31 दिसंबर 2018

जब काकभुशुण्डि ने गरुड़ का भ्रम दूर किया

रामायण में एक प्रसंग ऐसा आता है जब नारायण के वाहन गरुड़ को श्रीराम के विष्णु अवतार होने पर संदेह हो गया था। ये वर्णन तब आता है जब श्रीराम की सेना ने लंका पर आक्रमण किया और श्रीराम के नेतृत्व में वानरों और ऋक्षों की सेना ने रावण के कई महारथियों का वध कर दिया। यहाँ तक कि कुम्भकर्ण भी श्रीराम के हाथों वीरगति को प्राप्त हुआ। तब रावण ने स्वयं युद्ध में जाने की ठानी पर उसके पुत्र मेघनाद ने अपने पिता को रोकते हुए कहा कि जब तक वो है तब तक उन्हें राजा होते हुए युद्ध में नहीं जाना चाहिए।

29 दिसंबर 2018

भगवान दत्तात्रेय के २४ गुरु

भगवान दत्तात्रेय महर्षि अत्रि के पुत्र थे जो नारायण के अंश से जन्मे थे। उन्हें भगवान विष्णु का ही एक रूप माना जाता है। श्री दत्तात्रेय ने एक बार देवर्षि नारद से कहा था कि उन्होंने कई लोगों और चीजों से काफी कुछ सीखा है और उन्होंने जिनसे भी सीखा है उन्हें वे अपना गुरु मानते है। यहाँ तक कि उन्होंने पशुओं के भी अपने गुरु का दर्जा दिया। देवर्षि नारद के अनुसार भगवान दत्तात्रेय ने उन्हें अपने २४ गुरुओं के बारे में बताया। ये हैं:

27 दिसंबर 2018

मानवता को महर्षि मनु की देन

'मनुस्मृति नामक धर्मशास्त्र और संविधान के प्रणेता राजर्षि मनु 'स्वायम्भुव' न केवल भारत की, अपितु सम्पूर्ण मानवता की धरोहर हैं। आदिकालीन समाज में मानवता की स्थापना, संस्कृति-सभ्यता का निर्माण और इनके विकास में राजर्षि मनु का उल्लेखनीय योगदान रहा है। यही कारण है कि भारत के विशाल वाङ्मय के साथ-साथ विश्व के अनेक देशों के साहित्य में मनु और मनुवंश का कृतज्ञतापूर्ण स्मरण तथा उनसे सम्बद्ध घटनाओं का उल्लेख प्राप्त होता है। यह उल्लेख इस तथ्य को स्पष्ट करता है कि प्राचीन समाज में मनु और मनुवंश का स्थान महत्वपूर्ण और आदरणीय था। जिस प्रकार विभिन्न कालखण्डों में उत्पन्न विशिष्ट व्यक्तियों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने तथा उनकी स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिये उनका नाम स्थानों, नगरों आदि के साथ जोड़ दिया जाता है उसी प्रकार प्राचीन समाज ने मनु और मनुवंश का नाम सृष्टि के कालखण्डों के साथ जोड़कर चौदह मन्वन्तरों का नाम चौदह मनुओं के नाम पर रखा जिनमें प्रथम मन्वन्तर का नाम 'स्वायम्भुव मन्वन्तर' है। आदि मानव-समाज के मूल रूप से जुड़ाव का जैसा अनोखा उदाहरण मनु स्वायम्भुव का मिलता है वैसा उदाहरण समाज में विरल ही मिलता है।

25 दिसंबर 2018

भगवान शिव के छः पुत्र

वैसे तो जब शिवपुत्र की बात आती है तो हमारे ध्यान में कार्तिकेय और गणेश ही आते हैं। वैसे तो भगवान शिव के किसी भी पुत्र ने माता पार्वती के गर्भ से जन्म नहीं लिया है किन्तु फिर भी कार्तिकेय और गणेश को शिव-पार्वती का ही पुत्र माना जाता है और इनकी प्रसिद्धि सबसे अधिक है। किन्तु इसके अतिरिक्त भी चार व्यक्ति ऐसे हैं जिन्हे शिवपुत्र होने का गौरव प्राप्त है। हालाँकि ये इतने प्रसिद्ध नहीं हैं और पुराणों में भी इनके शिवपुत्र होने के विषय में अधिक वर्णन नहीं किया गया है किन्तु इन्हे भगवान शिव और माता पार्वती का पुत्र ही माना जाता है। तो आइये उनके बारे में कुछ जानते हैं:

23 दिसंबर 2018

राक्षसों का वंश वर्णन

पुराणों के अनुसार परमपिता ब्रह्मा के शरीर से जल की उत्पत्ति हुई। उसी जल से दो जातियों की उत्पत्ति हुई जिन्होंने ब्रह्मदेव से पूछा कि उनकी उत्पत्ति क्यों हुई है? तब ब्रह्मा ने उनसे पूछा कि तुममे से कौन इस जल की रक्षा करेगा। उनमे से एक ने कहा कि हम इस जल की रक्षा करेंगे, वे "राक्षस" कहलाये। दूसरे ने कहा वे उस जल का यक्षण (पूजा) करेंगे, वे यक्ष कहलाये। तब ब्रह्मदेव ने दो राक्षसों हेति-प्रहेति की उत्त्पति कि जिससे आगे चल कर राक्षस वंश चला। आगे चल कर इस वंश में एक से एक पराक्रमी योद्धाओं ने जन्म लिया जिसमे से सबसे प्रसिद्ध रावण है। इसके अतिरिक्त ब्रह्मा के पौत्र और महर्षि मरीचि के पुत्र महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी सुरसा के पुत्रों को भी राक्षस कहा जाता है। आइये राक्षस वंश पर एक दृष्टि डालते हैं:

21 दिसंबर 2018

श्री दत्तात्रेयस्तोत्रम्

जटाधरं पाण्डुरंगं शूलहस्तं दयानिधिम्।
सर्वरोगहरं देवं दत्तात्रेयमहं भजे ॥१॥

जगदुत्पत्तिकर्त्रे च स्थितिसंहारहेतवे।
भवपाशविमुक्ताय दत्तात्रेय नमोस्तुते॥२॥

जराजन्मविनाशाय देहशुद्धिकराय च।
दिगंबर दयामूर्ते दत्तात्रेय नमोस्तुते॥३॥

कर्पूरकान्तिदेहाय ब्रह्ममूर्तिधराय च।
वेदशास्स्त्रपरिज्ञाय दत्तात्रेय नमोस्तुते॥४॥

ह्रस्वदीर्घकृशस्थूलनामगोत्रविवर्जित!
पञ्चभूतैकदीप्ताय दत्तात्रेय नमोस्तुते॥५॥

यज्ञभोक्त्रे च यज्ञेय यज्ञरूपधराय च।
यज्ञप्रियाय सिद्धाय दत्तात्रेय नमोस्तुते॥६॥

19 दिसंबर 2018

काकभुशुण्डि

काकभुशुण्डि का वर्णन वाल्मीकि रामायण एवं तुलसीदास के रामचरितमानस में आता है। सबसे पहला वर्णन इनका तब आता है जब देवी पार्वती ने महादेव से श्रीराम की कथा सुनाने का अनुरोध किया था। माता के अनुरोध पर भगवान शिव उन्हें एकांत में ले गए और रामकथा विस्तार से सुनाने लगे। दैववश देवताओं के लिए भी दुर्लभ उस कथा को वहाँ बैठे एक कौवे ने सुन लिया। भगवान शिव द्वारा कथा सुनाये जाने पर उसे श्रीराम के सभी रहस्यों सहित पूर्ण कथा का ज्ञान हो गया। वही कौवा आगे चल कर काकभुशुण्डि के रूप में जन्मा।

16 दिसंबर 2018

हिन्दू धर्म में संख्याओं का महत्व

१ 
  • एक ओम्कार् -
२ 
  • दो लिंग - नर और नारी ।
  • दो पक्ष - शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष।
  • दो पूजा - वैदिकी और तांत्रिकी।
  • दो अयन- उत्तरायन और दक्षिणायन।

14 दिसंबर 2018

श्री शिव पंचाक्षर स्तोत्र

पिछले लेख में हमने पञ्चाक्षरी मन्त्र के बारे में चर्चा की थी। आदि शंकराचार्य ने इस महान पञ्चाक्षरी मन्त्र की महत्ता को विस्तृत तरह से काव्य के रूप में बताया है जो "श्री शिव पञ्चाक्षर स्त्रोत्र" के रूप में जाना जाता है। शिव पंचाक्षर स्तोत्र पंचाक्षरी मन्त्र ॐ नमः शिवाय की ही विस्तृत व्याख्या है। पञ्चाक्षरी मन्त्र की तरह ही इसके पाँच छंद हैं और अंतिम छंद के रूप में इसके महत्त्व को बताया गया है। आदि शंकराचार्य के विषय में कहा जाता है कि - अष्टवर्षेचतुर्वेदी द्वादशेसर्वशास्त्रवित् षोडशेकृतवान्भाष्यम्द्वात्रिंशेमुनिरभ्यगात्। अर्थात: आठ वर्ष की आयु में चारों वेदों में निष्णात हो गए, बारह वर्ष की आयु में सभी शास्त्रों में पारंगत, सोलह वर्ष की आयु में शांकरभाष्य तथा बत्तीस वर्ष की आयु में शरीर त्याग दिया। तो आइये इस स्तोत्र की महिमा समझते हैं। 

12 दिसंबर 2018

"ॐ नमः शिवाय" - पञ्चाक्षरी मन्त्र का महत्त्व

वेदों और पुराणों में वर्णित जो सर्वाधिक प्रभावशाली एवं महत्वपूर्ण मन्त्र हैं, उनमे से श्रेष्ठ है भगवान शिव का पञ्चाक्षरी मन्त्र - "ॐ नमः शिवाय"। इसे कई सभ्यताओं में महामंत्र भी माना गया है। ये पंचाक्षरी मन्त्र, जिसमे पाँच अक्षरों का मेल है, संसार के पाँच तत्वों का प्रतिनिधित्व करता है जिसके बिना जीवन का अस्तित्व ही संभव नहीं है। ॐ नमः शिवाय का मूल अर्थ है "भगवान शिव को नमस्कार", तो अगर एक प्रकार से देखें तो इस मन्त्र का अर्थ बहुत ही सरल है, ठीक उसी तरह जिस प्रकार भोलेनाथ को समझना बहुत सरल है। साथ ही साथ ये मन्त्र उतना ही महत्वपूर्ण और शक्तिशाली है जितने महादेव। इसे पञ्चाक्षरी मन्त्र इसी लिए कहते हैं क्यूंकि श्री रुद्रम चमकम (कृष्ण यजुर्वेद) एवं रुद्राष्टाध्यी (शुक्ल यजुर्वेद) के अनुसार ये पाँच अक्षरों से मिलकर बना है:

10 दिसंबर 2018

रामचरित मानस के कुछ रोचक तथ्य

वाल्मीकि रामायण के बाद अगर कोई और राम कथा सबसे प्रसिद्ध है तो वो है तुलसीदास कृत रामचरितमानस। इसे तुलसीदास जी ने १५७४ ईस्वी में लिखना आरम्भ किया था और २ वर्ष ७ मास और २६ दिन के बाद १५७६ ईस्वी को इसे पूर्ण किया। आइये रामचरितमानस के बारे में कुछ अनसुने तथ्य जानते हैं।
  1. मानस में "राम" शब्द कितनी बार आया है: १४४३ बार 
  2. मानस में "सीता" शब्द कितनी बार आया है: १४७ बार 

8 दिसंबर 2018

हनुमद रामायण - जिसे बजरंगबली ने स्वयं समुद्र में डुबा दिया

रामायण का जिक्र आते ही हमारे दिमाग में सबसे पहले महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखा गया मूल रामायण ही आता है। आधुनिक युग में उनके बाद सबसे प्रसिद्ध रचना तुलसीदास कृत रामचरितमानस है। इसके अतिरिक्त भी रामायण के कई और महत्वपूर्ण स्वरुप हैं जैसे कम्ब रामायण इत्यादि। ये बात तो निर्विवाद है कि रामायण में अगर कोई श्रीराम के अनन्य भक्त थे तो वो महाबली हनुमान ही थे। बहुत कम लोगों को ये पता होगा कि रामायण का एक स्वरुप स्वयं पवनपुत्र हनुमान ने भी लिखा था किन्तु वो अब उपलब्ध नहीं है क्यूंकि ऐसी मान्यता है कि उस रामायण को स्वयं पवनपुत्र ने समुद्र में डुबा दिया था। इस घटना का वर्णन भी आपको बहुत ही कम पुस्तकों में मिलता है और ये कथा पीढ़ी दर पीढ़ी लोक कथाओं के रूप में सुनी सुनाई जाती रही है। 

6 दिसंबर 2018

लोमश ऋषि - भगवान शिव का वरदान जिनके लिए श्राप बन गया

लोमश ऋषि परम तपस्वी तथा विद्वान थे। वे बड़े-बड़े रोमों या रोओं वाले थे इसीकारण इनका नाम लोमश पड़ा। सप्त चिरंजीवियों के बारे में तो हम सबने सुना है लेकिन उसके अतिरिक्त भी कुछ ऐसे लोग है जिनके बारे में मान्यता है कि वे अमर हैं। उनमे से एक लोमश ऋषि भी हैं। अमरता का अर्थ यहाँ चिरंजीवी होना नहीं है बल्कि उनकी अत्यधिक लम्बी आयु से है। लोमश ऋषि ने युधिष्ठिर को ज्ञान की गूढ़ बातें बताई थी जिससे वे एक योग्य राजा बने। एक बार लोमश ऋषि भगवत कथा कर रहे थे। उसी भीड़ में बैठा एक व्यक्ति उन्हें बार-बार टोक रहा था। वो कभी एक प्रश्न पूछता तो कभी दूसरा। अंत में इससे क्रोधित होकर लोमश जी ने कहा - "रे मुर्ख! तू क्यों कौवे की तरह काँव-काँव कर रहा है? जा अगले जन्म में तू कौवा ही बन।"

4 दिसंबर 2018

धर्मः मम - ३ (अंतिम भाग)

दिव्यवंशी पाण्डवों में स्वविवेक है, विचारशीलता है, सत्य विद्यमान है और भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम है। स्वविवेक से ही धर्ममम का विस्तार होता है, इसकी गूढता सरलता में परिवर्तित होती है, इसके मर्म का ज्ञान होता है। बृहस्पति स्मृति में कहा गया है -

केवलं शास्त्रमाश्रित्य न कर्तव्यो विनिर्णयः !
युक्तिहीनविचारे तु धर्महानिः प्रजायते !!

2 दिसंबर 2018

धर्मः मम - २

कुरुक्षेत्र को धर्मभूमि कहा गया है जहाँ ब्रह्मा जी और देवगणों ने तप किया था। चन्द्रवंशी राजा कुरु ने तपस्या की थी और इन्हीं के नाम पर इस क्षेत्र का नाम कुरुक्षेत्र पडा। यह भूमि पुण्यों में वृद्धि करती है, यह परम पवित्र तीर्थस्थल रहा है, यहाँ युद्धस्थल में वीरगति प्राप्त होने वाले वीरों को स्वर्ग की प्राप्ति हो इसी हेतु इस क्षेत्र को युद्ध के लिए चुना गया। चौरासी लाख योनियों में एकमात्र मानवयोनि ही कर्मयोनि और भोगयोनि दोनों हैं। यह शरीर कुरुक्षेत्र है, कुरु अर्थात् कर्म करने का पावन संदेश। इस कर्मरूपी क्षेत्र में जैसा बीज बोया जाता है वैसी ही फसल कटती है।