2 दिसंबर 2018

धर्मः मम - २

कुरुक्षेत्र को धर्मभूमि कहा गया है जहाँ ब्रह्मा जी और देवगणों ने तप किया था। चन्द्रवंशी राजा कुरु ने तपस्या की थी और इन्हीं के नाम पर इस क्षेत्र का नाम कुरुक्षेत्र पडा। यह भूमि पुण्यों में वृद्धि करती है, यह परम पवित्र तीर्थस्थल रहा है, यहाँ युद्धस्थल में वीरगति प्राप्त होने वाले वीरों को स्वर्ग की प्राप्ति हो इसी हेतु इस क्षेत्र को युद्ध के लिए चुना गया। चौरासी लाख योनियों में एकमात्र मानवयोनि ही कर्मयोनि और भोगयोनि दोनों हैं। यह शरीर कुरुक्षेत्र है, कुरु अर्थात् कर्म करने का पावन संदेश। इस कर्मरूपी क्षेत्र में जैसा बीज बोया जाता है वैसी ही फसल कटती है। पूर्वजन्म के महाराज भरत, ब्राह्मण जडभरत जी सौवीरनरेश को कहते हैं - "कहीं भी आने-जाने का कर्म कर्मफल के उपभोग के लिए ही हुआ करता है। धर्माधर्मजनित सुख-दुःखों का उपभोग करने के लिए ही जीव देह आदि धारण करता है। भूपाल! सब जीवों की सम्पूर्ण अवस्थाओं के कारण केवल उनके धर्म और अधर्म ही हैं।" अपने मित्र एवं शत्रु हम स्वयं ही हैं और यह शरीर हमें भोगों की अति से दूर रह उत्तम कर्मो के लिए मिला है जिससे मृत्यु पश्चात् भी कीर्ति की सुगन्ध चहुँ ओर बिखरती रहे और अमरता प्राप्त हो। 

पुत्र मोह के कारण वृद्ध धृतराष्ट्र संजय से अपने अधर्मी पुत्रों को 'मेरे' कह और अपने भाई की संतानों युधिष्ठिर आदिक भाईयों को 'पाण्डु के पुत्र' कहकर सम्बोधित करते हैं। इससे धृतराष्ट्र की दुर्भावना स्पष्ट होती है जो अपने आतताई और अधर्म पर चलने वाले पुत्रों की विजय चाहते हैं। महाभारत युद्ध के पश्चात् भी वे इस भावना से, पक्षपात से ऊबर नहीं पाते। अपनी भावनाओं को रोक नहीं पाते और भीमसेन को अपनी भुजाओं में दबाकर मार डालना चाहते हैं। महाराज युधिष्ठिर धर्मावतार हैं, साक्षात धर्मराज ही युधिष्ठिर के रूप में धरा-धाम पर अवतरित होते हैं। इन धर्मरूपी वृषभ के चारों पाद उनके भाई हैं और जगद्गुरु श्रीकृष्ण द्वारा नियन्त्रित हैं, उनकी कृपा के पात्र हैं, उनके परम भक्त है, उनकी शरण में हैं। पाँचों पाण्डव निज हेतु नहीं बल्कि न्याय के लिए युद्ध करते हैं। अधर्म को समाप्त करने के लिए युद्ध करते हैं और दुष्टों के दमन के लिए कालस्वरूप हो जाते हैं। 

महाराज धृतराष्ट्र मन ही मन भयभीत हैं क्योंकि वे यह भलीभाँति जानते हैं कि सत्य की ही जीत होती है ( सत्यमेव जयते)। महात्मा विदुर जी के समझाने पर भी धृतराष्ट्र उनसे कहते हैं - "सौम्य! तुम मुझसे जो कुछ कहते हो, वैसे ही मैं भी विचार रखता हूँ यद्यपि दुर्योधन से मिलने पर मेरी बुद्धि पलट जाती है। 

न दिष्टमश्यतिक्रान्तुं शक्यं भूतेन केनचित् !
दिष्टमेव ध्रुवं मन्ये पौरुषं तु निरर्थकम् !!

अर्थात, प्रारब्ध का उल्लड्घन करने की शक्ति किसी भी प्राणी में नहीं है। मैं तो प्रारब्ध को ही अचल मानता हूँ, उसके सामने पुरुषार्थ तो व्यर्थ है।"

महाराज धृतराष्ट्र को धर्मात्मन् विदुर जी के कहे वचन स्मरण हो उठते हैं। राजा धृतराष्ट्र युद्ध के परिणाम को लेकर विचलित थे। उन्होंने विदुर जी को परामर्श देने को कहा। धर्मात्मा पुरुष और सत्यपथ के अनुगामी विदुर जी अपने दुष्कर्मो के कारण अधर्मरूपी दुर्योधन के पक्ष का विनाश सुनिश्चित समझ इसे टालने के लिए एवं पाण्डवों को न्याय दिलवाने हेतु महाराज धृतराष्ट्र को समझाते हैं - "आप दुर्योधन, शकुनि, कर्ण तथा दुःशासन जैसे अयोग्य व्यक्तियों पर राज्य का भार रखकर कैसे ऐश्वर्य-वृद्धि चाहते हैं?  'अब तो राज्य प्राप्त हो ही गया' - ऐसा समझकर अनुचित बर्ताव नहीं करना चाहिए। उद्दण्डता सम्पत्ति को उसी प्रकार नष्ट कर देती है जैसे सुन्दर रूप को बुढापा।" भरत श्रेष्ठ! आपके पुत्रों की वह (मलिन) बुद्धि पाण्डवों के प्रति विरोध से व्याप्त हो गयी है, आप इन्हें पहचान नहीं रहे हैं। आपका आज्ञाकारी युधिष्ठिर ही इस पृथ्वी का शासक होने योग्य है। धर्मधारियों में श्रेष्ठ युधिष्ठिर दया, सौम्यभाव तथा आपके प्रति गौरव बुद्धि के कारण बहुत कष्ट सह रहा है। मैंने आपसे कहा था कि आप द्युतक्रीडा में आसक्त दुर्योधन को रोकें किन्तु आपने मेरा कहना नहीं माना। समस्त पाण्डव सत्य पर डटे हुए हैं। हे राजन! जो मनुष्य अपने साथ जैसा बर्ताव करे उसके साथ वैसा ही बर्ताव करना चाहिए यही नीति धर्म है। कपट का आचरण करने वाले के साथ कपटपूर्ण बर्ताव करे और अच्छा बर्ताव करने वाले के साथ साधुभाव से ही बर्ताव करना चाहिए। आप सिंहों (पाण्डवों) को छोडकर सियारों (दुष्ट पुत्रों) की रक्षा कर रहे हैं। समय आने पर आपको इसके लिए पश्चाताप् करना पडेगा। अतः आप पाण्डवों से संधि कर लें। अपने पुत्रों सहित आप लता के समान हैं और पाण्डव महान शालवृक्ष के सदृश हैं। महान वृक्ष का आश्रय लिए बिना लता कभी बढ नहीं सकती। शुभ चाहने वालों को अपने जाति-भाईयों के साथ मिलकर सुख का उपभोग करना चाहिए। राजन्! लकडी डालकर आग को जीतने की आशा न रखें। जिनके पास हजार (रुपये) हैं वे भी जीवित हैं तथा जिनके पास सौ (रुपये) हैं वे भी जीवित हैं। अतः महाराज धृतराष्ट्र! आप अधिक का लोभ छोड दीजिए, इससे भी किसी तरह जीवन रहेगा ही। अतः आप युधिष्ठिर को पुनः राजधर्म में नियुक्त कीजिए। हे राजन्! मैं फिर कहता हूँ यदि आपका अपने पुत्रों और पाण्डवों में समान भाव है तो उन सभी पुत्रों के साथ एक-सा बर्ताव कीजिए।"

असंगति का प्रभाव, कुसंस्कारों का प्रभाव व्यापक होता है। यह अपनी पकड में शीघ्र ले लेता है किन्तु परिणाम में विष होता है, पतन को प्राप्त होता है। इसके उलट संगति का प्रभाव सुसंस्कारों का प्रभाव धीरे-धीरे जड जमाता है और परिणाम में अमृत समान हो यश दिलाता है। दुर्योधन पक्ष पर कुसंस्कार व कुसंगति हावी हो चुकी थी, कुटिलता में ही उन्हें लाभ दिखता था और सह्रदयता से वे कोसों दूर हो चुके थे। रामचरितमानस उत्तरकाण्ड में श्रीरामचन्द्र जी कहते हैं - "सरल स्वभाव न मन कुटिलाई, यथा लाभ सन्तोष सदाई।" धृतराष्ट्र भीष्म, द्रौणाचार्य, कर्ण आदिक वीरों के बाहुबल पर अपने पुत्रों की विजय की कामना ह्रदय में रखते थे। संजय उन्हें स्पष्ट कर देता है कि जहाँ अर्जुन (नर) और श्रीकृष्ण (नारायण) नहीं हैं, वहाँ पराजय निश्चित है क्योंकि ये दोनों ही श्रीहरि के स्वरूप हैं। श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं - पाण्डवानां धनञ्जयः अर्थात् पाण्डवों में मैं अर्जुन हूँ। 

पितामह भीष्म भलीभाँति जानते हैं कि श्रीकृष्ण सर्वाधार हैं, परमपिता परमेश्वर हैं, ये अर्जुन को कहते हैं - "यतः कृष्णस्ततो धर्मः यतो धर्मस्ततो जयः" अर्थात् जहाँ कृष्ण हैं वहाँ धर्म है, जहाँ धर्म है वहाँ जय है।" यही बात धृतराष्ट्र से महात्मा संजय कहते हैं - जहाँ श्रीकृष्ण (नारायण) और अर्जुन (नरश्रेष्ठ), हैं वहीं शोभा, यश, जय, सफलता, समृद्धि, ऐश्वर्य, न्याय और धर्म है एवं यह सर्वविदित है कि सत्य की ही जीत होती है। भगवान श्रीकृष्ण जिनमें श्री, विजय, विभूति और अचल नीति समाहित है, वे असंख्य ब्रह्माण्डों के अधिपति क्षणभर में समस्त जगत की उत्पत्ति, पालन और संहार कर सकते हैं। वे श्रीकृष्ण महाभारत युद्ध में पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर के सहायक हैं। पवित्रात्मा, धर्मनीति का पालन करने वाले और सत्यवादी युधिष्धिर की विजय सुनिश्चित थी। पाण्डवों ने अपने आपको भगवान श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित कर दिया था, उन्हीं की शरण ग्रहण कर ली थी क्योंकि वे भलीभाँति जानते थे कि श्रीकृष्ण सृष्टि के संचालक है, हमारे नियन्ता हैं। नरश्रेष्ठ महात्मा अर्जुन सदैव श्रीकृष्ण का स्मरण करते थे और सोते समय भी इनकी देह से श्रीकृष्ण नाम की ध्वनि निकला करती थी जो वातावरण को परम-पवित्र बना देती थी। इसी शरणागति और विश्वास को गोस्वामी तुलसीदास जी ने कवितावली में रामस्वरूप को आराध्य मान अभिव्यक्त किया है -

कानन भूधर वारि बयारि महाविष व्याधि दवा अरि घेरे !
संकट कोटि जहाँ तुलसी सूत मात पिता हितु बंधु न नेरे !!
राखिहै राम कृपालु तहाँ हनुमान से सेवक हैं जेहि केरे !
नाक रसातल भूतल में रघुनायक एक सहायक मेरे !!

अर्थात् वन, पर्वत, जल, आँधी, महाविष, रोग, अग्नि, शत्रु से घिरने पर तथा जहाँ कोटि संकट हों और पुत्र, माता-पिता, हितैषी, बंधु भी निकट न हों, वहाँ कृपालु राम रक्षा करेंगे जिनके हनुमान् जैसे समर्थ सेवक हैं। स्वर्ग, पाताल और पृथ्वी पर श्रीराम मेरे एक सहायक हैं। 

शेष... 
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ये लेख हमें श्री प्रदीप अरोरा जी से प्राप्त हुआ है जो हकीकत नगर, सराहनपुर, उत्तरप्रदेश के निवासी हैं। इन्होने सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय (वाराणसी) से साहित्याचार्य की उपाधि प्राप्त की है। इसके अतिरिक्त इन्हे अंकज्योतिष का भी अच्छा ज्ञान है। इनके लेख कई पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहते हैं। सराहनपुर से प्रकाशित "महाविद्या पञ्चाङ्ग" में नियमित इनके धार्मिक लेख प्रकाशित होते रहते हैं। हकीकत नगर में ही इनकी अपनी इलेक्ट्रिकल उपकरणों की दुकान है। धर्मसंसार में सहयोग देने के लिए हम इनके अत्यंत आभारी हैं।