

कार्तवीर्य अर्जुन - १: वंश वर्णन

कार्तवीर्य अर्जुन पौराणिक काल के एक महान चंद्रवंशी सम्राट थे जिनकी राजधानी महिष्मति नगरी थी। परमपिता ब्रह्मा के पुत्र अत्रि ऋषि हुए। अत्रि से चंद्र और चंद्र से बुध हुए। बुध और उनकी पत्नी इला के पुत्र महान पुरुरवा हुए जिन्होंने उर्वशी से विवाह किया। दोनों के पुत्र आयु हुए और आयु के पुत्र नहुष हुए। नहुष के पुत्र चक्रवर्ती सम्राट ययाति हुए जिनके ज्येष्ठ पुत्र यदु हुए। इन्ही से यदुकुल चला जिसमे आगे चलकर श्रीकृष्ण ने जन्म लिया। यदु के पुत्र सहस्त्रजीत हुए और उनके पुत्र शतजीत हुए। इन्ही शतजीत के पुत्र हैहय हुए जिनसे हैहयवंश चला। इसी वंश में कार्तवीर्य अर्जुन ने जन्म लिया। महाराज हैहय ने प्रतिष्ठानपुर को अपनी राजधानी बनाया।

10 सितंबर 2019

सोलह सिद्धियाँ - २

पिछले लेख में आपने इन १६ सिद्धियों में से पहली आठ सिद्धियों के बारे में पढ़ा। इस लेख में हम अगली ८ सिद्धियों के विषय में जानेंगे।

९. देवक्रियानुदर्शन: इस सिद्धि को प्राप्त करने के बाद साधक विभिन्न देवताओं का सानिध्य प्राप्त कर सकता है। यही नहीं वो देवताओं को अपने अनुकूल बना कर उनसे उचित सहयोग ले सकता है। हमारे पुराणों में कई महान ऋषि हुए हैं जो अपनी इच्छा अनुसार देवताओं से मिल सकते हैं। दुर्वासा, भृगु, वशिष्ठ इत्यादि ऐसे कई ऋषि इसके उदाहरण हैं।

8 सितंबर 2019

सोलह सिद्धियाँ - १

आप सब ने महावीर हनुमान की अष्ट सिद्धियों के बारे में पढ़ा। इसके अतिरिक्त हमारे पुराणों में १६ मुख्य सिद्धियों का वर्णन किया गया है। किसी एक व्यक्ति में सभी १६ सिद्धियों का होना दुर्लभ है। केवल अवतारी पुरुष, जैसे श्रीराम, श्रीकृष्ण इत्यादि में ही ये सारी सिद्धियाँ हो सकती है। साथ ही बहुत सिद्ध ऋषियों जैसे सप्तर्षियों में ये साडी सिद्धियाँ हो सकती है। आइये इन सिद्धियों के विषय में कुछ जानते हैं:

4 सितंबर 2019

गणेश चतुर्थी - २

पिछले लेख में आपने श्रीगणेश के जन्म की कथा पढ़ी। आपने ये भी जाना कि साल के हर महीने में श्रीगणेश की पूजा होती है जिसे हम "विनायक चतुर्थी" कहते हैं पर उनमे से भाद्रपद की चतुर्थी तिथि सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है जिसे हम "गणेश चतुर्थी" कहते हैं। ये तो सभी जानते हैं कि गणेश चतुर्थी का त्यौहार १० दिनों तक रहता है और उसके बाद उनकी प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। इस परंपरा के पीछे भी एक कथा है। 

बात तब की है जब ब्रह्मदेव की प्रेरणा से महर्षि व्यास ने महाभारत की कथा को लिखने का निर्णय लिया। उन्होंने ये निश्चय किया कि वे केवल श्लोकों की रचना करेंगे। किन्तु फिर उस महान कथा को लिपिबद्ध कौन करे? तब उन्होंने श्रीगणेश से प्रार्थना की कि वे उस कथा को लिखने की कृपा करें। उनका अनुरोध सुनकर श्रीगणेश उस कथा को लिखने के लिए तैयार तो हो गए पर उन्होंने एक शर्त रख दी कि एक बार लिखना शुरू होने के बाद उनकी लेखनी कभी रुकनी नहीं चाहिए। अगर व्यास ने कथा सुनाना बंद किया और उनकी लेखनी रुकी तो वे आगे उस कथा को नहीं लिखेंगे।

2 सितंबर 2019

गणेश चतुर्थी - १

आप सभी को गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनायें। गणेश चतुर्थी श्रीगणेश का सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं प्रसिद्द पर्व है जिसे पूरे देश में हर्षोल्लास से मनाया जाता है। विशेषकर महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में इस पर्व की बहुत अधिक मान्यता है और वहाँ इस उत्सव को भव्य रूप से १० दिनों तक मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी को महाचतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि इसी दिन श्रीगणेश का जन्म हुआ था और दुर्भाग्य से इसी दिन उनकी मृत्यु भी हो गयी थी। बाद में भगवान शंकर की कृपा से इसी दिन उन्हें जीवनदान भी प्राप्त हुआ। यही कारण है कि इस पर्व का इतना अधिक महत्त्व है।

31 अगस्त 2019

ब्राह्मणों के प्रकार

वैसे तो ये सम्पूर्ण सृष्टि ही परमपिता ब्रह्मा से उत्पन्न हुई है किन्तु उनमे से भी ब्राह्मणों को उनका ही दूसरा रूप माना गया है। "ब्राह्मण", ये शब्द भी स्वयं "ब्रह्मा" से उत्पन्न हुआ है। हमारे धार्मिक ग्रंथों में कई स्थान पर ऋषि, मुनि इत्यादि का वर्णन है। आम तौर पर हम इसे एक ही समझ लेते हैं किन्तु इनमे भी भेद है। हमारे ग्रंथों में ब्राह्मणों के भी ८ प्रकार बताये गए हैं। तो आइए आज इस विषय में कुछ जानते हैं।

29 अगस्त 2019

तिरुपति बालाजी - ४

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार भगवान विष्णु ने पृथ्वी पर श्रीनिवास एवं माता लक्ष्मी ने पद्मावती के रूप में जन्म लिया। पद्मावती से विवाह करने के लिए श्रीनिवास ने देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर से धन उधार लिया और कलियुग के अंत तक उनके धन को लौटने का वचन दिया। अब आइये हम तिरुपति बालाजी मंदिर के विषय में और कुछ रोचक तथ्य जानते हैं।

25 अगस्त 2019

तिरुपति बालाजी - ३

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि भगवान विष्णु को त्यागने के बाद माता लक्ष्मी ने पद्मावती के नाम से पृथ्वी पर जन्म लिया। उन्हें खोजते-खोजते श्रीहरि ने भी श्रीनिवास के नाम से पृथ्वी पर जन्म लिया। युवा होने पर एक बार श्रीनिवास एक वन में पहुँचे जहाँ उन्होंने प्रथम बार पद्मावती को देखा। वापस आकर उन्होंने बकुलामाई, जिन्हे वो अपनी माता मानते थे, उन्हें अपने प्रेम के विषय में बताया। तब उनकी व्याकुलता देख कर बकुलामाई ने उनकी सहायता का वचन दिया। अब आगे...

23 अगस्त 2019

उज्जैन से अन्य ज्योतिर्लिंगों की अद्भुत दूरी


द्वादश ज्योतिर्लिंग श्रृंखला में हमने महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के बारे में एक लेख लिखा था। कहा गया है:

आकाशे तारकं लिंगं पाताले हाटकेश्वरम्।
भूलोके च महाकालो लिंड्गत्रय नमोस्तु ते॥

अर्थात: आकाश में तारक लिंग, पाताल में हाटकेश्वर लिंग तथा पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग है।

इसी से इस ज्योतिर्लिंग की महत्ता का पता चलता है। आज से करीब १०० वर्ष पूर्व जब वैज्ञानिकों ने पृथ्वी पर एक काल्पनिक "कर्क रेखा" खींची तो उससे ये पता चला कि उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर इस पूरी पृथ्वी के केंद्र बिंदु पर स्थित है। जो बात वैज्ञानिकों को १०० वर्ष पहले पता चली, वे हमारे ऋषियों को हजारों वर्ष पहले पता चल गयी थी। हमारे पूर्वजों ने २००० वर्ष पूर्व सूर्य और ज्योतिष गणना के लिए उज्जैन में कई यंत्रों का निर्माण भी किया और आज भी वैज्ञानिक सूर्य एवं नक्षत्रों की सटीक गणना के लिए उज्जैन ही आते हैं।

21 अगस्त 2019

तिरुपति बालाजी - २

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार महर्षि भृगु ने त्रिदेवों की परीक्षा ली। उसी परीक्षा में उन्होंने श्रीहरि विष्णु के वक्षस्थल पर अपने पैरों से प्रहार कर दिया। इस पर भी भगवान विष्णु ने उनके चरण पकड़ लिए। तब भृगु ऋषि ने भगवान विष्णु को त्रिदेवों में श्रेष्ठ बताया। किन्तु उनके इस व्यवहार से देवी लक्ष्मी को बड़ा कष्ट हुआ कि क्यों भगवान विष्णु ने भृगु को उसके अपराध का दंड नहीं दिया। तब वे रुष्ट होकर श्रीहरि को छोड़ कर चली गयी। अब आगे...

19 अगस्त 2019

कुबेर की नौ निधियाँ - २

पिछले लेख में आपने देवताओं के कोषाध्यक्ष यक्षराज कुबेर की पहली ४ निधियों के बारे में पढ़ा। इस लेख में हम आगे बढ़ते हैं और उनकी बची हुई ५ निधियों के बारे में जानते हैं।

५. नन्द: इस निधि का धारक राजसी एवं तामसी गुणों के मिश्रण वाला होता है। वह अकेला अपने कुल का आधार होता है। ये निधि साधक को लम्बी आयु एवं निरंतर तरक्की प्रदान करती है। ऐसा व्यक्ति अपनी प्रशंसा से अत्यंत प्रसन्न होता है और प्रशंसा करने वाले को आर्थिक रूप से सहायता भी कर देता है। अधिकतर ऐसे साधक अपने परिवार की नींव होता है और अपने परिवार में धन संग्रह करने वाला एकलौता व्यक्ति होता है। इस निधि के साधक के पास धन तो अथाह होता है किन्तु तामसी गुणों के कारण उसका नाश भी जल्दी होता है। पर साधक अपने पुत्र पौत्रों के लिए बहुत धन संपत्ति छोड़ कर जाता है।

17 अगस्त 2019

राघवयादवीयम् (श्लोक २६ - ३०)

श्लोक २६

अनुलोम (रामकथा)

सागरातिगम् आभातिनाकेशः असुरमासहः।
तं सः मारुतजं गोप्ता अभात् आसाद्य गतः अगजम् ॥ २६॥

अर्थात: समुद्र लांघ कर सहयाद्री पर्वत तक जा समुद्र तट तक पहुंचने वाले हनुमान जैसे दूत होने के कारण इंद्र से भी अधिक प्रतापी, असुरों की समृद्धि के लिए असहनशील उन रक्षक श्रीराम की कीर्ति में वृद्धि हो गई।

15 अगस्त 2019

रक्षा बंधन

आप सभी को रक्षाबंधन एवं स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें। रक्षाबंधन एक अति प्राचीन पर्व है जो हर वर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इस पर्व में बहनें अपने भाइयों के हाथ में रेशम के धागों का एक सूत्र बाँधती है और उसकी रक्षा की कामना करती है। बदले में भाई भी सदैव अपनी बहन की रक्षा का वचन देता है। ये साधारण सा बंधन भाई एवं बहन की रक्षा की कड़ी है और इसी कारण इसे रक्षा बंधन के नाम से जाना जाता है। सांस्कृतिक रूप से तो इसका बहुत महत्त्व है पर आज हम इसके धार्मिक महत्त्व को जानेंगे।

13 अगस्त 2019

कुबेर की नौ निधियाँ - १

कुछ समय पहले हमने आपको पवनपुत्र हनुमान की नौ निधियों के बारे में बताया था। हनुमानजी को अष्ट सिद्धि और नौ निधि का दाता कहा जाता है। जिस प्रकार हनुमान के पास नौ निधियाँ हैं, ठीक उसी प्रकार देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर के पास भी नौ निधियाँ हैं। अंतर केवल इतना है कि हनुमान अपनी नौ निधियों को किसी अन्य को प्रदान कर सकते हैं जबकि कुबेर ऐसा नहीं कर सकते।

निधि का अर्थ होता ऐसा धन जो अत्यंत दुर्लभ हो। इनमे से कई का वर्णन युधिष्ठिर ने भी महाभारत में किया है जिसे आप यहाँ देख सकते हैं। कुबेर को इन निधियों की प्राप्ति महादेव से हुई है। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ना केवल भगवान शंकर ने उन्हें इन निधियों का दान दिया अपितु उन्हें देवताओं के कोषाध्यक्ष का पद भी प्रदान किया।

11 अगस्त 2019

राघवयादवीयम् (श्लोक २१ - २५)

श्लोक २१

अनुलोम (रामकथा)

ताटकेयलवादत् एनोहारी हारिगिर आस सः।
हा असहायजना सीता अनाप्तेना अदमनाः भुवि ॥ २१॥

अर्थात: ताड़कापुत्र मारीच के वध से प्रसिद्द, अपनी वाणी से पाप का नाश करने वाले तथा जो अत्यंत मनभावन है, उनकी हाय सुनकर (मृगरूपी मारीच द्वारा श्रीराम के स्वर में सीता को पुकारने पर) असहाय सीता अपने उस स्वामी श्रीराम के बिना व्याकुल हो गईं।

9 अगस्त 2019

तिरुपति बालाजी - १

शायद ही कोई ऐसा हो जिसने तिरुपति बालाजी का नाम ना सुना हो। इसे दक्षिण भारत के सब बड़े और प्रसिद्ध मंदिर के रूप में मान्यता प्राप्त है। दक्षिण भारत के अतिरिक्त अन्य राज्यों में भी इस मंदिर की बहुत मान्यता है। यह एक ऐसा मंदिर है जहाँ भगवान विष्णु मनुष्य रूप में  विद्यमान हैं जिन्हे "वेंकटेश" कहा जाता है। इसी कारण इसे "वेंकटेश्वर बालाजी" भी कहते हैं। ये मंदिर विश्व का सबसे अमीर मंदिर है जहाँ की अनुमानित धनराशि ५०००० करोड़ से भी अधिक है। इसके पीछे का कारण बड़ा विचित्र है।

बात तब की है जब देवों और दैत्यों ने मिलकर समुद्र मंथन किया। उस मंथन से अनेक रत्न प्राप्त हुए और उनमे से सबसे दुर्लभ देवी लक्ष्मी की उत्पत्ति हुई। उनका सौंदर्य ऐसा था कि देव और दैत्य दोनों उन्हें प्राप्त करना चाहते थे। किन्तु माता लक्ष्मी ने स्वयं श्रीहरि विष्णु को अपना वर चुन लिया। स्वयं ब्रह्मदेव ने दोनों का विवाह करवाया। विवाह के पश्चात देवी लक्ष्मी ने पूछा कि उनका स्थान कहाँ होगा? तब नारायण ने कहा कि उनका स्थान उनके वक्षस्थल में होगा।

7 अगस्त 2019

राघवयादवीयम् (श्लोक १६ - २०)

श्लोक १६

अनुलोम (रामकथा)

सः अरम् आरत् अनज्ञाननः वेदेराकण्ठकुंभजम्।
तं द्रुसारपटः अनागाः नानादोषविराधहा ॥ १६॥

अर्थात: श्रीराम जो महाज्ञानी हैं, जिनकी वाणी वेद है, जिन्हें वेद कंठस्थ है, वो कुम्भज (महर्षि अगस्त्य, जिन्हे ये नाम मटके में जन्म लेने के कारण मिला) के निकट जा पंहुचे। वे निर्मल वृक्ष वल्कल (छाल) परिधानधारी हैं जो अनेक पाप करने वाले विराध के संहारक हैं।

5 अगस्त 2019

क्यों महाभारत के युद्ध को टालना असंभव था?

कौरवों ने छल से द्युत जीतकर पांडवों को १२ वर्ष के वनवास और एक वर्ष के अज्ञातवास पर भेज दिया। पांडवों ने अपना वनवास और अज्ञातवास नियमपूर्वक पूर्ण किया। विराट के युद्ध के पश्चात स्वयं पितामह भीष्म ने कहा कि पांडवों ने सफलतापूर्वक अपना अज्ञातवास पूर्ण कर लिया था किन्तु दुर्योधन अपने हठ पर अड़ा रहा। पांडवों ने धृतराष्ट्र से विनम्रतापूर्वक अपने हिस्से का राज्य माँगा पर पुत्रमोह में पड़ कर धृतराष्ट्र अच्छे-बुरे का विवेक खो बैठे। जब हस्तिनपुर दूत बनकर गए श्रीकृष्ण स्वयं संधि करवाने में असफल रहे तब अंततः महाभारत का युद्ध निश्चित हो गया।

1 अगस्त 2019

राघवयादवीयम् (श्लोक ११ - १५)

श्लोक ११

अनुलोम (रामकथा)

वरमानदसत्यासह्रीतपित्रादरात् अहो।
भास्वरः स्थिरधीरः अपहारोराः वनगामी असौ ॥ ११॥

अर्थात: विनम्र, आदरणीय, सत्य के त्याग से और वचन पालन ना करने से लज्जित होने वाले, अद्भुत, तेजोमय, मुक्ताहारधारी, वीर एवं साहसी श्रीराम वन को प्रस्थान किए।

30 जुलाई 2019

राघवयादवीयम् (श्लोक ६ - १०)

श्लोक ६

अनुलोम (रामकथा)

मारमं सुकुमाराभं रसाज आप नृताश्रितं। 
काविरामदलाप गोसम अवामतरा नते ॥ ६॥

अर्थात: लक्ष्मीपति नारायण के सुन्दर, सलोने एवं तेजस्वी मानव अवतार श्रीराम का वरण रसाजा (भूमिपुत्री), धरातुल्य धैर्यशील, निज वाणी से असीम आनन्द प्रदाता एवं सुधि सत्यवादी सीता ने किया था।

28 जुलाई 2019

क्या श्रीकृष्ण माँ काली के अवतार हैं? - २

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार देवी पुराण में श्रीकृष्ण को माँ काली का और राधा को भगवान शंकर का अवतार माना गया है। इसका साक्ष्य है वृन्दावन में स्थित श्रीकृष्ण-काली मंदिर। आज के इस लेख में हम मुख्यतः दो बातों का जिक्र करेंगे - पहली एक घटना जिसमे माँ काली ने राधा रूपी भगवान शंकर के मान की रक्षा की। और दूसरी कि माँ काली और श्रीकृष्ण में क्या-क्या समानताएं हैं। तो चलिए आरम्भ करते हैं।

26 जुलाई 2019

क्या श्रीकृष्ण माँ काली के अवतार हैं? - १

अगर आपसे कोई पूछे कि श्रीकृष्ण किसके अवतार थे तो १००० में से ९९९ लोग बिना संकोच के कहेंगे कि श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के अवतार थे। हमारे धार्मिक ग्रंथों में भी इस बात की स्पष्ट व्याख्या है कि भगवान श्रीकृष्ण के रूप में श्रीहरि ने अपना ८वां अवतार लिया। कहीं-कहीं उन्हें भगवान विष्णु का नवां अवतार भी कहा जाता है क्यूंकि गौतम बुद्ध को विष्णु अवतार के रूप में मान्यता मिलने में मतभेद है। दशावतार के बारे में आप विस्तार से यहाँ पढ़ सकते हैं। लेकिन इसका एक दूसरा पहलु भी है।

जब आप उत्तर प्रदेश में भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली वृन्दावन जायेंगे तो यहाँ का एक विशेष आकर्षण "कृष्ण-काली" मंदिर है। इस मंदिर की विशेषता ये है कि यहाँ पर श्रीकृष्ण की पूजा माँ काली के रूप में होती है। अब आप पूछेंगे कि ये कैसे संभव है? इसका उत्तर ये है कि बहुत कम, लेकिन कुछ जगह श्रीकृष्ण को माँ काली का अवतार ही माना जाता है। विशेषकर "देवी पुराण" में इस बात का वर्णन है कि स्वयं माँ काली ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया था। इसके पीछे एक बड़ी रोचक कथा है।

24 जुलाई 2019

जब महर्षि भृगु ने त्रिदेवों की परीक्षा ली - ३: नारायण

पिछले लेखों में आपने पढ़ा कि किस प्रकार महर्षि भृगु ब्रह्मदेव एवं महादेव की परीक्षा लेते हैं और दोनों ये बताते हैं कि वे त्रिगुणातीत नहीं हैं। अब महर्षि भृगु अंतिम त्रिदेव श्रीहरि विष्णु की परीक्षा लेने के लिए क्षीरसागर पहुँचते हैं। जब महर्षि भृगु वहाँ पहुँचे तो नारायण के पार्षद जय-विजय ने उन्हें रोका। तब महर्षि भृगु ने उन्हें अपने वहाँ आने का कारण बताया। कोई भगवान नारायण की भी परीक्षा ले सकता है ये सोच कर जय-विजय को बड़ा कौतुहल हुआ और उन्होंने भृगु को प्रवेश की आज्ञा दे दी।

22 जुलाई 2019

राघवयादवीयम् (श्लोक १ - ५)

श्लोक १
अनुलोम (रामकथा)

वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः। 
रामः रामाधीः आप्यागः लीलाम् आर अयोध्ये वासे ॥ १॥

अर्थात: मैं उन भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम करता हूं जिन्होंने अपनी पत्नी सीता के संधान में मलय और सहयाद्री की पहाड़ियों से होते हुए लंका जाकर रावण का वध किया तथा अयोध्या वापस लौट दीर्घ काल तक सीता संग वैभव विलास संग वास किया।

20 जुलाई 2019

राघवयादवीयम् - विश्व की सबसे अद्भुत रचना

क्या आप किसी ऐसे ग्रन्थ के विषय में सोच सकते हैं जिसे आप सीधे पढ़े तो कुछ और अर्थ निकले और अगर उल्टा पढ़ें तो कोई और अर्थ? ग्रन्थ को तो छोड़िये, ऐसा केवल एक श्लोक भी बनाना अत्यंत कठिन है। लेकिन क्या आपको पता है कि एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमें एक नहीं बल्कि ३० ऐसे श्लोक हैं जिसे अगर आप सीधा पढ़ें तो रामकथा बनती है और उसी को अगर आप उल्टा पढ़ें तो कृष्णकथा। जी हाँ, ऐसा अद्भुत ग्रन्थ हमारे भारत में ही है।

18 जुलाई 2019

जब महर्षि भृगु ने त्रिदेवों की परीक्षा ली - २: महादेव

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस प्रकार सप्तर्षियों के अनुरोध पर महर्षि भृगु त्रिदेवों की परीक्षा लेने निकले, ये जानने के लिए कि तीनों में त्रिगुणातीत कौन है? सबसे पहले वे अपने पिता ब्रह्मदेव की परीक्षा लेने पहुँचे किन्तु परमपिता ब्रह्मा ने उन्हें बताया कि वे त्रिगुणातीत नहीं हैं क्यूंकि उनमे रजोगुण की अधिकता है। सृष्टि की रचना के लिए ये गुण होना भी आवश्यक है। तब ब्रह्मदेव ने उन्हें महादेव के पास जाने को कहा। अब आगे...

16 जुलाई 2019

हनुमानजी की दस गौण सिद्धियां

पिछले लेखों में आपने महाबली हनुमान की अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों के विषय में पढ़ा। इसके अतिरिक्त पवनपुत्र के पास १० गौण सिद्धियों के होने का भी वर्णन है। ये गोपनीय और रहस्य्मयी १० गौण सिद्धियां जिस किसी के पास भी होती हैं वो अजेय हो जाता है। भागवत पुराण में श्रीकृष्ण ने भी इन १० गौण सिद्धियों के महत्त्व का वर्णन किया है। ये सिद्धियां चमत्कारी हैं और देवों तथा दानवों के लिए भी दुर्लभ हैं। आइये इन १० गौण सिद्धियों के बारे में कुछ जानते हैं: 

14 जुलाई 2019

जब महर्षि भृगु ने त्रिदेवों की परीक्षा ली - १: ब्रह्मदेव

बहुत काल के बाद महान ऋषियों द्वारा पृथ्वी पर एक महान यज्ञ किया गया। तब उस समय प्रश्न उठा कि इसका पुण्यफल त्रिदेवों में सर्वप्रथम किसे प्रदान किया जाये। तब महर्षि अंगिरा ने सुझाव दिया कि इन तीनों में जो कोई भी "त्रिगुणातीत", अर्थात सत, राज और तम गुणों के अधीन ना हो उसे ही सर्वश्रेष्ठ मान कर यज्ञ का पुण्य सबसे पहले प्रदान किया जाये। किन्तु अब त्रिदेवों की परीक्षा कौन ले? वे तो त्रिकालदर्शी हैं। जो कोई भी उनकी परीक्षा लेने का प्रयास करेगा उसे उनके कोप का भाजन भी बनना पड़ सकता है। तब सप्तर्षियों ने महर्षि भृगु का नाम सुझाया। उनके अनुमोदन पर भृगु त्रिदेवों की परीक्षा लेने को तैयार हो गए। त्रिदेवों से क्या छुपा है, वे भी इस लीला में भाग लेने के लिए सज्ज हो गए।