14 दिसंबर 2018

श्री शिव पंचाक्षर स्तोत्र

पिछले लेख में हमने पञ्चाक्षरी मन्त्र के बारे में चर्चा की थी। आदि शंकराचार्य ने इस महान पञ्चाक्षरी मन्त्र की महत्ता को विस्तृत तरह से काव्य के रूप में बताया है जो "श्री शिव पञ्चाक्षर स्त्रोत्र" के रूप में जाना जाता है। शिव पंचाक्षर स्तोत्र पंचाक्षरी मन्त्र ॐ नमः शिवाय की ही विस्तृत व्याख्या है। पञ्चाक्षरी मन्त्र की तरह ही इसके पाँच छंद हैं और अंतिम छंद के रूप में इसके महत्त्व को बताया गया है। आदि शंकराचार्य के विषय में कहा जाता है कि - अष्टवर्षेचतुर्वेदी द्वादशेसर्वशास्त्रवित् षोडशेकृतवान्भाष्यम्द्वात्रिंशेमुनिरभ्यगात्। अर्थात: आठ वर्ष की आयु में चारों वेदों में निष्णात हो गए, बारह वर्ष की आयु में सभी शास्त्रों में पारंगत, सोलह वर्ष की आयु में शांकरभाष्य तथा बत्तीस वर्ष की आयु में शरीर त्याग दिया। तो आइये इस स्तोत्र की महिमा समझते हैं। 

नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांगरागाय महेश्वराय। 
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै "न" काराय नमः शिवाय॥

अर्थात: हे महेश्वर! आप नागराज को हार स्वरूप धारण करने वाले हैं। हे (तीन नेत्रों वाले) त्रिलोचन, आप भस्म से अलंकृत, नित्य (अनादि एवं अनंत) एवं शुद्ध हैं। अम्बर को वस्त्र समान धारण करने वाले दिगम्बर शिव, आपके 'न' अक्षर द्वारा जाने वाले स्वरूप को नमस्कार है।

मंदाकिनी सलिल चंदन चर्चिताय नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय। 
मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मै "म" काराय नमः शिवाय॥

अर्थात: चन्दन से अलंकृत, एवं गंगा की धारा द्वारा शोभायमान, नन्दीश्वर एवं प्रमथनाथ के स्वामी महेश्वर आप सदा मन्दार एवं बहुदा अन्य स्रोतों से प्राप्त पुष्पों द्वारा पूजित हैं। हे शिव, आपके 'म' अक्षर द्वारा जाने वाले रूप को नमन है।

शिवाय गौरी वदनाब्जवृंद सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय। 
श्री नीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै "शि" काराय नमः शिवाय॥

अर्थात: हे धर्मध्वजधारी, नीलकण्ठ, शि अक्षर द्वारा जाने जाने वाले महाप्रभु, आपने ही दक्ष के दम्भ यज्ञ का विनाश किया था। माँ गौरी के मुखकमल को सूर्य समान तेज प्रदान करने वाले शिव, आपके 'शि' अक्षर से ज्ञात रूप को नमस्कार है।

वसिष्ठ कुम्भोद्भव गौतमार्य मुनींद्र देवार्चित शेखराय। 
चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय तस्मै "व" काराय नमः शिवाय॥

अर्थात: देवगण एवं वसिष्ठ , अगस्त्य, गौतम आदि मुनियों द्वारा पूजित देवाधिदेव! सूर्य, चन्द्रमा एवं अग्नि आपके तीन नेत्र समान हैं। हे शिव !! आपके 'व' अक्षर द्वारा विदित स्वरूप को नमस्कार है।

यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय। 
दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै "य" काराय नमः शिवाय॥

अर्थात: हे यक्ष स्वरूप, जटाधारी शिव आप आदि, मध्य एवं अंत रहित सनातन हैं। हे दिव्य चिदाकाश रूपी अम्बर धारी शिव !! आपके 'य' अक्षर द्वारा जाने जाने वाले स्वरूप को नमस्कार है।

पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेत् शिव सन्निधौ। 
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥

अर्थात: जो कोई भगवान शिव के इस पंचाक्षर मंत्र का नित्य उनके समक्ष पाठ करता है वह शिव के पुण्य लोक को प्राप्त करता है तथा शिव के साथ सुखपूर्वक निवास करता है।

॥ इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचितं श्रीशिवपंचाक्षरस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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