4 दिसंबर 2018

धर्मः मम - ३ (अंतिम भाग)

दिव्यवंशी पाण्डवों में स्वविवेक है, विचारशीलता है, सत्य विद्यमान है और भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम है। स्वविवेक से ही धर्ममम का विस्तार होता है, इसकी गूढता सरलता में परिवर्तित होती है, इसके मर्म का ज्ञान होता है। बृहस्पति स्मृति में कहा गया है -

केवलं शास्त्रमाश्रित्य न कर्तव्यो विनिर्णयः !
युक्तिहीनविचारे तु धर्महानिः प्रजायते !!

अर्थात् "केवल शास्त्र का आश्रय लेकर कर्तव्य-निर्णय नहीं करना चाहिए क्योंकि युक्तिहीन विचार करने पर धर्म की हानि हो जाती है।"

जिसके पास नेत्र ही न हों वह दर्पण से क्या लाभ ले पायेगा? जिसके पास ज्ञानचक्षु ही न हों वह स्वविवेक का और दूरदर्शिता का क्या विचार कर पायेगा? दुर्योधन और अर्जुन दोनों ने प्रभु श्रीकृष्ण को महाभारत युद्ध का निमन्त्रण देने के लिए द्वारिका प्रस्थान किया। इन दोनों का आना जान श्रीहरि ने युक्ति से काम लिया और निद्रा में लीन हो गये। राजा दुर्योधन द्वारिका पहुँचे और भगवान श्रीकृष्ण को सोते देख अभिमानवश उनके सिरहाने बैठ गये। उसी समय पहुँचे अर्जुन प्रभु के चरणकमलों की ओर खडे हो उन्हीं का स्मरण करने लगे। भगवान मधुसूदन ने जगकर सर्वप्रथम अर्जुन को देखा और उन दोनों का अभिवादन स्वीकार कर स्वागत किया। दोनों के द्वारा युद्ध का निमन्त्रण दिये जाने पर उन दोनों को कहा - मेरी सहायता दो प्रकार से प्राप्त होगी। एक ओर मैं युद्ध नहीं करूँगा, शस्त्र का प्रयोग नहीं करूँगा और दूसरी ओर मेरी अत्यन्त बलशालिनी नारायणी सेना रहेगी। अर्जुन! सर्वप्रथम मैंने तुम्हे देखा है, इसलिए धर्मानुसार पहले तुम माँग लो। अर्जुन ने श्रीकृष्ण को माँग लिया अर्थात् सर्वस्व ले लिया और दुर्योधन ने नारायणी सेना माँगी एवं प्रसन्नचित्त होता हुआ, मन ही मन अपनी बुद्धि की प्रशंसा करता हुआ हस्तिनापुर लौट गया। 

दुर्योधन ने अपने सर पर काल को तभी सवार कर लिया, अपनी हार तभी निश्चित कर ली, अपनी मृत्यु का वरण तभी कर लिया जब भगवान श्रीकृष्ण युद्ध के मुहाने पर दूत बन संधि का प्रस्ताव लेकर कौरव पक्ष के पास गये और सुलह की बात करते हुए केवल पाँच गांवों की माँग की और दुर्योधन ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। श्रीकृष्ण के समझाने पर भी दुष्ट बुद्धि वाला दुर्योधन न माना और स्पष्ट कहा - "मेरे जीते जी पाण्डव राज्य नहीं पा सकते, यहाँ तक कि सुईं की नोक भर भी जमीन मैं पाण्डु पुत्रों को नहीं दूँगा।"इसके पश्चात् धर्मयुद्ध करना पाण्डवों के लिए अनिवार्य बन गया। 

ब्रह्माजी के पुत्र श्रीसनक जी नारद जी को कहते हैं - "हे देवर्षि नारद! शरीर को क्षेत्र कहते हैं जो क्षेत्र में स्थित आत्मा है, वह क्षेत्रज्ञ कहलाता है। परमात्मा अव्यक्त, शुद्ध एवं सर्वत्र परिपूर्ण कहा गया है। परमात्मा सूक्ष्म से भी अत्यन्त सूक्ष्म और महान् से भी अत्यन्त महान है। वह सनातन परमेश्वर समस्त विश्व का कारण है। योगी लोग अपने ह्रदय में जिस अजन्मा, शुद्ध, विकार रहित, सनातन परमात्मा का दर्शन करते हैं, उन्हीं का नाम परब्रह्म है। मैं सत्य कहता हूँ, हित की बात कहता हूँ और बार-बार सम्पूर्ण शास्त्रों का सार बताता हूँ - इस असार संसार में श्रीहरि की आराधना ही सत्य है। अतः देवर्षे! तुम सदैव श्रीहरि का भजन करो। बचपन और बुढापे में भगवान की आराधना नहीं हो सकती अतः अहंकार छोडकर युवावस्था में ही धर्मो का अनुष्ठान करना चाहिए। सदा भगवान विष्णु का भजन करो, क्योंकि मनुष्य जन्म अत्यन्त दुर्लभ है। 

अच्युतानन्तगोविन्दनामोच्चारणभेषजात् !
नश्यन्ति सकला रोगाः सत्यं सत्यं वदाम्यहम् !!

अर्थात, अच्युत, अनन्त और गोविन्द - इन नामों के उच्चारण रूप औषध से सब रोग नष्ट हो जाते हैं। यह मैं सत्य कहता हूँ, सत्य कहता हूँ। भगवान गोविन्द का आश्रय लो, इस कार्य में विलम्ब न करो, क्योंकि यमराज का नगर निकट ही है। जो मनुष्य दिन-रात विष्णु के नाम का कीर्तन अथवा उसकी पूजा करते हैं उन्हें कलियुग बाधा नहीं देता है। जो शिवशंकर! रुद्र! नीलकण्ठ! त्रिलोचन! इत्यादि महादेव जी के नामों का उच्चारण करते हैं, उन्हें भी कलियुग बाधा नहीं देता। अतः मैं सम्पूर्ण लोकों के हित की बात कहता हूँ कि भगवन्नामपरायण मनुष्यों को कलियुग कभी बाधा नहीं दे सकता। 

हरेर्नामैव नामैव नामैव मम जीवनम् !
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा !!

अर्थात, भगवान विष्णु का नाम ही मेरा जीवन है। कलियुग में दूसरी कोई गति नहीं है... नहीं है... नहीं है..."

श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि - "मनुष्य जन्म का यही इतना ही लाभ है चाहे जैसे हो ज्ञान से, भक्ति से अथवा अपने धर्म की निष्ठा से जीवन को ऐसा बना लिया जाए कि जिससे मृत्यु के समय भगवान की स्मृति अवश्य ही बनी रहे। और धर्मनिष्ठ पाण्डवों ने इसी राह पर चल, सत्यपथ को पकड, भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित हो, इन्हीं का आश्रय ले, दुःख-सुख को समान समझ इहलोक को भोग, अपना परलोक संवार अपने को श्रीकृष्ण कृपा द्वारा भवसागर से पार कर लिया। भगवान श्रीकृष्ण चातुर्वर्ण्य की उत्पत्ति करते हैं, चारों आश्रमों को स्थापित करते हैं और ये ही इन सबमें प्रविष्ट होकर अपनी जीवनचर्या से जन-जन को शिक्षा देते हैं। आदि शंकराचार्य के स्वरूप में शिव ही अनेक समुदायों को क्षत्रियों में परिवर्तित कर देते हैं। श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण उद्धव जी को कहते हैं -

तेजः श्रीः कीर्तिरैश्वर्यं ह्रीस्त्यागः सौभगं भगः !
वीर्यं तितिक्षा विज्ञानं यत्र यत्र स में$शकः !!

अर्थात, हे उद्धव! ऐसा समझो कि जिसमें भी तेज, श्री, कीर्ति, ऐश्वर्य, लज्जा, त्याग, सौन्दर्य, सौभाग्य, पराक्रम, तितिक्षा और विज्ञान आदि श्रेष्ठ गुण हों, वह मेरा ही अँश है। 

ये महर्षि नर (अर्जुन) और महर्षि नारायण (श्रीहरि) स्वरूपों में बदरिकाश्रम में तपस्या करते हुए परमश्रेष्ठ संन्यासियों को अपने आचरण से शिक्षित करते हैं। कपिल स्वरूप में सांख्ययोग की शिक्षा देते हैं, और परशुराम - राम, कृष्ण स्वरूपों में अवतरित हो साधु-संतो की रक्षा का भार उठाते हैं। रामानंद जी के रूप मे भक्तिमार्ग की शिक्षा देते हैं एवं समर्थ गुरू रामदास जी के स्वरूप में शिवाजी को छत्रपति बनाते हैं। 

राजा परीक्षित को शुकदेव जी प्रभु श्रीकृष्ण के विषय में बताते हैं - "प्रातःकाल भगवान श्रीकृष्ण ब्राह्ममुहूर्त में उठते थे, आत्मध्यान करते थे, अपने ही सच्चिदानन्दमय स्वरूप के ध्यान में मग्न हो जाते थे। शुद्ध जल में स्नान कर विधिपूर्वक सन्ध्योपासनादि नित्यक्रिया और अग्नि में हवन कर मौन होकर गायत्री-मंत्र का जाप करते थे। इसके बाद कुल के बडे-बूढो और ब्राह्मणों की विधिपूर्वक पूजा करते थे। तदन्तर परम मनस्वी भगवान श्रीकृष्ण दुधारू एवं बछडों वाली हजारों गौओं का दान करते थे। इसके पश्चात् अन्यान्य प्रजा की कामनापूर्ति करके उन्हें संतुष्ट करते थे और इस प्रकार सबको प्रसन्न देखकर स्वयं भी आनन्दित होते थे।" प्रभु श्रीकृष्ण की शरणागति से व्यक्ति सम्पूर्ण विघ्नों से पार पा लेता है, श्रीकृष्णकृपा सभी साधनों का सार है। ईश्वर की शरणागति शीघ्र ही धर्मात्मा एवं उनके युगल चरणों का अनुगामी बना देती है और शान्ति प्राप्त होती है। अतएव श्रेष्ठ पाण्डवों की तरह भगवान का आश्रय लेकर ही कर्म करने चाहिए। प्रत्येक स्थिति में धैर्य धारण करें, धर्मशास्त्रों में निष्ठा रखें और आदर्श मानें, ईश्वर द्वारा बताये गये उपदेशों को ग्रहण करें। श्रीकृष्ण ही धर्म हैं, श्रीकृष्ण ही धर्म के मूल हैं, श्रीकृष्ण ही धर्म के रक्षक हैं और श्रीकृष्ण ही धर्माचरण करने वाले हैं। परमादर्श परमपिता परमेश्वर श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता में उद्घोष करते हैं -

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु !
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियो$सि मे !!

जय श्रीकृष्ण!
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ये लेख हमें श्री प्रदीप अरोरा जी से प्राप्त हुआ है जो हकीकत नगर, सराहनपुर, उत्तरप्रदेश के निवासी हैं। इन्होने सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय (वाराणसी) से साहित्याचार्य की उपाधि प्राप्त की है। इसके अतिरिक्त इन्हे अंकज्योतिष का भी अच्छा ज्ञान है। इनके लेख कई पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहते हैं। सराहनपुर से प्रकाशित "महाविद्या पञ्चाङ्ग" में नियमित इनके धार्मिक लेख प्रकाशित होते रहते हैं। हकीकत नगर में ही इनकी अपनी इलेक्ट्रिकल उपकरणों की दुकान है। धर्मसंसार में सहयोग देने के लिए हम इनके अत्यंत आभारी हैं।