20 फ़रवरी 2019

जब देवर्षि नारद को माया का भ्रम हो गया

एक बार देवर्षि नारद घूमते-घूमते बैकुंठ पहुंचे। वहाँ उन्होंने श्रीहरि विष्णु से पूछा कि "हे भगवन! संसार आपको मायापति कहता है किन्तु ये माया है क्या? मनुष्य क्यों सदैव माया के बंधन में जकड़ा होता है और व्यर्थ दुखी रहता है? जबकि बंधु-बांधव, धन संपत्ति आदि तो केवल मिथ्या है। अगर मनुष्यों को भी वैसा ज्ञान हो जाये जैसा हम देवताओं को होता है तो उन्हें इन व्यर्थ चीजों का दुःख नहीं होगा।" देवर्षि की ऐसी गर्व भरी बातें सुनकर भगवान विष्णु मुस्कुराये और कहा - "कोई बात नहीं। समय आने पर माया क्या है ये तुम्हे समझ आ जाएगा।"

फिर श्रीहरि ने कहा - "चलो थोड़ा पृथ्वी पर घूम आएं।" ऐसा कह कर वो देवर्षि के साथ पृथ्वीलोक पहुँचे। वहाँ एक वृक्ष के नीचे विश्राम करते हुए श्रीहरि ने देवर्षि से कहा कि उन्हें बड़ी प्यास लगी है। आस पास देखो जल है या नहीं। उनकी आज्ञा पाकर देवर्षि जल को ढूंढते हुए कुछ दूर तक चले आये जहाँ उन्हें एक सरोवर दिखा। वहाँ उन्होंने स्नान किया, जल पिया और फिर श्रीहरि के लिए जल लेकर सरोवर से बाहर आये। स्नानादि करने के बाद उन्हें अचानक ही नींद आने लगी और वो वही एक वृक्ष के नीचे थोड़ी देर के लिए लेट गए और उन्हें गहन निद्रा ने घेर लिया। 

18 फ़रवरी 2019

ऋषि मैत्रेय

ऋषि मैत्रेय महाभारत कालीन एक महान ऋषि थे। ये महर्षि पराशर के प्रिय शिष्य और और उनके पुत्र वेदव्यास के कृपा पात्र थे। इन्होने ही दुर्योधन को श्राप दिया था जिससे उसकी मृत्यु भीमसेन के हाथों हुई। इनका नाम इनकी माता "मित्रा" के नाम पर पड़ा और इन्हे अपने पिता "कुषरव" के कारण कौषारन भी कहा जाता है। वैसे तो इन्हे महर्षि पराशर ने समस्त वेदों और पुराणों की शिक्षा दी थी किन्तु ये विशेषकर विष्णु पुराण के महान वक्ता के रूप में विश्व प्रसिद्ध थे। युधिष्ठिर ने अपने राजसू यज्ञ में इन्हे भी आमंत्रित किया था।

16 फ़रवरी 2019

जब ऋषि मार्कण्डेय ने उर्वशी का मान भंग किया

उर्वशी के विषय में हम सभी जानते है। वो देवराज इंद्र की सबसे  सुन्दर अप्सरा और अन्य अप्सराओं की प्रमुख थी। पृथ्वी महान ऋषिओं-मुनिओं से भरी हुई थी और जब भी कोई मनुष्य घोर तपस्या करता था, देवराज इंद्र अपनी कोई अप्सरा उसकी तपस्या भंग करने के लिए भेज देते थे। कदाचित अपने सिंहासन के लिए वे कुछ अधिक ही चिंतित रहते थे। उनकी ही एक अप्सरा मेनका ने राजर्षि विश्वामित्र की तपस्या भंग कर दी थी। स्वयं उर्वशी ने पुरुओं के पूर्वज पुरुरवा की तपस्या भंग की और उनके साथ विवाह भी किया जिससे उन्हें आयु नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। इसी उर्वशी ने ऋष्यश्रृंग के पिता ऋषि विभाण्डक की तपस्या तब भंग की जब अन्य अप्सराएं हार मान बैठी। एक तरह से कहा जाये तो उर्वशी देवराज इंद्र का अचूक अस्त्र थी। किन्तु उर्वशी को भी एक बार मुँह की खानी पड़ी।

14 फ़रवरी 2019

जब रावण और हनुमान के बीच शर्त लगी

जैसा कि हम जानते हैं कि रावण निःसंदेह एक महान योद्धा था। उसने अपने शासन में सातों द्वीपों को जीत लिया था। उसे ब्रह्मा का वरदान प्राप्त था। उसने देवताओं को परास्त किया और नवग्रह उसके राजसभा की शोभा बढ़ाते थे। यहाँ तक कि वो शनि के सर पर अपना पैर रख कर बैठा करता था। यहाँ तक कि उसने भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र को वापस लौटने पर मजबूर कर दिया था। उसका वीर रूप ऐसा था कि उसके साथ अपने अंतिम युद्ध करते समय स्वयं श्रीराम ने कहा था कि आज रावण जिस रौद्ररूप में है कि उसे पराजित करना समस्त देवताओं के साथ स्वयं देवराज इंद्र के लिए भी संभव नहीं है। जाहिर था कि इतना बलशाली रावण सदैव अपने वीर रस में ही डूबा रहता था। इसी कारण उसे वानरराज बालि और कर्त्यवीर अर्जुन के हाथों पराजय का सामना भी करना पड़ा था लेकिन उसने उन दोनों से कोई बैर नहीं रखा और बालि के साथ उसकी मित्रता तो विश्व प्रसिद्ध थी। उसका इतना अधिक बल ही वास्तव में उसके अभिमान और पतन का कारण बना। 

12 फ़रवरी 2019

क्या आपको महादेव की बहन के बारे में पता है?

भगवान शिव के परिवार के बारे में हम सभी जानते हैं। उनकी पत्नी देवी पार्वती, पुत्र कार्तिकेय एवं गणेश तो प्रसिद्ध है ही, साथ ही साथ उनकी पुत्री अशोकसुन्दरी के बारे में भी जानने को मिलता है। इसके अतिरिक्त उनके अन्य चार पुत्रों (सुकेश, जालंधर, अयप्पा और भूमा) के विषय में भी पुराणों में जानकारी मिलती है। लेकिन क्या आपको महादेव की बहन के बारे में पता है? पुराणों और लोक कथाओं में भगवान शिव की बहन "असावरी देवी" के बारे में भी वर्णन मिलता है जिन्हे स्वयं महादेव ने देवी पार्वती के अनुरोध पर उत्पन्न किया था। तो आइये आज महादेव की बहन के विषय में जानते हैं। 

10 फ़रवरी 2019

सरस्वती, लक्ष्मी एवं गंगा का विवाद

आप सबको वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनायें। पिछले वर्ष इस अवसर पर हमने देवी सरस्वती पर एक लेख प्रकाशित किया था जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं। इस वर्ष हमने सोचा देवी सरस्वती पर कोई विशेष जानकारी लेकर आपके सामने आएं। तो आज हम आपको देवी सरस्वती और देवी गंगा के बीच हुए एक विवाद के विषय में बताएँगे। इस कथा का विवरण कुछ पौराणिक ग्रंथों में मिलता है। 

एक कथा के अनुसार भगवान विष्णु की तीन पत्नियाँ - लक्ष्मी, गंगा एवं सरस्वती थी। तीनों सदा नारायण को प्रसन्न रखने का प्रयास करती थी ताकि उनका विशेष प्रेम उन्हें प्राप्त हो सके। एक बार देवी गंगा के प्रति श्रीहरि का अधिक प्रेम देख कर देवी लक्ष्मी एवं माँ सरस्वती को ईर्ष्या हुई। इसपर लक्ष्मी जी ने तो कुछ नहीं कहा किन्तु सरस्वती जी ने इस पक्षपात के लिए भगवान विष्णु को खूब खरी-खोटी सुनाई। लक्ष्मी ने उन्हें रोकने का प्रयास किया किन्तु क्रोध के कारण वे उसी प्रकार नारायण को उपालम्भ देती रही। साथ ही उन्होंने देवी गंगा को भी दुर्वचन कहे। इस कलह से तंग आकर भगवान विष्णु कुछ समय के लिए वैकुण्ठ से बाहर चले गए।

7 फ़रवरी 2019

पूजा सम्बंधित १० महत्वपूर्ण जानकारियाँ

  1. पूजागृह में दो शिवलिंग, तीन गणेश, दो शंख, दो सूर्य प्रतिमा, तीन देवी प्रतिमा, दो गोमती चक्र या दो शालिग्राम का पूजन नहीं करना चाहिए। 
  2. घर में ९ इंच (२२ सेंटीमीटर) या उससे छोटी प्रतिमा होनी चाहिए। इससे बड़ी प्रतिमा घर के लिए शुभ नहीं होती है। उसे मंदिर में ही स्थापित करना चाहिए। 
  3. देवी की १ बार, सूर्य की ७ बार, गणेश की ३ बार, विष्णु की ४ बार तथा शिव की आधी परिक्रमा करनी चाहिए।

5 फ़रवरी 2019

मौनी अमावस्या

मौनी अमावस्या का वर्णन कुम्भ के सन्दर्भ में मिलता है। जब अमृत को बचाने के लिए जब धन्वन्तरि कलश लेकर भागे, अमृत की कुछ बूंदें पृथ्वी पर ४ स्थानों पर गिरी जहाँ आज कुम्भ का आयोजन किया जाता है। वे हैं प्रयाग, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन। मौनी अमावस्या को अत्यंत ही शुभ माना जाता है। इस दिन मौन रहकर स्नान करने की प्रथा बहुत पुरानी है। आज के दिन गंगास्नान कई गुणा अधिक फल देता है। यदि ये तिथि सोमवार को पड़े तो इसका महत्त्व बहुत ही बढ़ जाता है और अगर उस समय कुम्भ का ही आयोजन हो रहा हो तब तो मौनी अमावस्या को गंगास्नान का अर्थ एक प्रकार से अमृत में नहाने के समान है। सौभाग्य से इस वर्ष ऐसा ही संयोग पड़ा है जब मौनी अमावस्या सोमवार को है और प्रयाग महाकुम्भ का आयोजन हो रहा है। आइये इसके विषय में कुछ जानते हैं:

3 फ़रवरी 2019

देवर्षि नारद द्वारा प्रह्लाद को गर्भ में दिया गया उपदेश

महाभारत में देवर्षि नारद और युधिष्ठिर का एक संवाद है जहाँ देवर्षि नारद उन्हें भक्तराज प्रह्लाद के विषय में एक अनोखी बात बताते हैं। बात तब की है जब हिरण्यकशिपु तपस्या करने वन में चला गया। उसकी पत्नी कयाधु उस समय गर्भवती थी। हिरण्यकशिपु के जाने के बाद उस अवसर का लाभ उठा कर देवों ने दैत्यों पर आक्रमण कर दिया। जब दैत्य सेनापतियों को देवताओं की भारी तैयारी का पता चला तो उनका साहस जाता रहा। वे उनका सामना नहीं कर सके। मार खाकर स्त्री, पुत्र, मित्र, गुरुजन, महल, पशु और साज-सामान की कुछ चिन्ता न करके वे अपने प्राण बचाने के लिये बड़ी जल्दी में इधर-उधर भाग गये। अपनी जीत चाहने वाले देवताओं ने राजमहल को नष्ट कर दिया और देवराज इन्द्र ने हिरण्यकशिपु की पत्नी कयाधु को भी बन्दी बना लिया। कयाधु मारे भय के रो रही थी और इन्द्र उसे बलात् लिये जा रहे थे।

1 फ़रवरी 2019

जब भीम ने युधिष्ठिर को धर्म ज्ञान दिया

महाभारत में भीम को मुख्यतः बल का प्रतीक माना जाता है। उनकी बुद्धि के विषय में ज्यादा चर्चा नहीं की जाती। जबकि सत्य ये है कि वो जितने बलशाली थे उतने ही बुद्धिमान भी थे। उससे भी अधिक कहा जाये तो वे अत्यंत स्पष्टवादी थे। कदाचित ही महाभारत में कोई ऐसा पात्र है जो उतना स्पष्टवादी हो। वैसे तो उनकी स्पष्टवादिता के कई उदाहरण है लेकिन एक कथा ऐसी भी है जिसके द्वारा उन्होंने युधिष्ठिर को उनके कर्तव्य की याद दिलाई। इससे ये भी सिद्ध होता है कि वे सही चीज के लिए अपने भाइयों को भी नहीं छोड़ते थे। 

30 जनवरी 2019

नागा साधु

महाकुंभ, अर्धकुंभ या फिर सिंहस्थ कुंभ में आपने नागा साधुओं को जरूर देखा होगा। इनको देखकर आप सभी के मन में अक्सर यह सवाल उठते होंगे कि आखिर कौन हैं ये नागा साधु? कहाँ से आते हैं? और कुंभ खत्म होते ही कहां चले जाते हैं? आइए आज हम लोग चर्चा करते है हिंदू धर्म के इन सबसे रहस्यमयी लोगों के बारे में। 

"नागा" शब्द बहुत पुराना है। यह शब्द संस्कृत के "नग" शब्द से निकला है, जिसका अर्थ "पहाड़" होता है। इस पर रहने वाले लोग पहाड़ी या नागा कहलाते हैं। नागा का अर्थ "नग्न" रहने वाले व्यक्तियों से भी है। भारत में नागवंश और नागा जाति का बहुत पुराना इतिहास है। शैव पंथ से कई संन्यासी पंथों और परंपराओं की शुरुआत मानी गई है। भारत में प्राचीन काल से नागवंशी, नागा जाति और दसनामी संप्रदाय के लोग रहते आए हैं। उत्तर भारत का एक संप्रदाय "नाथ संप्रदाय" भी दसनामी संप्रदाय से ही संबंध रखता है। नागा से तात्पर्य एक बहादुर लड़ाकू व्यक्ति से लिया जाता है।

28 जनवरी 2019

माता अनुसूया

ब्रह्मा के दाहिने भाग से स्वयंभू मनु उत्पन्न हुए जिनका विवाह ब्रह्मा के वाम अंग से उत्पन्न होने वाली शतरूपा से हुआ। इन दोनो की पाँच संताने थी। दो पुत्र प्रियव्रत एवं उत्तानपाद और तीन पुत्रियाँ - आकूति, देवहूति एवं प्रसूति। आकूति का विवाह रूचि प्रजापति एवं प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति के साथ हुआ। देवहुति का विवाह कर्दम ऋषि से हुआ जिनसे उन्हें एक पुत्र - कपिल मुनि और नौ कन्याएं प्राप्त हुई - कला, अनुसूया, श्रद्धा, हविर्भू, गति, क्रिया, ख्याति, अरुंधती एवं शांति।

26 जनवरी 2019

जब हनुमान को विवाह करना पड़ा - सती सुवर्चला के महान त्याग की कथा

जब आप हैदराबाद से करीब २२५ किलोमीटर दूर आँध्रप्रदेश के खम्मम जिले में पहुँचते है तो एक ऐसा मंदिर मिलता है जो आपको हैरान कर सकता है। क्यूँकि ये विश्व का एकलौता ऐसा मंदिर है जहाँ पवनपुत्र हनुमान अपनी पत्नी सुवर्चला के साथ विराजमान हैं। अब आप ये प्रश्न कर सकते हैं कि हनुमान तो बाल ब्रह्मचारी हैं। फिर उनकी पत्नी कैसे हो सकती है। वैसे आप भी अपनी जगह ठीक हैं क्यूँकि जब आप वाल्मीकि रामायण या तुलसीदास कृत रामचरितमानस पढ़ते हैं तो बजरंगबली के विवाह का कोई वर्णन नहीं आता। इन दोनों ग्रंथों में हनुमान को बाल ब्रह्मचारी ही बताया गया है। लेकिन अगर आप महर्षि पराशर द्वारा रचित "पराशर संहिता" पढ़ते हैं तो आपको हनुमान के विवाह का प्रसंग पता चलता है। आज हम उसी प्रसंग के बारे में आपको बताने वाले हैं।

24 जनवरी 2019

चौरासी लाख योनियों का रहस्य

हिन्दू धर्म में पुराणों में वर्णित ८४००००० योनियों के बारे में आपने कभी ना कभी अवश्य सुना होगा। हम जिस मनुष्य योनि में जी रहे हैं वो भी उन चौरासी लाख योनियों में से एक है। अब समस्या ये है कि कई लोग ये नहीं समझ पाते कि वास्तव में इन योनियों का अर्थ क्या है? ये देख कर और भी दुःख होता है कि आज की पढ़ी-लिखी नई पीढ़ी इस बात पर व्यंग करती और हँसती है कि इतनी सारी योनियाँ कैसे हो सकती है। कदाचित अपने सीमित ज्ञान के कारण वे इसे ठीक से समझ नहीं पाते। गरुड़ पुराण में योनियों का विस्तार से वर्णन दिया गया है। तो आइये आज इसे समझने का प्रयत्न करते हैं। 

22 जनवरी 2019

शाकम्भरी जयंती

दुर्गम नाम का एक दैत्य था। हिरण्याक्ष के वंश में वह पैदा हुआ था और उसके पिता का नाम रुरु था। वो देवताओं से शत्रुता रखता था और देवताओं को कष्ट देने के लिए उसने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप आरम्भ कर दिया। तपस्या का फल देने आए ब्रह्मा जी ने उसे वरदान मांगने के लिए कहा। तब उस दैत्य ने ब्रह्मा जी से कहा सारे वेद मंत्र मेरे आधीन हो जाए। ब्रह्मा जी उसे तपस्या का वरदान देते हुए अंतर्ध्यान हो गए। उस दैत्य को पता था कि देवताओं की शक्ति वेद मंत्र है। ब्राह्मण जब वेद मंत्रों का उच्चारण करते हुये अग्नि में आहुति देते हैं उसी आहुति से देवताओं की शक्ति बढ़ती है। उस दैत्य ने वेद मंत्रों को छुपा दिया। वेद मंत्रों के अदृश्य हो जाने पर ब्राह्मण वेद मंत्रों को भूल गए। संध्या, देव पूजा, पितृ तर्पण आदि के आभाव में ब्राह्मण वैदिक मार्ग से भ्रष्ट हो गए। ब्राह्मणों के धर्म विहीन हो जाने पर देवताओं की शक्ति समाप्त हो गई।  तब उस दैत्य ने स्वर्ग पर आक्रमण किया और शक्तिहीन देवता स्वर्ग त्याग कर हिमालय की कन्दराओं में छुप गये।

19 जनवरी 2019

कृष्ण का वो पुत्र जिसके कारण सम्पूर्ण यदुवंश का नाश हो गया

साम्ब कृष्ण और उनकी दूसरी पत्नी जांबवंती के ज्येष्ठ पुत्र थे जिसका विवाह दुर्योधन की पुत्री लक्ष्मणा से हुआ था। जब महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ तो गांधारी ने कृष्ण को इसका दोषी मानते हुए यदुकुल के नाश का श्राप दे दिया जिसे कृष्ण ने सहर्ष स्वीकार किया। उन्होंने ये भी कहा कि समय आने पर वे और बलराम स्वयं यदुकुल का नाश कर देंगे। हालाँकि किसी ने उस समय ये नहीं सोचा था कि कृष्ण के कुल का नाश उनके अपने पुत्र साम्ब के कारण होगा। महाभारत को समाप्त हुए ३६ वर्ष बीत चुके थे। एक बार महर्षि दुर्वासा एवं अन्य ऋषि द्वारका पधारे। ऋषियों का इतना बड़ा झुण्ड देख कर साम्ब और उनके मित्रों ने उनसे ठिठोली करने की सोची।

17 जनवरी 2019

कुम्भ मेला

इस वर्ष की मकर संक्रांति अत्यंत पवित्र और शुभ है क्यूंकि उसके आरम्भ के साथ ही महाकुम्भ का भी शुभारम्भ हुआ। तो आज हम बात करते हैं कुंभ मेले की या कुंभ पर्व की। हिंदू धर्म में कुंभ पर्व बहुत ही धूमधाम से मनाया जाने वाला पर्व है। यह एक ऐसा पर्व है जो वैज्ञानिक होने के साथ-साथ पूर्ण प्रमाणिकता लिए हुए है। यह बहुत ही प्रामाणिक है और जिस प्रकार हमारी १२ राशियां है उसी के अनुसार ग्रहों की चाल एवं उनका समय निश्चित है।

15 जनवरी 2019

विजेता - धार्मिक कहानी प्रतियोगिता २ - "भक्तवत्सला शीतला माता"

एक बार देवर्षि नारद "नारायण! नारायण!" का जाप करते हुए तीनों लोकों की यात्रा पर निकले। सभी देवों के दर्शन करते हुए "शीतला माता" के धाम पहुँचे। ध्यान-मुद्रा में बैठी मातारानी को मुस्कुराते हुए देख विस्मित महर्षि ने अभिवादन के साथ ही कहा -"माँ! आज तो आपके मुख पर अद्वितीय तेज और प्रसन्नता झलक रही है। कौन है, जिसने आपके मुख पर प्रसन्नता बिखेर दी है?" माता ने उसी स्मित हास्य के साथ कहा - वत्स! एक निश्छल हृदय भक्त के अतिरिक्त और कौन हो सकता है?" तब महर्षि ने आश्चर्य से पूछा - "माता! आपके तो असंख्य भक्त हैं। फिर ऐसा कौन भक्तविशेष है जो आपके ह्रदय के इतने समीप है?" इसपर देवी ने कहा - "देवर्षि! कुण्डिनपुर में रहने वाली निर्मला ने अपनी सच्ची व निस्पृह भक्ति से मेरे हृदय को जीत लिया है।" तब देवर्षि ने मुस्कुराते हुए कहा - "अगर आज्ञा हो तो मैं भी आपकी इस विशेष भक्त से मिल आऊं।" तब देवी ने हँसते हुए कहा - "देवर्षि! मैं आपकी प्रकृति से अनभिज्ञ नहीं हूँ। मैं जानती हूँ कि आप निर्मला की परीक्षा लेना चाहते हैं। अगर ऐसा है तो आप अवश्य अपने मन की करें।"

14 जनवरी 2019

मकर संक्रांति विशेष

आप सभी को मकर संक्रांति की शुभकामनाएँ। इस वर्ष मकर संक्रांति १४ जनवरी सायंकाल में प्रवेश कर रहा है और १५ जनवरी को मनाया जायेगा। मकर संक्रांति क्यों मनाई जाती है इसपर एक लेख पिछले वर्ष इसी दिन धर्मसंसार पर प्रकाशित किया गया था जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं। इस वर्ष पंडित रोहित वशिष्ठ ने मकर संक्रांति के विषय में कुछ ज्ञानवर्धक जानकारी हमें भेजी है:

11 जनवरी 2019

जय श्रीराम ने पतंग उड़ाई

संक्रांति का माहौल है और इस समय पूरे देश में पतंगबाजी का मजा लिया जाता है। पतंग का इतिहास वैसे तो बहुत पुराना नहीं है लेकिन पुराणों में एक वर्णन ऐसा भी आता है जब श्रीराम ने भी पतंग उड़ाई थी। ये घटना रामचरितमानस के बालकाण्ड में वर्णित है। कथा इस प्रकार है कि श्रीराम और उनके तीनों भाई बालक थे और महाबली हनुमान भी बालरूप में श्रीराम के दर्शनों को अयोध्या आये हुए थे। संक्रांति के दिन सभी बालकों ने पतंग उड़ाने का मन बनाया। श्रीराम अपने भाइयों और हनुमान के साथ खुले मैदान में आ गए और श्रीराम ने अपनी पतंग उड़ाई। उन्होंने अपनी पतंग की इतनी ढील दी कि वो स्वर्गलोक तक जा पहुँची। इस बारे में तुलसीदास जी लिखते हैं:

9 जनवरी 2019

अयप्पा स्वामी

अयप्पा स्वामी भगवान शिव के छः पुत्रों में से एक हैं। उनके जन्म की कथा बहुत पहले महिषासुर के समय से शुरू होती है। महिषासुर की एक छोटी बहन थी महिषा। माँ दुर्गा द्वारा महिषासुर का वध करने के पश्चात उसने देवताओं से प्रतिशोध लेने के लिए ब्रह्माजी की घोर तपस्या की। ब्रह्मदेव उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए और वरदान माँगने को कहा। महिषी ने उनसे अमरत्व का वरदान माँगा किन्तु उन्होंने मना कर दिया। तब महिषी ने उनसे ये वरदान माँगा कि उनका वध केवल भगवान शिव और नारायण के पुत्र द्वारा ही संभव हो। ब्रह्मदेव ने उसे ये वरदान दे दिया और महिषी ने समझा की अब वो अमर हो गयी है क्यूंकि शिव और विष्णु का संयोग तो असंभव है। फिर उनका पुत्र कैसे पैदा होगा? ये वरदान प्राप्त कर वो दैत्या पृथ्वी पर उत्पात मचाने लगी। उसके वध के लिए देवता चिंतित हो गए किन्तु हरि और हर का संयोग कैसे संभव था? प्रकृति में जो कुछ भी होता है किसी ना किसी कारणवश होता है। उसी प्रकार नियति ने भी महिषी के अंत की प्रक्रिया आरम्भ कर दी थी।

7 जनवरी 2019

राशियों के आराध्य देव

हिन्दू धर्म और ज्योतिष में १२ राशियाँ बताई गयी है जिसके अपने अधिपति होते हैं। प्राचीन ज्योतिष शास्त्र में प्रत्येक राशि के आराध्य देव बताये गए हैं। अगर उस राशि का जातक अपने राशि के आराध्य देव की पूजा करता है तो उसके समस्त ग्रहदोष समाप्त हो जाते हैं। हालाँकि कोई भी व्यक्ति अपनी श्रद्धा अनुसार किसी भी राशि के आराध्य की पूजा कर सकता है। इससे उसे शुभ फल ही प्राप्त होता है। तो आइये जानते हैं कौन सी राशि के कौन आराध्य देव हैं।

5 जनवरी 2019

युयुत्सु

युयुत्सु महाभारत का एक महत्वपूर्ण पात्र है। महाभारत के युद्ध के अंत में बचे हुए १८ योद्धाओं में से एक वो भी था। दुर्योधन एवं अन्य कौरवों की भांति युयुत्सु भी धृतराष्ट्र पुत्र था किन्तु उसकी माता गांधारी नहीं थी। ऐसा वर्णित है कि महारानी गांधारी की एक वैश्य दासी थी जिसका नाम सौवाली (सुग्धा) था। वो गांधारी की सिर्फ दासी ही नहीं अपितु अभिन्न सखी भी थी जो गांधारी के विवाह के पश्चात उसके साथ गांधार से हस्तिनापुर आयी थी और मृत्युपर्यन्त उसके साथ ही रही।

3 जनवरी 2019

ऋष्यशृंग

ऋष्यश्रृंग ऋषि का वर्णन पुराणों एवं रामायण में आता है। ब्रह्मदेव के पौत्र महर्षि कश्यप के एक पुत्र थे विभाण्डक। वे स्वाभाव से बहुत उग्र और महान तपस्वी थे। एक बार उनके मन में आया कि वे ऐसी घोर तपस्या करें जैसी आज तक किसी और ने ना की हो। इसी कारण वे घोर तप में बैठे। उनकी तपस्या इतनी उग्र थी कि स्वर्गलोक भी तप्त हो गया। जब देवराज इंद्र ने देखा कि ऋषि विभाण्डक घोर तप कर रहे हैं तो उन्होंने उनकी तपस्या भंग करने के लिए कई अप्सराएं भेजी किन्तु वे उनका तप तोड़ने में असफल रहीं। तब इंद्र ने उर्वशी को विभाण्डक के पास भेजा। जब विभाण्डक ऋषि ने उर्वशी को देखा तो उसके सौंदर्य देखकर मुग्ध हो गए और उन्होंने उर्वशी के साथ संसर्ग किया जिससे उनकी तपस्या भंग हो गयी।